अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: जिन्होंने महिलाओं के हक़ों के लिए जद्दोजहद शुरू की…

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का हासिल क्या है? इस सवाल का जवाब यह है कि भले ही इस बीच महिलाओं के हक़ में बहुत कुछ न हो पाया हो और इस दिवस के आयोजन भी कर्मकांड में बदलते गए हों, लेकिन इतना तो हुआ है कि महिलाओं ने अनेक ऐसे क्षेत्रों में भी, जो पहले उनके लिए सर्वथा निषिद्ध थे, अपनी उपलब्धियों से अपने द्वेषियों को क़रारा जवाब दिया है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत की तो अपने देश के कुछ हल्कों में दशकों तक बहुत जोर देकर कहें या चुटकी लेते हुए पूछा जाता था कि इसे मनाने का हासिल क्या है? साल में यह एक दिन महिलाओं का हो और शेष सारे दिन पुरुषों के, तो इस बेहद असमान ‘बंटवारे’ से किसके साथ कौन-सा ‘इंसाफ’ हो जाएगा?

यह तो नहीं कह सकते कि इन पूछने वालों में सारे के सारे महिलाओं के प्रति द्वेष रखने वाले ही थे, लेकिन अनेक ‘आत्माएं’ इसे पूछते हुए न पितृसत्ता से जुड़े अपने अहंकार को छिपा पाती थीं, न ही दिल व दिमाग में जड़ें जमाए बैठी इस अहंकार की जाई नाइंसाफी की उम्र लंबी करती जाने की चाह को. वे इस दिवस का कोई प्रतीकात्मक महत्व भी स्वीकारने को तैयार नहीं होती थीं. यह भी नहीं कि यह महिलाओं के पक्ष में किन्हीं सत्प्रेरणाओं का वायस बनेगा.

तब से अब तक दुनिया की नदियों में बहुत पानी बह चुका है और भले ही इस बीच महिलाओं के हक़ में बहुत कुछ न हो पाया हो और इस दिवस के आयोजन भी कर्मकांड में बदलते गए हों, इतना तो हुआ है कि महिलाओं ने अनेक ऐसे क्षेत्रों में भी, जो पहले उनके लिए सर्वथा निषिद्ध थे, अपनी उपलब्धियों से अपने द्वेषियों को करारा जवाब दिया है.

आज की तारीख में उनका एक छोटा हिस्सा ही सही, जल-थल से लेकर नभ तक अपने झंडे गाड़ रहा है तो बड़े हिस्से का अपनी बेड़ियां तोड़ने का संघर्ष भी नाना विघ्नों व विचलनों के बावजूद थमकर नहीं रह गया है.

अपने देश की बात करें तो ऐसा इस विडंबना के बावजूद है कि समुचित चेतना के अभाव में महिलाओं के निचले तबकों की हालत अभी भी ‘चलता हूं थोड़ी दूर हर इक तेज रौ के साथ, पहचानता नहीं हूं अभी राहबर को मैं‘ जैसी है, जो स्वाभाविक ही उनके संघर्षों के मंजिल तक पहुंचने में बड़ी बाधा बनी हुई है.

यह विडंबना इस तथ्य की रौशनी में और बड़ी हो जाती है कि दोहरे-तिहरे संघर्ष में फंसे इन तबकों का अपनी जद्दोजहद की नींव की उन ‘ईंटों’ से अपरिचय अभी भी बहुत गाढ़ा है, जिन्होंने बहुत मुश्किल दिनों में न सिर्फ उनकी आवाज उठाई और उसे निश्चित दिशा दी बल्कि अंतहीन दिखते बुरे दिनों के खात्मे की उम्मीदें भी जगाईं.

तिस पर संचारक्रांति के फलस्वरूप मीडिया के विभिन्न रूपों की ‘व्यापक’ पहुंच के इस दौर में भी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीमों व सरोकारों का महिलाओं के निचले तबकों तक पहुंचना भी अभी बाकी है, जबकि उनकी सबसे ज्यादा जरूरत उन तबकों को ही है.

और तो और, वे इस बात से भी अपरिचित हैं कि अपने देश में हर वर्ष दो महिला दिवस मनाए जाते हैं: एक अंतरराष्ट्रीय और दूसरा राष्ट्रीय. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को जबकि राष्ट्रीय महिला दिवस उससे पहले 13 फरवरी को.

