गृह मंत्री साहब! हमारे देश में घरों की जाति ही नहीं, अमीरी-ग़रीबी और धर्म भी होते हैं

जब आप घरों की जाति से इनकार करते हैं तो आप जाति की गणना से इनकार करना चाहते हैं और इस इनकार का सीधा मतलब है जब तक और जहां तक संभव हो हिस्सेदारी से इनकार करते रहो. वरना हमारे घर और उसकी भौगोलिक स्थिति हमें हमारी जन्मजात हैसियत की याद हमेशा से दिलाते आए हैं, और जाति के साथ अब धर्म के नाम पर भी हमारे घरों का जुग़राफ़िया तय कर दिया गया है.

'टोला-मोहल्ला भी छोड़िए महानगरों की सोसाइटी का हाल भी धर्म और जाति की इस पहचान से कहां अलग है. ढेर सारी ख़बरें बताती हैं घरों की जाति होती है और नहीं होती तो धर्म के नाम पर अपनी पहचान की रक्षा करने वालों को पहुंचाने में भी कितनी देर लगती है.' (फोटो: पीटीआई)

इनमें तो कोई रौनक़ नहीं है, ख़ुशबू नहीं है
दौरां बताओ, तुम ही बताओ ये किनके घर हैं

उर्दू के प्रगतिशील शायर ओवेस अहमद दौरां ने ये शेर उस वक़्त कहा था, जब इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के दौरान सत्ता के दमन से बचने के लिए उन्हें मेरे गांव में एक ‘मेहतर’ के घर पनाह लेने को मजबूर होना पड़ा था.

कथित कुलीन घरों की गंदगी और ग़िलाज़त की तरह आबादी से बाहर उठाकर फेंक दिए गए और नज़रों से छुपा दिए गए इस मेहतर के घर जब कुछ वक़्त पहले गया था, तो उसके चूल्हे की उदासी आंखों में उतर आई थी और एक अजीब-सी बू सांसों में घुल गई थी.

उस समय दौरां साहब को याद करते हुए मैं देर तक उस आंगन में बैठा रहा, जहां ऊपर से एक पेड़ की हल्की-हल्की छांव पड़ रही थी, एक कोने में बांस की सड़ी-गली बत्तियों से घिरी जगह में कीचड़ से लिपटी दुर्गंध उठ रही थी और एक तरफ से घर की दीवार की आड़ लिए इस आंगन को बेपर्दा करते कुछ पुराने खूंटों पर टंगे हुए कपड़े झूल रहे थे.

इन सबके बीच ख़ुद को महसूस करने की बेचैनी भी मेरे भीतर थी, फिर जाने क्या कुछ पूछता रहा…

और बड़ी हुनरमंदी से तराशी गईं बांस की पतली-पतली फांकों से शायद किसी शादी के लिए सजावटी सामान बनाने में मसरूफ़ मेहतर ने जवाब दिया, ‘अच्छा माई और बाबू (जी) का पूछते हैं, वो होते तो बताते… जब तक जीवित रहे हसुआ-हथौड़ा वाला लाल झंडा लिए घूमते रहे…’

मेहतर बोल रहा था और मैं जाने क्यों ये सुन रहा था कि, ‘दौरां साहब के कॉमरेड तो मर गए, अब हम ही हैं और ये एक कमरे का घर है, जो इंदिरा आवास में कभी मिला था.’

भले ही झुग्गी-झोपड़ी को किसी वक़्त सरकारी योजना ने ईंटों के मकान में बदल दिया हो, लेकिन इस घर की जाति आज भी सबको मालूम है.

और आंखों देखा सच ये भी है कि ईंटों का ये घर अब अपने कमज़ोर निर्माण को जगह-जगह से उघाड़ने लगा है, कहीं-कहीं से ईंटें ग़ायब हैं, कहीं आधी झड़ी ईंट अपने भुरभुरेपन के साथ बची रह गई है और यहां-वहां पड़ी दरारें घर को जर्जर करती जा रही हैं. वहीं, बेहद छोटे ओसारे पर बने मिट्टी के चूल्हे से उठने वाली स्याही भी इन ईंटों की सुर्खी पर अपनी कालिख पोत चुकी है.

दौरां साहब ने इस घर का कोई और रूप देखकर ये शेर कहा होगा, लेकिन इस शेर की सच्चाई सालों बाद बांस-बल्ली, मिट्टी और घास-फूस की जगह ईंटों के आ जाने से भी कहां बदली.

इस घर का तज़्किरा पहले भी एक अवसर पर कर चुका हूं, लेकिन आज इसे दौरां साहब के अपने लफ़्ज़ों में फिर से दर्ज करना चाहता हूं कि ‘घरों की कोई जाति नहीं होती…’ जैसे एक सियासी बयान ने बड़ी सादगी से उस झूठ को विस्तार दिया है, जिसे सुविधाजनक तौर पर अक्सर इस तरह भी दोहराया जाता है कि इंसान तो सब बराबर होते हैं, ऊंच-नीच तो गए ज़माने की बात है, अब ये सब कहां होता है… और ये कि साहब हम तो नहीं मानते ये सब.

