लैंगिक पहचान तय करने का अधिकार कमज़ोर कर सकता है ट्रांस संशोधन विधेयक: हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार को एक फ़ैसले के दौरान कहा कि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति का अपनी लैंगिक पहचान स्वयं तय करने का अधिकार ‘किसी रियायत का विषय नहीं, बल्कि एक अधिकार’ है. अदालत ने चेतावनी दी कि नया ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक इस अधिकार को कमज़ोर कर ‘राज्य-नियंत्रित अधिकार’ में बदल सकता है.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार (30 मार्च) को कहा कि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति का अपनी लैंगिक पहचान स्वयं तय करने का अधिकार ‘किसी रियायत का विषय नहीं, बल्कि एक अधिकार’ है. अदालत ने चेतावनी दी कि मोदी सरकार का ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक इस अधिकार को कमजोर कर ‘राज्य-नियंत्रित अधिकार’ (एंटाइटलमेंट) में बदल सकता है.

अदालत ने यह टिप्पणी एक ट्रांस महिला गंगा कुमारी की याचिका पर दिए गए अपने फैसले के ‘एपिलॉग’ (समापन भाग) में की, जिसमें राज्य सरकार से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए समान आरक्षण लागू करने की मांग की गई थी.

जस्टिस योगेंद्र पुरोहित और जस्टिस अरुण मोंगा की पीठ ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन विधेयक, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की उस धारा को हटाने की कोशिश करता है, जो ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी लैंगिक पहचान तय करने का अधिकार देती है. अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘मूल बात यह है कि व्यक्ति की पहचान कोई रियायत नहीं, बल्कि उसका अधिकार है.’

हाईकोर्ट ने कहा कि 2014 के नालसा फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर लोगों के इस अधिकार को मान्यता दी थी. लेकिन संशोधन विधेयक में प्रस्ताव है कि ‘लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता प्रमाणपत्र, जांच या अन्य प्रशासनिक स्वीकृति पर निर्भर होगी.’ 

अदालत ने कहा, ‘जिसे सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की अस्मिता का अटूट हिस्सा माना था, वह अब एक सशर्त, राज्य-निर्भर अधिकार में बदलने का खतरा झेल रहा है.’

पीठ ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह अदालत के आदेश का पालन करते हुए संशोधित कानून के दायरे में भी आत्म-पहचान के सिद्धांत को अधिकतम रूप से सुरक्षित रखे. साथ ही, अधिकारियों को यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी कानूनी बदलाव को इस तरह लागू न किया जाए कि संवैधानिक अधिकार कमजोर पड़ जाएं.

अदालत ने कहा कि एक संवैधानिक संस्था के रूप में राज्य सरकार से अपेक्षा है कि वह कानून के पालन और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए, ताकि प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकार केवल दिखावटी न बन जाएं.

अपने मुख्य फैसले में अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति गठित करे, जो विभिन्न पृष्ठभूमियों से आने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के ‘गंभीर हाशिये पर धकेले जाने’ की स्थिति का विस्तृत अध्ययन करे. इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार को नीतियां बनानी होंगी.

इसके साथ ही, जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक राजस्थान सरकार को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सरकारी नौकरियों और राज्य संचालित शैक्षणिक संस्थानों में चयन के लिए निर्धारित अधिकतम अंकों में ‘3% अतिरिक्त वेटेज’ देना होगा.

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा 2023 में ट्रांसजेंडर लोगों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने का नोटिफिकेशन ‘सिर्फ दिखावा और भ्रम पैदा करने वाला कदम’ है, क्योंकि यह ‘सिर्फ औपचारिकता भर लगता है, जिसमें वास्तविक लाभ नहीं है.’

पीठ ने कहा कि सभी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ओबीसी श्रेणी में डालने से उनके पहले से मौजूद आरक्षण अधिकार समाप्त हो जाते हैं और उन्हें कोई विकल्प भी नहीं दिया जाता. अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एससी, एसटी और पिछड़े वर्गों से आने वाले ट्रांसजेंडर लोग ‘दोहरी और परस्पर जुड़ी हुई वंचनाओं’ का सामना करते हैं.

ज्ञात हो कि संसद ने इस महीने की शुरुआत में व्यापक विरोध के बीच इस संशोधन विधेयक को पारित कर दिया है, लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अभी तक इसे मंजूरी नहीं दी है.