दिल्ली एलजी द्वारा दायर बीस साल पुराने मानहानि केस में मेधा पाटकर बरी

साकेत कोर्ट ने दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना की ओर से दायर दो दशक पुराने आपराधिक मानहानि मामले में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को बरी कर दिया है. शनिवार को अदालत ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता मेधा पाटकर के ख़िलाफ़ अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहे.

मेधा पाटकर. (फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार ( 24जनवरी) को सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना द्वारा दायर 20 साल पुराने मानहानि मामले में बरी कर दिया.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, साकेत कोर्ट के साकेत कोर्ट के फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने कहा कि सक्सेना यह साबित करने में विफल रहे कि पाटकर ने अप्रैल 2006 में एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान उनके ख़िलाफ़ मानहानिकारक बयान दिए थे.

मालूम हो कि यह मामला 2006 का है. वीके सक्सेना उस समय नेशनल काउंसिल आफ सिविल लिबर्टीज (एनसीसीएल) के अध्यक्ष थे. उन्होंने 20 अप्रैल, 2006 को निजी टीवी चैनल के कार्यक्रम के दौरान मानहानि का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी.

उन्होंने दावा किया कि मेधा पाटकर ने आन एयर उन पर सरदार सरोवर निगम से सिविल कान्ट्रैक्ट लेने का आरोप लगाया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, अदालत ने माना कि पाटकर विवादित कार्यक्रम में पैनलिस्ट नहीं थीं और प्रसारण के दौरान केवल उनका पहले से रिकॉर्ड किया गया वीडियो क्लिप चलाया गया था.

समाचार एजेंसी के अनुसार, न्यायाधीश ने कहा, “यह ध्यान देने योग्य है कि न तो ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड करने वाले रिपोर्टर को और न ही आरोपी को आपत्तिजनक बयान देते हुए देखने वाले किसी व्यक्ति को गवाह के रूप में पेश किया गया है.”

उन्होंने आगे कहा कि प्रसारण के दौरान चलाया गया वीडियो पाटकर द्वारा आयोजित किसी साक्षात्कार या प्रेस कॉन्फ्रेंस का हिस्सा प्रतीत होता है.

न्यायाधीश ने कहा कि अदालत को किसी भी बात को साबित करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस के पूरे वीडियो और ऑडियो प्रस्तुत करना अनिवार्य है.

उन्होंने कहा कि सक्सेना कथित मानहानिकारक बयानों को रिकॉर्ड करने वाले मूल वीडियो फुटेज या रिकॉर्डिंग उपकरण को प्रस्तुत करने में विफल रहे हैं. परिणामस्वरूप, न्यायाधीश ने आगे कहा कि आरोप साबित नहीं किए जा सकते.

गौरतलब है कि इससे पहले बीते साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने सक्सेना द्वारा 2001 में दायर एक अलग मानहानि मामले में पाटकर की दोषसिद्धि को बरकरार रखा था.

सक्सेना ने आरोप लगाया था कि पाटकर ने नवंबर 2000 में जारी किए गए ‘देशभक्त का सच्चा चेहरा’ शीर्षक वाले एक प्रेस नोट में उनके खिलाफ मानहानि वाली बातें कहीं थीं.

मई 2024 में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने इस मामले में पाटकर को दोषी ठहराया था. उन्हें आपराधिक मानहानि का दोषी पाया गया और दो साल की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा सुनाई गई.

अदालत ने यह भी पाया था कि पाटकर ने सक्सेना पर ‘गुजरात की जनता और उनके संसाधनों को विदेशी हितों के लिए गिरवी रखने’ का आरोप लगाया था और इस आरोप को उनकी ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर ‘सीधा हमला’ माना था.

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी बरकरार रखा गया था.