नई दिल्ली: मिजोरम के लुंगलेई जिला जेल से पॉक्सो कानून के उल्लंघन, मादक पदार्थों की तस्करी और चोरी जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए 17 कैदियों को फर्जी कोर्ट आदेशों के आधार पर अवैध रूप से रिहा कर दिया गया. पुलिस का कहना है कि यह एक सुनियोजित फर्जी दस्तावेज़ गिरोह था, जिसे कथित तौर पर जेल के अंदर से ही चलाया जा रहा था.
इस घोटाले का पता तब चला जब 24 अप्रैल को दो विचाराधीन कैदी (जिन पर अभी मुकदमा चल रहा था) जज आर. लालदुहामी के सामने पेश हुए. उनके पास लुंगलेई ज़िला कोर्ट और गुवाहाटी हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए कथित रिहाई के आदेश थे. कैदियों ने दावा किया कि उन्हें 50,000 रुपये के बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया है.
जज को शक हुआ क्योंकि उन्होंने इन कैदियों का केस एक दिन पहले ही सुना था और अगली सुनवाई 8 मई के लिए तय की थी. इसके बाद जज तुरंत लुंगलेई जिला जेल पहुंचीं, जहां अधिकारियों ने पाया कि कई कैदी पहले ही फर्जी न्यायिक दस्तावेजों के आधार पर रिहा हो चुके थे.
पुलिस जांच में सामने आया कि ये फर्जी आदेश कथित तौर पर जेल में बंद 25 वर्षीय विचाराधीन कैदी जेरमिया लालथंगतुरा द्वारा तैयार किए गए थे.
जांचकर्ताओं के अनुसार, उसने लुंगलेई के रहसी वेंग इलाके की एक ज़ेरॉक्स और प्रिंटिंग की दुकान के कंप्यूटरों का इस्तेमाल किया और कभी-कभी जेल के अंदर मौजूद दफ़्तर के कंप्यूटर का भी इस्तेमाल करके ऐसे फर्जी रिहाई के आदेश तैयार किए जो बिल्कुल असली कोर्ट के दस्तावेज़ों जैसे दिखते थे.
पुलिस का आरोप है कि जेल से जुड़े सी. लालतलानहलुआ नाम के एक गैर-नियमित एम्बुलेंस ड्राइवर ने इस काम में मदद की. उसने दफ़्तर की चाबियां हासिल कीं और जब नकली कागज़ तैयार किए जा रहे थे, तब उसने पहरेदार का काम किया. इसके बाद ये दस्तावेज़ जेल अधिकारियों को सौंप दिए गए, जिन्होंने कथित तौर पर इन आदेशों को असली मानकर कैदियों को रिहा कर दिया.
पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने कैदियों से 4,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक की रकम वसूली. उन्होंने कैदियों से वादा किया था कि वे उन्हें जेल से रिहा करवा देंगे या किसी वकील के ज़रिये उनकी तरफ से अपील दायर करवा देंगे.
बताया गया है कि अब तक रिहा हुए 11 कैदियों को दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया है; एक कैदी को खॉज़ॉल पुलिस ने गिरफ्तार किया है, जबकि एक अन्य कैदी की रिहाई के बाद कथित तौर पर मौत हो गई है. मामले की जांच अभी जारी है.
मणिपुर: सशस्त्र समूहों द्वारा बंधक बनाए गए 28 नगा व कुकी नागरिक रिहा
मणिपुर पुलिस ने शुक्रवार (15 मई) को बताया कि राज्य के कांगपोकपी और सेनापति जिलों में सशस्त्र समूहों द्वारा बंधक बनाए गए लगभग 38 कुकी और नगा समुदाय के लोगों में से 28 को रिहा कर दिया गया है.
ये अपहरण उस समय हुए जब बुधवार को मणिपुर में ताज़ा हिंसा भड़क उठी. चूड़ाचांदपुर से कांगपोकपी लौट रहे तीन चर्च नेताओं की वाहनों पर घात लगाकर हमला किया गया, जिसमें उनकी मौत हो गई और पांच अन्य घायल हो गए. नोनेय जिले में एक अन्य नागरिक की भी हत्या कर दी गई, जबकि उसकी पत्नी घायल हो गई.
गुरुवार को मणिपुर के गृह मंत्री गोविंदास कोंथौजाम ने कहा था कि प्रशासन ‘अपहृत लोगों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए नागरिक समाज समूहों और राजनीतिक नेताओं के साथ सक्रिय रूप से बातचीत कर रहा है.’

