बलात्कार के मामलों में अदालतें स्त्रियों को इंसाफ़ से अधिक पीड़ा दे रही हैं

बलात्कार जैसे क्रूरतम अपराध का शिकार बनाई गई महिलाओं के लिए इंसाफ़ की राह इसलिए भी छोटी होने को नहीं आ रही कि अदालती फैसलों में उनके प्रति जो संवेदनहीनता कभी-कभी दिखती है, वह हमारे सामंती मूल्यों वाले पितृसत्तात्मक समाज में सदाबहार बनी हुई है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

सन् 1333 में सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के वक्त मोरक्को से आए और आठ साल तक दिल्ली के काजी रहे इतिहास प्रसिद्ध यात्री व विद्वान इब्नबतूता ने अपने यात्रा विवरण (जिसे अरबी में रिहला कहते हैं) में लिखा है कि एक बार वे एक जगह तीन स्त्रियों को समारोह पूर्वक सती किए जाने की हृदयविदारक घटना को देखकर मूर्छित होकर घोड़े से गिर गए थे और उनके मित्रों को उनके मुंह पर पानी के छींटे मारकर उनको होश में ले लाना पड़ा था.

यहां इस घटना की याद दिलाकर बात शुरू करने का उद्देश्य यह बताना है कि उक्त स्त्रियों के प्रति बरती जा रही जिस अमानवीयता ने ‘विदेशी’ इब्नबतूता को इतना विचलित कर दिया था, उसे एक बेहद सामान्य घटना मानकर देख रहे ‘भारतीयों’ ने अपनी सारी संवेदना को समारोह में लगाए जा रहे जयकारों के सैलाब में डुबो दिया था.

अभी भी, हम कहते भले हैं कि स्त्रियों की पीड़ाएं इतनी कठिन हैं और उन पर हजारों साल पुरानी (अ)सामाजिक विडंबनाओं का इतना बोझ है कि उनकी तकलीफों को समझने के लिए स्त्री होना पड़ता है, उनके प्रति अपनी संवेदनहीनता को उन्मूलित करने को कौन कहे, आकाश की ऊंचाइयों से नीचे भी नहीं उतार पाए हैं.

यह बात पिछले साल 17 मार्च को तो परिलक्षित हुई ही थी, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अवयस्का के मामले में फैसला सुनाया था कि किसी लड़की के स्तन पकड़ना या पायजामे का कमरबंद तोड़ना ‘बलात्कार की कोशिश’ नहीं बल्कि ‘बलात्कार की तैयारी’ है, पिछले दिनों तब भी दिखी, जब सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेकर उस फैसले को संवेदनहीन बताते हुए पलट दिया.

उम्मीद नाउम्मीद

ऐसा करते हुए न्यायालय ने इस दो टूक टिप्पणी से भी परहेज़ नहीं किया कि अदालतों द्वारा इस तरह की असंवेदनशीलता बरतकर बलात्कार की पीड़िताओं को पूर्ण न्याय प्रदान नहीं किया जा सकता. उसने यह भी कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों का ग़लत इस्तेमाल तो किया ही गया है, जरूरी न्यायिक संवेदनशीलता (जो ऐसे फैसलों के लिए सर्वथा अपरिहार्य है) भी नहीं बरती गई है.

तिस पर उसमें कई टिप्पणियां इस सीमा तक अमानवीय हैं कि वे न सिर्फ बलात्कार पीड़िताओं पर भयावह प्रभाव डाल सकतीं बल्कि अपनी शिकायत वापस लेने का दबाव भी डाल सकती हैं.

इस फैसला पलट के चलते कुछ हलकों को यह उम्मीद हो गई थी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का उक्त फैसला अपवाद सिद्ध होगा और आगे से न्यायालय बलात्कार के मामलों में अपेक्षाकृत ज्यादा सतर्क और संवेदनशील रुख अपनाएंगे.

लेकिन छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपनी असंवेदनशीलता से इस उम्मीद को नाउम्मीद करने में जरा भी देर नहीं लगाई. उसने बलात्कार के एक पुराने मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की ही तर्ज पर उससे कहीं ज्यादा संवेदनहीन फैसला सुनाकर यह तक कह डाला कि किसी पुरुष का पेनीट्रेशन किए बिना महिला के निजी अंग पर वीर्यस्खलन करना पूर्ण बलात्कार के बजाय बलात्कार की कोशिश ही माना जाएगा.

