पिछले एक दशक से अधिक से हम भारत-विचार पर बहस करते रहे हैं. इस पर विचार हुआ है कि असल भारतीयता क्या है. इस सिलसिले में स्वतंत्रता-संग्राम, गांधी-आंबेडकर-नेहरू, भारतीय परंपरा आदि पर भी पुनर्विचार हुआ है. यह सब ज़रूरी हुआ है कि भारतीय राजनीति-अर्थव्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, मीडिया आदि में एक सर्वग्रासी विचारधारा के रूप में हिंदुत्व का वर्चस्व होना शुरू हुआ है. एक तरह के हिंदू-विचार, हिंदू-भारतीयता पर आग्रह बढ़ता गया है.
एक तरह की वैचारिक बहस भारत-विचार और हिंदूविचार के बीच चलने लगी है हालांकि वह पूरी तरह से बौद्धिक नहीं कही जा सकती क्योंकि भारत-विचार को सामासिक और समावेशी बहुलता मूलक बताने वाले लोग तो बहस साक्ष्य और तथ्य के आधार पर करते हैं जबकि हिंदूविचार के लोग साक्ष्य और तथ्य के बजाय भावुकता, ‘आहत भाव’ आदि का सहारा लेते आए हैं.
इस संदर्भ में ईरानी दार्शनिक रामिन जहांबेगुलू की नई पुस्तक ‘आइडिया ऑफ पर्शिया’ (गिंगको, लंदन) में कही गई बहुत-सी बातें प्रासंगिक हो जाती हैं. रामिन पहले महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ ठाकुर आदि पर गंभीर और विचारोत्तेजक पुस्तकें लिख चुके हैं. ईरान से निष्कासित होने के बाद वे बरसों से भारत और कनाडा के विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं. वे स्पष्ट करते हैं कि हर राष्ट्र का विचार उसकी आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है.
सच तो यह है कि हर राष्ट्र, अपने सत्व में, एक विचार ही होता है. जैसे इतिहास किसी एक व्यक्ति की कृति नहीं होती बल्कि सामान्य रूप से मानवता की, वैसे ही राष्ट्र का विचार किसी एक अकेले व्यक्ति का न होकर एक प्रक्रिया का होता है जिससे सचाई और विचार दोनों एक साथ उपजते हैं.
आशय यह है कि ईरानविचार किसी व्यक्ति-विशेष का विचार नहीं है. यही हम दृढ़तापूर्वक भारत-विचार के बारे में भी कह सकते हैं- अनेक बुद्धिजीवी और लेखक कह ही रहे हैं- कि वह भारत की अनेक परंपराओं, धर्मों, भाषाओं, दृष्टियों, जीवनवयापन की विधियों आदि से उपजा और उनमें रूपायित विचार है. उसे किसी एक देवपुरुष, एक ऐतिहासिक नायक, एक ग्रंथ, एक भाषा, एक विचार-पद्धति आदि ने जन्म नहीं दिया है और इसलिए इनमें से किसी का उस पर आधिपत्य नहीं हो सकता: वैसा होना भारतीय रूप से अवैध और बौद्धिक रूप से अप्रामाणिक होगा.
रामिन ईरानी बुद्धिजीवियों के दुचित्तेपन का ज़िक्र और विश्लेषण करते हैं और बताते हैं भले पश्चिम ईरान का ‘अन्य’ है, बुद्धिजीवियों ने एक ओर तो पश्चिमी राजनीतिक और सांस्कृतिक मूल्य अपनाए हैं वहीं दूसरी ओर उनमें पश्चिम द्वारा ईरान में की गई सांस्कृतिक और राजनीतिक घुसपैठ को लेकर आहत राष्ट्रीय अभिमान और रोष भी है. वे इस रोष को पश्चिमी पदावली में ही व्यक्त करते हैं. दरअसल, वे अपने को भी प्रायः अन्य की नज़र से देखते हैं.
पश्चिम को लेकर भारतीय बुद्धिजीवियों का दुचित्तापन नई बात नहीं है. पश्चिम का भारत में रैडिकल क्रिटीक तो महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने किया था जो सीधे-सीधे बुद्धिजीवियों की कोटि में नहीं रखे जा सकते.
