माइकल सैवेज की वह टिप्पणी, जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर आगे बढ़ाया, केवल एक रेडियो-कमेंटेटर की उन्मादी वाक्-लहर नहीं थी; वह अमेरिका के उस पुराने, जिद्दी और आत्ममुग्ध श्रेष्ठताबोध की काई थी, जो बार-बार आधुनिक लोकतंत्र, मानवाधिकार और उदारवाद के चमकदार शीशे पर चढ़ आती है. ट्रंप ने अपने मुंह से भारत को ‘हेलहोल’ नहीं कहा, यह तथ्य है; लेकिन राजनीति में रीपोस्ट भी वक्तव्य होता है, शेयर भी संकेत होता है और चुपचाप प्रसारित किया गया अपमान भी अपमान ही रहता है.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इसे ‘अनइन्फॉर्म्ड, इनऐप्रोप्रिएट एंड इन पुअर टेस्ट’ कहा और स्पष्ट किया कि यह भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तविकता को नहीं दर्शाती.
यह प्रश्न केवल इतना नहीं है किसी ने भारत को क्या कहा. प्रश्न है कि विश्व-राजनीति का सबसे शक्तिशाली मंच जब किसी देश, सभ्यता और उसके लोगों के लिए ऐसी भाषा को आगे बढ़ाता है तो वह भाषा किस मानसिक ज़ुग़राफ़िये से आती है.
राष्ट्र की जटिलताओं को ‘नरक’ कह देना बौद्धिक दुष्टता है
‘हेलहोल’ (Hellhole) गाली भर नहीं; यह साम्राज्यवादी मानसिकता का नक्शा है, जिसमें अमेरिका स्वयं को व्यवस्था, प्रकाश, नियम, अवसर और सभ्यता का केंद्र मानता है और एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका तथा प्रवासी समाजों को भीड़, अराजकता, बीमारी, गरीबी, लालच और घुसपैठ की अंधेरी सुरंगों में रखता है. यह शब्द भारत पर नहीं, उस निगाह पर आरोप-पत्र है, जो दुनिया को बराबरी से देखने की क्षमता खो चुकी है.
भारत को ‘नरक’ कहना भारत का अपमान नहीं, इतिहास के अमेरिकी बोध की निरक्षरता है. जिस धरती ने अमेरिका के जन्म से बहुत पहले वैदिक दर्शन दिया, विश्व को देखने की छह दृष्टियां दीं, गणित को शून्य और पाई दिए, भाषिक अनुशासन को पाणिनि दिया, दर्शन को उपनिषदों की अग्नि दी, करुणा को बुद्ध दिया, शासन और नीति को कौटिल्य दिया, अध्यात्म को योग दिया, चिकित्सा को आयुर्वेद दिया और बहुलता को जीवन का स्वभाव बनाया- उसे ‘हेलहोल’ कहने के लिए केवल असभ्यता नहीं, गहरी अज्ञानग्रंथि भी चाहिए.
भारत कोई स्वर्ग नहीं; हमारे यहां गरीबी है, असमानता है, भीड़ है, भ्रष्टाचार है, हिंसा है, जाति की काली गुफाएं हैं, सांप्रदायिक ज्वर है और विकास की असमान रोशनी है. लेकिन किसी राष्ट्र की जटिलताओं को ‘नरक’ कह देना वही बौद्धिक दुष्टता है, जिसके सहारे साम्राज्य सदियों तक अपने अपराधों को सभ्यता-मिशन कहता रहा.
अमेरिका को अपनी आंखों में थोड़ी भी ऐतिहासिक ईमानदारी बचानी है तो उसे समझना चाहिए कि महानता और दादागीरी एक ही वस्तु नहीं हैं. अमेरिका ने दुनिया को निस्संदेह बड़े वैज्ञानिक, दार्शनिक, लेखक, कलाकार, विश्वविद्यालय, तकनीकी प्रयोग और लोकतांत्रिक संघर्ष दिए हैं; लेकिन उसी अमेरिका ने मूल निवासियों के विनाश, दास प्रथा, नस्लीय विभाजन, हिरोशिमा-नागासाकी, वियतनाम, इराक, ड्रोन युद्धों, लैटिन अमेरिकी हस्तक्षेपों और आर्थिक प्रतिबंधों की लंबी छाया भी दुनिया पर डाली है.
