नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी में गुरुवार (12 फरवरी, 2025) को आयोजित ‘समता उत्सव’ कार्यक्रम के दौरान इतिहासकार प्रो. एस. इरफ़ान हबीब पर बाल्टी समेत पानी और कूड़ेदान फेंका गया.
‘समता उत्सव’ आयोजित करने वाले वामपंथी छात्र संगठन आइसा का आरोप है कि इतिहासकार पर यह ‘हमला’ आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े कार्यकर्ताओं ने किया है.
यह घटना उस समय हुई जब ‘पीपुल्स लिटरेचर फेस्टिवल’ के तहत आयोजित कार्यक्रम में प्रो. हबीब भाषण दे रहे थे. आइसा ने इसे ‘सामाजिक न्याय और हाशिये के समुदायों की आवाज़ों पर संगठित हमला’ बताया है.
During Samta Diwas at Delhi University’s Arts Faculty, unidentified people throws water and a dustbin at historian Prof. S. Irfan Habib while he was speaking.
AISA alleged ABVP members involvement in the act. pic.twitter.com/PxHv6mmHkC
— Amit Pandey (@yuva_journalist) February 12, 2026
आइसा ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में हरेश चौधरी नामक व्यक्ति पर कार्यक्रम बाधित करने, पथराव करने और पानी फेंकने का आरोप लगाया है. संगठन का दावा है कि उक्त व्यक्ति एबीवीपी से जुड़ा है और लॉ फैकल्टी का छात्र है.
हालांकि, एबीवीपी ने इन आरोपों से इनकार किया है. पूरे मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष जानने का हमने डीयू प्रॉक्टर को ईमेल किया है, जवाब आने पर रिपोर्ट में जोड़ दिया जाएगा.
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‘यह गुंडागर्दी है’: प्रो. इरफ़ान हबीब
घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रो. एस. इरफ़ान हबीब ने द वायर हिंदी से कहा कि उन्हें चोट नहीं लगी, लेकिन उन पर पानी फेंका गया. उन्होंने बताया, ‘मुझे चोट नहीं लगी, लेकिन मैं भीग गया. बाल्टी फेंकी गई थी, जो दूर जाकर गिरी. कूड़ेदान भी फेंका गया, वो भी कहीं इधर-उधर गिरा.’
प्रो. हबीब ने विश्वविद्यालय परिसर को विचारों के आदान-प्रदान का खुला मंच बताते हुए कहा कि असहमति का जवाब बहस से दिया जाना चाहिए, न कि हिंसा से.
यूनिवर्सिटी कैंपस दुनिया की विभिन्न आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करता है. अगर आप चाहते हैं कि सभी लोग सिर्फ आपकी ही भाषा बोलें और एक ही विचारधारा हो, तो यह किसी के लिए ठीक नहीं है, न लेफ्ट के लिए, न राइट के लिए. अगर आपको जवाब देना है तो बोलिए, लिखिए, काउंटर कीजिए. लेकिन यह कोई तरीका नहीं है… यह गुंडागर्दी है.
उन्होंने कहा कि वह कार्यक्रम में एक अतिथि के रूप में शामिल हुए थे, ‘मैं वहां न पढ़ता हूं, न पढ़ाता हूं. फिर मेरे साथ या किसी के साथ भी ऐसी हरकत कैसे की जा सकती है? कैंपस इसके लिए नहीं होता.’

‘डरकर चुप हो जाना उनकी जीत होगी’
इस सवाल पर कि क्या इस घटना के बाद वह सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने से पहले सोचेंगे, प्रो. हबीब ने कहा कि हाल के वर्षों में कैंपस का माहौल बदला है.
पिछले कुछ सालों में कैंपस के हालात बेहद खराब हुए हैं. हम जैसे लोगों के लिए ओपन स्पेस पहले जितने सुरक्षित नहीं रह गए हैं. मुझे नहीं लगता कि मैं व्यक्तिगत रूप से निशाने पर था, बल्कि यह एक सोच के खिलाफ आवाज है. हम उस सोच का हिस्सा हैं, इसलिए टार्गेट किए जाते हैं.
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वह कार्यक्रमों में जाना जारी रखेंगे, ‘घटना के बाद भी मैंने अपनी बात पूरी की. हमला करने वाले चाहते हैं कि हम जैसे लोग डरकर अपनी आवाज़ बंद कर लें. अगर हम कार्यक्रमों में जाना छोड़ दें तो यह उनकी जीत होगी. हमारी बात चलती रहनी चाहिए, भले थोड़े एहतियात के साथ.’
एबीवीपी का क्या कहना है?
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने इस मामले में आइसा के आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद और झूठा बताया है.
द वायर हिंदी से बातचीत में एबीवीपी-दिल्ली के स्टेट सेक्रेटरी सार्थक शर्मा ने कहा, ‘आइसा के आरोप पूरी तरह निराधार हैं. आइसा द्वारा जारी किए गए वीडियो में हरेश केवल बैठा हुआ दिखाई देता है, वह न तो किसी पर पानी डालते हुए दिख रहा है और न ही किसी तरह की गतिविधि में शामिल है. पहले इन लोगों ने पीछे से वीडियो बनाया और उसके बाद खुद ही वहां से भागने लगे.’
एबीवीपी का यह भी कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच उनके संगठन की बढ़ती लोकप्रियता से विचलित होकर वामपंथी छात्र संगठन इस तरह के आरोप लगा रहे हैं.
एबीवीपी ने शुरू से ही परिसरों में विमर्श और वाद विवाद को बढ़ावा देने का काम किया है. इरफान हबीब जैसे फर्जी इतिहासकारों के विचारों पर जब लगातार प्रश्नचिह्न लग रहे है, ऐसे में मीडिया में बने रहने हेतु वामपंथी संगठनों का यह प्रायोजित कदम है. वामपंथियों का चरित्र शुरू से ही झूठ बोलने का रहा है.
क्या है ‘समता उत्सव’?
आइसा के अनुसार, ‘समता उत्सव’ एक सामाजिक न्याय केंद्रित साहित्यिक कार्यक्रम है, जिसे ‘पीपुल्स लिटरेचर फेस्टिवल’ के रूप में आयोजित किया गया. 12 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाना और सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता देना बताया गया.

आइसा द्वारा साझा पोस्टर के मुताबिक, कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट से यूजीसी नियमों पर लगी रोक हटाने और ‘रोहित एक्ट’ लागू करने की मांग भी उठाई गई. इंस्टाग्राम पर पोस्टर के साथ शेयर किए गए कैप्शन में ‘विश्वविद्यालयों में जातिवाद खत्म करो’ और ‘सामाजिक न्याय जिंदाबाद’ जैसे नारे भी शामिल थे.
संगठन के अनुसार, यह आयोजन हाशिये के समुदायों की आवाज़ों और समानता के प्रश्नों को मंच देने के लिए किया गया था.
