ज़मीन की तलाश में आसमान नापती ‘कोई एक सईदा’

पुस्तक समीक्षा: पत्रकार नेहा दीक्षित की 'द मैनी लाइव्स ऑफ सईदा एक्स' का हिंदी अनुवाद असल में सईदा के क़रीब की भाषा में किताब का फिर से लौटना है. दीक्षित सईदा के जीवन के ज़रिये मेहनत की लूट से चल रहे वैश्विक बाज़ार के दूसरे ध्रुव की कहानी कहती हैं. तमाम दुखों के बाद भी लोग कैसे ख़ुद को जीवित रखते हैं, सब खो देने के बाद कैसे जीवन शुरू करते हैं, और कई बार व्यवस्था के ख़िलाफ़ साझा संघर्ष को जन्म देते हैं.

(आवरण साभार: राजकमल प्रकाशन)

इत्यादि ही करने को वो सारे काम करते थे
जिनसे देश और दुनिया चलती थी
हालांकि उन्हें ऐसा लगता था कि वो ये सारे काम
सिर्फ अपना परिवार चलाने को करते हैं

~राजेश जोशी

धार्मिक मान्यताओं में आसमान के सात तलों का ज़िक्र होता है, जिसके सबसे ऊपर के तल पर ईश्वर रहता है. लेकिन उस आसमान के नीचे की सपाट धरती पर इंसान की दुनिया में सात से भी ज़्यादा तल हमने बनाए हैं, पत्रकार नेहा दीक्षित की किताब ‘कोई एक सईदा‘ उस आखिरी तल की दुनिया का एक ज़िंदा दस्तावेज है.

ये दुनिया ग्लोबल मार्केट में चीजों की कीमत को कम करने के लिए प्रति नग मज़दूरी से बनी दुनिया है. जहां एक-आध घंटे की देरी कर देने भर से नौकरी छूट जाती है, जहां काम के घंटों, दिनों और हफ़्तों का कोई हिसाब नहीं है, जहां जुल्म और अपमान झेलना ज़िंदा बचे रहने की अनिवार्य शर्त है. इस दुनिया को चलाए रखने, उसे शासित, प्रशासित और अनुशासित करने में ठेकेदारों, पुलिसकर्मियों, गुंडों और हिंदुत्व की राजनीति का ना दिखने वाला एक नेटवर्क हर समय मौजूद है.

देश में ‘एक्सीडेंटल’ तरीक़े से एक अर्थशास्त्री के वित्त मंत्री बनने के लगभग चार साल बाद सईदा अपने परिवार के साथ ‘एक्सीडेंटल’ तरीक़े से दिल्ली पहुंचती है. सईदा का एक्सीडेंटल तरीक़े से दिल्ली पहुंचना कई सारे हादसों का नतीजा था, और मनमोहन सिंह का एक्सीडेंटल तरीक़े से वित्त मंत्री बनना कई हादसों की शुरुआत.

सईदा का परिवार बनारस के अंसारी बिरादरी का बुनकर (जुलाहा) परिवार है, जो सांप्रदायिक दंगों और पॉवरलूम की नई तकनीक से चोट खा, अपनी परंपरागत जीविका और ज़मीन से अलग होकर दिल्ली पहुंचता है. दिल्ली जहां उनके ख़ानदानी हुनर का कोई मोल नहीं है, और जहां उन्हें ‘अकुशल मज़दूर’ के तौर पर जीवन जीने की संभावनाएं तलाशनी है.

पूरी किताब सईदा के संभावनाएं तलाशने, अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जुगत में लगे रहने, परिवार को चलाए रखने का एक कथात्मक ब्यौरा है. इस ब्यौरे का केंद्रीय कथा सूत्र सईदा और उसके इर्द-गिर्द के परिवेश का तीन दशकों का रोज़मर्रा का जीवन है, इस रोज़मर्रा के जीवन में सईदा द्वारा किए जाने वाले काम, उन काम की जगहों, काम की बारीकियों, काम के वक्त की परेशानियां शामिल हैं. काम के साथ ही सईदा के परिवार के रहने की जगहें, खान-पान, परिवार के भीतर और बाहर के रिश्तों का बदलता स्वरूप सईदा के जीवन की एक पूरी तस्वीर पेश करता है.