इसलिए जब अमेरिका से कोई आवाज़ भारत जैसे देश को ‘नरक’ कहती है तो भारत को केवल आहत होकर नहीं, इतिहास की पूरी मेज़ खोलकर जवाब देना चाहिए कि श्रीमान्, आपके पास पशुबल रहा है, मानवता और नैतिकता का सूखा ही रहा है.
अमेरिका में भारतीय दिमागों की मौन पर स्थायी उपस्थिति
भारतीयों को अमेरिकी समाज में लेकर की गई टिप्पणी तो और भी अधिक कृतघ्नता की पराकाष्ठा है. जिस भारतीय प्रवासी समुदाय को नफरत की भाषा ‘बर्थ टूरिज़्म’ या ‘चेन माइग्रेशन’ की संदिग्ध खिड़की से देखती है, वही समुदाय अमेरिकी अर्थव्यवस्था, चिकित्सा, तकनीक, शिक्षा और उद्यमिता के सबसे अनुशासित, परिश्रमी और उच्च उपलब्धि वाले समूहों में है.
प्यू रिसर्च के अनुसार भारतीय-अमेरिकी परिवारों की 2022 की मध्यम घरेलू आय 1,45,000 डॉलर थी, जो एशियाई-अमेरिकी समुदाय की कुल मध्यम आय से भी अधिक थी; 2025 के प्यू तथ्य-पत्र के अनुसार 25 वर्ष से अधिक आयु के 77 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों के पास स्नातक या उससे ऊपर की डिग्री थी. यह कोई ‘नरक’ से भागे हुए लोग नहीं; यह ज्ञान, अनुशासन, परिवार, शिक्षा और परिश्रम की लंबी सभ्यतागत परंपरा से निकले नागरिक हैं, जिन्होंने अमेरिका को केवल करदाता नहीं दिए, उसे दिमाग, श्रम, प्रतिष्ठा और भविष्य भी दिया.
अमेरिकी अस्पतालों की रातों में जब थकान से झुकी मशीनें बीप करती हैं, वहां भारतीय मूल के डॉक्टर, सर्जन, शोधकर्ता, फार्मासिस्ट और नर्सें जीवन की लौ बचाते हैं. अमेरिकी प्रयोगशालाओं में जब ओषधि, डेटा, जैव-प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर शोध होता है, भारतीय दिमागों की एक मौन लेकिन स्थायी उपस्थिति होती है.
अमेरिकी तकनीक की चमचमाती इमारतों में जब क्लाउड, एआई, सर्च, साइबर-सिक्योरिटी, सेमीकंडक्टर, फिनटेक और सॉफ्टवेयर की नई भाषाएं लिखी जाती हैं, वहां भारत केवल ‘आउटसोर्सिंग’ का भूगोल नहीं; वह उस बौद्धिक ऊर्जा का स्रोत है, जिसने सिलिकॉन वैली की नसों में कोड, गणना और कल्पना का रक्त प्रवाहित किया है. सुंदर पिचाई, सत्य नडेला, अरविंद कृष्ण, शांतनु नारायण, विनोद खोसला, इंद्रा नूयी, विवेक मूर्ति जैसे नाम केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानियां नहीं; वे इस बात के जीवित प्रतिवाद हैं कि ‘हेलहोल’ कहे गए देश ने अमेरिका को कितनी ऊंची प्रतिभा दी है.
अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिए भी भारत कोई परिधि नहीं, केंद्र है. ओपन डोर्स 2025 के अनुसार 2024-25 में अमेरिका में भारत से 3,63,019 अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी थे और भारत अमेरिका के लिए अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों का सबसे बड़ा स्रोत बना. ये विद्यार्थी ट्यूशन-फीस भरने वाले ग्राहक मात्र नहीं हैं. वे प्रयोगशालाओं में शोध की रातें जगाते हैं, पुस्तकालयों में सिद्धांतों से जूझते हैं, कैंपस में बौद्धिक विविधता लाते हैं, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर जोड़ते हैं और भविष्य के उद्यमों, पेटेंटों, स्टार्टअपों तथा अकादमिक नेटवर्कों की नींव रखते हैं.
