नॉर्थईस्ट डायरीः असम सरकार के चुनाव ड्यूटी के लिए वन सुरक्षा बल तैनात करने के आदेश पर रोक

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड और सिक्किम के प्रमुख समाचार.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक/@/voiceofvotersup)

नई दिल्ली: 9 अप्रैल को होने वाले असम विधानसभा चुनावों से कुछ ही दिन पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ ने गुरुवार (2 अप्रैल) को असम सरकार के एक आदेश पर रोक लगा दी. इस आदेश में चुनावों के लिए असम वन सुरक्षा बल (एएफपीएफ) के 1,600 कर्मियों को तैनात करने की बात कही गई थी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम को ‘कानून के खिलाफ’ बताते हुए न्यायिक सदस्य जस्टिस अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य ईश्वर सिंह की दो-सदस्यीय पीठ ने राज्य सरकार, पर्यावरण मंत्रालय, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, असम के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और विशेष मुख्य सचिव को नोटिस जारी किए.

19 मार्च के आदेश में असम सरकार ने लगभग 1,600 वन सुरक्षा बल कर्मियों को चुनाव ड्यूटी के लिए जुटाने के निर्देश दिए थे और उन्हें 3 अप्रैल तक अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के कार्यालय में रिपोर्ट करने को कहा गया था. आदेश में यह भी कहा गया था कि मतदान के अगले दिन यानी 10 अप्रैल को बल वापस लौट सकता है.

याचिकाकर्ता, वकील गौरव बंसल ने तर्क दिया कि असम का यह निर्देश मई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है. उस फैसले में राज्यों को चुनाव उद्देश्यों या अन्य गैर-वानिकी कार्यों, जैसे कि चारधाम यात्रा के लिए वन कर्मचारियों या वाहनों को लेने से रोक दिया गया था.

बंसल ने आगे कहा कि जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत राज्य का यह अनिवार्य दायित्व है कि वह काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान जैसे संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों की लगातार निगरानी करे. बंसल ने याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया कि एएफपीएफ का मुख्य कर्तव्य वनों और संरक्षित क्षेत्रों की सुरक्षा करना है.

एएफपीएफ की स्थापना 1986 में कानून के तहत की गई थी. कानून द्वारा अनिवार्य किए गए इसके प्राथमिक दायित्वों में असम के वनों, वन संसाधनों, वन्यजीवों और असम वन विभाग की संपत्तियों की सुरक्षा और रखवाली शामिल है.

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को तय करते हुए कहा, ‘यदि हम राज्य सरकार को आदेश वापस लेने के लिए नहीं कहेंगे, तो यह स्थिति स्थायी हो जाएगी, क्योंकि कल अंतिम तारीख है. हमें इस पर रोक लगानी होगी, वरना यह गलत परंपरा स्थापित करेगा.’

यह आदेश विशेष मुख्य सचिव एमके यादव द्वारा जारी किया गया था. सुनवाई के दौरान विशेषज्ञ सदस्य ईश्वर सिंह ने पूछा कि चुनाव प्रक्रिया में विशेष मुख्य सचिव की क्या भूमिका है. इस पर सरकारी वकील ने निर्देश लेने के लिए समय मांगा.

पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि यह पत्र राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजा ही नहीं गया था, जो प्रक्रिया में एक गंभीर कमी दर्शाता है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आदेश जारी करने वाले यादव एक सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा अधिकारी हैं और उन्हें मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा का करीबी माना जाता है. वे पिछले वर्ष वन संरक्षण कानून के उल्लंघन के आरोपों को लेकर भी विवादों में रहे हैं.

मई 2025 में शिलॉन्ग स्थित पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय ने असम वन विभाग को निर्देश दिया था कि वन भूमि पर कमांडो बटालियन के दो शिविर स्थापित करने की अनुमति देने के मामले में यादव के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए, जिसे ‘वन संरक्षण कानून का गंभीर उल्लंघन’ बताया गया था.

