नई दिल्ली: जीवन की अनेक चुनौतियों को पार कर, अपने ‘पिछड़े राज्य’ बिहार से निकलकर देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक आईआईटी दिल्ली तक पहुंचने की ‘जंग’ जीतने वाले ऋषिकेश कुमार का जीवन असमय थम चुका है. बेहद कठिन परीक्षा पास कर अपने सपनों के जिस संस्थान में उन्होंने साल भर पहले ही दाखिला लिया था, शनिवार (22 अगस्त) को उसी संस्थान की एक इमारत से कूदकर कथित आत्महत्या कर ली.
अब ऋषिकेश का संस्थान उबल रहा है. विरोध प्रदर्शनों से अक्सर दूर रहने वाला आईआईटी दिल्ली नारों से गूंज रहा है. ऋषिकेश के साथी (कुछ परिचित और अनेक अपरिचित) उनके लिए और उनके जैसे अनेकों के लिए न्याय व जवाबदेही की मांग कर रहे हैं.
और संस्थान? संस्थान 30 महीनों में आठ छात्रों की कथित आत्महत्या के बाद भी खुद को ‘स्तब्ध’ बता रहा है. ढाई साल में आठ जानें जा चुकी हैं और संस्थान अब भी ‘व्यवस्थाओं में लगातार सुधार’ का आश्वासन ही दे रहा है. जबकि छात्रों की मांग है कि स्टूडेंट वेलफेयर की एसोसिएट डीन प्रोफेसर श्रीदेवी इस्तीफा दें और कैंपस को ऐसी संवेदनशील व्यवस्था मिलें, जो केवल दिखावे और खानापूर्ति के लिए न हो.
इस बीच सवालों से पैदा हुए विज्ञान के ज्ञान को पढ़ाने वाला यह प्रौद्योगिकी संस्थान मीडिया के लिए अपने दरवाजे बंद कर चुका है. मंगलवार (25 अगस्त) की शाम करीब 4 से 6 बजे तक मीडियाकर्मी आईआईटी दिल्ली के मुख्य प्रवेश द्वार पर जमा थे. वे रविवार से कैंपस में चल रहे विरोध प्रदर्शन को कवर करना चाहते थे.
लेकिन मुख्य प्रवेश द्वार पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी और अंदर जाने वाले हर व्यक्ति की जांच की जा रही थी. सुरक्षाकर्मियों को सख्त निर्देश दिए गए थे कि बिना पूर्व अनुमति के किसी भी मीडियाकर्मी को संस्थान के भीतर प्रवेश न दिया जाए.
आईआईटी दिल्ली के लेक्चर हॉल कॉम्प्लेक्स में एमएससी फिजिक्स के दूसरे वर्ष के छात्र ऋषिकेश कुमार की कथित आत्महत्या के बाद कैंपस में चल रहा यह विरोध सिर्फ एक छात्र की मौत पर शोक का प्रदर्शन नहीं रह गया है. अब संस्थान के अन्य छात्र उस व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, जिसके भीतर वे पढ़ते हैं, रहते हैं और मानसिक संकट के दौरान मदद की उम्मीद करते हैं.
आईआईटी दिल्ली के भीतर हो रहा यह विरोध प्रदर्शन इसलिए भी अहम है क्योंकि आम तौर पर देश के इस प्रीमियर संस्थान में इस तरह का प्रदर्शन नहीं देखा जाता है.
छात्रों का कहना है कि ऋषिकेश की मौत को केवल उसकी व्यक्तिगत या मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में देखना उन परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा, जिनसे वह अपनी वापसी के बाद लगातार जूझ रहा था, जैसे कि हॉस्टल न मिलना, एकडेमिक प्रोजेक्ट न मिलना, सेमेस्टर से नाम वापस लेने की जटिल प्रक्रिया और प्रशासन से कथित तौर पर मिला असंवेदनशील व्यवहार.