ग़ौर से देखिए तो ये बयान उसी समाज के व्यवहार और पाखंड से निकलकर और बाक़ायदा सियासी चोला पहनकर हमारे सामने आया है, जो हाथी के दांतों की तरह नुमाइशी होता है और भीतर कहीं मन की ज़हरीली सच्चाई पहलू बदलती रहती है.

बहरहाल, इस भ्रामक और गुमराह-कुन बयान की होशियारी पर कोई और बात कहने से पहले दौरां साहब की बीती भी सुन ही लीजिए;

‘अपने एक कॉमरेड स्वीपर के यहां इंदिरा जी की इमरजेंसी के ज़माने में छुपा हुआ था. मेरा वो ग़रीब कॉमरेड जिसका घर बेहद बदबूदार था, और जिसके एक कोना में सूअर थे, मुझ पर अपनी जान निछावर करने के लिए तैयार था. उसकी बीवी का भी यही हाल था… मैं तीन या चार दिन उसके यहां छुपा रहा. उसकी बीवी जली हुई रोटी और आलू की आधी कच्ची और आधी जली हुई भुजिया बनाकर बड़े प्यार से मेरे सामने लाकर रखती और मैं उसको खाता. मैं जो खाने के मामले में नफ़ासत-पसंद हूं और मज़ेदार खाने को तरजीह देता हूं अपने हमदर्द और ग़रीब कॉमरेड की मैली-कुचैली बीवी के पकाए हुए खाने को बग़ैर किसी हिचक के खाता रहा….

नहीं मालूम कि हमारा तबक़ाती समाज और उसका क़ायम किया हुआ ज़ात-पात में बंटा हुआ मनहूस निज़ाम-ए-हयात कब ख़त्म होगा और इंसान की कब इज्ज़त की जाएगी. मुझको इस निज़ाम-ए-हयात में ज़िंदगी गुज़ारते हुए शर्म आती है. ये लिखते हुए मेरा क़लम थरथरा रहा है कि मेरा कॉमरेड मेहतर था और उसकी मैली-कुचैली बीवी मेहतरानी.

उठो और इस कमीना ज़लील निज़ाम-ए-हयात को तहस-नहस कर दो ताकि इंसान इंसान रहे. मेहतर और डोम नहीं रहे. हर शख़्स के पास रहने के लिए मकान हो और उसमें तारीकी-ओ-बदबू न हो…’

दौरां साहब कुलीन वर्ग से आते थे. ख़ूब-रू और दुबले-पतले पठान थे. कई मौक़ों पर अपने नस्ली-तफ़ाख़ुर यानी जातीय श्रेष्ठता के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते और लिखते हुए इंसान को सिर्फ़ इंसान समझने के क़ायल थे. उनका सारा संघर्ष ही सामाजिक समानता के लिए था, शायद इसलिए भी वो इस घर का घना अंधेरा देख पाए, जली हुई रोटी का कड़वापन समझ पाए और उस व्यवस्था के ज़ुल्म को महसूस कर पाए जहां इंसान इंसान नहीं, मेहतर और हलाल-ख़ोर होता है और उसके घर की पहचान भी इसी से तय होती है.

ऐसे में आदरणीय गृहमंत्री जी को तामझाम और पूरी व्यवस्था के साथ दलितों के घर खाना खाने वाली सियासत से अलग होकर उन घरों में ठहरने का मशविरा दिया जा सकता है जो हमारे कुलीन घरों की छाया से भी कहीं दूर गांव के किसी कोने में आज भी जाति व्यवस्था का शर्म उघाड़े अपनी कुरूपता के साथ मौजूद हैं.

और इतना भी संभव न हो तो वो देश के किसी गांव-देहात में खड़े होकर हाथ के इशारे से ही पूछ लें कि ये घर किन लोगों के हैं, तो यक़ीन जानिए उन्हें जो जवाब मिलेगा उसमें ‘जाति’ ही पहली सच्चाई होगी.

और अगर मुझे अपने गांव-शहर में मुसलमानों के विशेष संदर्भ में भी बताना पड़े तो मैं ठीक-ठीक बता सकता हूं कि किस मोहल्ले में, किस कोने में, किस टोले में कहां फ़क़ीर (शाह) के घर हैं, कहां धुनिया (नद्दाफ़) के घर हैं, किधर राईन (सब्ज़ी-फ़रोश) के घर हैं, कहां-कहां सर सैयद की गाली वाले ‘बद-ज़ात जुलाहों’ के घर हैं.