इस अपरिचय के रहते, साफ कहें तो, इन दिवसों से जुड़े सोच-सरोकार व लाभ, इन तबकों तक किसी चमत्कार की स्थिति में ही पहुंच सकते हैं. इसलिए हम उसकी समाप्ति की विनम्र कोशिश के तौर पर यहां बटलोई के चावल के तौर पर इन दिवसों व इनसे जुड़ी कुछ ‘नींव की ईंटों’ की चर्चा कर रहे हैं.

सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बात करें तो 1910 में नामचीन महिला अधिकारवादी क्लारा जेटकिन द्वारा डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में सोशलिस्ट इंटरनेशनल में कामकाजी महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इसे मनाने का सुझाव दिया गया था, जबकि राष्ट्रीय महिला दिवस उन सरोजिनी नायडू की जयंती का दिन है, जो भारतकोकिला, जानी-मानी कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी तो थीं ही, मानती थीं कि पुरुष देश की शान हैं तो महिलाएं उसकी नींव. स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान इस नींव को मजबूत करने के लिए उन्होंने बहुविध जतन किए.

क्लारा जेटकिन

क्लारा जेटकिन पांच जुलाई, 1857 को जर्मनी के एक गांव में पैदा हुईं और समय के साथ मार्क्सवादी सिद्धांतकार, सामाजिक कार्यकर्ता और महिलाओं के अधिकारों के जुझारू संघर्ष की अगुआ बनीं.  उनके पिता गाॅटफ्राइड ईस्नर किसान पृष्ठभूमि वाले शिक्षक थे और फ्रांसीसी मूल की मां जोसफीन विटाले ने भी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रखी थी. स्वाभाविक ही क्लारा जेटकिन बचपन से ही समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हो चली थीं.

1878 में बिस्मार्क ने जर्मनी में समाजवादी गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी तो उसके चार साल बाद 1882 में वे पहले ज्यूरिख फिर पेरिस चली गईं और पत्रकार व अनुवादक के रूप में काम करती रहीं. पेरिस में उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल ग्रुप की नींव भी डाली.

क्लारा जेटकिन. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

उन्हीं के दौर में 1908 में कोई पंद्रह हजार महिलाओं ने न्यूयॉर्क में एक परेड निकालकर महिला कामगारों के काम के घंटे कम करके उन्हें अच्छी तनख्वाह और सारी वयस्क महिलाओं को वोट डालने का हक देने की मांग की. इसके एक साल बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की घोषणा की तो क्लारा जेटकिन ने उसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की सोची.

जैसा कि पहले बता आए हैं, 1910 में कोपेनहेगेन के सम्मेलन में 17 देशों से आई 100 महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के उनके सुझाव को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया तो पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में मनाया गया.

1975 से संयुक्त राष्ट्र ने इसका जश्न मनाना शुरू कर दिया तो उसे इसकी औपचारिक मान्यता के तौर पर देखा गया और आज यह दिवस, समाज, सियासत और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं द्वारा तय की गई मंजिलों का उत्सव मनाने और बची रह गई असमानताओं व शोषणों को खत्म करने के संकल्प लेने का दिन है.

प्रसंगवश, क्लारा जेटकिन ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की कोई तारीख नहीं सुझाई थी. इसकी आठ मार्च की तारीख तो पहले विश्वयुद्ध के दौरान 1917 के बोल्शेविक क्रांति वर्ष में तय हुई, जब रूस की महिलाओं ने ‘रोटी और अमन’ की मांग करते हुए जार निकोलस द्वितीय की हुकूमत के खिलाफ हड़ताल कर दी थी.

अनंतर, जार सत्ता के खात्मे के बाद बनी अस्थायी सरकार ने महिलाओं को मताधिकार दे दिया था.

सरोजिनी नायडू

क्लारा जेटकिन की ही तरह सरोजिनी नायडू का व्यक्तित्व भी बहुआयामी था. वे प्रख्यात कवयित्री व स्वतंत्रता सेनानी तो थीं ही, बहुभाषाविद और महिलाओं में जागरूकता की फिक्रमंद कार्यकर्ता भी थीं. वे महिलाओं के प्रति समान बर्ताव, उनके समुचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व और मताधिकार के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों में तो सक्रिय रहीं ही, साथ ही सामाजिक कुरीतियों से पीड़ित सारी महिलाओं को उनके शिकंजे से निकालने के अभियानों की अगुवाई भी करती रहीं.

