नई दिल्ली: कर्नाटक कैबिनेट ने बीते शुक्रवार (24 अप्रैल) को 15% कोटे के भीतर अनुसूचित जातियों के लिए एक संशोधित आंतरिक आरक्षण मैट्रिक्स को मंज़ूरी दे दी, जिससे रुकी हुई सरकारी भर्तियों को फिर से शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है.
विधान सौध में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अध्यक्षता में हुई विशेष कैबिनेट बैठक के बाद, राज्य सरकार ने 101 अनुसूचित जाति समुदायों के लिए उप-वर्गीकरण का सूत्र घोषित किया. यह निर्णय 16 अप्रैल को गठित एक तकनीकी समिति (जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव ने की थी) की सिफारिशों में संशोधन करता है, जिसने प्रारंभ में 5.3%, 5.3% और 4.4% के वितरण का सुझाव दिया था.
इस संशोधित मैट्रिक्स के तत्काल लागू होने से राज्य को बजट में घोषित 56,432 सरकारी रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति मिलेगी. सिद्धारमैया ने कहा कि पहले 6:6:5 अनुपात के तहत जारी अधिसूचनाओं को वापस लिया जाएगा और नई अधिसूचनाएं जारी कर भर्ती प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाएगी.
विभाजन: संशोधित एससी कोटा मैट्रिक्स (कुल 15%)
- श्रेणी 1 (5.25%): दलित वाम (एडगाई) समूह – मुख्यतः मदिगा और आदि जांबव से जुड़े जाति समूह
- श्रेणी 2 (5.25%): दलित दक्षिणपंथ (बलगाई) समूह – मुख्यतः होलेया और आदि कर्नाटक से जुड़े जाति समूह
- श्रेणी 3 (4.5%): अन्य एससी समुदाय – जिनमें भोवी, लांबानी, कोराचा, कोरमा और 59 खानाबदोश (अलेमारी) समूह शामिल हैं.
ऐतिहासिक और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ
आंतरिक आरक्षण की मांग दलित समुदाय के भीतर ऐतिहासिक असमानताओं से उपजी है. सबसे पिछड़े समूह (एससी ‘वाम’) लंबे समय से बेहतर अवसरों की मांग करते रहे हैं. उनका तर्क है कि 15% का समग्र आरक्षण अपेक्षाकृत मजबूत वर्गों (जैसे एससी ‘दक्षिणपंथ’) द्वारा अधिक उपयोग किया गया.
ऐतिहासिक रूप से दक्षिणपंथी समूह भूमि स्वामित्व और कुशल व्यवसायों से जुड़े रहे, जबकि वामपंथी समूह हाशिये के कार्यों से जुड़े थे और उन्हें ज़्यादा सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था.
सरकार के इस निर्णय पर दलित दक्षिणपंथ और श्रेणी 3 के ‘स्पर्शनीय’ (touchable) समुदायों ने चिंता जताई, जिनका मानना है कि उप-वर्गीकरण से शिक्षा और रोजगार में उनके अवसर सीमित हो सकते हैं.
पृष्ठभूमि का ज़िक्र करते हुए सिद्धारमैया ने कहा कि यह कदम 2023 के कांग्रेस चुनावी घोषणा पत्र के वादे को पूरा करता है और चित्रदुर्ग में 101 एससी समुदायों के प्रतिनिधियों के सम्मेलन में बनी सहमति का परिणाम है. उन्होंने यह भी बताया कि राज्य पहले जस्टिस एजे सदाशिव आयोग और जस्टिस एचएन नागमोहन दास आयोग की रिपोर्टों पर निर्भर रहा है.
हालांकि नागमोहन दास आयोग की सिफारिशों को कानून का रूप दिया गया, लेकिन रोस्टर प्रणाली से जुड़े मुद्दों के कारण इनके क्रियान्वयन में बाधाएं आईं.
क़ानूनी सीमाएं और ‘बैकलॉग’
राज्य सरकार पहले 17% एससी और 7% एसटी आरक्षण लागू करने की कोशिश कर चुकी थी. लेकिन इंद्रा साहनी मामला 1992 में निर्धारित 50% आरक्षण सीमा का पालन करने के लिए वर्तमान व्यवस्था में एससी के लिए 15% और एसटी के लिए 3% आरक्षण तय किया गया है.
सिद्धारमैया ने कहा कि अतिरिक्त प्रस्तावित आरक्षण (एससी के लिए 2% और एसटी के लिए 4%) को ‘बैकलॉग’ के रूप में रखा जाएगा. उन्होंने कहा, ‘यह 6% हिस्सा अंतिम न्यायिक निर्णय तक बैकलॉग के रूप में रहेगा.’ – यह कर्नाटक हाईकोर्ट में लंबित 56% कुल आरक्षण नीति से संबंधित मामले की ओर इशारा करता है.
खानाबदोश समुदायों के लिए सुरक्षा और रोस्टर नियम
श्रेणी 3 में शामिल 59 खानाबदोश समुदायों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए – जिन्होंने पहले उप-वर्गीकरण के खिलाफ अदालत का रुख किया था – सरकार ने तय किया है कि इस श्रेणी के हर पांच पदों में से एक पद केवल इन्हीं समुदायों के लिए आरक्षित होगा. अगर इस समुदाय से उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिलता है, तो पद श्रेणी 3 के अन्य समूहों को दे दिया जाएगा.
सामाजिक कल्याण मंत्री एचसी महादेवप्पा ने रोस्टर नियम स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘कुछ लोगों ने उकसाकर भ्रम पैदा किया.’
उन्होंने बताया कि आंतरिक आरक्षण तभी लागू होगा जब पर्याप्त रिक्तियां हों. अगर किसी भर्ती में एससी के लिए आरक्षित पदों की संख्या 15 से कम है, तो उप-कोटा लागू नहीं होगा और सभी एससी उम्मीदवार मेरिट के आधार पर प्रतिस्पर्धा करेंगे.
राजनीतिक सहमति
मुख्यमंत्री ने दलित मंत्रियों की मौजूदगी में कहा कि यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया. बैठक में केएच मुनियप्पा, जी. परमेश्वर, एचसी महादेवप्पा, प्रियंक खरगे और सतीश जारकीहोली शामिल थे.
कानून एवं संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने कहा कि यह कानून सभी समुदायों और सदन को विश्वास में लेकर बनाया गया है. इस कदम के साथ कर्नाटक, हरियाणा और तेलंगाना के बाद एससी उप-कोटा लागू करने वाला तीसरा राज्य बन गया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी थी.
गृह मंत्री जी. परमेश्वर ने कहा कि भले ही हरियाणा, पंजाब, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में समान मॉडल हैं, लेकिन कर्नाटक का मामला अपनी 101 विशिष्ट एससी समुदायों के कारण अलग है. उन्होंने कहा, ‘कर्नाटक मॉडल का अनुसरण किया जा सकता है, क्योंकि हमने दिखाया है कि इसे कानूनी, राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से कैसे लागू किया जा सकता है.’