सईदा इन तीस सालों में 45 से अधिक प्रकार के काम करती हैं, इन कामों का विस्तार बड़े कारख़ानों, घरों में चलने वाले स्वीटशॉप और प्रति नग की दर पर खुद के घर से किए जाने वाले काम तक हैं- करघे की तैयारी करना, कढ़ाई करना, धागे काटना, भुजिया-गजक बनाना, बादाम छीलना, किशमिश टोंचना, दरवाजे के क़ब्ज़े बनाना, नोटबुक की जिल्द करना, सॉफ्टटॉय में रूई भरना, जींस को कलर करना, बटन लगाना, पैकिंग करना, अस्पताल में मरीज़ों तीमारदारी करना, नट-बोल्ट की पैकिंग करना, मालाएं पिरोना… कई बार सईदा एक समय में दो प्रकार के काम करती हैं, तो कई बार ये काम परिवार के दूसरे सदस्य मिलकर भी करते हैं.

इस रोज़मर्रा को पढ़ते हुए हम उन रंगों, गंधों, सीलन, घुटन, ख्वाहिशों, डरों, बेचैनियों और कभी-कभी की राहतों से रूबरू होते हैं, जिनसे मिलकर उत्पादन प्रणाली के आख़िरी मुहाने पर खड़ी एक प्रवासी मुस्लिम महिला मज़दूर का जीवन बनता है.

इन कामों को करने के दौरान जीवन की आपाधापियां सईदा को मूलभूत तरीक़े से बदल देती है, एक बातूनी, फिल्मों और कहानियों में दिलचस्पी रखने वाली लड़की से वह एक कुछ सख़्त और कुछ उदासीन महिला में बदलती है, साथ ही काम और अपनी बेपरवाहियों में खोए उसके पति के साथ उसके साहचर्य की कोमलता और गर्मी भी खो जाती है. सईदा का रोज़मर्रा का ये जीवन उस किनारे पर टिका है, जहां हमेशा कोई हादसा होने की गुंजाइश साथ चलती है.

दंगों के बाद जीवन की फिर से कल्पना

हर हादसा सईदा के परिवार का तानाबाना बुनियादी तरीक़े से बदल देता है, बनारस में बाबरी विध्वंस के बाद हुए दंगे और दिल्ली में 2020 में हुए दंगे सईदा के परिवार से कमाई हुई हर चीज छीन लेते हैं. दोनों दंगों के बाद सईदा का परिवार अपने जीवन की फिर से कल्पना करने को मजबूर होता है.

अमूमन आम भारतीय परिवारों में शादी जैसे कार्यक्रम जश्न के मौक़े होते हैं, लेकिन सईदा के बेटे शाजेब की अंतरधार्मिक शादी भी एक हादसे की तरह गुजरती है, उस शादी के बाद बेटा कभी घर नहीं लौट पाता. सईदा का दूसरा बेटा सलमान पहले काम की जगह पर हादसे का शिकार होता है, और दूसरी बार इबादत की जगह पर हादसे में अपनी जान खो देता है.

किताब का केंद्रीय कथा सूत्र सईदा का जीवन है, लेकिन यह केंद्रीय कथा सूत्र सईदा को अपने परिवेश से एक अलग इंसान बताने के बजाय, आसपास के कई इंसानों में से एक की तरह दर्ज करता है. सईदा के जीवन में आने वाले लोग- साइकिल रिक्शा चलाने वाले प्यारेलाल, सभापुर में सईदा का सुकून बनी रजिया सूफ़ी, सोहरत का ख़्वाब लिए नया ज़मींदार बना इफ़्तिकार, बिहार के भोजपुर से आया ललिता का परिवार, और करावल नगर की कई महिलाओं के लिए राहत की सांस बनी रेडियोवाली का जीवन, सईदा की कहानी को पूरा करने वाले किरदारों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने पूरे खुदमुख्तार तरीक़े से किताब में मौजूद है.

पलायन के साथ ही इंसान अपने कुनबे, भाषा, समुदाय और उस पूरे मनो-सांस्कृतिक परिवेश से अलग होकर आता है, जो उसके अस्तित्व के पुनरुत्पादन का आधार है. पलायन के साथ एक अजनबीयत जन्म लेती है, और जो हमेशा साथ चलती है. इस अजनबीयत के बीच संदेह, भरोसा और लेन-देन की व्यावहारिकता से एक जटिल भावनात्मक संबंध दुनिया से बनते है, लेखक की सबसे बड़ी सफलता सईदा और उसके परिवेश के इन जटिल भावनात्मक बुनियाद को दर्ज कर पाना है.

इस पूरे दौर में वह अपने कुनबे से दूर होती जा रही है, दिल्ली रेलवे स्टेशन पर प्यारेलाल से हमबोली के रिश्ते के कारण विश्वास कर पाती है, सभापुर की अक्खड़ हरियाणवी बोली से उसे डर लगता है, रजिया सूफ़ी और रेडियोवाली से उसके रिश्ते लेन-देने की व्यावहारिकता से परे अपनेपन का आधार बनते हैं.