आज बुद्धिजीवियों के सामने चुनौती पश्चिम के बरक़्स भारत को सिद्ध करने की नहीं है. चुनौती भारत में परंपरा-संस्कृति-इतिहास-ज्ञान की जो सत्ता-पोषित दुर्व्याख्याएं सुनियोजित ढंग से की जा रही हैं उनके बरक़्स इन सबका गंभीर पुनरीक्षण और उन्हें जनमानस और स्वयं ज्ञान के क्षेत्र में, साक्ष्य और प्रमाण के आधार पर, पुनर्परिभाषित करने की है.
इस विडंबना को समझने-समझाने की है कि हिंदुत्व का विचार और उसे अमल में लाने की विधियां पश्चिम से प्रेरित या उसकी नकल हैं. उनका सत्व ही भारतीय नहीं है.
स्थिति यह है कि भारत में सार्वजनिक बुद्धिजीवी बहुत कम हैं. जो हैं उन्हें भी अक्सर दूसरे बद्धिजीवियों का समर्थन कम ही मिलता है. इस बीच शिक्षा-व्यवस्था में मुक्त विचार-विनिमय, असहमति, वाद-विवाद-संवाद को सीमित-बाधित किया जा रहा है. स्वयं शिक्षक-समुदाय में हिंदुत्ववादियों की विस्तृत और भयावह घुसपैठ इतनी हो चुकी है कि आगे जाकर ये आज्ञापलक शिक्षक और आज्ञापालक समाज बनाने में जी-जान और अपार उत्साह से लग जाएंगे.
तब जो बुद्धिजीवी नाम के कहलाएंगे वे सभी बुद्धि को अतिक्रमित कर बने होंगे और उनसे यह उम्मीद करना बेकार होगा कि सच्चे बुद्धिजीवी का धर्म सत्ता से सच बोलना है. वे तो आश्वस्त भाव से सत्ता के चतुर-वाक्पटु प्रवक्ता होंगे. उनमें से ऐसे कुछ दृश्य पर आना शुरू हो गए हैं.
सदाशिव पर धूप
यों तो हमारे फ्लैट में धूप कम ही आती है ख़ासकर जाड़ों में तो बिल्कुल ही नहीं. लेकिन गर्मियों में, अवांछित, धूप बैठकखाने में आती है. सुबह साढ़े छह बजे के करीब वह सदाशिव की मूर्ति पर पड़ती है. मूर्ति दसवीं शताब्दी की है और मुझे सरगुजा के सघन वन और आदिवासी अंचल कुसमी पाट पर अपने एक दौरे में जीप ख़राब हो जाने के कारण एक पठार पर कुछ देर बिलमने के कारण एक ध्वस्त शिव मंदिर के भग्नावशेष में मिली थी. कुछ दिन वह अम्बिकापुर के सरकारी आवास में रही. फिर लगभग बीस बरस भोपाल के चौहत्तर बंगले के एक बंगले में, और दिल्ली में तीन मकानों में, 1992 से. अब वसुन्धरा एनक्लेव के मकान में 2003 से है.
भोपाल में एक पुरातत्व विशेषज्ञ ने उसे देखकर बताया था कि वह दसवीं शताब्दी की हो सकती है. ज़ाहिर है तब कुसमी पाट आज जैसा अगम्य न होकर मुख्य प्रदेश के अंतर्गत रहा होगा. शैव अंचल भी. अब तो वहां कुछ सदियों से आदिवासी ही रहते हैं.
मूर्ति भग्न मूर्ति है. सदाशिव का ही एक हाथ बिना किसी अस्त्र या वस्तु के है. एक हाथ टूटा हुआ है. सामने का मुख्य शिवमुख और बगल के दो मुख अक्षत हैं. इसी कारण यह पहचाना जा सका है कि यह मूर्ति सदाशिव की है. जब यह लिख रहा हूं तब तक धूप सदाशिव से जा चुकी है और अब वे शिल्पित पत्थर की रूक्ष आभा में ही दीख रहे हैं. सोच रहा हूं कि दसवीं शताब्दी की मूर्ति पर थोड़ी देर पहले इक्कीसवीं शताब्दी की धूप पड़ रही थी पर न मूर्ति को, न उसमें शिल्पित सदाशिव को यह याद है कि मूर्ति लगभग ग्यारह शताब्दी पहले की है.
