फ़िलिस्तीन से लेकर भारत तक, बुलडोज़र सामूहिक, न्यायेतर दंड के एक हथियार के तौर पर सामने आए, जिसके द्वारा न सिर्फ़ क़ानून लागू किया किया जाता है बल्कि पूरे समुदाय को संयमित रखने के लिए उनके घरों को गिराया जाता है. इज़रायल द्वारा सज़ा के तौर पर की जाने वाली तोड़फोड़ और भारत द्वारा मुस्लिम संपत्तियों को चुन- चुनकर निशाना बनाए जाने के बीच समानताएं दिखाई देती हैं.
छह लेखों की श्रृंखला के इस अंतिम लेख में यह बताया गया है कि कैसे क़ानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल तमाशा करने और डर दिखाने के लिए किया जाता है. इस श्रृंखला का पहला, दूसरा , तीसरा , चौथा और पांचवा लेख यहां पढ़ सकते हैं.
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नई दिल्ली: इज़रायल और भारत दोनों ही देशों में बुलडोज़र सरकारी शक्ति प्रदर्शन का हथियार बन गया है, जो घरों को ढाह कर दंड देता है और उस जगह को सार्वजनिक तमाशे की जगह में तब्दील कर देता है. क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी इलाक़ों में इज़रायली अधिकारियों ने दशकों से सामूहिक दंड देने के लिए फ़िलिस्तीनी घरों को गिराया है, आरोपी की जगह उसके परिवारों को निशाना बनाया है, कई बार तो उनका निशाना व्यापक समुदाय रहा है.
जानकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे ‘सज़ा के तौर पर घर गिराना’ बताते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करते हैं. चौथे जेनेवा कन्वेंशन के आर्टिकल 33 में कहा गया है कि ‘किसी भी सुरक्षित व्यक्ति को ऐसे जुर्म के लिए सज़ा नहीं दी जा सकती जो उसने ख़ुद नहीं की हो. सामूहिक दंड देना और इसी तरह डराने- धमकाने या आतंकवाद के सभी तरीक़े की मनाही है. लूटपाट मना है. सुरक्षित लोगों और उनकी संपत्ति के ख़िलाफ़ बदला निकालना मना है.’
भारत में, ख़ासकर भाजपा शासित राज्यों में पिछले पांच सालों में एक जैसा पैटर्न साफ़ तौर पर देखने को मिला है, जिसके बारे में इस सीरीज़ में लिखा गया है. विरोध प्रदर्शनों, कथित अपराधों, या आरोपी से दूर दराज़ के संबंध की वजह से मुस्लिम घरों और संपत्तियों को गिरा दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बाद भी यह तरीका जारी रहा है, जिससे इस बात का साफ संकेत मिलता है सरकार निश्चिंत है कि इस तरह के न्यायेतर तोड़फ़ोड़ को लेकर उसे कोई सज़ा नहीं मिलेगी.
जून 2022 में, नई दिल्ली स्थित सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर रिसर्च एसोसिएट, अंगशुमन चौधरी ने ग्लोबल जर्नलिज़्म ग्रुप कोडा को दिए एक इंटरव्यू में इन समानताओं की ओर ध्यान दिलाया: ‘हिंदू राष्ट्रवादी मोदी सरकार के काम करने के तरीक़े और इज़रायली सरकार द्वारा फ़िलिस्तीन में की गई कार्रवाई में एक अजीब समानता है. जैसे इज़रायल ने फ़िलिस्तीनियों को सज़ा देने के लिए बुलडोज़र का इस्तेमाल किया है, वैसे ही भारत में विरोध या प्रदर्शन करने वाले मुसलमानों के अंदर डर पैदा करने के लिए इसका इस्तेमाल करता है.’
जैसा कि विशेषज्ञों ने बताया है, तोड़फोड़ से लोकतांत्रिक संस्थाओं की संस्थागत कमज़ोरियां सामने आती हैं और सरकार की मंज़ूरी से की गई तोड़फोड़ की क़ीमत इंसानों को चुकानी पड़ती है.

वैचारिक समानताएं
एक लेखक और संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित एडवोकेसी ग्रुप, हिंदूज़ फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के एडवोकेसी कोऑर्डिनेटर प्रणय सोमयाजुला का कहना है कि निजी या सैन्य रिश्तों से परे एक जैसी वैचारिक दृष्टि से ऐसी नीतियां बनती हैं. भारत में हिंदुत्व और इज़रायल में ज़ायोनिज़्म, दोनों ही ख़ुद को बहुसंख्यक आबादी वाला देश – हिंदू और यहूदी – बनाना चाहते हैं, जबकि अल्पसंख्यक आबादी को देश की एकता के लिए ख़तरा बताते हैं.