एक अज्ञात पुलिस अधिकारी ने शुक्रवार को समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि कोंसाखुल गांव की 12 नगा महिलाओं को गुरुवार को माखन में रिहा कर दिया गया. अधिकारी ने यह भी कहा कि सेनापति में बंधक बनाए गए कुकी समुदाय के चार पुरुषों और दस महिलाओं को गुरुवार देर रात सुरक्षा बलों को सौंप दिया गया.
अधिकारी के हवाले से अखबार ने बताया, ‘कैथोलिक चर्च के धार्मिक संगठन डॉन बॉस्को के दो सेल्सियन धर्मबंधुओं को भी, जिनमें एक नगालैंड का था, सशस्त्र समूहों ने अलग-अलग स्थानों पर रिहा कर दिया.’
एक अन्य पुलिस अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि कुल कितने लोग बंधक बनाए गए थे, यह स्पष्ट नहीं है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है.
अखबार के अनुसार, दोनों पक्षों के समूहों ने गुरुवार को ‘अल्टीमेटम’ जारी किए थे और चेतावनी दी थी कि यदि दूसरी ओर से बंधकों को रिहा नहीं किया गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है.
बुधवार के हमले के बाद कुकी जनजातियों के शीर्ष संगठन कुकी इनपी मणिपुर ने आरोप लगाया कि इन घटनाओं के पीछे सशस्त्र नगा संगठन ज़ेलियांग्रोंग यूनाइटेड फ्रंट-कामसन गुट का हाथ है. हालांकि, अधिकारियों ने कहा कि उग्रवादी संगठनों की संलिप्तता की जांच की जा रही है.
ये घटनाक्रम उखरूल में कुकी और नगा समुदायों के बीच बढ़े तनाव के बीच सामने आए हैं. 7 फरवरी को तांगखुल नगा और कुकी-जो समुदायों के सदस्यों से जुड़े कथित हमले के बाद तनाव बढ़कर झड़पों में बदल गया था.
यह ताज़ा हिंसा मई 2023 में राज्य में मेईतेई और कुकी-जो-हमार समुदायों के बीच भड़की जातीय हिंसा की पृष्ठभूमि में हुई है, जिसमें कम से कम 260 से अधिक लोगों की मौत हुई है और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. वर्ष 2024 और 2025 में भी समय-समय पर हिंसा में वृद्धि देखी गई थी.
असम: हिमंता बिस्वा शर्मा के नए कैबिनेट ने यूसीसी विधेयक को मंजूरी दी
हिमंता बिस्वा शर्मा के नेतृत्व वाली असम कैबिनेट ने बुधवार (13 मई) को राज्य में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने को मंजूरी दे दी. विधानसभा चुनावों में दोबारा सत्ता में आने के बाद भाजपा-नीत नई सरकार का यह शुरुआती बड़े फैसलों में से एक है.
यह निर्णय मंगलवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के एक दिन बाद आयोजित पहली कैबिनेट बैठक में लिया गया.
बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में शर्मा ने इस कदम को ‘महत्वपूर्ण’ फैसला बताया और कहा कि यूसीसी विधेयक नई सरकार के पहले विधानसभा सत्र के दौरान पेश किया जाएगा, जो 21 से 26 मई तक आयोजित होगा.

सरकारी बयान में कहा गया कि कैबिनेट ने यूसीसी विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी है और इसे 26 मई को विधानसभा सत्र के अंतिम दिन पेश किया जाएगा.
बयान में कहा गया, ‘कैबिनेट की मंजूरी के अनुसार अनुसूचित जनजाति (पहाड़ी) और अनुसूचित जनजाति (मैदानी) समुदाय इस संहिता के दायरे से बाहर रहेंगे. पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाज, प्रथाएं और अनुष्ठान भी इसके दायरे में नहीं आएंगे. यूसीसी मुख्य रूप से चार विषयों को कवर करेगा – विवाह की न्यूनतम आयु, बहुविवाह पर प्रतिबंध, माता-पिता की संपत्ति में बेटियों को समान अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामले.’
सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर शर्मा ने लिखा, ‘एनडीए 3.0 की असम कैबिनेट की पहली बैठक में यूसीसी विधेयक के मसौदे को मंजूरी दी गई. हमारे संकल्प पत्र का एक प्रमुख वादा अब पूरा होने के एक कदम और करीब है. असम के लोगों द्वारा अपनाई जाने वाली रस्में और परंपराएं राज्य में यूसीसी के दायरे से बाहर रहेंगी.’