हालांकि उनकी शिक्षा-दीक्षा के दौर में उनके पिता चाहते थे कि वे उन्हीं की तरह वैज्ञानिक या गणितज्ञ बनें.

1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं तो दूसरी महिला अध्यक्ष उनकी गहरी दोस्त एनी बेसेंट. महात्मा गांधी सरोजिनी को ‘भारत कोकिला’ और अपनी प्रिय शिष्या कहते थे, जबकि सरोजिनी विनोद में उन्हें ‘मिकी माउस’ कहती थीं. उन्हें बिहार से संविधान सभा की सदस्य भी चुना गया था.

सरोजिनी नायडू. (फोटो साभार: Stamps Of India)

आज़ादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) की पहली राज्यपाल बनाया गया तो वे राज्यपाल बनने वाली देश की पहली महिला भी बन गईं. फिर भी वे ‘राजभवन के पिंजरे में कैद जंगल के पक्षी’ जैसा अनुभव करती थीं. लेकिन सांसें रहते उन्हें इस ‘कैद’ से मुक्ति नहीं मिल पाई और लखनऊ के राजभवन में ही दो मार्च, 1949 को हृदयगति रुक जाने के कारण उनका निधन हो गया था.

13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मी सरोजिनी अपने माता-पिता की पहली संतान थीं-आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी. अभी वे 15 साल की ही थीं कि डॉ. गोविंद राजालु नायडू के प्रति अनुरक्त हो उठी थीं और 19 साल की होती-होती उनसे विवाह कर लिया था. उस दौर में अंतरजातीय विवाह आसान नहीं होता था, क्योंकि उसकी सामाजिक स्वीकृति लगभग नहीं के बराबर थी. पर उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखमय रहा था.

वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान वे देश के राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूदीं तो पीछे मुड़कर नहीं देखा-सविनय अवज्ञा आंदोलन में बापू के साथ जेल गईं तो 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में भी 21 महीने जेल में रहीं. नमक सत्याग्रह के दौरान भी वे बापू के साथ थीं और उनकी गिरफ्तारी के बाद उनकी ज्यादातर जिम्मेदारियां वही संभालती थीं.

सार्वजनिक जीवन में वे गहरी ईमानदारी, भाषणों में अधिक साहस और कार्रवाई में अधिक ईमानदारी की पैरोकार थीं. गुलामी के दौर में प्लेग की महामारी से बचाव के प्रयत्नों में उनके योगदान के लिए उन्हें कैसर-ए-हिंद पुरस्कार दिया गया था, जबकि 1964 में उनकी जयंती पर उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था.

नीरा बेन देसाई

भारत में महिलाओं के आंदोलनों की ‘कुल माता’ कहलाने वाली नीरा बेन देसाई की गिनती दुनिया की ऐसी गिनी-चुनी विदुषियों में की जाती है, जिन्होंने 1970 से पहले स्त्रियों की समस्याओं पर लिखा. न सिर्फ लिखा बल्कि उनके समाधान के संघर्षों में प्राण-पण से जूझती भी रहीं.

स्वतंत्र भारत में स्त्रियों की स्वतंत्रता का संग्राम तो, कहा जाता है कि, सही मायनों में नीरा बेन ने ही शुरू किया और सात साल पहले 25 जून, 2009 को कैंसर के हाथों हारकर वे हमारे बीच नहीं रहीं, तो भी अपने पीछे उसको गति देने वाले कई संस्थान छोड़ गईं.

नीरा बेन का जन्म 1925 में एक मध्यवर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था. उनके माता-पिता दोनों मन से उदार और विचारों से प्रगतिशील थे. इसलिए घर के बाहर की दुनिया देखने और उससे भरपूर सीखने के उनके रास्ते में कोई बाधा नहीं थी. 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर वे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में कूदीं और जेल की सजा पाई तो उन्होंने उसको उसी जेल में बंद स्त्री सशक्तीकरण से जुड़ी शख्सियतों से मेलजोल के अवसर में बदल लिया.

