संविधान और उसके आधार-मूल्य संकट में हैं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हमारा समय और उसमें सक्रिय आक्रामक शक्तियां संविधान और लोकतंत्र विरोधी होने के साथ-साथ सृजन और ज्ञान विरोधी भी हैं. समय आ गया है जब सारे भारत से लेखक और कलाकार, संगीतकार-रंगकर्मी-नृत्यकार, विद्वान और बुद्धिजीवी अपने को सशक्त और मुखर रूप से इन मुद्दों पर व्यक्त करें.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

प्रतिरोध का नया मुक़ाम

हाल ही में स्त्री आरक्षण अधिनियम को ढाल की तरह लपेटकर संविधान में संशोधन करने और भारत के संघीय ढांचे को असंतुलित करने का प्रयत्न किया गया, उससे एक बार फिर दुखद रूप से प्रगट हुआ कि संविधान में कतर-ब्योंत करने, उसे क्षत-विक्षत करने के प्रयत्न लगातार हो रहे हैं. सत्तारूढ़ राजनीति भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के आड़े आने वाले हमारे संविधान को मौलिक रूप से बदलने की अपनी कोशिश कम करनेवाली नहीं है.

दूसरे शब्दों में, संविधान संकट में है. यह भी अलक्षित नहीं जा सकता है कि संविधान के बुनियादी मूल्यों स्वतंत्रता-समता-न्याय-भाईचारा में लगभग हर दिन कटौती हो रही है. देश भर में आहत भावनाओं के समूह बनते रहते हैं जो दूसरे नागरिकों की स्वतंत्रता पर दिन दहाड़े हमले करते रहते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती. एक तरह की अराजकता, राज ही फैला रहा है.

समता जो अब ज़ेरे बहस ही नहीं रह गई है: दो प्रतिशत भारतीयों के हाथों में भारत की पचास प्रतिशत दौलत है. मुसलमानों की नागरिकता को लगातार दोयम दर्ज़े की ओर ढकेला जा रहा है. न्याय की हालत यह है कि राज्य अनेक संवैधानिक संस्थाओं को अपना पालतू बनाकर असहमति आदि का अपराधीकरण कर रहा है. भाईचारे को सिरे से ख़त्म करने के संगठित प्रयत्न बढ़ रहे हैं. ज़ाहिर है कि संविधान और उसके आधार-मूल्य संकट में हैं.

ऐसे संकट के समय भारत के सृजन-विचार समुदाय के लोग यानी लेखक-कलाकार-विद्वान् आदि चुप और निष्क्रिय नहीं रह सकते. वर्ष ठीक से याद नहीं, पर शायद 1938 में आंद्रे जिद, आंद्रे मालरो आदि फ्रेंच लेखकों और कलाकारों ने फ़ासीवाद के विरुद्ध एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस आयोजित की थी जिसमें रूस से बोरिस पास्तरनाक ने भी भाग लिया था.

जिन संवैधानिक मूल्यों पर लगातार हमले हो रहे हैं वे हमारे लोकतंत्र के भी आधार-मूल्य हैं. स्वयं सृजन, विद्या आदि क्षेत्रों में भी उनकी व्याप्ति है. हमारा समय और उसमें सक्रिय आक्रामक शक्तियां इसलिए संविधान और लोकतंत्र विरोधी होने के साथ-साथ सृजन और ज्ञान विरोधी भी हैं. समय आ गया है जब सारे भारत से लेखक और कलाकार, संगीतकार-रंगकर्मी-नृत्यकार, विद्वान और बुद्धिजीवी अपने को सशक्त और मुखर रूप से इन मुद्दों पर व्यक्त करें.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले पचहत्तर वर्षों में साहित्य-कलाओं-विद्वत्ता आदि क्षेत्रों में इसी लोकतंत्र और संविधान द्वारा हमें दी गई सुविधाओं और नागरिक अधिकारों के कारण ही हम बहुत कुछ कर पाए हैं. उनमें आ रहे अड़ंगों से हम अपनी आंखें नहीं मूंद सकते. सांस्कृतिक संस्थाएं नि:शक्त की गई हैं और उनका एजेंडा सत्तारूढ़ शक्तियों और उनकी विचारधारा का समर्थन और महिमामंडन करना हो गया है.

इन सभी मुद्दों पर सामूहिक चिंतन और फिर सामूहिक प्रयत्न होना चाहिए. झूठों के भयावह घटाटोप में अगर सच कहने, दर्ज करने की हिम्मत हममें नहीं होगी तो किनमें होगी?

रंगमिथक

इधर कुछ वर्षों से भारतीय रंगमंच के क्षेत्र में एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि महाकाव्यों और मिथकों पर आधारित रंगप्रस्तुतियां संख्या, लोकप्रियता और खर्चीलेपन में बहुत बढ़ गई हैं. एक अंग्रेज़ी दैनिक ने इस परिघटना पर अपने रविवार परिशिष्ट में पृष्ठ भर लंबा लेख प्रकाशित किया है. कहा यह जा रहा है कि ये रंग प्रस्तुतियां इतनी भव्य और प्रभावशाली हैं, उनके सेट और दृश्यबंध, वेशभूषाएं, संगीत आदि इतनी आकर्षक हो रही हैं कि उन्हें ऐसे लगाव और ध्यान से देखा-सराहा जा रहा है जैसा कि फिल्मों को.

