साहित्य और शहर के रिश्तों पर सोचें तो पहली बात जो ध्यान में आती है वह यह है कि चूंकि हमारे यहां आधुनिकता पहले शहरों में आई, ज़्यादातर आधुनिक साहित्य शहरों में ही लिख गया. शहरों में अलग जगहों पर जो साहित्य लिखा गया वह ज़्यादातर हाशिये पर ढकेल दिया गया. पहले भी साहित्य का शहरों से संबंध सीधा-सादा नहीं रहा है.
संस्कृत साहित्य मुख्यतः नगर-केंद्रित रहा है जबकि प्राकृत साहित्य अधिक लोकधर्मी. भक्तिकाव्य का भी बड़ा और निर्णायक हिस्सा शहरों से निकला: जैसे बनारस से कबीर, रैदास, तुलसीदास, भले वे वहां किसी गांव से क्यों न आए हों. रीति काव्य का भी बड़ा हिस्सा राजधानियों में लिखा-सराहा गया.
इस बीच हिंदी अंचल के शहर भी इतना बदल गए हैं कि उनका पहले का रूप, अगर कहीं बचा है तो साहित्य में ही. अब वह दृश्य भौतिक सचाई नहीं रह गया है. ऐसे कई लेखक हैं जिन्हें हम अनायास किसी न किसी शहर से जोड़ते हैं: जयशंकर प्रसाद को बनारस से, निराला-महादेवी-शमशेर बहादुर सिंह को इलाहाबाद से, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी को शांति निकेतन और बनारस से, रेणु को पूर्णिया से, अज्ञेय-निर्मल वर्मा-रघुवीर सहाय-कृष्णा सोबती-श्रीकांत वर्मा, मनोहर श्याम जोशी आदि को दिल्ली से, अमृतलाल नागर को लखनऊ से, मुक्तिबोध को नागपुर और राजनांदगांव से, विनोद कुमार शुक्ल को रायपुर से आदि.
यह और बात है और थोड़ी दुखद है कि शहर ज़्यादातर अपने लेखकों को याद नहीं करते. अन्य भाषाभाषी अंचलों में कई शहर हैं जो वहां के लेखकों की स्मृति को जीवित रखे आए हैं. पर किसी हिंदी लेखक ने वहां रहते-लिखते अपने शहर को उदास या उदासीन पाया? क्या किसी शहर के लोग वहां लिखे गए साहित्य में जगह पा सके? क्या हमारे शहरों में वहां के लेखकों की कोई हैसियत बनी? क्या किसी लेखक ने अपने शहर को वीरान पाया- ग़ालिब ने कहा है कि ‘कोई वीरानी सी वीरानी हैं- और उस वीरानी को दर्ज किया?
जैसे रैदास ने एक वैकल्पिक शहर ‘बेगमपुर’ रचा था, किसी और लेखक ने अपने साहित्य में कोई वैकल्पिक शहर खोजा-पाया? ऐसे कई प्रश्न उठते हैं और उनके कोई बंधे-बंधाए उत्तर संभव नहीं हैं.
हिंदी अंचल में शहरों में अभद्रता, आक्रामकता, असभ्यता, हिंसा, अपराधवृत्ति, दंगे आदि बढ़ते रहे हैं. इनमें वे शहर भी शामिल हैं जिन्हें ‘स्मार्ट सिटी’ का दर्ज़ा मिला हुआ है. इस पर गंभीरता और विस्तार से विचार करने की ज़रूरत है कि इन शहरों में अधिकांशतः सांस्कृतिक विपन्नता से भरे हुए हैं. इनमें से अनेक में कोई सार्वजनिक पुस्तकालय, कलाकेंद्र आदि नहीं हैं.
