अरुणाचल में प्रस्तावित सियांग परियोजना के ख़िलाफ़ विरोध सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई: फैक्ट फाइंडिंग टीम

अरुणाचल प्रदेश के सियांग ज़िले में प्रस्तावित 12,000 मेगावाट जलविद्युत परियोजना पर एक फैक्ट फाइंडिग कमेटी ने कहा कि 20 से अधिक गांव पूरी तरह डूब सकते हैं, जबकि 50 से अधिक गांव सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं. इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन, कृषि भूमि का नुकसान और पारंपरिक आजीविका पर असर पड़ने की आशंका है.

सियांग बांध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे ग्रामीण. (फोटो साभार X/@intlrivers वीडियो स्क्रीनग्रैब)

नई दिल्ली: अरुणाचल प्रदेश के सियांग और अपर सियांग ज़िलों में प्रस्तावित अपर सियांग बहुउद्देश्यीय परियोजना (एसयूएमपी) को लेकर एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कहा कि इस परियोजना के ख़िलाफ़ आदिवासी समुदाय में तीव्र विरोध है, क्योंकि वे इसे अपनी जमीन, संस्कृति और सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर खतरा मानते हैं.

हालांकि, मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने मंगलवार (14 अप्रैल) को दावा किया कि 70% से ज़्यादा ग्रामीणों ने सियांग बहुउद्देशीय परियोजना के अध्ययन का समर्थन किया है.

ज्ञात हो कि सियांग नदी प्रस्तावित लगभग 12,000 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना है. इस एसयूएमपी को अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रीय जलविद्युत ऊर्जा निगम द्वारा क्रियान्वित किया जाना है. राज्य और केंद्र सरकारें चीन द्वारा सियांग पर एक विशाल बांध (66 गीगावाट) के निर्माण के जवाब में बांध को आगे बढ़ा रही हैं, जहां इसे यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है; भारतीय सरकारों ने दावा किया है कि बांध सियांग में जल प्रवाह को नियंत्रित करेगा और बाढ़ के जोखिम को कम करेगा.

फैक्ट फाइडिंग टीम – जिसमें संदीप पांडेय, गुंजन सिंह, निया टापो, बिजू बरबरुआ और रामुनी बुरहागोहेन शामिल थे – ने एक बयान जारी कर कहा कि इलाके का दौरा करने से पता चलता है कि 20 से अधिक गांव पूरी तरह डूब सकते हैं, जबकि 50 से अधिक गांव सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं. इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन, कृषि भूमि का नुकसान और पारंपरिक आजीविका पर असर पड़ने की आशंका है.

बयान में कहा गया कि सियांग घाटी के आदिवासी समुदायों, खासकर आदि जनजाति के लिए यह नदी ‘मदर सियांग’ के रूप में पूजनीय है और उनकी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक जीवन का आधार है. इसलिए प्रस्तावित बांध को वे केवल विकास परियोजना नहीं, बल्कि अपनी पहचान, विरासत और प्रकृति से संबंध पर सीधा खतरा मानते हैं.

इसमे कहा गया है कि स्थानीय समुदायों ने एसआईएफएफ के नेतृत्व में 2012 से इस परियोजना का संगठित विरोध कर रहे है. हालांकि विरोध इससे पहले से ही ‘सियांग बचाओ आंदोलन’ के तहत चल रहा था, जो 1980 के दशक में ब्रह्मपुत्र बोर्ड द्वारा प्रस्तावित बांध के बाद शुरू हुआ था. यह आंदोलन अब तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुका है और 40 वर्षों से अधिक समय से जारी है.

टीम ने कहा कि परियोजना के प्रारंभिक चरण में ही कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) गतिविधियां और एनएचपीसी द्वारा विशेष विकास पैकेज सरकारी विभागों के माध्यम से लागू किए जा रहे हैं, जिससे प्रशासन में हस्तक्षेप हो रहा है. सीएसआर नियमों के अनुसार, ऐसी गतिविधियां सरकारी विभागों द्वारा नहीं की जानी चाहिए. स्थानीय लोगों ने इस असंवैधानिक व्यवस्था का विरोध किया है और मांग की है कि सरकारी विभाग अपने निर्धारित सरकारी फंड का उपयोग करें, न कि एनएचपीसी के फंड का.

स्थानीय निवासियों ने पारदर्शिता की कमी पर भी चिंता जताई है और सवाल उठाया है कि क्या इन पहलों का इस्तेमाल सहमति प्रभावित करने और समुदायों में विभाजन पैदा करने के लिए किया जा रहा है.

बयान में कहा गया है कि दिसंबर 2024 से सियांग, अपर सियांग और ईस्ट सियांग के गांवों और मुख्यालयों में 1000 से अधिक अर्धसैनिक बल तैनात किए गए हैं ताकि विरोध प्रदर्शनों को दबाया जा सके.

इसमें आगे कहा, ‘लगभग 400 लोगों के खिलाफ सामान्य एफआईआर दर्ज की गई है, जिसमें प्रमुख कार्यकर्ता और आयोजक शामिल हैं  – जैसे एडवोकेट एबो मिली, भानु तताक और आदि छात्र संघ की कार्यकारिणी टीम, जिसका नेतृत्व पूर्व अध्यक्ष जिरबोह जमोह कर रहे हैं. ये लोग आज भी अदालत के मुकदमों का सामना कर रहे हैं.’

बयान में कहा गया कि कुल 9 गांव बुजुर्ग (गांव बुराह) को इस बांध के विरोध के कारण निलंबित और बर्खास्त कर दिया गया है.

टीम ने कहा, ‘इन पुलिस मामलों, गलत तरीके से लोगों की गिरफ्तारी, विरोध के अधिकार पर रोक और आदिवासी आवाजों को दबाने की घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक और शर्मनाक हैं. ये घटनाएं सियांग बांध परियोजना पर गंभीर पुनर्विचार की मांग करती हैं और राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने की आवश्यकता है.’

अंत में फैक्ट फाइडिंग टीम ने मांग की कि परियोजना पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए, प्रभावित समुदायों की मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति (एफपीआईसी) सुनिश्चित किया जाए, गलत तरीके से गिरफ्तार नेताओं की सुरक्षा और सभी केस वापस लिया जाए, पारदर्शी और लोकतांत्रिक संवाद प्रक्रिया शुरू किया जाए, स्वतंत्र पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव आकलन किया जाए, वैकल्पिक और टिकाऊ विकास मॉडल की खोजा जाए.