अमेरिका अपने विश्वविद्यालयों की विश्व-प्रतिष्ठा पर गर्व करता है; उसे यह भी याद रखना चाहिए कि उस प्रतिष्ठा की सीढ़ियों पर भारतीय विद्यार्थियों के कदमों की आवाज़ बहुत स्पष्ट सुनाई देती है.
साझा हित अपमान का लाइसेंस नहीं
भारत जानता है कि दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, व्यापार, ऊर्जा, शिक्षा, प्रवासी संपर्क और चीन-संतुलन जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण साझा हित हैं. लेकिन साझा हित अपमान के लाइसेंस नहीं होते. मित्रता का अर्थ यह नहीं कि वाशिंगटन से आई हर छींट को गुलाब जल समझकर माथे से लगाया जाए. मित्रता सिर झुकाकर नहीं, आंख मिलाकर होती है. दो देशों के संबंध तभी स्वस्थ होते हैं जब उनमें बराबरी का ताप हो-न कि एक ओर से उपदेश और दूसरी ओर से चुप्पी.
अमेरिका को यह भ्रम छोड़ना चाहिए कि वह दुनिया का नैतिक हेडमास्टर है और बाकी देश उसकी कक्षा में बैठे बैकबेंचर विद्यार्थी. यह इक्कीसवीं सदी है. भारत अब वह उपनिवेशोत्तर थका हुआ राष्ट्र नहीं है, जिसे वैश्विक मंचों पर केवल सहायता, अनाज, वीज़ा और उपदेश की भाषा में संबोधित किया जा सके.
यह वह देश है, जो चंद्रमा तक पहुंचता है, डिजिटल भुगतान की क्रांति करता है, दवाइयों और वैक्सीन का वैश्विक स्रोत बनता है, विशाल लोकतांत्रिक चुनाव कराता है, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और जिसकी युवा आबादी आने वाले दशकों में वैश्विक श्रम, ज्ञान और बाजार की दिशा तय करेगी. उसके दोष हैं, पर उसकी गरिमा भी है. उसके संघर्ष हैं, पर उसका आत्मसम्मान भी है. और यह सब स्वतंत्रता के तत्काल बाद के भारत की उस आधारशिला पर टिका है, जो गांधी और नेहरू जैसे कितने नेताओं के कंधों पर खड़ी थी.
‘हेलहोल’ जैसी भाषा का असली खतरा यह है कि वह नीतिगत बहस को नस्ली घृणा में बदल देती है. ‘बर्थराइट सिटीजनशिप’ पर अमेरिका बहस करना चाहता है तो करे. संविधान, चौदहवां संशोधन, अदालतें, प्रवासन-नीति-ये सब उसके अपने लोकतांत्रिक विवाद हैं. लेकिन इस बहस में भारत, चीन या किसी भी देश को ‘नरक’ कहना उस लोकतांत्रिक तर्कशीलता का पतन है, जिसे अमेरिका अपने राष्ट्रीय चरित्र का मुकुट बताता रहा है.
जब नीति की जगह गाली आती है, तब लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदलता है. जब आप्रवासी को नागरिक-सहभागी नहीं, घुसपैठिया प्राणी बना दिया जाता है, तब कानून भी पूर्वग्रह का दास बन जाता है.
अपमान को गंभीरता से लेना ही राष्ट्रीय गरिमा का पहला संस्कार
भारतीयों को भी इस प्रसंग से एक गहरी सीख लेनी चाहिए. हमारे यहां एक विचित्र वर्ग है-अंग्रेज़ चले गए, पर आत्मा में साम्राज्य की धूल संजोए लोग रह गए. ये लोग हर विदेशी नेता की ऊंची आवाज़ को विश्वबुद्धि समझ लेते हैं, हर अमेरिकी ताली में मोक्ष ढूंढते हैं और अपने ही देश के अपमान पर भी दांत निपोरते हुए कहते हैं, ‘देखिए, राजनीति है, इसे गंभीरता से न लें.’
नहीं, अपमान को गंभीरता से लेना ही राष्ट्रीय गरिमा का पहला संस्कार है. राष्ट्रवाद का अर्थ शोर नहीं, आत्म-सम्मान है. राष्ट्रवाद का अर्थ यह नहीं कि अपने नेता की हर बात पर झंडा उठाया जाए; राष्ट्रवाद का अर्थ यह है कि अपने देश की सामूहिक गरिमा पर किसी बाहरी शक्ति की अशिष्टता को सामान्य न माना जाए.