कैबिनेट ने अगले पांच वर्षों में दो लाख सरकारी नौकरियां देने के लिए एक टास्क फोर्स के गठन को भी मंजूरी दी. 2021 में अपने पहले कार्यकाल की शुरुआत के दौरान शर्मा ने पहले वर्ष में एक लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया था. सरकार के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 1.6 लाख से अधिक नौकरियां दी गईं.
यूसीसी का उद्देश्य धर्म से परे सभी नागरिकों के लिए समान व्यक्तिगत कानून लागू करना है. यह कानूनी ढांचा विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों को धर्म, जाति या लिंग से इतर समान रूप से नियंत्रित करता है.
शर्मा ने कहा कि भाजपा-शासित उत्तराखंड, गोवा और गुजरात में यूसीसी पहले ही लागू किया जा चुका है, लेकिन असम का कानून राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किया जाएगा. उन्होंने कहा कि आदिवासी आबादी को इससे छूट दी जाएगी ताकि संरक्षित समुदायों की पारंपरिक प्रथाएं और रीति-रिवाज प्रभावित न हों.
असम में प्रस्तावित कानून में विवाह की न्यूनतम आयु, लिव-इन संबंध, बहुविवाह पर रोक और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों से जुड़े प्रावधान शामिल होंगे.
असम की आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत से अधिक है, जबकि मुस्लिम समुदाय की आबादी 34 प्रतिशत से ज्यादा है.
मणिपुर: इंफाल पूर्व में लाइमाचिंग पहाड़ी पर बड़े पैमाने पर मिट्टी खुदाई के ख़िलाफ़ स्थानीय लोगों का प्रदर्शन
मणिपुर के इंफाल पूर्व जिले में स्थानीय निवासियों और महिला संगठनों ने 15 मई को लाइमाचिंग पहाड़ी की तलहटी में प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने पहाड़ी पर कथित बड़े पैमाने पर हो रही मिट्टी खुदाई की निंदा करते हुए पर्यावरण की रक्षा के लिए सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की.
नॉर्थईस्ट टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रदर्शन क्षेत्रिगाओ नुपी लामजिंग लुप और स्थानीय मीरा पाइबिस द्वारा आयोजित किया गया था.
प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि लाइमाचिंग पहाड़ी पर लगातार और अनियंत्रित मिट्टी खुदाई से गंभीर पर्यावरणीय नुकसान हो रहा है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा पैदा हो गया है. उन्होंने अधिकारियों से स्थल पर चल रही सभी खुदाई गतिविधियों को तुरंत रोकने की मांग की.

खुदाई की वैधता पर सवाल उठाते हुए प्रदर्शनकारियों ने पूछा कि आखिर किस नियम के तहत यह मिट्टी कटाई की जा रही है. उन्होंने कहा कि स्थानीय ग्रामीण वर्षों से इस पहाड़ी की रक्षा करते आए हैं और वे इसे नष्ट नहीं होने देंगे.
उन्होंने आगे कहा कि यदि विकास कार्यों के लिए मिट्टी की आवश्यकता है, तो उसे अधिकृत स्थानों से लिया जाना चाहिए, न कि उन पहाड़ियों से जिन्हें स्थानीय समुदायों ने संरक्षित किया है.
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि प्रशासन सार्वजनिक रूप से बताए कि खुदाई की अनुमति किसने दी और पहाड़ी पर मिट्टी कटाई के लिए जारी सभी अनुमतियां रद्द की जाएं.
मेघालय: असम के साथ तनाव के बीच विवादित सीमा गांव में कमांडो तैनात किए
मेघालय ने पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले के विवादित लापांगाप गांव और उसके आसपास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है.
असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य पुलिस की कम से कम तीन टुकड़ियों के साथ स्पेशल फोर्स-10 कमांडो इकाई को भी तैनात किया गया है.
पुलिस महानिदेशक इदाशिशा नोंगरांग ने पुष्टि की कि कमांडो प्लाटून को गुरुवार सुबह (14 मई) क्षेत्र में भेजा गया था. उन्होंने कहा, ‘क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए वर्तमान तैनाती की समीक्षा की जाएगी.’

सुरक्षा बढ़ाने का यह कदम लापांगाप गांव वालों की शिकायतों के बाद उठाया गया है. गांववालों का कहना है कि सीमा के असम वाले हिस्सा में रहने वाले लोगों द्वारा कथित उत्पीड़न के कारण वे अपनी जमीन पर खेती नहीं कर पा रहे हैं.
कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि वे दिन में जो पौधे लगाते हैं, उन्हें पड़ोसी राज्य के लोग रात में नष्ट कर देते हैं. ग्रामीणों ने यह मांग भी की है कि जिला प्रशासन द्वारा लगाया गया रात्रिकालीन कर्फ्यू हटाया जाए ताकि वे अपने खेतों की निगरानी कर सकें.