अमित शाह का असम में यूसीसी लागू करने का वादा, आदिवासी समुदायों को मिलेगी छूट

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार (3 अप्रैल) को असम में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सत्ता में वापसी के लिए अपील करते हुए राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू करने के अपनी पार्टी के वादे को दोहराया, साथ ही यह भी साफ़ किया कि आदिवासी समुदाय इसके दायरे से बाहर रहेंगे.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने गोआलपाड़ा जिले के दूधनोई में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा, ‘यदि आप असम में भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार बनाते हैं, तो हम समान नागरिक संहिता लाएंगे, जिससे कोई भी चार बार विवाह नहीं कर सकेगा. और मैं आश्वस्त करता हूं कि आदिवासियों को इसके दायरे से बाहर रखा जाएगा, हमें पता है कि यह किन पर लागू होना चाहिए.’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह असम विधानसभा चुनावों के लिए आयोजित एक जनसभा में. (फोटो: पीटीआई)

यह कदम उत्तराखंड में भाजपा सरकार द्वारा हाल ही में लागू किए गए समान नागरिक संहिता कानून के बाद उठाया गया है, जिसमें लिव-इन संबंधों के नियमन का भी प्रावधान है. इसी प्रकार का एक विधेयक इस वर्ष मार्च में गुजरात सरकार द्वारा भी पेश किया गया था. 9 अप्रैल को होने वाले असम विधानसभा चुनावों के लिए समान नागरिक संहिता का क्रियान्वयन भाजपा के घोषणा-पत्र का मुख्य बिंदु बना हुआ है.

रैली के दौरान शाह ने आरोप लगाया कि पिछली कांग्रेस सरकारों ने आदिवासी समुदायों को केवल ‘वोट बैंक’ के रूप में इस्तेमाल किया और उनके विकास की अनदेखी की. उन्होंने मौजूदा प्रशासन के तहत हाशिए पर पड़े समूहों के प्रतिनिधित्व पर भी ज़ोर दिया और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही द्रौपदी मुर्मू भारत की राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी महिला बनीं.

आदिवासियों के उत्थान के प्रति भाजपा की प्रतिबद्धता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘स्वतंत्रता से लेकर 2013 तक पूरे देश में आदिवासियों के कल्याण के लिए वार्षिक बजट लगभग 25,000 करोड़ रुपये था, लेकिन 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह बढ़कर 1.38 लाख करोड़ रुपये हो गया.’

उन्होंने क्षेत्र में एक बड़ा डेयरी स्थापित करने का वादा किया, ताकि प्रत्येक आदिवासी परिवार को एक गाय और एक भैंस उपलब्ध कराई जा सके.

दूधनोई विधानसभा क्षेत्र 126 में से 19 अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों में से एक है. इस क्षेत्र में 1,75,592 मतदाता हैं, जिनमें से लगभग 44% आदिवासी समुदाय से संबंधित हैं.

उन्होंने यह भी दोहराया कि भाजपा केवल असम ही नहीं, बल्कि पूरे देश में अवैध घुसपैठियों की पहचान करेगी.

उन्होंने कहा, ‘असम में हमें पांच साल और दीजिए, हम राज्य को घुसपैठियों से मुक्त कर देंगे और उन्हें वापस भेजेंगे.’

केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि भाजपा ने असम में शांति बहाल की, लेकिन यदि 9 अप्रैल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कोई भी सीट जीतती है, तो राज्य में फिर से अस्थिरता आ सकती है.

उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस ने असम को अशांत राज्य बनाए रखा और राज्य के युवाओं के जीवन के साथ राजनीति की. लेकिन हमने उग्रवादी समूहों के साथ समझौते किए और अब तक 10,000 से अधिक युवाओं ने हथियार छोड़ दिए, जिससे राज्य में शांति आई है.’

कांग्रेस पर राज्य की संस्कृति की रक्षा के लिए कुछ न करने का आरोप लगाते हुए शाह ने कहा कि भाजपा शासन के दौरान अहोम सेनापति लाचित बोरफुकन की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई, असम आंदोलन के 860 शहीदों का स्मारक बनाया गया और यूनेस्को द्वारा चराइदेव मैदाम को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया गया.

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

शाह के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने कहा कि उन्होंने संविधान में छठी अनुसूची को शामिल करके आदिवासियों को असली ताक़त दी, ताकि असम के पहाड़ी इलाकों में आदिवासियों को स्वायत्तता और स्व-शासन मिल सके. साथ ही, उन्होंने 29 विकास परिषदें भी बनाईं – जिनमें आदिवासी/चाय बागान से जुड़े आदिवासी, मोरान, मत्तक, कोच-राजबोंगशी और अन्य शामिल हैं – जिससे छोटे आदिवासी समुदायों को पहली बार अपनी संस्थागत आवाज़ मिली और उन पर विशेष ध्यान देकर विकास किया गया.