दोनों ही सरकारें बहुसंख्यक लोगों के भीतर पीड़ित होने का एहसास भड़काती हैं, वे ज़ुल्म को सही ठहराती हैं, और अल्पसंख्यकों को बराबर के नागरिक अधिकार देने से इनकार करती हैं. वे देश के अल्पसंख्यकों को अलग- थलग करने वाला रवैया अपनाती हैं, उन्हें बलि का बकरा बना देती हैं. किसी भी सरकार की बुराई करने पर उसे ‘हिंदूफ़ोबिया’ या ‘एंटी- सेमिटिज़्म’ का नाम दिया जाता है.
दोनों ही देश की सुरक्षा की चिंताओं को अल्पसंख्यक आबादी से जोड़ते हैं, और मुसलमानों पर शक करते हैं तथा उन्हें संभावित ख़तरा बताते हैं. सरकार के कामकाज के तरीक़े में इसके नतीजे साफ़ दिखते हैं. इज़रायल में आरोपी फ़िलिस्तीनियों के घर गिरा दिए जाते हैं; भारत में, अपराध, विरोध प्रदर्शन, या गोहत्या से जुड़ी घटनाओं के आरोपी मुस्लिम व्यक्तियों के परिवारों को भी इसी तरह तबाही का सामना करना पड़ता है.
क़ानूनी दिखावा और प्रशासनिक तरीक़े
इज़रायल में कार्रवाई से कुछ घंटे पहले ही तोड़फोड़ के नोटिस दिए जाते हैं, जिसकी वजह से से लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वे क़ानूनी मदद ले सकें. जेफ़ हैल्पर, जो एक एंथ्रोपोलॉजिस्ट और इज़रायली कमिटी अगेंस्ट हाउस डिमोलिशन के डायरेक्टर हैं, एक आम पैटर्न बताते हैं: ‘यरूशलेम में, रात में ऑर्डर देना और सुबह जल्दी तोड़फोड़ करना एक पसंदीदा तरीका है.’
चौधरी ने 2022 में समाचार वेबसाइट स्क्रॉल पर लिखा, ‘(इज़रायली सरकार की) इस सज़ा देने वाली तोड़फोड़ की नीति की ख़ास बात यह है कि यह एक तरह का सामूहिक दंड है, जो सिर्फ़ आरोपी को नहीं दिया जाता है बल्कि उससे जुड़े लोगों को दिया जाता है.’
भारत ने भी इसी तरीक़े को अपनाया है. तोड़फोड़ किए जाने से कुछ समय पहले नोटिस जारी किया जाता है. अधिकारी क़ानूनी दिखावा करने के लिए अतिक्रमण- रोधी या भवन निर्माण संबंधी नियमों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि लोग कार्रवाई का विरोध करने में नाकाम रहते हैं.
दोनों देशों में लोगों को अलग- अलग तरह से संदेश दिया जाता है. इज़रायल में तोड़फोड़ को सुरक्षा उपायों के तौर पर सही ठहराया जाता है. भारत में सार्वजनिक विमर्श में मुसलमानों को हिंदू बहुसंख्यक के लिए ख़तरा बताया जाता है, और तोड़फोड़ को कथित अपराध या प्रदर्शन से जोड़ा जाता है. क़ानूनी वजहें अक्सर औपचारिकता भर होती हैं, जबकि असल मक़सद उन्हें दंड देना होता है.
सामूहिक दंड, सार्वजनिक तमाशा
दोनों देश सामूहिक दंड के तौर पर घरों को गिराने की कार्रवाई करते हैं. इज़रायल में आरोपी फ़िलिस्तीनियों के परिवार वालों को निशाना बनाया जाता है; भारत में, आरोपी मुस्लिम व्यक्तियों का पूरा परिवार ही इस तरह की कार्रवाई से प्रभावित होता है.
जैसा कि इस सीरीज़ के पहले लेख में बताया गया है कि प्रयागराज में एक्टिविस्ट जावेद मोहम्मद की गिरफ़्तारी के बाद उनके घर को गिरा दिया गया, जिससे उनकी पत्नी और दो बेटियां प्रभावित हुईं. नूंह में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद आस मोहम्मद का साधारण- सा घर और उनकी चाय की दुकान तोड़ दी गई.
