यूसीसी पर अमित शाह का बयान: आश्वासन और आशंकाओं के बीच आदिवासी अधिकारों का सवाल

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का कोई प्रावधान आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं होगा. हालांकि, आदिवासी संगठनों के बीच इस क़ानून को लेकर लंबे समय से आशंकाएं बनी हुई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल राजनीतिक आश्वासन पर्याप्त हैं, या आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक और क़ानूनी सुरक्षा को लेकर स्पष्ट गारंटी की आवश्यकता है.

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, नई दिल्ली के लाल किले में रविवार, 24 मई 2026 को आयोजित 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' के दौरान. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार (24 मई) को कहा कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का कोई भी प्रावधान आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं होगा और यह कानून उनके अधिकारों, परंपराओं तथा रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप नहीं करेगा.

लाल किले के मैदान में आरएसएस से जुड़े जनजाति सुरक्षा मंच (जेएसएम) और वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘जनजाति संस्कृति समागम’ को संबोधित करते हुए शाह ने कहा, ‘एक साजिश शुरू की गई है जिसमें कहा जा रहा है कि यूसीसी आदिवासियों को अपनी संस्कृति और परंपराओं का पालन करने के अधिकार से वंचित कर देगी. मैं आज स्पष्ट करना चाहता हूं कि यूसीसी का कोई भी प्रावधान आदिवासियों पर लागू नहीं होगा. यूसीसी आदिवासियों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करेगी.’

उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में यूसीसी को लेकर बहस तेज है और विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के बीच गहरी आशंकाएं मौजूद हैं. सरकार इस बयान को भरोसा दिलाने की कोशिश के रूप में पेश कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल राजनीतिक आश्वासन पर्याप्त हैं, या फिर आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा को लेकर अधिक स्पष्ट और ठोस गारंटी की आवश्यकता है.

यूसीसी और विविधता का प्रश्न

समान नागरिक संहिता का मूल विचार यह है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानूनों के लिए सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू हो. संविधान के नीति निदेशक तत्वों में इसका उल्लेख है, लेकिन भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना अत्यंत विविधतापूर्ण है. आदिवासी समाज की पहचान केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन, पारंपरिक शासन व्यवस्था, भूमि संबंधों और सामूहिक अधिकारों से भी जुड़ी हुई है. ऐसे में ‘एक देश, एक कानून’ की अवधारणा स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न खड़े करती है.

आदिवासी समुदायों की अपनी परंपरागत न्याय प्रणाली, विवाह पद्धतियां और उत्तराधिकार संबंधी नियम हैं. इनमें से कई प्रथाएं मुख्यधारा के व्यक्तिगत कानूनों से भिन्न हैं.

उदाहरण के तौर पर मध्य भारत के कई आदिवासी समुदायों में युवक-युवतियों की लिव-इन रिलेशनशिप को स्वीकृति है. यानी वयस्क युवक-युवती प्यार और आपसी सहमति से शादी की रस्म पूरी करने की अनिवार्यता के बगैर ही एक साथ रह सकते हैं. इसे परिवार और समाज सहर्ष स्वीकार करते हैं और इसे किसी भी तरीके से अपमान या विचलन नहीं माना जाता है. इस प्रथा को गोंडी भाषा में ‘लोन होड़ियना’ और छत्तीसगढ़ी बोली में ‘पैठू जाना’ कहा जाता है. उत्तराखंड में पारित यूसीसी में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य बनाया गया और असम में भी ऐसी बात चल रही है. ऐसे में आदिवासी समुदायों में अपनी विवाह और दंपत्ति की प्रथाओं में दखल की आशंकाएं उत्पन्न होना स्वाभाविक है.

इसके अलावा, आदिवासी प्रकृति की पूजा करते हैं मूर्तियों की नहीं. उनके समाज में वर्ण व्यवस्था नहीं है. कई आदिवासी समाजों में विवाह केवल धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि सामुदायिक समझौता माना जाता है. उदाहरण के लिए कुछ गोंड और संथाल समुदायों में तलाक अपेक्षाकृत आसान और सामुदायिक पंचायत के जरिए हो सकता है. जबकि हिंदू विवाह कानून में तलाक के लिए अदालत और कानूनी प्रक्रिया जरूरी होती है.

आदिवासी इलाकों में जमीन सामुदायिक स्वामित्व की परंपरा से जुड़ी होती है. जमीन कबीले या गांव की मानी जाती है. लेकिन मुख्यधारा के कानूनों में जमीन अक्सर किसी व्यक्ति के निजी स्वामित्व में दर्ज होती है.

कई आदिवासी समुदायों में विवाह, शिकार, जंगल उपयोग, त्योहार और सामाजिक दंड के नियम लिखित कानून नहीं बल्कि परंपराओं से तय होते हैं. अगर यूसीसी का कोई भी स्वरूप इन व्यवस्थाओं को प्रभावित करता है, तो यह केवल कानूनी बदलाव नहीं होगा, बल्कि सांस्कृतिक स्वायत्तता पर भी प्रभाव डालेगा.

