बंगाल में भाजपा का उदय: ममता सरकार से नाराज़गी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और एसआईआर विवाद रहे निर्णायक

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने 15 साल पुरानी तृणमूल सरकार को हटाकर बहुमत हासिल किया. ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष, भ्रष्टाचार व शासन संबंधी सवाल, हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण और मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) विवाद इस बड़े राजनीतिक बदलाव के प्रमुख कारण बनकर उभरे.

(तस्वीर एआई की मदद से बनाई गई है.)

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक ऐसे दौर का अंत कर दिया, जिसकी शुरुआत 2011 में ममता बनर्जी के ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ हुई थी. पंद्रह साल तक सत्ता में रहने के बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और भारतीय जनता पार्टी ने 206 सीटों के साथ निर्णायक बहुमत हासिल कर लिया.

यह सिर्फ सरकार बदलने का परिणाम नहीं है, बल्कि बंगाल की सामाजिक संरचना, चुनावी व्यवहार, प्रशासनिक असंतोष और राष्ट्रीय राजनीति के बदलते संतुलन का सम्मिलित संकेत भी है.

भाजपा की जीत का पैमाना बड़ा है, लेकिन उसकी कहानी सीधी रेखा में नहीं पढ़ी जा सकती. यह परिणाम जितना तृणमूल कांग्रेस के क्षरण की कहानी है, उतना ही भाजपा के संगठनात्मक विस्तार, मतदाता पुनर्संरचना और ध्रुवीकृत राजनीतिक वातावरण का भी परिणाम है.

ममता बनर्जी की हार का प्रतीकात्मक क्षण

इस चुनाव का सबसे नाटकीय दृश्य भवानीपुर सीट पर सामने आया, जहां ममता बनर्जी भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से 15 हजार से अधिक वोटों से हार गईं. शुरुआती दौरों में बढ़त के बाद उनका पिछड़ जाना केवल एक सीट का परिणाम नहीं था. भवानीपुर लंबे समय से ममता की सुरक्षित सीट मानी जाती रही थी.

गिनती केंद्र से बाहर निकलकर ममता बनर्जी ने भाजपा पर ‘100 से अधिक सीटें लूटने’ का आरोप लगाया और निर्वाचन आयोग को भाजपा का आयोग बताया. उन्होंने केंद्रीय बलों, सीसीटीवी बंद किए जाने, पार्टी एजेंटों को अंदर न जाने देने और मतगणना में अनियमितताओं के आरोप लगाए.

राजनीतिक दृष्टि से यह क्षण महत्वपूर्ण था, क्योंकि 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने वाली नेता अब स्वयं उसी तरह की पराजय का सामना कर रही थीं, जैसा कभी उनके विरोधियों ने किया था.

2011 में जो हुआ था, 2026 में दोहराया गया

2011 में तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथी शासन को 34 वर्ष बाद सत्ता से बाहर किया था. उस समय वाम नेतृत्व पर आरोप था कि उसने जनता के भीतर बढ़ रहे असंतोष को समय रहते नहीं समझा. 2026 में वही आरोप ममता सरकार पर लौट आया.

तृणमूल नेतृत्व प्रशासनिक थकान, भ्रष्टाचार के आरोपों, बेरोज़गारी, शहरी असंतोष और पार्टी संगठन के बढ़ते दबदबे को कमतर आंकता दिखा. दूसरी ओर भाजपा को एक चुनौती के बजाय केवल बाहरी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानने की रणनीति अंततः महंगी साबित हुई.

यह बदलाव धीरे-धीरे नहीं आया. 2024 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 42 में से 29 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई थी. लेकिन अगले दो वर्षों में कई घटनाओं ने राजनीतिक माहौल बदल दिया.

आरजी कर रेप मामला और नैतिक आघात

अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की घटना ने बंगाल की राजनीति को झकझोर दिया. राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हुए. सरकार पर आरोप लगा कि उसने शुरुआत में मामले को हल्का दिखाने और बाद में राजनीतिक साजिश बताने की कोशिश की.