प्रायः सारी नगरपालिकाएं शहर के विकास, नागरिक सुविधाओं के विस्तार में संस्कृति को हिसाब में नहीं लेती हैं. जो कुछ सुविधाएं विकसित हो पाई हैं वे ज़्यादातर निजी पहल पर ही और उनके मार्ग में भी प्रशासन और अन्य संबंधित अधिकरण अड़ंगे ही डालते रहते हैं. अधिकांश लेखक किसी भी शहर में स्वेच्छा से कम जीवनयापन की, नौकरी आदि की मजबूरी के कारण रहते और वहीं लिखते हैं.
अचानक याद आता है कि पेरिस के नगर निगम ने दशकों पहले वहां कलाकर्म करने आने वाले विदेशी कलाकारों के लिए अलग आवास और स्टूडियो की व्यवस्था की. आज भी विश्वनाथन जैसे मूर्धन्य भारतीय कलाकार उसी सुविधा का उपयोग करते हुए पेरिस में बसे हुए हैं. दिल्ली और मुंबई में बड़ी संख्या में भारत के ही दूसरे शहरों-कस्बों से बड़ी संख्या में कलाकार पढ़ने-सीखने और कलायापन करने आते हैं. इनके नगर निगमों को कभी यह नहीं सूझा कि इन प्रवासियों के रहने के लिए कोई सार्वजनिक सुविधा होना चाहिए.
रसातल में रसा-बसा
इस पर अटकल लगाई जा सकती है कि हिंदी अंचल का नैतिक पतन पहले हुआ कि राजनीतिक पतन. जो भी हो अब वे व्यापक रूप से, कम से कम सार्वजनिक स्तर पर, एक साथ हैं. एक बलात्कारी धर्म नेता, जेल से पैरोल पाकर, अयोध्या के राम मंदिर में, अत्यन्त विशिष्ट अतिथि का दर्जा और सुविधा का उपभोग करते हुए रामलला के दर्शन करने गया. पता नहीं कि रामलला ने एक बलात्कारी का दर्शन करने का सुयोग पाया या कि बलात्कारी ने उनके दर्शन कर अभय पाया!
संभल में क़ानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका से वहां के ज़िला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक ने किसी मस्जिद में नमाजियों की संख्या 25 तक सीमित कर दी थी. इस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है कि अगर क़ानून व्यवस्था बनाए रखने को क़ानूनी ढंग से नहीं निभा सकते तो उन व्यक्तियों को, जो ज़िला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक थे, अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए.
नए निज़ाम के अंतर्गत पिछले दस सालों में 93000 सरकारी स्कूल बंद हुए हैं और छात्रों के दाख़िले की संख्या 27 करोड़ से घटकर 24.96 करोड़ रह गई है यानी लगभग 2.41 करोड़ बच्चे शिक्षा की सुविधा से बाहर हो गए हैं. यह स्कूलबंदी और छात्रों की संख्या में कटौती का अधिकांश हिंदीभाषी राज्यों में हुए हैं, उसमें भी राजस्थान और मध्य प्रदेश में.
यहां यह भी एक बार फिर याद कर लेना चाहिए कि बच्चों-स्त्रियों-अल्पसंख्यकों-आदिवासियों के विरुद्ध हिंसा-हत्या-बलात्कार आदि के जो जघन्य अपराध देश भर में होते हैं उनका लगभग दो तिहाई से ज़्यादा हिस्सा हिंदी अंचल में घटता है.
अकादेमिक अध:पतन के बढ़ते जाने का एक प्रमाण यह है कि हिंदी अंचल के एकाध-दो विश्वविद्यालयों को छोड़कर एक भी विश्वविद्यालय, इसी शिक्षा-बुद्धि-ज्ञान विरोधी निज़ाम की आकलन सूची में, देश के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय के रूप में, शामिल नहीं है. अकादेमिक रूप से और बुद्धि में बौने अज्ञातकुलशील कुलपति बनाए जा रहे हैं जो विश्वविद्यालय के परिसरों को कठघरों या खुले जेलों में बदलने पर आमादा हैं.