ट्रंप-भक्ति और भारत-भक्ति साथ नहीं चल सकतीं. किसी भारतीय को अमेरिकी राजनीति पसंद हो सकती है, किसी को ट्रंप की आर्थिक नीति, किसी को उनकी चीन-नीति, किसी को उनकी आप्रवासन-नीति भी पसंद हो सकती है; यह राजनीतिक मतभेद का विषय है. लेकिन जब उसी राजनीतिक धारा से भारत के लिए ‘हेलहोल’ जैसी भाषा आगे बढ़े और भारतीय मूल के लोगों को संदिग्ध, चालाक, अवसरवादी जनसमूह की तरह प्रस्तुत किया जाए, तब चुप रहना विचार नहीं, आत्महीनता है.
जो लोग अपने देश की धूल से अधिक किसी विदेशी नेता की जूती की चमक में सुख पाते हैं, उन्हें इतिहास बहुत सज्जन लेकिन कठोर भाषा में दर्ज करता है-दरबारी, नागरिक नहीं.
भारत की प्रतिक्रिया भी केवल सरकारी वाक्य-रचना तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. विदेश मंत्रालय का वक्तव्य आवश्यक था, लेकिन पर्याप्त नहीं. भारत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी भाषा न केवल अनुपयुक्त है, भारत-अमेरिका संबंधों की गरिमा के प्रतिकूल है.
अमेरिकी दूतावास यदि यह कहता है कि ट्रंप भारत को ‘ग्रेट कंट्री’ मानते हैं तो यह स्वागतयोग्य पर अधूरा है. सम्मान का प्रमाण निजी मित्रता के वाक्यों से नहीं, सार्वजनिक अपमान से असहमति जताने से मिलता है. यदि भारत सचमुच मित्र है, तो भारत के बारे में ‘हेलहोल’ जैसी भाषा को आगे बढ़ाने पर साफ़ ख़ेद, स्पष्ट दूरी और सार्वजनिक स्पष्टीकरण होना चाहिए.
यह भी याद रखा जाना चाहिए कि अमेरिका की शक्ति ने अक्सर भाषा के माध्यम से ही दुनिया पर नियंत्रण बनाया है. पहले वह किसी देश को अस्थिर कहता है, फिर असुरक्षित; फिर उसे पिछड़ा, कट्टर, अराजक, असभ्य या विफल घोषित करता है; फिर वहां हस्तक्षेप, प्रतिबंध, सैन्य उपस्थिति, वीज़ा-नियंत्रण, व्यापार दबाव या नैतिक उपदेश को वैध ठहराता है.
शब्द कभी अकेले नहीं आते; वे नीति की पूर्व-छाया होते हैं. इसलिए ‘हेलहोल’ जैसे शब्द को केवल मूर्खतापूर्ण टिप्पणी मानकर छोड़ देना भोलेपन की पराकाष्ठा होगी. ऐसे शब्द उन मानसिक नक्शों को बनाते हैं, जिन पर बाद में विदेश नीति की सड़कें खिंचती हैं.
होगा अमेरिका शक्तिशाली है, पर शक्ति सभ्यता का लाइसेंस नहीं
भारत को अपनी महत्ता साबित करने के लिए अमेरिका को नीचा दिखाने की आवश्यकता नहीं. लेकिन अमेरिका को अपनी शक्ति सिद्ध करने के लिए भारत को गाली देने का अधिकार भी नहीं. भारतीय सभ्यता की गरिमा इस बात में है कि वह प्रतिशोधी अभद्रता में नहीं उतरती; लेकिन उसकी कमज़ोरी भी नहीं कि वह हर अपमान पर मौन साध ले.
भारत का उत्तर सभ्य होना चाहिए, पर निर्बल नहीं; तीखा होना चाहिए, पर तथ्यहीन नहीं; गरिमामय होना चाहिए, पर दंतहीन नहीं. हमें कहना चाहिए, आपका देश शक्तिशाली है, पर शक्ति आपको सभ्यता का लाइसेंस नहीं देती. आपकी अर्थव्यवस्था बड़ी है, पर बड़ी अर्थव्यवस्था बड़ा चरित्र सिद्ध नहीं करती. आपकी सेना विशाल है, पर सैन्य क्षमता नैतिक ऊंचाई का पर्याय नहीं. आपकी विश्वविद्यालय-व्यवस्था प्रभावशाली है, पर उसके गलियारों में भारतीय प्रतिभा भी उतनी ही गूंजती है, जितनी आपकी अपनी.
