नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश पुलिस ने नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में दो लोगों – छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी और वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका), 1980 के तहत कार्रवाई की है.
इस मामले में गिरफ़्तार सात कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वकील अली ज़िया कबीर चौधरी ने कहा, ‘हमारे पास एकमात्र जानकारी पुलिस के मीडिया सेल की प्रेस विज्ञप्ति है. हमें इस बारे में कोई दस्तावेज़ नहीं दिए गए हैं कि किस आधार पर यह (रासुका) लगाया गया है. आदर्श रूप से होना ये चाहिए था कि क़ानून के तहत पुलिस को अदालत में कागज़ात दाख़िल करने चाहिए और वकीलों को सूचित करना चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है.’
यहां जिस प्रेस विज्ञप्ति का ज़िक्र वकील अली ज़िया कबीर चौधरी ने किया है, उसे गौतमबुद्धनगर पुलिस कमिश्नरेट के मीडिया सेल की ओर से जारी किया गया है.
इस प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा के मामले में दो आरोपियों के ख़िलाफ़ रासुका के तहत कार्रवाई की गई है. ये दोनों आरोपी ‘मज़दूर बिगुल दस्ता’ से जुड़े थे और उन्होंने मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और आगज़नी में अहम भूमिका निभाई थी.’
इस प्रेस विज्ञप्ति में चौधरी और वर्मा के नाम शामिल हैं.
इस संबंध में संगठन कैंपेन फॉर द रीलिज़ ऑफ वर्कर्स एंड एक्टिविस्ट्स ऑफ नोएडा द्वारा जारी एक बयान में दिल्ली की एक्टिविस्ट चौधरी और पत्रकार वर्मा पर लगाए गए आरोपों के समय पर सवाल उठाए गए हैं.
संगठन ने 13 मई को जारी अपने एक बयान में कहा:
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि सत्यम और आकृति की ज़मानत पर सुनवाई कल सूरजपुर कोर्ट में हुई. दलीलें सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने मामले को स्थगित कर दिया. बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपों के बेबुनियाद होने और गिरफ़्तारियों के गैर-कानूनी होने की बात पर ज़ोर दिया, जबकि सरकारी वकील सत्यम या आकृति को दोषी ठहराने वाला कोई भी ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहे.
यह भी ध्यान देने लायक है कि आरोपी क़रीब एक महीने से न्यायिक हिरासत में हैं, और अब जाकर यूपी पुलिस ने उन पर रासुका लगाया है.
जैसा कि ‘द वायर‘ ने पहले अपनी रिपोर्ट में बताया था कि मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन के मामले में नोएडा पुलिस ने कुल सात एफआईआर दर्ज की हैं और 300 लोगों को गिरफ़्तार किया है; इनमें एक्टिविस्ट, छात्र, एक पत्रकार और एक पीएचडी स्कॉलर शामिल हैं.
वकील अली ज़िया कबीर चौधरी ने रासुका लगाए जाने से पहले सत्र न्यायालय में हुई बहसों के बारे में बात करते हुए कहा, ‘गिरफ़्तारी की वजह बताना सिर्फ़ एक क़ानूनी नियम ही नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक प्रावधान, अनुच्छेद 22 (गिरफ़्तारी और हिरासत से सुरक्षा) का भी हिस्सा है. हमने यह दलील दी है कि सत्यम और अन्य लोगों के मामले में रिकॉर्ड पर ऐसा एक भी सबूत मौजूद नहीं है जिससे यह पता चले कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी. सत्यम के मामले में तो वह किसी भी वाट्सऐप ग्रुप का हिस्सा भी नहीं हैं; ऐसा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है.’
गौरतलब है कि अप्रैल 2021 में इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल से पता चला था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 120 बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिकाओं में से 94 मामलों में सवाल उठाए थे- जिनमें सख़्त रासुका लगाया गया था; इससे यह संकेत मिला था कि जांच एजेंसियां इस कानून का दुरुपयोग कर रही हैं.
इसी तरह, अगस्त 2022 में न्यूज़लॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह कानपुर के डीएम को भेजे गए एक प्रस्ताव- जिसमें निलंबित भाजपा नेता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मोहम्मद के बारे में की गई टिप्पणियों के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा को लेकर स्थानीय मुस्लिम लोगों पर रासुका लगाने की मंज़ूरी मांगी गई थी- यूपी पुलिस ने हिंदू-बहुल चंदेश्वर हाटा इलाके में ‘लैंड जिहाद’ की साज़िश वाली थ्योरी का सहारा लिया था.
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