एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: सुप्रीम कोर्ट दोबारा लिखे गए अध्याय से भी नाख़ुश

सुप्रीम कोर्ट एनसीईआरटी निदेशक द्वारा दायर हलफ़नामे में दिए गए एक 'अत्यंत संक्षिप्त' बयान पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें विवादित अध्याय को फिर से लिखने की बात कही है. साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि संशोधित अध्याय तभी प्रकाशित होगा जब विशेषज्ञ समिति उसे मंज़ूरी देगी.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च) को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी द्वारा दायर हलफ़नामे में दिए गए एक ‘अत्यंत संक्षिप्त’ बयान पर कड़ी आपत्ति जताई. हलफ़नामे में कहा गया था कि कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की उस प्रतिबंधित पाठ्यपुस्तक का विवादित अध्याय – जिसमें ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर एक खंड था – उसे फिर से लिखा गया है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने एनसीईआरटी निदेशक सकलानी और शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा व साक्षरता विभाग के सचिव संजय कुमार से पूछा, ‘इसे किसने फिर से लिखा है?’

ज्ञात हो कि 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक पर ‘पूर्ण और व्यापक प्रतिबंध’ लगाने का आदेश दिया था, जबकि केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया था कि 82,000 से अधिक प्रतियां पहले ही वापस ले ली गई हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार संबंधी सामग्री शामिल किए जाने को संस्था की छवि धूमिल करने की ‘सुनियोजित कोशिश’ और ‘गहरी साजिश’ बताया था.

अदालत का मानना था कि विद्यार्थियों को उनके ‘संवेदनशील और शुरुआती सालों’ में पक्षपातपूर्ण नैरेटिव से परिचित कराना स्थायी गलत धारणाएं पैदा कर सकता है.

द हिंदू के अनुसार, बुधवार को अदालत ने जब पूछा कि अध्याय किसने दोबारा लिखा, तो सकलानी ने मौखिक रूप से जवाब दिया, ‘हमारे फैकल्टी में विशेषज्ञ मौजूद हैं.’

इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘यदि हमारी व्याकरण गलत नहीं है, तो आपके हलफ़नामे में लिखा है कि अध्याय उचित रूप से फिर से लिखा जा चुका है. इसका मतलब है कि यह काम पहले ही हो चुका है.’

उन्होंने पूछा, ‘ये तथाकथित विशेषज्ञ कौन हैं? अध्याय को किस तरह और किस प्रक्रिया से फिर से लिखा गया? क्या अदालत की चिंता व्यक्त करने के बाद भी एनसीईआरटी निदेशक का हलफ़नामा इतना संक्षिप्त होना उचित है?’

पीठ की यह टिप्पणी एनसीईआरटी के बिना किसी शर्त के माफी मांगने के एक दिन बाद आई.

मुख्य न्यायाधीश ने हलफ़नामे से पढ़ते हुए कहा कि एनसीईआरटी इस ‘संशोधित’ अध्याय को शैक्षणिक सत्र 2026-27 में लागू करना चाहता है और इसे सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में कक्षा-शिक्षण के लिए उपयोग करना चाहता है. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी की, ‘हम आपके लागू पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचे से पहले ही काफी भुगत चुके हैं.’

अदालत ने निर्देश दिया कि संशोधित अध्याय तभी प्रकाशित होगा जब विशेषज्ञ समिति उसे मंज़ूरी देगी. सरकार को ऐसी समिति गठित करने का आदेश दिया गया, जिसमें एक पूर्व वरिष्ठ न्यायाधीश, एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद और एक प्रसिद्ध विधि विशेषज्ञ शामिल हों.

अदालत ने कहा कि यह समिति राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के साथ मिलकर केवल कक्षा 8 ही नहीं, बल्कि अन्य कक्षाओं के विधि अध्ययन पाठ्यक्रम की भी समीक्षा कर सकती है.

न्यायपालिका आलोचना से नहीं डरती

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को अपनी संस्थागत कार्यप्रणाली पर निष्पक्ष और वैध आलोचना से कोई आपत्ति नहीं है.

अदालत ने कहा कि यदि किसी विशेषज्ञ समिति द्वारा न्यायपालिका की कमियां उजागर की जाती हैं तो यह देश की भावी पीढ़ी और वर्तमान हितधारकों के लिए सुधार का अवसर हो सकता है.

अदालत ने इस विवाद के बाद सोशल मीडिया पर गैर-जिम्मेदार प्रतिक्रियाएं देने वाले लोगों की कड़ी आलोचना की और केंद्र सरकार से उन वेबसाइटों तथा व्यक्तियों का विवरण देने को कहा.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘कुछ तत्वों ने सोशल मीडिया पर बेहद गैर-जिम्मेदार तरीके से प्रतिक्रिया दी है. कानून ऐसे शरारती तत्वों के खिलाफ अपना काम करेगा. किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा.’

उन्होंने यह भी कहा, ‘अगर वे देश के बाहर छिपे हुए हों, तब भी उन्हें नहीं छोड़ा जाएगा.’

पाठ्यपुस्तक तैयार करने वाली टीम पर सवाल

अदालत को हलफ़नामे से पता चला कि विवादित अध्याय एक पाठ्यपुस्तक विकास टीम ने तैयार किया था, जिसमें मिशेल दानिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार शामिल थे.

अदालत ने कहा कि या तो इस टीम को भारतीय न्यायपालिका के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है, या फिर उन्होंने जानबूझकर तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया ताकि कक्षा 8 के छात्रों के सामने न्यायपालिका की नकारात्मक छवि बनाई जा सके.

अदालत ने निर्देश दिया कि भारत सरकार, राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश, विश्वविद्यालय और सरकारी धन प्राप्त करने वाली संस्थाएं इन तीनों व्यक्तियों को तुरंत पाठ्यक्रम या पाठ्यपुस्तक निर्माण के कार्य से अलग करें.

अदालत ने कहा कि अब समय आ गया है कि सरकार राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शिक्षण-सामग्री समिति के गठन की समीक्षा करे. अदालत को बताया गया कि इस अध्याय का मसौदा केवल कुछ सदस्यों को डिजिटल रूप से भेजा गया था.

मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया, ‘यदि इस देश में स्कूल के बच्चों का पाठ्यक्रम इस तरह की लापरवाही से तैयार किया जाएगा, तो आप क्या उम्मीद करते हैं?’

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पाठ्यक्रम में व्यवस्थित सुधार की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसे समीक्षा करने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष विशेषज्ञों की समिति बनाई जाएगी.

अदालत ने अंत में कहा कि यदि एनसीईआरटी छात्रों को न्यायपालिका के बारे में पढ़ाना चाहता है, तो यह निराशाजनक है कि समिति में एक भी प्रमुख विधि-विशेषज्ञ शामिल नहीं है, और समिति के पुनर्गठन का निर्णय संबंधित प्राधिकरण पर छोड़ दिया गया है.