भारत को ‘नरक’ कहने वाली भाषा अंततः भारत की नहीं, अमेरिका की परीक्षा है. यह देखना अब अमेरिका को है कि वह अपने उदार लोकतांत्रिक आदर्शों की ओर लौटता है या चुनावी उन्माद, नस्ली भय और आप्रवासी-विरोधी जुनून के गंदे नाले में उतरता है. वह तय करे कि उसे फ्रैंकलिन, लिंकन, मार्टिन लूथर किंग, जेम्स बाल्डविन, एमर्सन, थोरो, व्हिटमैन और माया एंजेलो की नैतिक परंपरा में खड़ा होना है या उन रेडियो-स्टूडियो की अंधेरी गुफाओं में जहां सभ्यताओं को गाली बनाकर बेचा जाता है.
अमेरिका यदि अपने महान आदर्शों को बचाना चाहता है तो उसे पहले अपनी भाषा को बचाना होगा.
और भारत?
भारत को इस प्रसंग से क्रोधित होने से अधिक सजग होना चाहिए. हमें अपनी शक्ति, अपनी प्रतिभा, अपनी सभ्यता और अपने प्रवासी समुदाय की गरिमा को किसी विदेशी प्रमाणपत्र से मापना बंद करना होगा. हमारी महानता हमारे इतिहास, हमारे ज्ञान, हमारे श्रम, हमारे लोकतांत्रिक संघर्ष, हमारी भाषाओं, हमारी स्त्रियों, हमारे किसानों, हमारे वैज्ञानिकों, हमारे विद्यार्थियों, हमारे सैनिकों, हमारे कारीगरों, हमारे श्रमिकों, हमारे प्रवासियों और हमारी जनता की उस अद्भुत जीवटता में है, जो अपमान को भी कभी-कभी ऊर्जा में बदल देती है.
भारत किसी के इमिग्रेशन-भय का कूड़ादान नहीं है. अमेरिका से संबंध चाहिए-पर समानता के साथ. व्यापार चाहिए-पर गरिमा के साथ. रणनीतिक साझेदारी चाहिए-पर आत्मसम्मान के साथ. मित्रता चाहिए-पर ऐसी मित्रता नहीं, जिसमें एक पक्ष मुस्कुराता रहे और दूसरा पक्ष उसके घर को ‘नरक’ कहने वाली भाषा को आगे बढ़ाता रहे.
यह समय भारत के लिए कूटनीतिक विनम्रता और राष्ट्रीय दृढ़ता को साथ लेकर चलने का है. हमें अमेरिका से दुश्मनी नहीं, पर अमेरिका के श्रेष्ठताबोध से असहमति अवश्य रखनी है. हमें अमेरिकी जनता से वैर नहीं, पर अमेरिकी राजनीतिक अहंकार को आईना ज़रूर दिखाना है. हमें भारतीय प्रवासियों की उपलब्धियों पर गर्व करना है, पर उन्हें अमेरिकी स्वीकृति की भीख में बदलना नहीं. और हमें अपने देशवासियों से कहना है- स्वाभिमान कोई चुनावी नारा नहीं, राष्ट्र की रीढ़ है. जो रीढ़ झुक गई, वह राष्ट्र नहीं, भीड़ रह जाता है.
इसलिए उत्तर साफ है: भारत ‘हेलहोल’ नहीं है. भारत एक महान, जटिल, संघर्षशील, असमानताओं से जूझता हुआ, फिर भी अद्भुत ऊर्जा से भरा राष्ट्र है. अगर किसी को इसमें नरक दिखता है तो संभव है कि उसकी आंखों में ही वह अंधेरा हो, जिसे वह दुनिया पर आरोपित कर रहा है. अमेरिका को भारत से माफी नहीं तो कम-से-कम स्पष्ट खेद और असहमति अवश्य व्यक्त करनी चाहिए.
और भारत को, अपनी पुरानी सभ्यता की शांत आंखों और नए राष्ट्र की दृढ़ आवाज़ के साथ, इतना अवश्य कहना चाहिए-मित्रता स्वीकार है; अपमान नहीं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