इन विरोध प्रदर्शन में शामिल आईआईटी दिल्ली में दर्शनशास्त्र में पीएचडी कर रहे एक छात्र ने अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘यह आईआईटी में सुसाइड का पहला मामला नहीं है. पिछली ऐसी घटनाओं को देखें तो एक पैटर्न सा दिखाई देता है. आमतौर पर वे लोग, खासकर हाशिए पर रहने वाले समुदाय से आने वाले छात्र, जो कैंपस में अपने लिए जगह नहीं खोज पाते, इस स्थिति तक पहुंचते हैं.’
छात्रों के मुताबिक, इस बार गुस्सा इसलिए अधिक है क्योंकि ऋषिकेश की मौत से पहले भी कैंपस में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 30 महीनों में आईआईटी दिल्ली में आठ छात्रों ने आत्महत्या की है. प्रदर्शनरत छात्र इसे ‘व्यवस्थागत विफलता’ मानते हैं और संस्थान को मेंटल हेल्थ के प्रति असंवेदनशील बताते हैं.
जब मदद की जगह बढ़ती गई मुश्किलें
जुलाई 2025 में ऋषिकेश आईआईटी दिल्ली में दाख़िला लिया था. वह बिहार के पटना जिले के रहने वाले थे. 2025 में पिता को खोने के बाद ऋषिकेश मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर परेशानियों का सामना करने लगे. छात्रों द्वारा जारी किए गए एक नोट के मुताबिक, इस साल मार्च में होली के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और आईआईटी दिल्ली के अस्पताल में करीब एक सप्ताह उनका इलाज हुआ. इसके बाद उन्हें दिल्ली के विमहंस (VIMHANS) अस्पताल में लगभग एक महीने के लिए भर्ती कराया गया. इलाज के बाद ऋषिकेश की स्थिति में सुधार हुआ और मेडिकल फिटनेस क्लीयरेंस मिलने पर वह आईआईटी वापस आए.
छात्रों द्वारा जारी नोट के मुताबिक, वापसी के बाद भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं. लंबे इलाज के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई थी और वह परीक्षा की तैयारी में पीछे रह गए थे. उन्होंने सेमेस्टर (सेकंड सेमेस्टर से) से नाम वापस लेने की मांग की और घर जाने का फैसला किया. लेकिन जुलाई में कैंपस लौटने पर उन्हें पता चला कि हॉस्टल से उनका नाम हटा दिया गया है. सेमेस्टर से नाम वापस लेने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए उनसे आईआईटी दिल्ली के अस्पताल से मेडिकल क्लीयरेंस मांगा गया.
छात्रों का कहना है कि यह एक ऐसी मांग थी, जिसके बारे में उन्हें पहले से जानकारी नहीं दी गई थी.
हॉस्टल में दोबारा कमरा पाने की कोशिश भी सफल नहीं हुई. नोट के अनुसार, विंध्याचल हॉस्टल में कमरा उपलब्ध होने की जानकारी मिलने के बावजूद उन्हें कमरा नहीं दिया गया. अंततः उन्हें कैंपस के बाहर रहना पड़ा और उनकी मां साथ रहने आ गईं. छात्रों का कहना है कि दोस्तों और कैंपस से दूर रहने से ऋषिकेश का अकेलापन और बढ़ा.
इस वाकये को लेकर छात्र मानसिक स्वास्थ्य और संस्थान की नीतियों के बीच के संबंध पर सवाल उठाते हैं.
एक छात्र कहते हैं, ‘यहां मेंटल हेल्थ को सिर्फ काउंसलिंग तक सीमित कर दिया गया है. वे छात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी, संस्थान के ढांचे, शैक्षणिक व्यवस्था और उनकी आकांक्षाओं को नज़रअंदाज़ करते हैं, जबकि ये सभी चीजें मानसिक परेशानियों को बढ़ा सकती हैं.’
इसी बीच ऋषिकेश की मां और स्टूडेंट अफेयर्स ऑफिस के के बीच हुई बातचीत को लेकर भी गंभीर आरोप लग रहे हैं. छात्रों के मुताबिक, ऋषिकेश के लिए हॉस्टल की मांग करने पर उनकी मां को कथित तौर पर कहा गया, ‘ऐसे बच्चों को हम नहीं रखते.’ एक महिला कर्मचारी ने उनसे कहा, ‘आपसे एक बच्चा भी संभाला नहीं जाता.’
