नई दिल्ली: ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों के 57वें दिन भी कूटनीतिक हलचल तेज है, लेकिन ठोस प्रगति के संकेत अब तक नहीं मिले हैं. बातचीत की कोशिशें जारी हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस युद्ध को लेकर मतभेद साफ नजर आ रहे हैं.
पाकिस्तान में कूटनीतिक हलचल, लेकिन सीधे संवाद से इनकार
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची शुक्रवार शाम ‘द्विपक्षीय परामर्श’ के लिए पाकिस्तान पहुंचे. इसी बीच, व्हाइट हाउस ने घोषणा की है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शनिवार (25 अप्रैल) को अपने दूत स्टीव विटकॉफ और जैरेड कुशनर को पाकिस्तान भेज रहे हैं. हालांकि, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस दौरे का हिस्सा नहीं होंगे.
इन कूटनीतिक प्रयासों के बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि वह इस यात्रा के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ सीधे बातचीत नहीं करेगा. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बकाई ने कहा कि ‘ईरान और अमेरिका के बीच कोई बैठक निर्धारित नहीं है’ और ईरान अपने विचार पाकिस्तान के माध्यम से साझा करेगा.
यह स्थिति इस बात का संकेत है कि बातचीत की कोशिशों के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास बना हुआ है.
दिल्ली में ब्रिक्स बैठक बिना संयुक्त बयान के खत्म
इसी बीच, ब्रिक्स देशों के उप-विदेश मंत्रियों और पश्चिम एशिया के लिए विशेष दूतों की बैठक 24 अप्रैल को दिल्ली में हुई, लेकिन यह बिना किसी संयुक्त बयान के समाप्त हो गई.
इस बैठक में ईरान समेत ब्रिक्स के 10 सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे. ईरान, जिस पर अमेरिका और इज़रायल ने सीधे हमले किए हैं, और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश, जो ईरानी जवाबी कार्रवाइयों से प्रभावित हुए हैं, दोनों की मौजूदगी के बावजूद साझा रुख नहीं बन पाया. यह इस युद्ध को लेकर ब्रिक्स देशों के भीतर मौजूद मतभेदों को दिखाता है.
लेबनान में पत्रकार की हत्या की निंदा
अंतरराष्ट्रीय प्रेस संगठनों ने दक्षिणी लेबनान में इज़रायली हमले में पत्रकार अमल खलील की मौत की कड़ी निंदा की है. इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ प्रेस क्लब्स ने कहा कि यह हमला उस समय हुआ जब पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहे थे, जिससे यह महज ‘संयोगवश हुई मौत’ नहीं, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है.
संगठन ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे हमलों के बाद राहत और बचाव कार्यों में भी बाधा डाली गई, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पत्रकारों को मिलने वाली सुरक्षा की अनदेखी को दर्शाता है.
कुल मिलाकर स्थिति
57वें दिन की स्थिति यह दिखाती है कि युद्ध सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी जटिलता बढ़ती जा रही है. एक ओर बातचीत की कोशिशें हैं, लेकिन दूसरी ओर सीधे संवाद से इनकार, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मतभेद और जमीनी स्तर पर हिंसा, ये सभी इस संकट के जल्द समाधान की राह को और कठिन बना रहे हैं.