इस फैसले से यह बात पूरी तरह साफ हो गई कि ऐसी संवेदनहीनता के रहते देश में बलात्कार का शिकार बनाई गई महिलाओं की यथासमय समुचित इंसाफ पाने की लड़ाई लंबी और कठिन ही बनी रहनी है. खासकर जब सर्वोच्च न्यायालय इस संबंध में न्यायालयों से जिस संवेदनशीलता की अपेक्षा कर रहा है, उसकी राह के बहुत से कांटे अभी भी बुहारे जाने बाकी हैं.

थोड़ा पीछे मुड़कर देखें, तो हम पाते हैं कि ये कांटे कोई अचानक नहीं पैदा हो गए, बल्कि अरसे से चली आ रही उन न्यायिक विडंबनाओं से गुजरकर यहां तक पहुंचे हैं, जिनके तहत कई बार बलात्कारी के विरुद्ध इंसाफ मांगने अदालत गई सर्वाइवर को ही दोषी ठहरा दिया और इंसाफ को उसके कथित खराब आचरण, तकनीकी कानूनी बारीकियों व सामाजिक रूढ़ियों का मोहताज बना दिया जाता रहा है.

पुराने कांटे

अभी जिस इलाहाबाद उच्च न्यायालय के संवेदनहीन फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने पलटा है, उसी उच्च न्यायालय ने कुछ अरसा पहले बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए टिप्पणी कर डाली थी कि अपराध का शिकार बनी महिला ने आरोपी के साथ जाकर और शराब पीकर ‘स्वयं मुसीबत को आमंत्रित किया’ था और वह खुद इसके लिए जिम्मेदार है.

इसी तरह कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश अपने फैसले में इस ‘निष्कर्ष’ तक जा पहुंचे थे कि किसी भारतीय नारी के लिए खुद से बलात्कार के बाद सो जाना अशोभनीय है, क्योंकि भारतीय महिलाएं ऐसी स्थिति में अलग तरह से प्रतिक्रिया देती हैं. और तो और, अभी दो साल पहले ऐसे ही एक मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने किशोरियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दे डाली थी, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज करने योग्य पाया था.

यह स्थिति तब है, जब सर्वोच्च न्यायालय अगस्त, 2023 में उस समय के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की ओर से लैंगिक रूढ़ियों से निपटने के लिए एक जेंडर स्टीरियोटाइप हैंडबुक भी जारी कर चुका है ताकि न्यायाधीशों को रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर संवेदनशील निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. 35 पृष्ठों की इस हैंडबुक का उद्देश्य अदालती फैसलों और कानूनी कामकाज में महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा व रूढ़िवादी सोच को समाप्त करना है, ताकि न्याय प्रक्रिया लैंगिक रूप से निष्पक्ष हो सके.

अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के संवेदनहीन फैसले को पलटने के ऊपर उल्लिखित प्रसंग में उसने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से कहा है कि वह यौन अपराधों के मामलों में न्यायाधीशों में संवेदनशीलता विकसित करने के लिए समुचित दिशानिर्देश तैयार करे.

लेकिन यहां यह नहीं कह सकते कि न्यायाधीशों ने ही एकतरफा तौर पर असंवेदनशील होकर बलात्कार पीड़ितों के लिए इंसाफ की राह रोक रखी है. न्यायाधीशों की सीमा यह है कि वे दोनों पक्षों को सुनकर कानून के प्रावधानों के अनुसार फैसले सुनाते हैं, कानून नहीं बनाते. ऐसे में, वे कर भी क्या सकते हैं, अगर संबंधित कानूनों में ऐसे प्रावधान हैं या उनकी भाषा ऐसी है, जिनके संवेदनहीन अर्थ निकाले जा सकते और बलात्कारियों के पक्ष में पीड़िताओं के लिए इंसाफ की राह रोकने वाली व्याख्या की जा सकती है.

इस लिहाज से देखें तो जो हालात हैं, उनकी जिम्मेदारी संबंधित कानूनों या उनका ड्राफ्ट बनाने वालों पर भी आती है. उन्हीं के कारण अभी तक पतियों द्वारा किए जाने वाले बलात्कारों को अपराध बनाना संभव नहीं हुआ है और उसकी शिकार महिलाएं अपने लिए इंसाफ का सपना तक नहीं देख पा रहीं. कानून बनाने वालों के ही कारण ‘शादी के झूठे वादे पर बलात्कार’ और ‘सहमति से बने संबंध’ के बीच की रेखा इतनी महीन है कि आसानी से पहचान में नहीं आती और यह बात भी बलात्कारियों के पक्ष में जाती है.