छात्रों का का मानना है कि यह घटना केवल एक परिवार के साथ खराब व्यवहार के रूप में नहीं, बल्कि मानसिक अस्वस्थता को लांछन बना देने के संभावित उदाहरण के तौर पर देखी जानी चाहिए.
हॉस्टल के बाद ऋषिकेश के सामने अकादमिक समस्या सामने आई. ऋषिकेश को डिग्री पूरी करने के लिए प्रोजेक्ट करना जरूरी था. नोट के मुताबिक, उन्होंने दूसरे छात्र के साथ साथ मिलकर प्रोजेक्ट करने की कोशिश की, ताकि खोए हुए समय और अकादमिक दबाव को संभाल सकें. चार प्रोजेक्ट में से तीन में दूसरे छात्रों ने उनके साथ प्रोजेक्ट करने से इनकार कर दिया और चौथे में सुपरवाइजर ने उन्हें खारिज कर दिया.
आईआईटी दिल्ली के एक पीएचडी शोधार्थी के मुतबिक, 6 अगस्त को ऋषिकेश की मां ने उनके एक दोस्त को बताया कि प्रोजेक्ट न मिलने के कारण उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया था. उन्होंने संस्थान को भी उसकी मानसिक दशा और आत्महत्या के प्रयास के बारे में बताया, लेकिन इसके बाद भी उन्हें मदद नहीं मिली.
एक छात्र इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘एक परेशान छात्र’ की कहानी मानने से इनकार करता है. छात्र कहते हैं कि ‘प्रोजेक्ट नहीं मिलना, कम नंबर मिलना, इन सबको केवल व्यक्तिगत विफ़लता की तरह नहीं देखा जा सकता. जब कोई छात्र पहले ही दुख और ख़राब मेंटल हेल्थ से जूझ रहा हो, तब संस्थान के सहयोग का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है.’
ऋषिकेश तीसरा सेमेस्टर छोड़कर फिर से फर्स्ट ईयर की शुरुआत करना चाहते थे. लेकिन फिजिक्स विभाग के प्रमुख उनके इस फैसले से सहमत नहीं थे और उनसे सेमेस्टर से नाम वापस लेने की प्रक्रिया के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट मांगा गया. बताया गया है कि आईआईटी दिल्ली अस्पताल के डॉक्टर ने ऐसा सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि वह सेमेस्टर से नाम वापस नहीं ले सके.
हालांकि, आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर रंगन ने कहा है कि तीसरा सेमेस्टर छोड़ने की उनकी मांग मान ली गई थी.
New Delhi | IIT Delhi says in a press release, “IIT Delhi expresses its profound sorrow and deep shock at the tragic demise of Rishikesh Kumar, an MSc student at the Institute… The Institute is also extending financial support to his family through contributions from faculty,… pic.twitter.com/Mh86a56ZrF
— ANI (@ANI) August 25, 2026
छात्रों का कहना है कि ऐसी नौकरशाही प्रक्रियाएं मानसिक संकट से जूझ रहे छात्र की समस्या का समाधान करने की बजाय और कठिन बना सकती हैं.
एक पीएचडी छात्रा कहती हैं, ‘हमारा सवाल यह नहीं है कि ऋषिकेश को मेंटल हेल्थ संबंधित समस्या थी या नहीं, सवाल यह है कि जब उसे मदद की जरूरत थी, तब संस्था ने उसके लिए कौन-कौन से रास्ते खोले? और क्या उन रास्तों ने उसे वापस अपने साथ जोड़ा या और अलग कर दिया?’
कुछ छात्र कैंपस में मेंटल हेल्थ की नीतियों के साथ-साथ जातिगत भेदभाव और संस्थागत बहिष्करण के सवाल भी उठा रहे हैं.
पीएचडी छात्रा कहती हैं, ‘ऋषिकेश ग्रामीण बिहार से आया था और ओबीसी समुदाय से था. इस बात को अभी छात्र आंदोलन में पर्याप्त जगह नहीं मिल पा रहा है. जब हम यह बात उठाते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि इससे आंदोलन प्रभावित होगा. लेकिन अगर किसी महिला की सुरक्षा की बात हो तो क्या हम कहेंगे कि जेंडर की बात मत करो? अगर क्वीर छात्रों की समस्या हो तो क्या कहेंगे कि क्वीर पहचान को मत लाओ?’
