नई दिल्ली: भारत ने ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुए दो सप्ताह के युद्धविराम का स्वागत किया है, जिससे खाड़ी क्षेत्र में 39 दिनों से जारी संघर्ष पर विराम लगा है. हालांकि, भारत ने अपने बयान में पाकिस्तान का कहीं कोई उल्लेख नहीं किया.
भारत के विदेश मंत्रालय (एमईए) ने युद्धविराम की घोषणा के छह घंटे से अधिक समय बाद अपना यह बयान जारी किया.
बयान में कहा गया, ‘हम युद्धविराम का स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि इससे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित होगी. जैसा कि हम पहले भी कहते रहे हैं, तनाव कम करना, संवाद और कूटनीति इस संघर्ष को जल्द समाप्त करने के लिए जरूरी हैं.’
गौरतलब है कि इस बयान में युद्धविराम कराने में पाकिस्तान की भूमिका का जिक्र नहीं किया गया, जबकि वॉशिंगटन, तेहरान और अन्य देशों के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इसकी भूमिका को स्वीकार किया है.
यह संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद शुरू हुआ, जिसके जवाब में तेहरान ने पलटवार किया. इसके बाद खाड़ी क्षेत्र में सैन्य ठिकानों, ऊर्जा ढांचे और समुद्री मार्गों पर हमलों का सिलसिला बढ़ता गया.
पिछले 39 दिनों में इस संघर्ष ने तेल आपूर्ति को बाधित किया, माल ढुलाई और बीमा लागत बढ़ा दी और अहम होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर जोखिम बढ़ा दिया.
भारत ने कहा कि इस संघर्ष ने ‘लोगों को भारी नुकसान पहुंचाया है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति तथा व्यापार नेटवर्क को बाधित किया है.’ विदेश मंत्रालय ने उम्मीद जताई कि ‘होर्मुज़ जलडमरूमध्य के जरिए नौवहन की स्वतंत्रता और वैश्विक व्यापार सुचारु रूप से जारी रहेगा.’
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले की समयसीमा खत्म होने से करीब एक घंटे पहले, अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान के नेताओं ने दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की.
युद्धविराम की घोषणा करते हुए ट्रंप ने कहा कि यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर से बातचीत के बाद संभव हुआ. इसी तरह का बयान ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी दिया.
शहबाज शरीफ ने बताया कि 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में बातचीत के लिए अमेरिका और ईरान को आमंत्रित किया गया है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वांस और ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ़ भी इन वार्ताओं में शामिल हो सकते हैं.

दुनिया ने पाकिस्तान को दी बधाई
अमेरिका द्वारा परमाणु हमले और युद्ध अपराधों की धमकियों के बीच विश्व के अधिकांश नेता चुप रहे. लेकिन अब कई देशों ने समझौता कराने में पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका के लिए उसका आभार जताया है.
युद्ध विराम के फ़ैसले का ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम, मलेशिया, मिस्र, जापान, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया, कज़ाख़स्तान, जर्मनी, यूक्रेन, फ़िनलैंड, स्पेन, चीन, सऊदी अरब, तुर्किये, क़तर, फ़्रांस इत्यादि देशों ने स्वागत किया है.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीयर स्टारमर ने युद्धविराम समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह ‘क्षेत्र और दुनिया के लिए राहत का एक क्षण लेकर आया है.’
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘अपने साझेदारों के साथ मिलकर हमें इस युद्धविराम को बनाए रखने, इसे स्थायी समझौते में बदलने और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा.’
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी दो सप्ताह के युद्धविराम का स्वागत किया है.
उनके प्रवक्ता स्टेफ़ान दुजारिक ने एक बयान में कहा कि गुटेरेस ने सभी पक्षों से ‘अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने दायित्वों का पालन करने और युद्धविराम की शर्तों का सम्मान करने’ की अपील की, ताकि क्षेत्र में स्थायी और व्यापक शांति का रास्ता तैयार हो सके.
उन्होंने यह भी कहा कि ‘नागरिकों की जान बचाने और मानवीय पीड़ा कम करने के लिए शत्रुता का अंत तत्काल आवश्यक है.’
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने अमेरिका और ईरान के बीच रातोंरात हुए दो सप्ताह के युद्धविराम का स्वागत करते हुए कहा, ‘इस समझौते में मध्यस्थता के लिए हम पाकिस्तान का धन्यवाद करते हैं. अब लक्ष्य यह होना चाहिए कि युद्ध का स्थायी अंत करने के लिए बातचीत की जाए.’
स्पेन के विदेश मंत्री जोसे मैनुअल अल्बारेस ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए कहा कि उनका देश मध्यस्थों, खासकर पाकिस्तान, की अहम भूमिका का समर्थन करता है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘करीब 40 दिनों के बाद आज यह युद्धविराम मध्य पूर्व और दुनिया के लिए उम्मीद लेकर आया है. हम मध्यस्थों, विशेष रूप से पाकिस्तान के महत्वपूर्ण प्रयासों का समर्थन करते हैं. यह युद्धविराम ऐसे टकराव को रोकता है जिसके परिणाम अपूरणीय हो सकते थे.’
भारत का रुख
संघर्ष के शुरुआती चरण में नई दिल्ली का रुख अमेरिका और इज़रायल के साथ मेल खाता हुआ प्रतीत होता था. नरेंद्र मोदी 28 फरवरी को तनाव बढ़ने से दो दिन पहले इज़रायल गए थे, और संघर्ष बढ़ने के बावजूद भारत ने अमेरिका या इज़रायल की आलोचना नहीं की.
भारत की शुरुआती प्रतिक्रियाएं मुख्य रूप से खाड़ी देशों और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले असर पर केंद्रित रहीं.
नई दिल्ली ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की कथित मौत पर भी प्रतिक्रिया देने में समय लिया था, और विदेश सचिव ने कुछ दिनों बाद संवेदना व्यक्त की थी. इस बीच, विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपने ईरानी समकक्ष के संपर्क में बने रहे और पूरे संकट के दौरान कम से कम पांच बार बातचीत की.