सदाशिव को उस शताब्दी से भी पहले के होंगे. मूर्ति को शायद यह भी ध्यान में नहीं होगा कि उस पर धूप पड़ रही है. धूप को भी इसका ख़याल नहीं होगा कि वह इक्कीसवीं शताब्दी की है. सदाशिव, मूर्ति और धूप दोनों को अपना समय नहीं याद: वे समय से बाहर हैं. हैं, जहां भी हैं, बस हैं.
मूर्ति कल्पना-कला-कौशल की त्रयी से संभव हुई होगी. सदाशिव कल्पना की उपज है, पत्थर जैसे कठोर माध्यम में उनकी मूर्ति बनाना कला और कौशल के बिना संभव नहीं. यह सब कुछ समय के अंतर्गत ही हुआ है पर होने के बाद, एक तरह से, समयातीत हो गया है. यह सोचना कि थोड़ी सी दसवीं शताब्दी हमारे घर में है, सदाशिव भी हमारे आस्था-वंचित परिवार में बिराज रहे हैं और बहुत सारी पुस्तकों से घिरे रहने के बावजूद पत्थर अपनी कठिन और खुरदरी उपस्थिति में अविचलित है.
यह जिज्ञासा बनी रहती है कि हम उसे रोज़ देखते हैं, दिन में कई बार, पर क्या वह भी हमें देखती है? वह तो लगभग अनश्वर है: क्या हम नश्वरों को वह, अपनी अनश्वरता के वितान से, देखती है? गर्मियों में जिस धूप में होने से हम बचते हैं वह धूप काफ़ी देर सदाशिव की मूर्ति पर पड़ती रहती है.
वेनिस में भारत पैवेलियन
ख़बर है कि इस बार वेनिस बियेनाल में भारत का स्थायी पैवेलियन है और आगे भी रहेगा. यह भारतीय कला के क्षेत्र में, उसकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीयता के अनुरूप, एक बड़ा क़दम है. ऐसे स्थायी पैवेलियन के लिए 2011 में ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष के रूप में मैंने कोशिश की थी, संस्कृति मंत्रालय ने प्रस्ताव मान भी लिया था पर बात आगे नहीं बढ़ी. उस समय स्थायी पैवेलियन कुल 15 करोड़ रुपये में बीस बरसों के लिए मिल रहा था. इस बार संस्कृति मंत्रालय ने स्थायी पैवेलियन ले लिया है यह बहुत अच्छी ख़बर है.
इस बार वेनिस में भारत पैवेलियन में जो प्रदर्शनी आयोजित है उसमें चार कलाकारों की कृतियां शामिल की गई हैं: यलवार बालसुब्रमणियम, सुमाक्षी सिंह, रंजनी शेट्टार, आसिम वाकिफ़, स्कर्मा सोनम ताषी. संग्राहक एक विदेशी विशेषज्ञ हैं: अमीन ज़ाफ़र. कुछ मित्रों ने बताया कि चयन बहुत अच्छा है और उसे व्यापक प्रशंसा मिल रही है. यह तो सोने में सुहागा है: स्थायी पैवेलियन और एक सशक्त प्रदर्शनी से उसका शुभारंभ.
इस बार शुरू होने से पहले वेनिस बियेनाल विवादग्रस्त हो गया जब उसकी जूरी के कुछ सदस्यों ने इस आधार पर इस्तीफ़ा दे दिया कि बियेनाल ऐसे दो देशों को प्रदर्शन करने दे रहा है, रूस और इज़रायल, जो मानवता के विरुद्ध अपराधों के अभियुक्त हैं. यह आपत्ति जायज़ तो है ही, यह भी ज़ाहिर करती है कि कला अगर मानवीय अंतःकरण है तो ऐसे अवसरों पर ऐसे हस्तक्षेपों से ही अपने को सत्यापित करती है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