यह मिथक-रंग आधुनिक रंगमंच के स्वाभाविक विकास या नए प्रासंगिक विषयों की खोज से नहीं निकला है. यह किसी सांस्कृतिक प्रक्रिया का परिणाम या अभिव्यक्ति नहीं है. यह देश भर में फैली लोक परंपराओं के प्रभाव का मामला नहीं है जिनमें सारे भारत में लगभग हर दिन, बारिश के दिन छोड़कर, हमारे महाकाव्यों और मिथकों के हिस्से प्रस्तुत किए जाते हैं. अंदाज़न ये लोक प्रस्तुतियां दैनिक रूप से पांच हज़ार होती हैं.

जो मिथकरंग इस समय व्यापक और सक्रिय हो रहा हे वह सीधे-सीधे सत्तारूढ़ राजनीतिक विचारधारा के प्रभाव या दबाव में हो रहा है. हिंदुत्व नामक विचारधारा के यह हित में है कि भारतीय समाज में सतही धार्मिकता, मिथक आदि फैलें ताकि सांप्रदायिक भेदभाव और दूरियां बढ़ें. ऐसा सुनियोजित ढंग से हो रहा है.

ख़बर यह फैलती रही है कि इन दिनों संस्कृति मंत्रालय से रंगमंच और प्रस्तुतियों के लिए जो अनुदान दिए जाते हैं उनके बेशतर हिस्सा रामायण, अन्य धार्मिक मिथकों पर आधारित नाटकों और प्रस्तुतियों के लिए ही दिया जाता है. चूंकि याराना पूंजीवादी व्यवस्था के दौरान सांस्कृतिक सक्रियता में कॉरपोरेट जगत् शामिल है, वह भी इस अभियान में सदलबल शामिल है. संदेह यह होता है कि सीएसआर आदि का पैसा भी ऐसे मिथकीय प्रदर्शनों के लिए सहज उपलभ्य है.

यह आकस्मिक नहीं है कि ये अधिकांश प्रस्तुतियां अनुष्ठानपरक और उत्सवधर्मी हैं. इब्राहीम अलकाज़ी, हबीब तनवीर, शम्भू मित्र, कावलम पणिक्कर, रतन थियाम आदि की प्रश्नवाचक आधुनिकता और महाकाव्यात्मकता से इन प्रस्तुतियों का कोई संबंध या संवाद तक नहीं. यही नहीं लोक परंपरा में शास्त्र-मिथक-महाकाव्य आदि को लेकर जो उदग्र प्रश्नवाचकता है उससे भी यह मंच बहुत दूर है.

यह एक विडंबना है कि स्वयं हमारे महाकाव्यों, उनसे प्रेरित आधुनिक नाट्य-प्रस्तुतियों और लोकमंच की प्रश्नाकुलता और प्रश्नांकन का कोई स्पंदन या उपस्थिति इस भव्य पर छूछे मिथक-रंग में नहीं हैं. यह स्मृति और दायवंचित रंगमंच है. वह एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट के अंतर्गत सक्रिय और पोषित है: वह उन्नति नहीं, अवनति है.

सौभाग्य यह है कि इस भव्यता से अप्रभावित और अनातंकित प्रश्नवाचक रंगमंच भी है, सक्रिय और स्पंदित, जिसने सारे अभावों और साधनहीनता के बावजूद अपना प्रश्नाकुल विवेक और सांस्कृतिक अंतःकरण बचा रखा है.

शोभा-यात्रा

हालांकि मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अँधेरे में’ 1960-64 के दौरान लिखी गई और उनकी मृत्यु के बाद 1964 के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित हुई, वह हमारी आज की स्थिति का यथार्थ लगती है:

विचित्र प्रोसेशन,
गंभीर क्विक मार्च …
कलाबत्तूवाला काला ज़रीदार ड्रेस पहने चमकदार बैंडदल –

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बैंड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से,
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के!!
बड़े-बड़े नाम अरे कैसे शामिल हो गये इस बैंडदल में.

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कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे- से लगते,
उनके चित्र समाचारपत्रों में छपे थे,
उनके लेख देखे थे
यहां तक कि कविताएं पढ़ी थीं
भई वाह.

उसमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण
मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान्
यहां तक कि शहर का कुख्यात
डोमा जी उस्ताद
बनता है बलबन

हाय, हाय!!

हमें यह सवाल अपने से पूछना चाहिए कि आजकल जो इसी तरह की शोभा-यात्रा निकल रही है, क्या हम उसमें शामिल हैं? क्या हम उसे दूर से देख रहे और चुप हैं? क्या हम अपनी कायरता में ‘जग-मगा’ रहे हैं?

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)