नई दिल्ली: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी/एसटी) (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से निर्धारित होती है और धर्म परिवर्तन या अंतरजातीय विवाह करने पर भी उसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता है.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत एक अनुसूचित जाति की महिला के साथ अत्याचार के मामले पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने गैर-अनुसूचित जाति के पुरुष से शादी की थी.
शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने उनके साथ मारपीट की, अभद्र भाषा का प्रयोग किया और जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया. घटना में स्वयं शिकायतकर्ता सहित तीन लोग घायल हुए थे.
दरअसल, अपील में एससी/एसटी एक्ट के विशेष न्यायाधीश, अलीगढ़ द्वारा पारित समन आदेश को चुनौती दी गई थी. उक्त आदेश में आरोपियों को आईपीसी की धारा 323, 506, 452, 354 तथा एससी/एसटी अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमे में तलब किया गया था.
समन आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि शिकायतकर्ता भले ही जन्म से अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय से संबंधित हैं और मूल रूप से पश्चिम बंगाल की निवासी हैं, लेकिन जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह करने के बाद उसने अपनी मूल जाति का दर्जा खो दिया है.
इस संबंध में 10 फरवरी के एक आदेश में जस्टिस अनिल कुमार-दशम ने आरोपी दिनेश और आठ अन्य लोगों द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया.
उनका तर्क था कि विवाह के बाद महिला अपने पति की जाति में सम्मिलित हो जाती है, इसलिए एससी/एसटी एक्ट के तहत इस मामले में की गई कार्रवाई अनुचित है. अपील में यह भी कहा गया कि इस मामले में आरोपियों द्वारा पहले दर्ज कराई गई एफआईआर के प्रतिशोध में यह शिकायत दर्ज उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है.
हालांकि, राज्य के वकील ने इस आधार पर उनकी दलील का विरोध किया कि शिकायत में वर्णित घटना और एफआईआर में बताई गई घटना एक साथ घटी थीं; दोनों घटनाएं एक ही तारीख को हुई थीं. इसलिए, यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्ताओं का यह दावा कि वर्तमान शिकायत जवाबी कार्रवाई के रूप में दर्ज की गई है, निराधार है.
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान तथा चोट के चिकित्सीय प्रमाणों पर विचार करने के बाद ही आरोपियों को तलब किया था.
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी मामले में क्रॉस-केस (विपरीत पक्ष द्वारा दर्ज मामला) होना शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता. जहां तक विवाह के बाद जाति बदलने के तर्क का प्रश्न है, कोर्ट ने उसे अस्वीकार करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है, लेकिन उसकी जाति वही रहती है जो जन्म से निर्धारित होती है. विवाह से भी किसी व्यक्ति की जाति में परिवर्तन नहीं होता. अतः यह तर्क स्वीकार करने योग्य नहीं है.
अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला का विवाह यदि दूसरी जाति में हो जाए, तब भी उसकी मूल जाति समाप्त नहीं होती.
इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों की आपराधिक अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को बरकरार रखा है.