नीरा बेन देसाई. (फोटो साभार: wikipeacewomen.org)

गौरतलब है कि भारत में महिलाओं की भूमिका के विभिन्न पहलुओं पर अपने शोध में उन्होंने 1950 के शुरुआती वर्षों में जो निष्कर्ष निकाले थे, 1970 के बाद देश में हुए महिला अधिकार आंदोलनों ने उन्हीं के आलोक में अपना रास्ता बनाया.

1957 में प्रकाशित उनका शोधग्रंथ ‘वीमेन इन मॉडर्न इंडिया’ देश की स्त्रियों की दुर्दशा पर मौलिक शोधों के सिलसिले में अनूठा साबित हुआ तो 2004 में आई उनकी एक और पुस्तक ‘फेमिनिज्म इन वेस्टर्न इंडिया’ भी खूब चर्चित हुई.

1974 में देश में स्त्रियों की दशा के विश्लेषण के लिए गठित जिस समिति ने ‘समानता की ओर’ शीर्षक से बहुचर्चित विस्तृत रिपोर्ट दी थी, नीरा बेन भी उसकी सदस्य थीं. उनके कई समकालीनों की नजर में उनमें विद्वता व सक्रियता का अद्भुत सामंजस्य था. वे अकादमिक उद्यम और एक्टिविज्म दोनों को एक सांचे में ढाल लेती थीं.

अगाथा क्रिस्टी की जासूसी कहानियों की जबर्दस्त प्रशंसक नीरा की एक और विशेषता यह थी कि वे सार्वजनिक जीवन में और होकर व्यक्तिगत जीवन में कुछ और नहीं थीं. उनके राजनीतिक व व्यक्तिगत जीवनदर्शन समान थे और वे महिला आंदोलनों की सफलता और विकास के लिए स्त्री संबंधित अध्ययनों को अपरिहार्य मानती थीं.

उनका कहना था कि ज्ञान को स्त्री की संवेदना, प्रवृत्ति और दृटिकोण के अनुकूल बनाना हो तो शिक्षण, प्रशिक्षण, दस्तावेज लेखन, अनुसंधान व अभियान के हर मोर्चे पर सक्रियता के बिना काम नहीं चलने वाला.

सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में वे मानवाधिकारों का रक्षा के लिए तो लड़ती ही थीं, नर्मदा बचाओ आंदोलन से भी जुड़ी थीं.

आशापूर्णा देवी

1975 में अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष की धूमधाम के अगले बरस यानी 1976 में ‘महिलाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र का दशक’ शुरू ही हुआ था कि बांग्ला कथाकार व कवयित्री आशापूर्णा देवी को प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया और वे उसे प्राप्त करने वाली देश की पहली महिला साहित्यकार बन गईं तो शिक्षित व जागरूक महिलाओं ने उनकी इस उपलब्धि को हाथों-हाथ लिया और वे उनके स्वाभिमान की प्रतीक बन गईं.

आशापूर्णा द्वारा 1964 में ‘अबला जीवन’ के दुखों व सुखों को आधार बनाकर लिखे गए उपन्यास ‘प्रोथोम प्रोतिश्रुति’ (प्रथम प्रतिश्रुति यानी पहला वादा) के लिए उन्हें इस साल यह पुरस्कार तो मिला ही, इसी साल पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया तो उक्त महिलाओं को सोने में सुहागा जैसा महसूस हुआ.

आशापूर्णा देवी.

अनंतर उन दिनों की नाना प्रकार की रूढ़ियों, कुरीतियों, पोच-सोच से निरंतर संघर्ष और अनवरत सृजन की राह अपनाकर आशापूर्णा देवी तत्कालीन सामाजिक बंधनों में अकुला रही महिलाओं की आज़ादी की सबसे मुखर आवाज बनकर उभरीं और बंकिमचंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर व शरतचंद्र के बाद के युग की बांग्ला की अग्रणी साहित्यकार मानी जाने लगीं. उनको बांग्ला की जेन ऑस्टिन भी कहा जाता है.

द वायर हिंदी के जिन पाठकों ने 08 जनवरी, 2025 को ‘आशापूर्णा देवी : महिलाओं की वह आवाज जिसका संघर्ष भी अथक और सृजन भी’ शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी पढ़ी होगी, वे उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से अवगत होंगे.