असम कांग्रेस की वरिष्ठ प्रवक्ता बरनाली फुकन ने कहा, ’10 साल से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बावजूद आप असम की छह समुदायों (जिसमें चाय जनजाति/आदिवासी शामिल हैं) को बार-बार वादा करने के बावजूद एसटी का दर्जा नहीं दे पाए. द्रौपदी मुर्मू प्रतीक मात्र हैं. असम में हमारे 15 साल के शासन के दौरान कांग्रेस ने आदिवासी इलाकों में ढांचागत सुरक्षा, गरीबी में कमी, स्कूल, सड़कें और शिक्षकों को सरकारी दर्जा दिया.’

उन्होंने आगे कहा, ‘शाह जी, आपका ‘एक गाय, एक भैंस और जिला डेयरी’ वाला वादा सिर्फ एक दिखावा है. आदिवासियों को स्वायत्तता, भूमि सुरक्षा, एसटी दर्जा और सम्मानजनक विकास चाहिए – न कि चुनावी वादे. कांग्रेस असम के आदिवासियों के साथ मजबूती से खड़ी है. आपके जुमले उन्हें फिर से नहीं बहला पाएंगे.’

असम चुनाव: 14% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले, 11% पर गंभीर आरोप

आगामी असम विधानसभा चुनाव में कुल 722 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें से 102 यानी लगभग 14% उम्मीदवारों ने अपने ऊपर आपराधिक मामलों की जानकारी दी है. यह खुलासा एक गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट में किया गया है.

2021 के विधानसभा चुनाव में 941 उम्मीदवारों में से 138 (करीब 15%) ने ऐसे मामलों की जानकारी दी थी.

इस बार 82 उम्मीदवार (लगभग 11%) ने अपने ऊपर गंभीर आपराधिक मामलों की घोषणा की है, जबकि 2021 में यह आंकड़ा 12% था.

जिन उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की जानकारी दी है, उनमें सबसे ज़्यादा संख्या ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के उम्मीदवारों की है. इस पार्टी ने 20 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिनमें से 11, यानी 37% उम्मीदवारों पर अपराधों के आरोप हैं.

इसके बाद कांग्रेस का स्थान है, जिसके 99 उम्मीदवारों में से 28 (28%) पर मामले दर्ज हैं. असम गण परिषद के 26 में से 6 उम्मीदवार (23%) भी इस सूची में हैं.

असम जातीय परिषद के 2 (20%) और रायजोर दल के 2 (15%) उम्मीदवारों ने भी आपराधिक मामलों की जानकारी दी है.

भारतीय जनता पार्टी के 8 उम्मीदवार (करीब 9%) ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मामले हैं. वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के 3 में से 1 उम्मीदवार ने भी ऐसा मामला घोषित किया है.

गंभीर आपराधिक मामलों में भी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सबसे आगे (30%) है, इसके बाद कांग्रेस (20%) का स्थान है. भाजपा के 9% उम्मीदवारों पर गंभीर मामले हैं.

दो उम्मीदवारों ने महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े मामलों की जानकारी दी है, जबकि 9 उम्मीदवारों पर हत्या के प्रयास के मामले दर्ज हैं.

एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ये आंकड़े बताते हैं कि फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए निर्देशों का उम्मीदवारों के चयन पर बहुत कम असर पड़ा है. अदालत ने राजनीतिक दलों से कहा था कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनने के कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करें.

संगठन ने कहा, ‘2025 में हुए हाल के दो राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान यह देखा गया कि राजनीतिक पार्टियों ने बेबुनियाद और आधारहीन कारण दिए, जैसे कि व्यक्ति की लोकप्रियता, वह अच्छा सामाजिक काम करता है, या उसके खिलाफ मामले राजनीति से प्रेरित हैं. दागी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव में उतारने के लिए ये ठोस और तर्कसंगत कारण नहीं हैं.’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह आंकड़े दिखाते हैं कि राजनीतिक दल चुनावी सुधार में गंभीर नहीं हैं और लोकतंत्र ऐसे लोगों के कारण प्रभावित हो रहा है जो कानून तोड़ने के बावजूद कानून बनाने की स्थिति में पहुंच जाते हैं.

करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के असम विधानसभा चुनाव में 39% उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति 1 करोड़ रुपये से अधिक घोषित की है. 722 उम्मीदवारों में से 285 इस श्रेणी में आते हैं. 2021 में यह संख्या 28% (941 में से 264) थी.