इस चौतरफ़ा पतन के लिए सिर्फ़ सांप्रदायिक-धर्मांध-जातिग्रस्त राजनीति भर ज़िम्मेदार नहीं है, उसमें विशाल हिंदी मध्यवर्ग बहुत मुदितमन और उत्साह से शामिल है. यह मध्यवर्ग लगातार हिंदी की अपनी उदार परंपरा, उसके साहित्य के समावेशी और प्रश्नवाचक लोकतांत्रिक स्वभाव से विश्वासघात करता समुदाय है. हिंदी अंचल में ज्ञान का अपमान और अज्ञान का महिमा-मंडन दैनिक घटना है और दोनों में इस मध्यवर्ग की गहरी लिप्ति है.
ऐसे कोई आंकड़े सामने नहीं हैं और न ही उचित है ऐसा सामान्यीकरण करना कि हिंदी अंचल के लेखक-कलाकार, बुद्धिजीवी और विद्वान, रंगकर्मी-संगीतकार-नृत्यकार आदि की इस पतन में क्या भूमिका या स्थिति है.
अलबत्ता कुछ प्रश्न उठाए जा सकते हैं: क्या इन सबका का अधिकांश पतनकारी शक्तियों के विरोध या प्रतिरोध में सक्रिय हैं? क्या वह इस पतन को अपनी रचना में दर्ज़ कर रहा है? उसका कितना हिस्सा इन शक्तियों के साथ है, भले अवसरवादिता या कायरता के कारण? क्या इस पतन को दर्ज़ करने, उसकी व्याप्ति और फलितार्थों का विश्लेषण करनेवाली कोई पुस्तकें हिंदी में आई हैं? क्या हिंदी अंचल में ऐसी कोई संस्थाएं या संगठन हैं जो प्रतिरोध करने का साहस कर रहे हैं? क्या उसका महत्वपूर्ण हिस्सा ‘कौन झंझट में पड़े’ की मानसिकता की गिरफ़्त में है? इस मुक़ाम पर क्या हिंदी साहित्य अपने ही समाज के विरुद्ध खड़ा हो रहा है?
दूसरा अंक
शहर है सागर, वर्ष है 1958, महीना है दिसंबर. अंक है दूसरा, पत्रिका है ‘समवेत’ जिसके संपादक हैं राजा दुबे, प्रबोध कुमार, आग्नेय और मैं. मुझे छोड़ अब सभी दिवंगत हैं. अंक दिल्ली के मलय प्रिंटिंग प्रेस से छपा. मेरी उमर अगली जनवरी में 88 की होने जा रही है.
जिन लेखकों की रचनाएं इस अंक में प्रकाशित हैं उनके नाम हैं: नरेश मेहता, शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, कमलेश्वर, अमरकांत, अक्षोभ्येश्वरी, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, कीर्ति चौधरी, ठाकुर प्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, युगजीत नवलपुरी, अनिल कुमार, राजेन्द्र यादव, विद्यानिवास मिश्र, प्रभाकर माचवे, प्रमोद वर्मा, गोपाल प्रसाद, कांता, शलभ चतुर्वेदी, श्याम सुन्दर घोष, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, महेन्द्र भल्ला, विश्वेन्द्र ठाकुर, भवानी प्रसाद मिश्र, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, राजा दुबे, जितेन्द्र शर्मा, रमेश दत्त दुबे, और स्व. सतीश चन्द्र चौबे.
कुल 140 पृष्ठ हैं. ‘समवेत’ का यह अंतिम अंक सिद्ध हुआ. मूल्य है दो रुपये. कवर पर भाऊ समर्थ का चित्र है जैसा कि पहले अंक के कवर पर भी था.
सागर जैसे छोटे शहर से सर्वथा अज्ञातकुलशील युवा लेखकों द्वारा निकाली जा रही एक पत्रिका को उस समय, आज से 67 वर्ष पहिले, कितने लेखकों की रचनाएं मिल पाईं! हममें से कई उस सहज साहित्य संस्कृति को धीरे-धीरे ग़ायब होते देखते रहे हैं.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