डॉ. आनंदीबाई जोशी

कोई एक सौ इकतालीस साल पहले 1885 में पुणे (महाराष्ट्र) की आनंदीबाई गोपालराव जोशी (31 मार्च,1865 – 26 फरवरी,1887) ने देश की पहली डिग्रीधारी महिला डॉक्टर बनने का संकल्प लिया तो उनके सामने चुनौतियों का अंबार लग गया. ये चुनौतियां इस मायने में दोहरी थीं कि उस वक्त गुलामी के बोझ से दबे भारतीयों को छोटी-छोटी उपलब्धियों के लिए भी तरसना पड़ रहा था. तिस पर महिलाओं के लिए हालात और विकट थे क्योंकि उन्हें गुलामी के साथ पितृसत्ता की जाई विडंबनाओं का भारी-भरकम बोझ भी उठाना पड़ रहा था.

तिस पर आनंदीबाई महज नौ साल की उम्र में बाल-विवाह का दंश भोगने को मजबूर हो गई थीं और उन्हें उनसे सोलह साल बड़े विधुर गोपाल राव के साथ विवाह के बन्धन में जकड़ दिया गया था. 14 साल की होते-होते वे गर्भवती होकर एक शिशु की मां बन गई थीं. चूंकि उनका अपरिपक्व शरीर और किशोर मन इस गर्भधारण के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे, उनके शिशु दस दिन भी जीवित नहीं रह पाया था.

उसको खोकर विह्वल आनंदीबाई ने अपने भीतर की मां को अपने इस दृढ़ संकल्प से सदमे से उबारा कि वे चिकित्सा विज्ञान पढ़कर डाक्टर बनेंगी और अपने देखते किसी भी अन्य मां की गोद इस तरह सूनी नहीं होने देंगी.

नाना विघ्नों व बाधाओं के बीच उन्होंने अमेरिका के पेंसिलवेनिया स्थित मेडिकल कॉलेज (इसलिए कि देश में डॉक्टरी की पढ़ाई की सुविधा नहीं थी) से अध्ययन करके अपना यह संकल्प पूरा किया, किंतु नियति ने इस मोड़ पर भी उनका ट्रेजेडी से सामना कराना ही तय कर रखा था.

आनंदी बेन जोशी. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

स्वदेश लौटकर उन्होंने कोल्हापुर रियासत द्वारा संचालित अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल के महिला वार्ड की प्रभारी चिकित्सक का पद भार संभालने के कुछ ही दिनों बाद वे तपेदिक (टीबी) की शिकार हो गईं, जो उन दिनों तक सर्वथा लाइलाज थी. अंततः 26 फरवरी, 1887 को महज 22 साल की उम्र में इस बीमारी ने उनकी जान ले ली.

द वायर हिंदी द्वारा 01 जुलाई, 2025 को नेशनल डाक्टर्स डे पर प्रकाशित ‘स्वास्थ्य सेवाओं को उन्नत बनाने के सपनों का क्या हुआ?’ शीर्षक टिप्पणी में इसकी विस्तार से चर्चा की गई है.

डॉ. रखमाबाई राउत

प्रसंगवश, आनंदीबाई के ही वक्त में मुंबई की उनकी जैसी ही बाल-विवाह पीड़िता रखमाबाई राउत (22 नवंबर, 1864 – 25 सितंबर,1955) ने नाना विघ्न बाधाओं के बीच लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर वीमेन से स्नातक की पढ़ाई पूरी कर एमडी करनी चाही तो पाया कि वह संस्थान महिलाओं को एमडी ही नहीं करवाता.

डॉ. रखमाबाई राउत. (फोटो साभार: Wikimedia Commons)

इसके चलते उन्हें ब्रसेल्स जाकर एमडी करनी पड़ी, जिसके बाद वे भारत की पहली महिला एमडी और पहली प्रैक्टिस करने वाली डॉक्टर बनीं. मुंबई के भीकाजी कामा अस्पताल में शुरुआती सेवाएं देने के बाद वे सूरत चली गईं और साढ़े तीन दशकों तक खुद को पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष और महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के निदान के प्रयत्नों में झोंके रखा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)