प्रमुख दलों में भारतीय जनता पार्टी के 90 में से 79 उम्मीदवार (88%) करोड़पति हैं. इसके बाद बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (82%) और असम जातीय परिषद (70%) का स्थान है. असम गण परिषद के 69% और कांग्रेस के 61% उम्मीदवारों ने 1 करोड़ रुपये से अधिक संपत्ति घोषित की है.

2026 में प्रति उम्मीदवार औसत संपत्ति 3.25 करोड़ रुपये है, जो 2021 में 2.10 करोड़ रुपये थी.

अरुणाचल प्रदेश: ईटानगर में साइन बोर्ड से मीट के नाम हटाने का निर्देश, आलोचना तेज़

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

ईटानगर नगर निगम (आईएमसी) द्वारा जारी एक आदेश में भोजनालयों को उनके लाइसेंस और साइनबोर्ड से खास तरह के मांस के ज़िक्र हटाने का निर्देश दिया गया है, जिससे स्थानीय लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. इस कदम का विरोध करने वालों ने इसे ‘दखलंदाज़ी और राजनीति से प्रेरित’ बताया है, साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि अरुणाचल प्रदेश में ज़्यादातर लोग मांसाहारी खाना खाते हैं.

अपने हालिया आदेश में आईएमसी ने होटल और रेस्तरां को अपने व्यापार लाइसेंस के नाम और सार्वजनिक साइनबोर्ड से पोर्क, चिकन, बीफ और मटन जैसे शब्द हटाने के निर्देश दिए. इसके पीछे ‘सार्वजनिक शालीनता, पशु कल्याण नियम और वर्तमान संवेदनशीलताओं’ को कारण बताया गया.

आईएमसी के संयुक्त आयुक्त डेटम गादी द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि मौजूदा लाइसेंसों में संशोधन किया जाना चाहिए और ऐसे नए आवेदन, जिनमें इन शब्दों का उल्लेख होगा, स्वीकृत नहीं किए जाएंगे. आईएमसी ने भोजनालयों को साइनबोर्ड और बैनर अपडेट करने के लिए 10 दिन का समय दिया है. अनुपालन न करने की स्थिति में संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी.

स्थानीय लोगों और व्यापारियों ने इस निर्देश का विरोध करते हुए कहा है कि यह कुछ विशेष खाद्य पदार्थों को निशाना बनाता है और उपभोक्ताओं के विकल्प को सीमित करता है.

एक स्थानीय निवासी रंजू डोडुम ने कहा, ‘ऐसे नाम यह सुनिश्चित करते हैं कि जो लोग बीफ नहीं खाते, वे गलती से ऐसे स्थानों पर न चले जाएं. अगर ऐसा है, तो अधिकारियों को केएफसी जैसे प्रतिष्ठानों को भी बंद करना चाहिए, और हम ‘शुद्ध शाकाहारी’ रेस्तरां को बंद करने की भी मांग करेंगे.’

आईएमसी के पार्षद गोरा लोटक ने कहा कि वह 9 अप्रैल को होने वाली व्यावसायिक बैठक में इस निर्णय की समीक्षा की मांग करेंगे और इसे ‘गलत’ बताया.

आईएमसी ने इस बदलाव को लागू करने के लिए अरुणाचल प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 2019 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग किया है. निगम का कहना है कि व्यापार के नाम सामान्य और उचित होने चाहिए.

इस आदेश का विरोध करने वालों का कहना है कि यह नया नियम ऐसे राज्य में पारंपरिक पहचान को मिटाने का जोखिम पैदा करता है, जहां मांस आधारित भोजन दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

अरुणाचल सरकार ने यूएपीए ट्रिब्यूनल से कहा- एनएससीएन-के का उद्देश्य धर्मांतरण और आबादी को एक जैसा बनाना

अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में एक यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) ट्रिब्यूनल को बताया कि प्रतिबंधित संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-खापलांग (एनएससीएन-के) का उद्देश्य ‘लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना’ है, ताकि एक साझा मकसद के लिए एक जैसा समाज बनाया जा सके.

सरकार ने यह भी कहा कि यह संगठन भारत और म्यांमार के नगा-बहुल क्षेत्रों के विलय की मांग करता है.