अस्पताल प्रशासन पर सबूतों से छेड़छाड़ और लीपापोती के आरोप लगे. सरकार की प्रतिक्रिया ने यह धारणा मजबूत की कि सत्ता जवाबदेही से बच रही है. यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि शासन की संवेदनशीलता और विश्वसनीयता पर प्रश्न बन गया.

शिक्षक भर्ती घोटाला और भ्रष्टाचार की वापसी

इसके बाद शिक्षक भर्ती घोटाले ने तृणमूल सरकार की छवि को और नुकसान पहुंचाया. सुप्रीम कोर्ट ने 25 हजार से अधिक शिक्षकों की नियुक्तियां रद्द करने वाले कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा. अदालत ने चयन प्रक्रिया को ‘खराब’ और ‘विश्वसनीयता से रहित’ बताया.

इसके साथ ही पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी से जुड़े परिसरों से नकदी बरामद होने की पुरानी तस्वीरें फिर चर्चा में आईं. तृणमूल सरकार राहत पैकेज और राजनीतिक सफाई देने की कोशिश करती रही, लेकिन भ्रष्टाचार का आरोप चुनावी विमर्श में स्थायी रूप से दर्ज हो चुका था.

‘सिंडिकेट राज’ और शासन से दूरी

तृणमूल शासन के खिलाफ सबसे व्यापक शिकायतों में एक थी ‘सिंडिकेट’ संस्कृति यानी निर्माण ठेकों से लेकर स्थानीय कारोबार, मनोरंजन उद्योग और सरकारी कामकाज तक पार्टी-संबद्ध नेटवर्क का प्रभाव. भाजपा ने इसे ‘कट मनी’ राजनीति कहकर प्रचारित किया.

उद्योग, निवेश और रोजगार के मोर्चे पर ठहराव की धारणा ने खासकर शहरी और युवा मतदाताओं में असंतोष बढ़ाया. तृणमूल की कल्याणकारी योजनाएं लोकप्रिय रहीं, लेकिन शासन की केंद्रीकृत शैली और पार्टी संगठन का सर्वव्यापी प्रभाव धीरे-धीरे प्रतिरोध पैदा करता गया.

भाजपा की जीत कैसे हुई

भाजपा ने इस चुनाव में केवल वैचारिक मुद्दों पर नहीं, बल्कि बहुस्तरीय सामाजिक गठबंधन पर काम किया. पार्टी के भीतर यह मान्यता थी कि ‘सुरक्षा’, ‘आश्वासन’ और ‘विकास’ उसके मुख्य मुद्दे बने.

महिलाओं के वोट पर भाजपा ने विशेष ध्यान दिया. महिलाओं के लिए राजनीतिक आरक्षण के राष्ट्रीय विमर्श, महिला सुरक्षा के सवाल, और प्रत्यक्ष नकद सहायता के वादों को साथ जोड़कर अभियान चलाया गया.

सरकारी कर्मचारियों और नौकरी चाहने वाले युवाओं को सातवें वेतन आयोग, रिक्त पद भरने और बकाया महंगाई भत्ता देने के वादे के जरिए साधने की कोशिश हुई. पश्चिम बंगाल में लंबे समय से डीए विवाद कर्मचारियों के बीच असंतोष का कारण रहा है.

युवाओं और मध्यम वर्ग के लिए भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम ममता बनर्जी का विकास मॉडल पेश किया. केंद्र प्रायोजित योजनाओं, बुनियादी ढांचे और निवेश की भाषा ने खास असर डाला.

केंद्रीय बल और चुनावी भरोसा

बंगाल लंबे समय से चुनावी हिंसा के आरोपों से जुड़ा राज्य रहा है. इस बार केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती हुई. भाजपा का तर्क था कि इससे सामान्य मतदाता बिना भय मतदान कर सका.