पब्लिक पॉलिसी के एक अन्य छात्र का कहना है कि आईआईटी जैसे एलीट और मेरिट आधारित संस्थान में मेरिट और पहुंच को सामाजिक पृष्ठभूमि से अलग करके नहीं देखा जा सकता. वह इस बात पर भी सवाल उठाते हैं कि ओबीसी वेलफेयर कमेटी जैसे संस्थागत ढांचों की मौजूदगी के बावजूद क्या वे वास्तव में छात्रों के लिए काम कर रहे हैं.
वह सवाल करते हैं, ‘ओबीसी छात्र ओबीसी सेल के पास जाएगा, दलित छात्र दलित सेल के पास जाएगा, क्योंकि उसे लगता है कि वहां कोई उसके संघर्ष को समझेगा. लेकिन अगर यह सेल कागज पर हो और सुचारू न हो, तब छात्र अपनी समस्या लेकर कहां जाएगा?’
दोनों छात्रों के मुताबिक, यह भी महत्वपूर्ण है कि आईआईटी दिल्ली में मेंटल हेल्थ संघर्ष को केवल काउंसलिंग या पारिवारिक सहयोग के सवाल के रूप में न देखा जाए. उनका कहना है कि कई छात्रों के लिए परिवार स्वयं सुरक्षित या पर्याप्त सपोर्ट सिस्टम नहीं हो सकता.
एसोसिएट डीन प्रोफेसर श्रीदेवी के इस्तीफे की मांग
विरोध के दौरान छात्रों ने स्टूडेंट वेलफेयर की एसोसिएट डीन प्रोफेसर श्रीदेवी के इस्तीफे की मांग को प्रमुखता से उठाई है. छात्रों का आरोप है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे छात्रों के लिए वह संस्थान में एक महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु हैं, लेकिन उनके कथित व्यवहार के कारण छात्रों का उन पर से भरोसा उठ गया है.
हालांकि, संस्थान इस्तीफ़े की मांग पर कार्रवाई करने को तैयार नहीं है.
छात्रों ने ऋषिकेश की मौत के बाद उनके द्वारा एक कथित टिप्पणी का भी हवाला दिया, जिसमें प्रोफेसर श्रीदेवी ने ऋषिकेश को ‘बियोंड रिपेयर’ यानी लाइलाज जैसी स्थिति में बताया था. छात्रों का सवाल है कि अगर किसी अस्पताल ने इलाज के बाद किसी छात्र को मेडिकली फिट घोषित किया था, तब संस्थान के अधिकारी उसे किस आधार पर ‘बियोंड रिपेयर’ मान सकते हैं.
जांच की मांग
विरोध के दौरान छात्रों ने अपने तीन प्रमुख मांगे सामने रखी हैं- स्वतंत्र जांच, संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही/इस्तीफा और ऋषिकेश के परिवार को पर्याप्त मुआवजा. छात्रों की मांग है कि जिन प्रबंधक या कर्मचारी की भूमिका जांच में सामने आए, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाए.
छात्रों ने यह भी मांग की है कि जांच समिति वास्तव में स्वतंत्र हो और उसमें छात्र प्रतिनिधित्व हो. प्रशासन ने बाहरी जांच समिति बनाने की बात कही है. छात्रों ने इस समिति की संरचना और उसकी स्वतंत्रता पर सवाल उठाते हुए रिटायर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता की मांग की थी.
छात्रों की मांग पर अमल करते हुए प्रशासन ने मामले की जांच के लिए गठित कमेटी में इसके प्रमुख बनाए गए उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी अशोक कुमार को हटाकर दिल्ली हाई कोर्ट की रिटायर जज मुक्ता गुप्ता को अध्यक्ष बनाया गया. अशोक कुमार की नियुक्ति पर छात्रों ने आपत्ति जताई थी.