अमित शाह का बयान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह अभी केवल मौखिक आश्वासन है. सरकार ने अब तक स्पष्ट नहीं किया है कि आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखने का संवैधानिक और कानूनी ढांचा क्या होगा. क्या यह छूट संविधान की छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों तक सीमित होगी? (छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के कुछ आदिवासी बहुल क्षेत्रों को विशेष स्वायत्त शासन देने की व्यवस्था है, इसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों की भाषा, संस्कृति, परंपरा और जमीन के अधिकारों की रक्षा करना है.)

क्या पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के आदिवासी भी समान रूप से संरक्षित होंगे? (पांचवीं अनुसूची का एक बड़ा उद्देश्य आदिवासियों की जमीन को गैर-आदिवासियों के हाथों जाने से रोकना है.) क्या विभिन्न राज्यों की पारंपरिक व्यवस्थाओं को अलग-अलग मान्यता दी जाएगी? इन सवालों पर अभी अस्पष्टता बनी हुई है.

जब समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की बात होती है, तब अक्सर यह सवाल उठता है कि छठी अनुसूची और पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्रों की पारंपरिक व्यवस्थाओं और रूढ़िगत कानून (कस्टमरी लॉज़) का क्या होगा. क्योंकि इन क्षेत्रों को संविधान ने विशेष सांस्कृतिक और कानूनी संरक्षण दिया है.

इतिहास यह भी बताता है कि कई बार विकास, सुरक्षा या प्रशासनिक सुधारों के नाम पर आदिवासी अधिकारों में हस्तक्षेप हुआ है. भूमि अधिग्रहण, वन अधिकार और खनन परियोजनाओं को लेकर आदिवासी समुदायों का अनुभव भरोसे से अधिक संघर्ष का रहा है. ऐसे में केवल यह कहना कि ‘अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं होगा’ पर्याप्त नहीं माना जा सकता.

राजनीतिक संदेश और वास्तविक चिंता

सरकार का यह बयान राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई आदिवासी बहुल राज्यों में पहचान और स्वायत्तता का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील है. हालांकि, यूसीसी पर चल रही बहस में आदिवासी समुदायों की प्रत्यक्ष भागीदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है. अधिकांश विमर्श राजनीतिक दलों, न्यायपालिका और शहरी बौद्धिक वर्ग तक सीमित रहता है, जबकि सबसे अधिक प्रभावित होने वाले समुदायों की आवाज़ अक्सर हाशिये पर चली जाती है. जैसे- जून 2023 में झारखंड में 30 से अधिक आदिवासी संगठनों ने अलग बैठक कर यूसीसी का विरोध किया था और कहा कि उनसे पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है और उनकी पहचान और परंपरागत कानून खतरे में पड़ सकते हैं. तब आदिवासी संगठनों ने विधि आयोग (लॉ कमीशन) से यूसीसी के प्रस्ताव को वापस लेने की मांग करने की बात कही थी.

जुलाई 2023 में अरविंद नेताम समेत छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेताओं ने कहा था कि सरकार को बिना उचित परामर्श यूसीसी नहीं लाना चाहिए. इसमें सीधे तौर पर आदिवासियों से संवाद और भागीदारी की मांग थी.

सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया पर कानूनी विश्लेषणों में भी सवाल उठे हैं. लाइव लॉ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यूसीसी पर विधि आयोग की परामर्श प्रक्रिया पर्याप्त रूप से समावेशी और सुव्यवस्थित नहीं दिखाई दी, जिससे विभिन्न समुदायों – विशेषकर हाशिये पर रहने वाले समूहों – का विश्वास कमजोर पड़ सकता है.

ऐसे में यदि सरकार वास्तव में आदिवासी हितों की रक्षा को लेकर गंभीर है, तो उसे व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए, जिसमें ग्राम सभाओं, आदिवासी संगठनों और पारंपरिक नेतृत्व की भागीदारी सुनिश्चित हो.

फिलहाल भाजपा शासित राज्यों- गुजरात और उत्तराखंड में यूसीसी बिल पारित किया है. असम में 25 मई को यूसीसी बिल विधानसभा में पेश किया गया है. उत्तराखंड में आदिवासियों को कानून के दायरे से बाहर रखा गया है. असम में भी आदिवासियों को बाहर रखने की बात कही जा रही है.

भाजपा सरकार के दौर में आदिवासी अधिकार: दावों और ज़मीनी हक़ीक़त

भारत के आदिवासी समुदाय लंबे समय से जल, जंगल और जमीन पर अपने पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहे हैं. संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियां, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) और वनाधिकार कानून जैसे प्रावधान आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों पर अधिकार को सुरक्षित करने के लिए बनाए गए थे. लेकिन पिछले एक दशक में, खासकर भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के दौरान आदिवासी अधिकारों के हनन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं.

सरकार एक ओर आदिवासी कल्याण, विकास और मुख्यधारा से जुड़ाव की बात करती है, वहीं दूसरी ओर कई नीतियों और परियोजनाओं ने आदिवासी समुदायों में विस्थापन, संसाधनों पर नियंत्रण के नुकसान और सांस्कृतिक हस्तक्षेप की आशंकाएं बढ़ाई हैं.