यह कर्फ्यू पिछले वर्ष हुई हिंसा के बाद लगाया गया था, जिसमें असम सीमा क्षेत्र के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी.
बुधवार को गांववाले शिलांग तक मार्च करके गए और उपमुख्यमंत्री स्नियावभलंग धर से क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ाने का आश्वासन प्राप्त किया. इसके बाद मेघालय सरकार ने बाराटो से लगभग 19 किलोमीटर दूर एक पुलिस चौकी स्थापित की है, जिसे लापांगाप से कुछ दूरी पर रखा गया है.
यह कदम दोनों राज्यों के बीच हुए एक समझौते के अनुरूप उठाया गया है. इस समझौते के तहत, विवादित क्षेत्र के पास सुरक्षा ढांचे की यथास्थिति (status quo) बनाए रखने के साथ-साथ विकास कार्यों को जारी रखने की अनुमति दी गई है.
असम पहले से ही लापांगाप के निकट एक पुलिस शिविर संचालित कर रहा है.
लापांगाप विवाद असम-मेघालय सीमा पर मौजूद कई तनावपूर्ण बिंदुओं (flashpoints) में से एक है. इस सीमा पर ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर होने वाले विवादों के कारण समय-समय पर गतिरोध और हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं.
त्रिपुरा: हाईकोर्ट ने पुलिस दुर्व्यवहार मामले में विशेष जांच दल गठित करने का आदेश दिया
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने पूर्व अगरतला पुलिस थाने के पुलिसकर्मियों पर मारपीट, भ्रष्टाचार, दुर्व्यवहार और पक्षपातपूर्ण जांच के आरोपों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया है. अदालत ने प्रारंभिक जांच में स्पष्ट कमियां पाए जाने के बाद यह निर्देश दिया.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह आदेश धलेश्वर निवासी रत्ना रॉय द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया. याचिका में आरोप लगाया गया था कि नगर निगम कर्मचारियों के साथ विवाद के बाद उनके परिवार पर हमला किया गया और उनके बेटे को पुलिस हिरासत में प्रताड़ित किया गया.

अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता तथा प्राथमिकी दर्ज न करने और निष्पक्ष जांच न होने के कारण वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में स्वतंत्र जांच जरूरी है, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके.
मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव और जस्टिस बिस्वजीत पालित की पीठ ने आदेश दिया कि मामले की जांच पुलिस अपराध शाखा के अधिकारियों सहित एक विशेष जांच दल द्वारा की जाए, जिसका नेतृत्व पुलिस उपाधीक्षक स्तर का अधिकारी करेगा और जिसकी निगरानी पुलिस महानिरीक्षक करेंगे.
याचिका के अनुसार, रत्ना रॉय अपनी संपत्ति पर निर्माण कार्य करा रही थीं, तभी अगरतला नगर निगम के दो कर्मचारियों – रवींद्रनाथ घोष और जॉय देबनाथ – ने कथित रूप से बार-बार काम में बाधा डाली और दो लाख रुपये की अवैध मांग की. आरोप है कि उन्होंने धमकी दी कि यदि मांग पूरी नहीं की गई तो निर्माण कार्य रुकवा दिया जाएगा.
स्थिति 4 अप्रैल को और बिगड़ गई, जब कथित तौर पर घोष, देबनाथ और अन्य लोग रात लगभग 10:45 बजे परिवार के किराए के घर पहुंचे, रत्ना रॉय के बेटे सैकत साहा को बाहर बुलाया और उसके साथ मारपीट की. जब रत्ना रॉय और उनके पति ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो उनके साथ भी कथित रूप से मारपीट की गई.
याचिका में दावा किया गया है कि सैकत को जबरन पूर्व अगरतला पुलिस थाने ले जाया गया, जहां पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में उसके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया गया. आरोपों में अपमानित करना, यातना देना, अनुचित शारीरिक संपर्क और कपड़े उतरवाने की कोशिश शामिल है.
रॉय ने बताया कि उन्होंने 6 अप्रैल को आरोपियों के नाम बताते हुए शिकायत दर्ज कराई थी. हालांकि, न तो एफआईआर दर्ज की गई और न ही कोई प्रभावी जांच शुरू की गई. पश्चिम त्रिपुरा के पुलिस अधीक्षक और पुलिस महानिदेशक सहित वरिष्ठ अधिकारियों से कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने 29 अप्रैल को न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया.
