नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि यह मामला जटिल संवैधानिक सवाल उठाता है और छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘मनी पावर’ का बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल भावना पर आघात करता है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने अन्य देशों में चुनावी खर्च की सीमाओं का उल्लेख करते हुए ऐसे नियामक उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में भी खर्च पर सीमाएं हैं, लेकिन उम्मीदवारों के मित्रों का क्या?’ उन्होंने आगे संभावित संवैधानिक चिंताओं को भी उठाया, यह सवाल करते हुए कि क्या खर्च पर रोक लगाने से संविधान के आर्टिकल 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भौतिक सहयोग के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है.
इसके जवाब में भूषण ने चुनावी बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले ही अनियंत्रित राजनीतिक फंडिंग के लोकतंत्र पर पड़ने वाले विकृत प्रभाव को स्वीकार कर चुकी है.
राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर सीमा तय करने की मांग वाली इसी तरह की एक याचिका, जिसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने दायर किया था, जनवरी 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली गई थी, ताकि नई याचिका दाखिल की जा सके.
चुनावी बॉन्ड पर फैसला
15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा चुनावी बॉन्ड योजना को सर्वसम्मति से रद्द किए जाने के बाद वर्तमान याचिका का महत्व और बढ़ गया है.
बता दें कि 15 फरवरी, 2024 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉन्ड योजना को ‘असंवैधानिक’ करार दिया था. शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि यह योजना राजनीतिक दलों को मिलने वाली फंडिंग का खुलासा करने में विफल रहने के कारण संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करती है.
इसके परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम, आयकर अधिनियम और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में चुनावी बॉन्ड से संबंधित प्रावधानों को भी अमान्य कर दिया था. इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड के खरीदारों और प्राप्तकर्ताओं की जानकारी भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया था.
अदालत ने माना था कि राजनीतिक दलों को गुमनाम चंदा देने की अनुमति देने वाली यह योजना नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी पर भी आघात करती है. अदालत ने वित्त अधिनियम, 2017 के जरिए आयकर अधिनियम और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में किए गए संबंधित संशोधनों को भी निरस्त कर दिया था.
इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक को निर्देश दिया गया कि अप्रैल 2019 से खरीदे और भुनाए गए सभी चुनावी बॉन्ड का विवरण निर्वाचन आयोग को प्रकाशन के लिए उपलब्ध कराया जाए. इस बीच शीर्ष अदालत में एक अलग याचिका लंबित है, जिसमें इन फंडों को जब्त करने और कथित ‘क्विड प्रो क्वो’ (लेन-देन आधारित लाभ) व्यवस्थाओं की न्यायालय की निगरानी में जांच कराने की मांग की गई है.