कांग्रेस सरकार द्वारा लाए गए 2006 का वनाधिकार कानून आदिवासी और वन आश्रित समुदायों को जंगलों पर पारंपरिक अधिकार देता है. इसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना था. लेकिन विभिन्न सामाजिक संगठनों और शोध रिपोर्टों के अनुसार, कई राज्यों में वनाधिकार दावों को बड़ी संख्या में खारिज किया गया है. जनजातीय मामलों के मंत्रालय के मुताबिक 30 नवंबर, 2018 तक देश भर में 19.39 लाख दावों को खारिज कर दिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2019 में लगभग 20 लाख आदिवासियों और वन आश्रित समुदायों को बेदखल करने का आदेश दिया था. हालांकि, लोकसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए केंद्र सरकार के निवेदन पर बाद में अपने आदेश पर रोक लगा दी थी.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र सरकार ने 7 मार्च 2019 को राज्य सरकारों को एक पत्र जारी करते हुए वन कानून 1927 को संशोधन करते हुए वन कानून 2019 का प्रस्तावित प्रारूप भेजा था, जो काफी भयावह था.

इस कानून के तहत राज्य सरकार किसी भी जंगल को कभी भी रिजर्व एवं सुरक्षित जंगल घोषित करते हुए लोगों के उपयोग एवं पशुओं के चरागाह पर प्रतिबंध लगा सकती है. इसके अलावा कुल्हाड़ी एवं अन्य पारंपरिक हथियारों के साथ जंगल जाने वाले लोगों पर वनारक्षी को गोली चलाने का अधिकार देने का प्रस्ताव था. इसके अलावा निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले वनारक्षी पर सरकार के बगैर अनुमति से कोई मुकदमा नहीं किया जा सकता है.

इसके अलावा कई राज्यों में ग्राम सभाओं की सहमति के बिना वन भूमि को विकास परियोजनाओं, खनन और औद्योगिक उपयोग के लिए हस्तांतरित करने के आरोप लगे हैं.

भाजपा सरकार ने जून 2022 में वन अधिकार कानून को कमजोर करने वाली वन संरक्षण अधिनियम को लागू किया था, जिसका व्यापक रूप से विरोध हुआ था. इस कानून के तहत केंद्र सरकार किसी भी निजी कंपनी या संस्था/ठेकेदार को बिना आदिवासियों की अनुमति लिए जंगल काटने की अनुमति दे सकती है.

वन अधिकार कानून, 2006 के तहत किसी भी आदिवासी क्षेत्र में बिना ग्राम सभा की अनुमति लिए कोई भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो सकता था, जिसमें वनोन्मूलन (वनों की कटाई) शामिल हो.

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण खनन परियोजनाओं का दबाव लगातार बढ़ा है. कोयला, बॉक्साइट और लौह अयस्क से जुड़ी परियोजनाओं ने बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और विस्थापन की स्थितियां पैदा की हैं. आलोचकों का कहना है कि भाजपा सरकार ने औद्योगिक विस्तार के नाम पर पर्यावरणीय मंजूरियों को आसान बनाया, जिसका असर आदिवासी इलाकों पर पड़ा है.

हसदेव अरण्य इसका प्रमुख उदाहरण है. छत्तीसगढ़ के इस घने वन क्षेत्र में कोयला खनन परियोजनाओं का स्थानीय आदिवासी समुदायों ने लंबे समय तक विरोध किया. उनका तर्क है कि इससे जंगल, जल स्रोत और आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा. इसी तरह ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित मेगा परियोजनाओं को लेकर भी पर्यावरणविदों और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई कि इससे स्थानीय समुदायों और पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर पड़ सकता है.

पेसा कानून का कमजोर क्रियान्वयन

पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, (पेसा कानून), जिसे 1996 में आदिवासी बहुल अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को अधिकार देने के लिए बनाया गया था. यह कानून संविधान की पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों पर लागू होता है. इसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों को ‘जल, जंगल और जमीन’ पर निर्णय लेने की शक्ति देना और उनकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को मान्यता देना था.

लेकिन जमीनी स्तर पर इसका प्रभावी क्रियान्वयन लंबे समय से चुनौती बना हुआ है. कानून बने लगभग 30 साल हो चुके हैं, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि पेसा आज भी ‘आंशिक’ या ‘कमजोर’ रूप में लागू है. कई राज्यों ने लंबे समय तक इसके नियम ही नहीं बनाए.

कई आदिवासी संगठनों का आरोप है कि ग्राम सभाओं की सहमति को औपचारिकता बनाकर छोड़ दिया गया है या कई बार प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रखी जाती. विकास परियोजनाओं, खनन और भूमि अधिग्रहण में वास्तविक निर्णय अक्सर प्रशासन या कंपनियां लेती हैं.

आज भी आदिवासी संगठन मांग कर रहे हैं कि पेसा को ‘कागज से जमीन’ तक लाया जाए. झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर आंदोलन और अदालतों में याचिकाएं जारी हैं.