मुआवजे के मुद्दे पर भी प्रबंधन और छात्रों के बीच मतभेद है. छात्रों की मांग है कि परिवार को एक निश्चित राशि, 1 करोड़, मुआवजे के तौर पर दी जाए, जबकि प्रशासन की ओर से मेडिकल खर्च की भरपाई और अलग से वित्तीय सहायता/फंड उपलब्ध कराने की बात कही गई है. प्रशासन पहले मेडिकल खर्च की भरपाई और 6 लाख रुपए की वित्तीय सहायता देने को तैयार था.
छात्रों का कहना है कि ऋषिकेश के पिता की मृत्यु के बाद परिवार पहले ही आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहा था और अब उसकी मौत के बाद उनकी मां के पास कोई सहारा नहीं बचा है.
कैंपस में विरोध की जगह कहां है?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच छात्रों के लिए एक और सवाल है- कैंपस में विरोध की जगह कहां है?
एक छात्र कहता है, ‘यहां आपको छात्र अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि आप छात्र हैं. आपको एक ‘अच्छा छात्र’ भी होना पड़ता है. अगर हम बैठकर बात करने के लिए भी जगह खोजें तब सिक्योरिटी आकर पूछती है कि आप क्या कर रहे हैं.’
छात्र कहता है कि विरोध को ‘कैंपस की शांति खराब करने’ के रूप में देखना भी समस्या का एक हिस्सा है. ‘लेकिन हम इसे इस बार जाने नहीं देंगे, क्योंकि एक छात्र की मौत हुई है.’

कैंपस में मीडिया को न जाने देने को लेकर एक छात्र ने कहा, ‘आप आख़िर इन विरोध प्रदर्शनों को छिपाना क्यों चाहते हो? ये सवाल बाहर आने चाहिए, ताकि संस्थान उसे सुधारने की दिशा में क़दम उठाए. छिपाने से समस्या का हाल नहीं होगा.’
छात्र ने यह भी आरोप लगाया कि आईआईटी प्रशासन अपने पसंद के मीडियाकर्मियों को प्रवेश करने दे रहा है, बाकियों को कैंपस में प्रवेश की अनुमति नहीं है. इस पत्रकार को भी कैंपस के अंदर जाने की इजाज़त नहीं दी गई.
इस बीच छात्रों के बीच एक प्रोफेसर- सुदीप्तो मुखर्जी, की कथित टिप्पणियों को लेकर भी नाराजगी है. छात्रों के बीच उनके नाम से जुड़ा एक स्क्रीनशॉट प्रसारित हो रहा है, जिसमें आत्महत्या, ह्यूमैनिटी विभाग के छात्रों के काम के बोझ और विरोध-प्रदर्शन को लेकर टिप्पणियां की गईं हैं.
छात्रों का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां मानसिक स्वास्थ्य और छात्रों की परेशानियों के प्रति संस्थान की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करती हैं.
इन कथित टिप्पणियों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है.
Read these points by an IIT professor on the institutional murder of Rishikesh.
How come the professors of these eminent institutions so insensitive and violent in their minds. pic.twitter.com/eRixPO82iK
— aditi_aisa (@aditi_jnu) August 25, 2026
‘सिर्फ पढ़ाई नहीं, छात्रों को दूसरे तरह के सहारे की भी जरूरत’
एक छात्रा स्टेम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट) कोर्सेज में सामाजिक असमानता पर होने वाली सीमित चर्चा पर भी जोड़ देती हैं. उनके मुताबिक, आईआईटी में आने वाले कई छात्र 11वीं कक्षा से ही कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लंबे दौर से गुजरते हैं और इसके बाद सीधे बेहद प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक माहौल में पहुंचते हैं. ‘संस्थान को यह समझना होगा कि इन छात्रों को सिर्फ अकादमिक मदद की नहीं, बल्कि कई दूसरी तरह की सहायता की भी जरूरत होती है.’
‘व्यवस्था में व्यक्ति असफल नहीं हो रहे हैं; हमें यह देखना होगा कि कहीं व्यवस्था ही व्यक्तियों को असफल तो नहीं कर रही.’ एक छात्र कहते हैं. ‘ये आत्महत्याएं संस्थान के लिए चेतावनी होनी चाहिए थीं. हर बार शोक संदेश जारी करके और फिर कक्षाएं शुरू कर देने से समस्या खत्म नहीं होगी.’
