नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 वर्षीय दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के छह साल बाद भी पीड़िता का परिवार अलगाव, आर्थिक तंगी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच जीवन जीने को मजबूर है.
वर्ष 2020 से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की चौबीसों घंटे सुरक्षा में रह रहा परिवार अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया आदेश के बाद नोएडा या ग़ाज़ियाबाद में पुनर्वास की उम्मीद कर रहा है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था ने परिवार के सामान्य जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है. पीड़िता के भाई का कहना है कि परिवार के सदस्य न तो सामान्य सामाजिक जीवन जी पा रहे हैं और न ही आसानी से काम के लिए घर से बाहर निकल सकते हैं. इससे उनकी आर्थिक मुश्किलें और बढ़ गई हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों के बुरे व्यवहार के कारण परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है.
पीड़िता के भाई ने अख़बार को बताया, ‘इन वर्षों में हमारा कोई सामाजिक जीवन नहीं रहा. न कोई हमसे मिलने आता है और न ही परिवार का कोई सदस्य नौकरी के लिए बाहर जा सकता है. हम गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं और भुखमरी की कगार पर हैं.’
परिवार को लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया का खर्च भी उठाना पड़ रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि लखनऊ, दिल्ली और अन्य शहरों में होने वाली अदालती सुनवाई में शामिल होने के लिए परिवार के सदस्यों को निजी परिवहन की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है.
पीड़िता के भाई ने बताया कि पिछले छह वर्षों में कानूनी खर्चों पर भी काफी पैसा खर्च हो चुका है. इन्हीं परिस्थितियों के चलते परिवार बेहतर सुरक्षा, रोज़गार और बच्चों की शिक्षा के अवसरों के लिए दिल्ली-एनसीआर में स्थानांतरित होने की मांग कर रहा है.
पीड़िता के भाई ने कहा कि अगर सरकार परिवार के एक सदस्य को नौकरी दे दे, तो अन्य सदस्य निजी क्षेत्र में काम तलाश सकेंगे और बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सकेगी.
हालांंकि, अदालत के एक अन्य आदेश के बाद परिवार के जीवन को सामान्य बनाने के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं. मसलन, परिवार के बच्चों का स्थानीय केंद्रीय विद्यालय में दाखिला कराया गया है. लेकिन परिवार का कहना है कि सुरक्षा और कुछ सीमित प्रशासनिक कदमों के अलावा अब तक कोई ठोस पुनर्वास योजना लागू नहीं की गई है.
उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का ताजा आदेश तब आया, जब उत्तर प्रदेश सरकार परिवार की स्थानांतरण संबंधी मांग पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं कर सकी.
इससे पहले द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अदालत ने माना कि परिवार को दूसरी जगह बसाने के संबंध में उसके पहले के निर्देशों के बावजूद सरकार द्वारा उनकी मांग पर ‘ठीक से विचार नहीं किया गया.’
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की पीठ ने कहा कि 26 सितंबर 2024, 14 नवंबर 2024 और 8 जनवरी 2025 के आदेशों के बावजूद राज्य सरकार की ओर से ‘अनावश्यक प्रतिरोध’ दिखाई दिया.
अदालत ने 22 फरवरी 2025 के राज्य सरकार के उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें परिवार को कासगंज, एटा या अलीगढ़ में पुनर्वास का प्रस्ताव दिया गया था.
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर पीड़िता के परिवार का पुनर्वास कर उन्हें नोएडा या ग़ाज़ियाबाद में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है.
इसके साथ ही अदालत ने 26 जुलाई 2022 के अपने पहले के आदेश को भी दोहराया, जिसमें पुनर्वास के तहत परिवार के एक सदस्य को रोज़गार देने का निर्देश दिया गया था.
अदालत ने कहा कि परिवार के स्थानांतरण के बाद उसे रोज़गार उपलब्ध कराया जाए.
हाईकोर्ट का यह ताजा आदेश परिवार को हाथरस से बाहर स्थानांतरित करने की संभावना पर विचार करने संबंधी उसके पहले निर्देश के चार साल से अधिक समय बाद आया है. इस बीच पिछले छह वर्षों से परिवार अलगाव, आर्थिक संकट और सीमित रोज़गार के अवसरों के बीच जीवन बिता रहा है.
वहीं, इस मामले में चार आरोपियों में से तीन को आरोपों से बरी किया जा चुका है.