हालांकि आलोचकों ने यही कहा कि केंद्रीय बलों की उपस्थिति और चुनावी प्रशासन का उपयोग राजनीतिक रूप से असंतुलित रहा. लेकिन यह निर्विवाद है कि सुरक्षा का प्रश्न इस चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बन गया था.

मतदाता सूची पुनरीक्षण और विवाद

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया भी इस चुनाव के सबसे विवादित पक्षों में रही. मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए गए.

कई करीबी सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी. विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया अल्पसंख्यक बहुल इलाकों को प्रभावित करती है. भाजपा ने इसे ‘केवल वास्तविक मतदाताओं’ को सूची में रखने का कदम बताया.

यह विवाद चुनाव परिणामों पर स्थायी प्रश्नचिह्न तो नहीं लगाता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं मानी जा रहीं.

सामाजिक ध्रुवीकरण की नई रेखाएं

भाजपा की सफलता का एक आधार हिंदू वोटों का अपेक्षाकृत व्यापक एकीकरण रहा. शुभेंदु अधिकारी ने जीत के बाद खुले तौर पर कहा कि हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध और विभिन्न समुदायों ने उन्हें समर्थन दिया, जबकि मुसलमानों ने ममता बनर्जी को वोट दिया.

यह बयान केवल व्यक्तिगत राजनीतिक दावा नहीं था; यह बंगाल की बदलती चुनावी संरचना का संकेत भी था.

दूसरी ओर, अल्पसंख्यक वोट पूरी तरह तृणमूल के साथ एकजुट नहीं रहे. हमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी और नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट जैसे दलों ने कुछ सीटें जीतीं. इससे तृणमूल का पारंपरिक अल्पसंख्यक आधार दरका.

शहरी बंगाल और जिला बंगाल

भाजपा ने केवल सीमांत जिलों या उत्तर बंगाल में नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों और कई जिलों में व्यापक प्रदर्शन किया. अनुसूचित जाति और जनजातीय इलाकों में उसका विस्तार भी निर्णायक रहा.

उत्तर बंगाल, आदिवासी पट्टी और प्रवासी आबादी वाले क्षेत्रों में भाजपा पहले से मजबूत थी. इस बार उसने दक्षिण बंगाल और पारंपरिक तृणमूल क्षेत्रों में भी सेंध लगाई.

अब भाजपा सरकार के सामने क्या

नई सरकार का एजेंडा लगभग स्पष्ट है. भाजपा समान नागरिक संहिता लागू करने, बांग्लादेश से कथित घुसपैठ रोकने, महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के लिए प्रत्यक्ष सहायता योजनाएं शुरू करने, और राज्य कर्मचारियों के डीए बकाया निपटाने जैसे वादों पर जोर दे रही है.

साथ ही उद्योग, बंदरगाह, हवाई अड्डे, उत्तर बंगाल में नए शहर, दार्जिलिंग मुद्दे पर त्रिपक्षीय वार्ता और सांस्कृतिक परियोजनाओं की भी घोषणा की गई है.

लेकिन चुनावी वादों को प्रशासनिक यथार्थ में बदलना आसान नहीं होगा. डीए बकाया और कल्याण योजनाओं का वित्तीय बोझ भारी है. उद्योग निवेश लाने के लिए राजनीतिक स्थिरता और संस्थागत भरोसा चाहिए. घुसपैठ या पहचान आधारित मुद्दों को अगर आक्रामक रूप से लागू किया गया तो सामाजिक तनाव भी बढ़ सकता है.

बंगाल ने क्या कहा

यह चुनाव केवल तृणमूल की हार या भाजपा की जीत नहीं है. यह उस राजनीतिक चक्र का अंत है जिसमें कल्याणकारी योजनाएं, करिश्माई नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण लंबे समय तक पर्याप्त साबित होते रहे.

बंगाल के मतदाता ने इस बार बदलाव चुना है, लेकिन यह बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, जवाबदेही की मांग भी है. भाजपा के लिए यह जीत जितनी बड़ी उपलब्धि है, उतनी ही बड़ी परीक्षा भी.