अरुणाचल प्रदेश में तैनात भारतीय सेना के जवान. (प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

19 मार्च को यूएपीए ट्रिब्यूनल ने गृह मंत्रालय की 22 सितंबर 2025 की अधिसूचना को बरकरार रखते हुए एनएससीएन-के को यूएपीए, 1967 के तहत अगले पांच वर्षों के लिए गैरकानूनी संगठन घोषित किया. यह संगठन 4 जून 2015 को मणिपुर में सेना के काफिले पर हुए हमले में शामिल था, जिसमें 18 जवान शहीद हुए थे.

अपने बयान में अरुणाचल सरकार ने कहा कि जबरन धर्मांतरण के अलावा इस संगठन का इरादा सभी उप-जनजातियों को ‘तांगसांग-नगा’ नाम के एक झंडे के नीचे लाना है, यह एक जैसी आबादी वाली संरचना बनाने की गहरी साजिश को दर्शाता है.

यह संगठन अरुणाचल प्रदेश के तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों में सक्रिय है. सरकार ने बताया कि 2015 में जब पहली बार इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब इस तरह की दलीलें ट्रिब्यूनल के सामने नहीं रखी गई थीं.

सरकार के अनुसार, एनएससीएन-के चुनाव प्रक्रिया में अवैध हस्तक्षेप, मादक पदार्थों की तस्करी और सुरक्षा बलों पर हमले के लिए इन जिलों में ठिकाने/कैम्प स्थापित करने जैसी गतिविधियों में भी शामिल है.

इस संगठन का नाम इसके नेता एसएस खापलांग के नाम पर रखा गया है, जिनकी 2017 में म्यांमार में मौत हो गई थी. एनएससीएन-के का गठन जनवरी 1990 में मूल संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) से अलग होकर हुआ था, जो 1988 में विभाजित हुआ था. मूल संगठन का एक धड़ा अब एनएससीएन (इसाक-मुइवा) के नाम से जाना जाता है और 1997 से सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल है.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने सेना के काफिले पर हमले के मामले में खापलांग की गिरफ्तारी के लिए 17 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था.

एनएससीएन-के ने 2001 में केंद्र सरकार के साथ संघर्षविराम समझौता किया था, लेकिन 27 मार्च 2015 को इसे एकतरफा समाप्त कर दिया. इस संगठन पर पहली बार 2020 में पांच साल के लिए प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे 2025 में फिर पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया.

गृह मंत्रालय ने ट्रिब्यूनल को बताया कि पिछले पांच वर्षों में एनएससीएन-के गुट 29 हिंसक घटनाओं में शामिल रहे, जिनमें 18 लोगों की मौत और 16 सुरक्षा कर्मियों व नागरिकों के घायल होने की घटनाएं शामिल हैं. इस दौरान 71 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 56 में आरोपपत्र दाखिल हुए और 35 उग्रवादियों को सजा या अभियोजन का सामना करना पड़ा.

इसके अलावा, 85 उग्रवादियों को गिरफ्तार किया गया, 69 ने आत्मसमर्पण किया और अपहरण सहित 51 अन्य आपराधिक घटनाएं दर्ज की गईं. बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए.

मंत्रालय के अनुसार, संगठन के पास म्यांमार में लगभग 400-500 उग्रवादी और करीब 400 हथियार हैं, जिनमें 50-75 भारतीय नागा उग्रवादी शामिल हैं.

नगालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश की सरकारों से परामर्श लेने के बाद सभी ने एनएससीएन-के को गैरकानूनी संगठन घोषित करने की सिफारिश की.

मंत्रालय ने यह भी कहा कि यह संगठन भारत से अलग होकर भारत-म्यांमार क्षेत्र के नगा-बहुल इलाकों को मिलाकर एक संप्रभु नगालैंड बनाना चाहता है. इसके अलावा, यह यूएलएफए (आई), पीआरईपीएके और पीएलए जैसे अन्य गैरकानूनी संगठनों से जुड़ा है तथा फिरौती के लिए अपहरण और वसूली में भी शामिल है. यह अन्य देशों में भारत-विरोधी ताकतों से हथियार और सहायता प्राप्त करने की कोशिश भी करता है.

अरुणाचल: ग्रामीणों ने निगलोक सिलिकॉन फैक्ट्री के खिलाफ नई शिकायत दर्ज की

अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी सियांग जिले के रुक्सिन सर्कल के अंतर्गत आने वाले आठ गांवों- जो धेमाजी से सटे हैं, के निवासियों ने निगलोक स्थित औद्योगिक विकास केंद्र में स्थापित फेरो-सिलिकॉन फैक्ट्री के खिलाफ नई शिकायत दर्ज कराई है.

नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, फैक्ट्री के खिलाफ लंबे समय से आंदोलन कर रहे ग्रामीणों ने गुरुवार को रुक्सिन के अतिरिक्त उपायुक्त को एक नई शिकायत सौंपी. इसमें कहा गया है कि एम/एस एथर एलॉयज एलएलपी द्वारा संचालित सिलिकॉन फैक्ट्री ने अनापत्ति प्रमाण पत्र अवैध तरीके से हासिल किया और बिना किसी जनसुनवाई के फैक्ट्री स्थापित कर दी.

आंदोलन कर रहे ग्रामीणों ने शिकायत में दोहराया कि यह सिलिकॉन उद्योग क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और समुदाय के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, जिससे भविष्य की पीढ़ियों और प्रकृति-आधारित आजीविका पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.

रुक्सिन क्षेत्र के स्थानीय गांव के मुखियाओं, जिन्होंने अतिरिक्त उपायुक्त के समक्ष इसी तरह की शिकायत दर्ज की, ने आरोप लगाया कि कंपनी के प्रतिनिधियों ने उन्हें गुमराह किया और गलत, अधूरी तथा भ्रामक जानकारी देकर अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल किया.

गांव मुखियाओं ने दुख जताया कि उन्हें अब लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि प्रभावित लोग बिना परिणाम जाने फैक्ट्री की अनुमति देने के लिए उनसे सवाल कर रहे हैं.

निगलोक के मुखिया तालुंग सरोह ने कहा, ‘कंपनी के प्रतिनिधियों ने हमें परियोजना का पूरा विवरण नहीं दिया, जिससे हम इस भारी उद्योग और उसके प्रभावों से अनजान रहे. अब हम देख रहे हैं कि यह फैक्ट्री गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं पैदा कर रही है, साथ ही स्वास्थ्य संबंधी खतरे और सामाजिक अशांति भी बढ़ा रही है.’ उन्होंने सरकार से मांग की कि एथर एलॉयज एलएलपी द्वारा संचालित फैक्ट्री के अनापत्ति प्रमाण पत्र को निलंबित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं.

प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों ने फैक्ट्री के संचालन को रोकने, शिकायतों की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने और इस मुद्दे पर जनसुनवाई आयोजित करने की मांग की है, क्योंकि प्रदूषण का मामला स्थानीय लोगों के जीवन और संपत्ति से जुड़ा है.

अपने विरोध और नई मांगों को जताने के लिए सैकड़ों ग्रामीणों, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और युवा शामिल थे, ने गुरुवार को एमएमजे रोड और राष्ट्रीय राजमार्ग-515 पर पैदल मार्च निकाला और फैक्ट्री के खिलाफ नारे लगाए.

इसके बाद प्रदर्शनकारी रुक्सिन के सामान्य मैदान में एकत्र हुए, जहां बैठक आयोजित कर अपनी मांगों पर चर्चा की गई.

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण की कोलकाता पीठ ने एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर निगलोक औद्योगिक विकास केंद्र में संचालित फेरो-एलॉय फैक्ट्री से कथित बड़े पैमाने पर हो रहे पर्यावरण प्रदूषण का स्वतःसंज्ञान लिया है.

नगालैंड: ‘शहीद पार्क’ स्थल पर आपत्ति से ओटिंग हत्याकांड के जख्म फिर हरे हुए

नगालैंड के मोन जिले में प्रस्तावित शहीद पार्क के लिए चिह्नित स्थल पर असम राइफल्स की कथित आपत्ति ने दिसंबर 2021 के ओटिंग हत्याकांड से जुड़े पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, मोन जिले में प्रमुख कोन्याक जनजाति के शीर्ष संगठन कोन्याक यूनियन ने कहा कि गृह विभाग ने एक विशेष सेना यूनिट द्वारा कथित तौर पर एक असफल मुठभेड़ में समुदाय के 13 सदस्यों की हत्या के कुछ ही दिनों बाद स्मारक बनाने के लिए असम राइफल्स कैंप से सटी एक जगह को मंज़ूरी दे दी थी.