फ़िलिस्तीन में इसी तरह की तोड़फोड़ सिर्फ़ घरों तक सीमित नहीं है, टाउनशिप, खेत, बाग़ और पानी के स्रोत, सबकुछ नष्ट किया जाता है, जिसका मक़सद भौतिक और सांस्कृतिक मौजूदगी को मिटाना होता है.
स्कॉलर शिवांगी मरियम राज और सोमदीप सेन का तर्क है कि भारत में तोड़फोड़ इसी पैटर्न से प्रेरित है, जो मुस्लिम विरासत और संस्कृति को निशाना बनाती है.
दोनों देशों में तोड़फोड़ अक्सर सार्वजनिक तमाशे में तब्दील हो जाती है, प्रशासन चाहती है कि आम अवाम इस तोड़फोड़ को देखे. बुलडोज़र दिन के उजाले में चलते हैं, कभी- कभी मीडिया कवरेज के साथ, जिससे सरकार की ताक़त का विज़ुअल प्रमाण मिलता है.
जावेद मोहम्मद की बेटी आफ़रीन फ़ातिमा ऐसी घटनाओं में छिपे दोहरे संदेश को उजागर करती हैं, ‘हिंदू आबादी को यह बताना कि हम मुसलमानों की जगह क्या है. मुसलमानों को यह बताना कि अपनी हद में रहो वरना तुम्हारे घर गिरा दिए जाएंगे.’
इज़रायल में भी घर गिराए जाने की घटनाएं आम हैं, जिसका मक़सद संभावित ख़तरों (यहां और यहां) को रोकना है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे डर और स्वीकारोक्ति की भावना मज़बूत होती है, और यह दंडविधान सिर्फ़ पीड़ितों तक ही सीमित नहीं रहता.
तोड़फोड़ की मानवीय क़ीमत
स्कॉलर ग़ज़ाला जमील बताती हैं कि तोड़फोड़, यानी सरकार द्वारा किसी के घर को तबाह किए जाने से भौतिक सुरक्षा और पहचान दोनों ही ख़त्म हो जाता है. परिवार से न सिर्फ़ आश्रय छिन जाता, बल्कि अपनेपन और सुरक्षा की भावना भी ख़त्म हो जाती है. प्रत्येक तोड़फोड़ का असर पूरे समुदाय पर पड़ता है, जिससे उन्हें दीर्घकालिक सदमा लगता है.
भारत में, लोगों ने ऐसी तोड़फोड़ की घटनाओं के लेकर अपने अनुभव दर्ज किए हैं:
- दिल्ली के जहांगीरपुरी में 40 साल की अख्तानम ने अपने एक मात्र घर को मलबे में बदलते देखा. 2022 में स्क्रॉल से बात करते हुए वह रो पड़ीं, ‘वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? मेरे पास कोई और घर नहीं है.’
- प्रयागराज में उर्दू और अरबी पढ़ाने वाली 25 साल की शिक्षिका तौहीद फ़ातिमा बुलडोज़र के शोर से परेशान थीं जब उनका घर तोड़ा गया. उनके पिता ने 2023 में इस घर को बनाया था जिसमें चार दिन बाद उन्हें शिफ़्ट होना था. वह वहां कभी नहीं रह पाईं.
- खरगोन में, छह बच्चों के पिता 45 वर्षीय अमजद ख़ान ने 2022 में हुए सांप्रदायिक तनाव के बाद अपनी बेकरी को टूटते देखा. उन्होंने फिर से बेकरी का निर्माण किया, लेकिन वे अपना डर ज़ाहिर करते हैं: ‘आज भारत में मुसलमान होने का मतलब है कि आपके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है.’
फ़िलिस्तीन के वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा में, पूरे गांव को और साथ ही साथ खेती की ज़मीन तथा पानी की पाइपलाइन को भी तबाह कर दिया गया, जिससे समुदायों के जीवित रहने की क्षमता ख़त्म हो गई है.
- ह्यूमन राइट्स मॉनिटरिंग ऑर्गनाइज़ेशन की रिपोर्ट है कि वेस्ट बैंक के एरिया C के ग्रामीण इलाक़े में हज़ारों फ़िलिस्तीनियों के घर तोड़े जा रहे हैं, उन्हें घरों से निकाला जा रहा है और उनसे वह इलाक़ा ख़ाली कराया जा रहा है, क्योंकि अधिकारी घरों और ज़रूरी बुनियादी सुविधाओं को तोड़ रहे हैं.
- FAO- UNOSAT के 2025 के आकलन में बड़े पैमाने पर तबाही का पता चला: 2025 के आख़िर तक, ग़ाज़ा की लगभग 87% खेती की ज़मीन, ग्रीनहाउस और सिंचाई के कुएं ख़राब हो गए थे या नष्ट हो गए थे, जिससे भोजन का उत्पादन और रोज़ी- रोज़गार बुरी तरह प्रभावित हुआ था.