वह अपने बच्चों को ताले में बंद करके कितने देर तक जाए? उसका पति अब कौन सी मज़ारों पर जाकर गुमसुम इंसान की तरह रहे? उसके बेटे शाजेब का मोटरसाइकिलों से आकर्षण, सलमान की ज़मींदार गुर्जर परिवार से आने वाले विक्रम से दोस्ती, और रेश्मा का अपने प्रेमी जीजा से संबंध बारीकी से दर्ज है.

विधा और शिल्प की कहें तो, सतही तौर पर इसे सईदा की जीवनी कह सकते हैं, लेकिन विधा के तौर पर जीवनी लेखन प्रायः ‘महत्वपूर्ण’ माने जाने वाले इंसानों से जुड़ा रहा है. नेहा दीक्षित की यह किताब परंपरागत जीवनी शैली का प्रतिवाद है, जहां परंपरागत जीवनियां महत्वपूर्ण इंसान के मिथक को रचने के लिए उसे अलग इंसान के तौर पर हाइलाइट करती है, इसके उलट लेखक सईदा के जीवन को अपने परिवेश के साथ दर्ज करती है.

मूल अंग्रेज़ी किताब ‘द मैनी लाइव्स ऑफ सईदा एक्स‘ में जुड़ा X इशारा करता है कि यह सिर्फ़ एक सईदा की कहानी भर नहीं है. इसलिए मैं इसे जीवनी कहने से बचने के साथ ही, ‘नैरेटिव-नॉनफिक्शन’ जैसी कैटेगरी का एक उम्दा उदाहरण के तौर पर देख पाता हूं. किताब को पढ़ने पर अमन सेठी की किताब ‘अ फ्री मैन’, सारनाथ बैनर्जी के ग्राफ़िक उपन्यास ‘ऑल क्वाइट इन विकासपुरी’ और अब्दुल्ल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ के चित्र लौट आते हैं.

किताब का अनुवाद

सपाट कथात्मकता इस किताब को बड़े पाठक वर्ग के लिए सुलभ बनाती है. किताब में प्रयोग के तौर पर लिखे गए सूचनात्मक वाक्य सईदा के जीवन के समानांतर भारतीय समाज में चल रही गतिविधियों को दर्ज करते हैं, जो समय के संकेत के तौर पर भी मौजूद है. किताब में प्रयोग की गई कविताएं, अपने लिखे जाने के संदर्भ से अलग अर्थ को नया विस्तार देती है.

अनुवाद की बात करें तो मूल अंग्रेज़ी पढ़ने के बाद एक पाठक के तौर पर इस किताब के अनुवाद की ज़रूरत समझ पा रहा था. प्रभात सिंह द्वारा ‘कोई एक सईदा’ के तौर पर हिंदी अनुवाद करना, असल में सईदा के क़रीब की भाषा में किताब का फिर से लौटना है.

हिंदी में आकर किताब के मुहावरे ‘एक और आ गई आसमान नापने’ और पुख्ता हो जाते है, करावल नगर के चित्र और ज़्यादा साफ़ नज़र आते हैं, क्योंकि असल में किताब में शामिल लोगों का जीवन हिंदी और उसके क़रीब की दूसरी भाषाओं में ही घटित हो रहा है. अंग्रेज़ी और हिंदी में दोनों में पढ़े जाने के बाद कहा जा सकता है कि अनुवादक ने अपनी उपस्थिति का कोई निशान नहीं छोड़ने में सक्षम साबित हुए हैं.

और आख़िर में कार्ल मार्क्स उद्धरण‘एक ध्रुव पर संपत्ति का संचय, दूसरे ध्रुव पर विपन्नता, श्रम की यंत्रणा, ग़ुलामी और अज्ञानता का संचय है.’

नेहा दीक्षित सईदा के जीवन के ज़रिये मेहनत की लूट से चल रहे वैश्विक बाज़ार के दूसरे ध्रुव की कहानी कहती है. तमाम दुखों और परेशानियों के बाद भी लोग कैसे अपने आपको जीवित रखते हैं, सब कुछ खो देने के बाद कैसे जीवन को शुरू करते हैं, और रोज़मर्रा का संघर्ष करते-करते, कई बार व्यवस्था के खिलाफ साझा संघर्ष को जन्म देते हैं.

अगर पत्रकार इतिहास का पहला ड्राफ्ट लिखता है तो, शहर और श्रम का सामाजिक इतिहास लिखने वाले इतिहासकार इस ड्राफ्ट से रश्क कर सकते हैं.

(विभांशु कल्ला समसामयिक विषयों पर लिखते हैं.)