छह दिसंबर 2021 को मोन जिले में सशस्त्र बलों द्वारा कथित तौर पर मारे गए नागरिकों को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए एक समारोह में शामिल स्थानीय लोग. (फाइल फोटो: पीटीआई)

यूनियन के अनुसार, जनवरी 2022 में ओटिंग के 13 पीड़ितों के लिए स्मारक बनाने की अनुमति दी गई थी. ओटिंग, नगालैंड-असम सीमा के पास स्थित एक गांव है. इसके साथ ही एक 14वें पीड़ित व्यक्ति के लिए भी स्मारक बनाने की अनुमति मिली थी, जिनकी मौत अगले दिन मोन शहर में प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए असम राइफल्स द्वारा की गई गोलीबारी में हुई थी.

कोन्याक यूनियन के महासचिव वांगो कोन्याक ने कहा, ‘हालात तनावपूर्ण होने के दौरान हमने ज़िला प्रशासन के ज़रिए असम राइफल्स कैंप से सटी एक जगह पर शहीद पार्क बनाने की अनुमति मांगी थी. इसका मकसद उन बेकसूर लोगों को श्रद्धांजलि देना था जिनकी जान चली गई और सुरक्षा एजेंसियों को यह याद दिलाना था कि वे भविष्य में ऐसे अभियानों से बचें.’

यूनियन के अध्यक्ष के. यामाओ कोन्याक ने कहा कि मोन में तैनात 42 असम राइफल्स ने पार्क निर्माण पर यह कहते हुए आपत्ति जताई कि आवंटित जमीन उसके लीज क्षेत्र में आती है.

उन्होंने कहा, ‘लेकिन जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मोन शहर में असम राइफल्स की ज़मीन का लीज़ डीड (पट्टा) पंजीकृत नहीं है और इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है.’

यूनियन ने ज़ोर देकर कहा कि समुदाय को इस पार्क की ज़रूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को दिसंबर 2021 की उस घटना की याद बनी रहे.

कोन्याक यूनियन ने बताया कि 23 जनवरी को जिला प्रशासन से इस मुद्दे को सुलझाने की अपील का कोई नतीजा नहीं निकला. 10 फरवरी को नगालैंड के कमिश्नर को भेजा गया रिमाइंडर भी अनसुना कर दिया गया.

बीते मंगलवार (31 मार्च 2026) को जारी बयान में संगठन ने कहा कि यदि नेफ्यू रियो के नेतृत्व वाली नगालैंड सरकार जल्द ही इस प्रक्रिया में तेज़ी नहीं लाती है तो वह चयनित स्थल पर पार्क का निर्माण शुरू कर देगा.

यूनियन ने चेतावनी दी, ‘यदि निर्माण कार्य शुरू करने के दौरान कोई अप्रिय घटना होती है, तो इसकी जिम्मेदारी यूनियन की नहीं होगी.’

मालूम हो कि चार दिसंबर, 2021 को अपराह्न लगभग 4:20 बजे अपर तिरु और ओटिंग गांव के बीच लोंगखाओ में घात लगाकर वहां मौजूद 21 पैरा स्पेशल फोर्स की ऑपरेशन टीम ने सफेद बोलेरो पिकअप वाहन पर गोलियां चला दीं, जिसमें ओटिंग गांव के आठ आम आदमी सवार थे. इनमें से ज्यादातर तिरु में कोयला खदानों में मजदूर के रूप में काम करते थे. उन्होंने इन लोगों की न तो सही पहचान सुनिश्चित की थी और न ही हमले से पहले उन्हें कोई चुनौती दी थी.

पुलिस डीजीपी ने कहा था कि जांच से पता चला है कि ओटिंग और तिरु के ग्रामीण जब लापता ग्रामीणों की तलाश में घटनास्थल पर पहुंचे और रात करीब आठ बजे बोलेरो पिकअप वाहन मिला तो वे शव मिलने पर हिंसक हो गए और और 21 पैरा स्पेशल फोर्स के जवानों तथा ग्रामीणों के बीच हाथापाई शुरू हो गई, जिसमें एक पैराट्रूपर की मौत हो गई थी और हाथापाई के परिणामस्वरूप 21 पैरा स्पेशल फोर्स टीम के 14 कर्मचारियों को चोटें आईं. इसके चलते मेजर ने रात करीब 10 बजे गोली चलाने का आदेश दिया था. दूसरी घटना में विशेष बल की गोलियों से सात ग्रामीणों की मौत हो गई थी.