- संयुक्त राष्ट्र ने पाया कि वेस्ट बैंक में तोड़फोड़ के अभियान में पानी के कुएं, सफ़ाई और हाइजीन से जुड़े ढांचे और हौद को भी नष्ट किया गया था.
सांस्कृतिक विनाश
तोड़फोड़ में अक्सर सिर्फ़ घर ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक जगहों को भी निशाना बनाया जाता है. भारत में मस्जिद, दरगाह, मज़ार और मदरसे गिराए गए हैं. जानकारों का कहना है कि यह इज़रायल द्वारा फ़िलिस्तीनी इतिहास, विरासत और संस्कृति को समाप्त करने जैसी कार्रवाई है.
लेखक शिवांगी मरियम राज और सोमदीप सेन, जो भारत में हुई तोड़फोड़ की घटना को कम से कम कुछ हद तक फ़िलिस्तीनी ज़मीन, इमारतों और लोगों के साथ इज़रायली बर्ताव से प्रेरित मानते हैं, इसके असर के बारे में बताते हैं: ‘ऐसा लगता है कि यह इज़रायल द्वारा फ़िलिस्तीनी इतिहास, विरासत और संस्कृति को व्यवस्थित रूप से मिटाने की कोशिश से प्रेरित है.’
तोड़फोड़ के लगातार जारी रहने से क़ानूनी सुरक्षा उपायों की सीमाओं का पता चलता है. न्यूयॉर्क स्थित एक वेबसाइट और शोध तथा पत्रकारिता के संगठन, द पोलिस प्रोजेक्ट, इसकी व्याख्या करता है: ‘सिर्फ़ क़ानून बुलडोज़र को नहीं रोक सकता. इसका सिर्फ़ ग़लत इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है; इसे हिंसा के तौर पर फिर से व्याख्यायित किया जा रहा और नए तरीक़े से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.’

मुआवज़े को लेकर कभी- कभार कोर्ट का आदेश आता भी है तो इसके लिए अधिकारियों को निजी तौर पर ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाता.
उच्च न्यायालय ने कभी- कभार इस मामले में दख़ल दिया है, लेकिन ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से तोड़फोड़ करने वाले किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण को कोई ख़ास सज़ा नहीं मिली है, जैसा कि इस सीरीज़ के पिछले हिस्से में बताया गया था. सिविल सेवा के अधिकारियों और पुलिस ने अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी को दरकिनार करते हुए ज़्यादातर सरकार का पक्ष लेकर ऐसी कार्रवाई की है.
‘जो कुछ मेरे होने का सार है’
2022 में इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील कपिल सिब्बल- जिन्होंने कई ऐसे केस लड़े हैं जहां मुसलमानों पर सरकारी कार्रवाई हुई है- ने कहा कि उनका घर ‘सिर्फ़ एक ईंट- गारे का ढांचा नहीं है.’
उन्होंने लिखा, ‘इसके अंदर वह सब कुछ है जिसे मैं संजोकर रखता हूं. यह मुझे चिलचिलाती धूप की गर्मी से बचाता है, मुझे सर्दियों की ठंडी रातों से बचाता है, और उन यादों को समेटे हुए है जो मेरे साथ रहती हैं.’
सिब्बल ने लिखा, उनका घर एक ऐसी जगह थी ‘जहां मैं आज़ादी से सांस ले सकता हूं, हंस सकता हूं, रो सकता हूं, और बाहरी लोगों की नज़रों से बचकर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर सकता हूं. यह एक महल या एक छोटी- सी झोपड़ी हो सकती है, लेकिन यह मेरी जगह है’.
सिब्बल ने लिखा, ‘जब आप एक बुलडोज़र को उसमें से गुज़रने देते हैं, तो आप सिर्फ़ एक इमारत को ही नष्ट नहीं करते, आप मेरे होने के सार को भी नष्ट कर देते हैं.’
‘एक बुलडोज़र ताक़त की निशानी है, जिसकी कोई भावना नहीं है, जो स्टील की तरह ठंडा है. जब यह मेरे घर को गिराता है, तो यह न सिर्फ़ मेरे बनाए ढांचे को, बल्कि बोलने की मेरी हिम्मत को भी तोड़ना चाहता है.’
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है. लेख के लिए उमैर ख़ान ने शोध सहायता की है. इस लेख के लिए डायसपोरा इन एक्शन फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स से सहयोग मिला है.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