छात्रों और प्रशासन के बीच हुई बैठक के मिनट्स में भी इसी तरह की चिंता दर्ज है. छात्रों ने ऐसी स्पष्ट व्यवस्था की मांग की है, जिसमें यह तय हो कि मानसिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे किसी छात्र के मामले में प्रशासन, छात्र परामर्श सेवा, छात्र कल्याण विभाग और संस्थान के शीर्ष अधिकारियों की क्या भूमिका और जिम्मेदारी होगी. छात्रों ने यह भी सवाल उठाया कि कैंपस में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पहले गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर संस्थान ने अब तक क्या कार्रवाई की है.
छात्रों ने प्रशासन की ओर से पहले किए गए प्रयासों, जिनमें काउंसलरों की नियुक्ति और छात्रों के लिए सहायता तंत्र विकसित करना शामिल है, का भी उल्लेख किया है. हालांकि, छात्रों का कहना है कि संस्थान में इसके बावजूद भी कई संरचनात्मक समस्याएं बनी हुई हैं, जिनका तत्काल समाधान जरूरी है.
जब मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या सामने आती है, तब संस्थान में छात्रों के लिए क्या तय प्रक्रिया है? इस सवाल पर एक छात्र ने बताया कि प्रशासन ने हाल ही में एक प्रोटोकॉल छात्रों के साथ साझा किया है.
छात्र के मुताबिक, उन्हें यह प्रोटोकॉल पहले उपलब्ध नहीं कराया गया था और यह स्पष्ट नहीं है कि इसे पहले से लागू किया गया था या हाल में तैयार किया गया है. छात्र कहते हैं, ‘जब हमने हाल में प्रशासन से इस बारे में पूछा, तब उन्होंने हमें यह प्रोटोकॉल भेजा. हमें नहीं पता कि यह पहले से मौजूद था या अभी बनाया गया है. कम से कम 2024 में ऐसा कोई प्रोटोकॉल नहीं था, यह हमें पता है.’
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आईआईटी दिल्ली ने 2024 में छात्रों की आत्महत्याओं के संदर्भ में संस्थान की प्रक्रियाओं और माहौल का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की थी. समिति ने छात्रों के बीच संकट के कई संभावित कारणों की ओर इशारा किया था. इनमें कोचिंग के लंबे दौर के बाद होने वाली थकान और मानसिक दबाव, ऐसा ग्रेडिंग सिस्टम जो टॉक्सिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है, लगातार बना रहने वाला अकादमिक दबाव और कैंपस में जाति एवं जेंडर आधारित भेदभाव की संस्कृति शामिल थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, समिति ने अपनी रिपोर्ट पिछले साल अगस्त में संस्थान को सौंप दी थी, लेकिन उसके बाद उस पर आगे की कार्रवाई या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई.
उधर, दिल्ली पुलिस ने ऋषिकेश को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच शुरू की है.
द वायर हिंदी ने आईआईटी दिल्ली प्रशासन का पक्ष जानने के लिए संबंधित अधिकारियों से मिलने और उनका पक्ष जानने के उद्देश्य से आईआईटी दिल्ली कैंपस का दौरा किया, लेकिन उसे संस्थान के भीतर प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई.
इसके बाद द वायर हिंदी ने ईमेल के माध्यम से आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर रंगन बनर्जी और एसोसिएट डीन प्रोफेसर श्रीदेवी को अपने सवाल भेजे हैं. प्रशासन की ओर से जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
(अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं– दोस्त या परिजन– जो मानसिक रूप से परेशान हैं और आत्महत्या का जोखिम है, तो कृपया उनसे संपर्क करें. सुसाइड प्रिवेंशन इंडिया फाउंडेशन के पास उन फोन नंबरों की एक सूची है जिन पर कॉल करके वे गोपनीयता से बात कर सकते हैं. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज द्वारा संचालित परामर्श सेवा, आईकॉल ने देश भर के चिकित्सकों/थेरेपिस्ट की एक क्राउडसोर्स्ड सूची तैयार की है. आप उन्हें नज़दीकी अस्पताल भी ले जा सकते हैं.)