और ये भी बता सकता हूं कि मेरे रेलवे स्टेशन से कितनी दूरी पर मिथिला दीप हाल्ट है, जहां पमरिया के घर की एक औरत ने हमसे कहा था कि जब लोग हमें नचनिया की बीवी कहते हैं तो बड़ी शर्म आती है.

मैंने विशेष संदर्भ में ये बात इसलिए भी कही कि अक्सर सियासी तौर पर दावा किया जाता है कि मुसलमानों में जाति नहीं है, सब बराबर हैं. इस्लाम और मुसलमान को यहां एक कर देने वाली सियासत पर ज़्यादा कुछ कहने का मौक़ा नहीं है, लेकिन अब मुसलमानों के घरों का भूगोल भी अध्ययन का एक विषय ज़रूर है.

अपने अनुभव से कहूं तो फ़क़ीरों के घरों की छाया भी किसी सैयद के घर पर नहीं पड़ती बल्कि एक दलित के आंगन में ही पड़ती है. ऐसे में घरों की कोई जाति नहीं होती कहने वालों को बताया जाना चाहिए कि आप घरों की बात करते हैं, यहां तो मज़ारों की भी जाति होती है.

दरअसल, दरभंगा में फ़क़ीर बिरादरी के एक बुज़ुर्ग (सूफ़ी) हुए हैं, बाबा आशिक़ शाह, इनके मज़ार पर इतने कम लोग आते हैं कि मज़ार का ख़र्च भी पूरा नहीं पड़ता, लेकिन इसी शहर में अशराफिया के मज़ार पर चले आइए तो श्रद्धालुओं की भीड़ से आंखें फटी रह जाएंगी. क्या ये आस्था कि वजह से है, या इस वजह से कि एक फ़क़ीर अपने घर और मज़ार में भी फ़क़ीर ही होता है?

ये बातें इसलिए भी कि भाजपा का पसमांदा-प्रेम किसी से छिपा नहीं है, ऐसे में शायद उन्हें इन मुस्लिम घरों की जाति के बारे में भी जानने में दिलचस्पी हो और वो ‘सबका साथ सबका विकास के नारे’ को शिद्दत से ज़मीन पर उतार पाएं.

दरअसल, आदरणीय गृह मंत्री जी ख़ूब जानते हैं कि हमारे टोले-मोहल्ले सिर्फ़ धर्म के ख़ानों में नहीं बंटे हैं, ये अपने-अपने धर्म के अंदर ज़ात-पात के चौखटे में कहीं ज़्यादा बंटे हुए हैं.

और टोला-मोहल्ला भी छोड़िए महानगरों की सोसाइटी का हाल भी धर्म और जाति की इस पहचान से कहां अलग है. कहीं संयोग से अलग है भी तो ख़बर बनते कितनी देर लगती है. कभी किसी मुस्लिम को घर बेच दिया गया हो तो नफ़रत कि सियासत और मुस्लिम पड़ोसी हो तो नमाज़ को लेकर विवाद… ऐसी ढेर सारी ख़बरें बताती हैं घरों की जाति होती है और नहीं होती तो धर्म के नाम पर अपनी पहचान की रक्षा करने वालों को पहुंचाने में भी कितनी देर लगती है.

याद दिला दूं कि जाति और उसके बाद धर्म की सियासत करने वाले ख़ूब जानते हैं कि कहां बुलडोज़र इस्तेमाल करना है और कहां धर्म के नाम पर जाति को पीछे रखना है. कब किसे पसमांदा समझना है और कब किसे हिंदू बताना है. ये सुविधा की सियासत है और असल मुद्दों से भटकाने की मक्कारी भी.

असल में जब आप घरों की जाति से इनकार करते हैं तो आप जाति की गणना से इनकार करना चाहते हैं और इस इनकार का सीधा मतलब है जब तक और जहां तक संभव हो हिस्सेदारी से इनकार करते रहो.

वरना हमारे घर और उसकी भौगोलिक स्थिति हमें हमारी जन्मजात हैसियत की याद हमेशा से दिलाते आए हैं, और जाति के साथ अब धर्म के नाम पर भी हमारे घरों का जुग़राफ़िया तय कर दिया गया है.

कुल मिलाकर, घरों की भूख होती है, जाति होती है, अमीरी होती है, ग़रीबी होती है, उनका धर्म होता है और मज़हब भी. और जिन घरों की जाति नहीं होती उसके बारे में शायर कह गए हैं;

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है

और फिर वो भी तो हैं जिन्हें घर ही मयस्सर नहीं. बहरहाल, उनके लिए भी बस एक शेर ही पढ़ा जा सकता है कि;

ब-ज़ेर-ए-क़स्र-ए-गर्दूं क्या कोई आराम से सोए
ये छत ऐसी पुरानी है कि शबनम से टपकती है