मणिपुर: मई 2023 की हिंसा के बाद पहली बार मुख्यमंत्री ने एनएच-37 के जरिए जिरीबाम पहुंचे 

हिंसाग्रस्त मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयासों के बीच मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने शनिवार (4 अप्रैल) को राष्ट्रीय राजमार्ग-37 के माध्यम से जिरीबाम जिले की यात्रा की. मई 2023 में जातीय हिंसा भड़कने के बाद किसी मौजूदा मुख्यमंत्री की सड़क मार्ग से की गई यह पहली यात्रा है.

असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ए. शारदा देवी और आठ विधायकों की टीम के साथ तीन दिवसीय दौरे पर निकले हैं. इस दौरे का उद्देश्य इंफाल से करीब 217 किलोमीटर दूर स्थित इस संवेदनशील सीमावर्ती ज़िले में विश्वास बहाली के उपायों को मज़बूत करना और स्थानीय समुदायों की चिंताओं को दूर करना है.

मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह. (फोटो: पीटीआई)

मुख्यमंत्री के साथ यात्रा करने वाले विधायकों में टोंगब्रम रोबिंद्रो, के. रोबिंद्रो, सपन रंजन, एच. डिंगो, एल. रामेश्वर, एस. कुंजकेश्वर (केबा), एस. प्रेमचंद्र, अशब उद्दीन और नूर हुसैन शामिल हैं. प्रतिनिधिमंडल में गृह आयुक्त और लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता सहित वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं.

यह मार्ग कुकी बहुल कांगपोकपी जिले से होकर गुजरता है, जिससे इस यात्रा का महत्व और बढ़ जाता है. इस पहल को राज्य सरकार द्वारा हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में विश्वास बहाल करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा माना जा रहा है.

अखबार ने सूत्रों के हवाले से बताया कि इस दौरे में आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों (आईडीपी) के साथ बातचीत और स्थानीय नेताओं के साथ बैठकें शामिल होंगी, ताकि जमीनी स्थिति का आकलन किया जा सके और प्रमुख मुद्दों का समाधान किया जा सके.

गौरतलब है कि जून 2024 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह द्वारा इसी मार्ग से जिरीबाम जाने का प्रयास कांगपोकपी जिले के कोटलेन के पास संदिग्ध उग्रवादियों द्वारा उनके अग्रिम सुरक्षा काफिले पर घात लगाकर किए गए हमले के बाद रद्द करना पड़ा था, जिसमें सुरक्षा कर्मी घायल हो गए थे.

सिक्किम: 17 और प्राथमिक स्कूल बंद करने की तैयारी, सरकार ने कम जन्म दर को बताया कारण

सिक्किम सरकार इस वर्ष घटते नामांकन के कारण 17 और प्राथमिक विद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद करने की योजना बना रही है. शिक्षा विभाग के सचिव ताशी चोफेल लेपचा ने बुधवार (1 अप्रैल) को यह जानकारी दी और इस प्रवृत्ति के लिए राज्य की कम जन्म दर को जिम्मेदार ठहराया.

चिंतन भवन में आयोजित राज्य स्तरीय शिक्षा सम्मेलन में बोलते हुए लेपचा ने कहा कि कम नामांकन राज्य की स्कूल शिक्षा प्रणाली के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है.

उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष 38 प्राथमिक विद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद किया गया था और इस साल 17 और स्कूल बंद करने का प्रस्ताव रखा गया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पिक्साबे)

उन्होंने कहा, ‘कुल जन्म दर (टीएफआर) 1.0 होने के कारण सिक्किम देश में सबसे कम जन्म दर वाला राज्य है. इससे जनसंख्या वृद्धि और छात्र नामांकन दोनों में कमी आई है.’

लेपचा ने यह भी कहा कि विभाग शिक्षकों के लिए ट्रांसफर पॉलिसी एक्ट लाने का प्रस्ताव तैयार कर रहा है. उन्होंने बार-बार और बिना किसी नियम के होने वाले तबादलों को एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बताया.

उन्होंने कहा कि यदि यह अधिनियम लागू होता है, तो इससे शिक्षकों की नियुक्ति में अधिक स्थिरता, पारदर्शिता और पूर्वानुमानिता आएगी.

लेपचा ने यह भी बताया कि खास जरूरतों वाले बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा हेतु अधिक प्रशिक्षित शिक्षकों की जरूरत है. उन्होंने कहा, ‘सरकार ने विशेष शिक्षा के लिए बुनियादी ढांचा तैयार किया है, लेकिन विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी है, जिससे मौजूदा शिक्षकों को कई स्कूलों के बीच जाना पड़ता है और हर बच्चे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा पाता.’