हां, अदालतों में न्याय की असमान गति भी बलात्कार पीड़िताओं के आड़े आती ही आती है, जिसके चलते कुछ चर्चित मामलों में तो समय से न्याय मिल जाता है, लेकिन अनेक दूसरे मामलों में उसकी कछुआ चाल जारी रहती है. कई बार तो दोषियों की सजा निलंबित कर उनको जमानत तक दे दी जाती है, जिसका एक बड़ा उदाहरण बीते दिनों उन्नाव मामले के गुनहगार कुलदीप सेंगर के मामले में सामने आया था. हालांकि बाद में शीर्ष अदालत ने रोक लगाई.

सदाबहार संवेदनहीनता

दूसरे पहलू पर जाएं तो बलात्कार पीड़िताओं के लिए इंसाफ की राह इसलिए भी छोटी होने को नहीं आ रही कि अदालती फैसलों में उनके प्रति जो संवेदनहीनता कभी-कभी दिखती है, हमारे सामंती मूल्यों वाले पितृसत्तात्मक समाज में वह सदाबहार बनी हुई है.

इसके चलते बलात्कारी अपनी सारी हैवानियत के बाद भी शान से घूमते व मान-सम्मान पाते रहते हैं, जबकि अपने शरीर ही नहीं, मन और आत्मा तक पर उनके उजड्ड प्रहार झेलने वाली महिलाओं से ऐसा सलूक किया जाता है, जैसे उनके साथ जो कुछ हुआ, उसमें उनका ही कुसूर ज्यादा है और उसके लिए उन्हें खुद अपनी ही निगाह में गिर जाना चाहिए.

तिस पर बलात्कार के मामलों में जनप्रतिनिधि व सत्ताधीश भी जिम्मेदारी से मुंह नहीं खोलते. न ही संवेदनहीन सरलीकरणों से पीड़िताओं की राह दुश्वार करने से बचते हैं. कुछ साल पहले हरियाणा के एक जनप्रतिनिधि द्वारा किया गया समस्या का यह सरलीकरण बहुत चर्चित हुआ था कि एक बार बलात्कार हुआ तो एक बार मुआवजा दिया, दोबारा हुआ तो दोबारा दे देंगे.

इसी तरह कर्नाटक के एक जनप्रतिनिधि ने यह तक कह डाला था कि जब बलात्कार से बचना संभव न रह जाए तो महिलाएं को चाहिए कि लेट जाएं और उसका आनंद लें. हालांकि बाद में उन्होंने माफी मांग ली थी, लेकिन सवाल है कि क्या इस तरह का उपहास पीड़ित महिलाओं के प्रति अमानवीयता की हदें पार कर उनके जले पर नमक छिड़कना नहीं है?

हां, बलात्कार के मामलों की सुनवाई अनिवार्य रूप से बंद कमरे में (यथासंभव एक महिला न्यायाधीश द्वारा) की जाने और उसके विवरणों को अदालत की अनुमति के बगैर प्रकाशित न करने की कानूनी व्यवस्था से बलात्कार पीड़िताओं को ऐसे उपहासों से कुछ राहत जरूर महसूस होती है. क्योंकि इससे पहले हालत यह थी कि बलात्कारी ने पीड़िता से जो बलात्कार एक बार किया होता था, खुली अदालत में सुनवाई के दौरान उससे जुड़े सवालों व जवाबों के क्रम में पीड़िता को लगता था कि उसे उसके साथ बार-बार दोहराया जा रहा है.

यह राहत अपनी जगह रहें, लेकिन बलात्कार के अलावा दूसरे मामलों में भी अदालतों में सब कुछ कितना स्टीरियोटाइप है, इसकी एक मिसाल गुजरात उच्च न्यायालय का हाल में आया वह फैसला भी है, जिसमें उसने पार्टियों से अक्सर देर से घर लौटने के आदती पति द्वारा बिना उसे बताये रात भर मायके में रुक गई पत्नी को वहां पहुंच कर थप्पड़ मार देने को पति की क्रूरता मानने से इनकार कर दिया है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)