उत्तम नगर में सांप्रदायिक ध्वस्तीकरण और सामाजिक बहिष्कार रोका जाए: पीयूडीआर

पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स ने एक बयान में कहा कि सांप्रदायिक उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार के कारण उत्तम नगर में तरुण की हत्या मामले के आरोपियों के परिवारों के बहुत सारे लोग अपने घरों में दो महीने बाद भी वापस नहीं लौट पाए हैं. इन परिवारों की औरतों और बच्चों को सांप्रदायिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है.

दिल्ली नगर निगम द्वारा उत्तम नगर होली झड़प मामले के एक आरोपी से जुड़े एक घर के अवैध हिस्सों को गिराते हुए. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) ने उत्तम नगर की झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनी में 30 अप्रैल, 2026 को नगर निगम द्वारा आरोपी ठहराए गए एक मुस्लिम व्यक्ति की संपत्ति के कुछ हिस्सों को ढहाए जाने की कड़ी निंदा की. इन व्यक्ति पर एक युवक तरुण की हत्या का आरोप लगाया गया है और वे फिलहाल न्यायिक हिरासत में है.

उल्लेखनीय है कि होली के दौरान 4 मार्च को दो समुदायों के दो परिवारों के बीच पानी के गुब्बारे को लेकर हुए विवाद के कारण एक 26 वर्षीय तरुण गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद उनकी मौत हो गई.

संगठन के बयान में कहा गया है कि यह ध्वस्तीकरण कार्रवाई रातोंरात की गई, जबकि हाईकोर्ट द्वारा मामले पर दो सप्ताह की रोक लगा थी और मालिक को एमसीडी ट्रिब्यूनल में अपील के लिए कहा था. ट्रिब्यूनल ने उनकी अंतरिम याचिका को ख़ारिज कर दिया और रातों-रात एमसीडी ने तोड़-फोड़  कर दी.

इसमें आगे कहा गया है कि 8 मार्च, 2026 को भी ऐसे ही बुलडोज़र से इसी मामले में न्यायिक हिरासत में बंद एक और मुस्लिम मालिक की संपत्ति के एक हिस्से को अतिक्रमण बताकर ध्वस्त कर दिया था.

बयान में कहा कि 5 मार्च 2026 को होली की रात उत्तम नगर में हुई झड़पें, जिनमें तरुण की मौत हुई, लंबे समय से वहां रह रहे मुस्लिम और दलित निवासियों के बीच एक मामूली विवाद से शुरू हुई थीं. पीयूडीआर की फैक्ट जांच से पता चला है कि राज्य एजेंसियों की सुनियोजित कार्रवाइयों और निष्क्रियता ने इस मौत और उसके बाद की घटनाओं को सांप्रदायिक रंग दे दिया है.

पीयूडीआर ने दावा किया कि इलाके में मौजूद कुछ निहित स्वार्थों वाले समूहों ने आरोपियों के परिवारों के खिलाफ, ‘कानून-व्यवस्था’ के इस मामले पर अपना एकाधिकार जमा लिया है.

बयान में कहा गया है कि मौत को ‘सांप्रदायिक हत्या’ बताने की साज़िश के चलते पुलिस ने इस मोहल्ले से 20 मुसलमानों को गिरफ़्तार किया है- जिनमें तीन औरतें और दो नाबालिग बच्चे भी शामिल हैं.

बयान में आरोप लगाया गया है कि घटना के बाद एक बुज़ुर्ग मुस्लिम बाबू खान को अवैध रूप से आठ दिनों तक हिरासत में रखा गया तथा रिहाई के समय पुलिस द्वारा धमकाया और डराया गया.

पीयूडीआर ने कहा कि बाबू खान द्वारा द्वारका के पुलिस उपायुक्त को दी गई लिखित शिकायत पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. होली की रात हुई झड़पों और उनकी अवैध हिरासत से संबंधित बाबू खान की शिकायत पर पुलिस की निष्क्रियता निष्पक्ष जांच और सही कानूनी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है.

कार्रवाई में भेदभाव का आरोप लगाते हुए बयान में कहा गया है कि घटना के बाद आरोपियों के परिवारों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसके तुरंत बाद कुछ खाली पड़े मकानों को असामाजिक तत्वों द्वारा लूटा और क्षतिग्रस्त किया गया, नगर निगम द्वारा गिरा दिया गया तथा प्रदूषण मानकों के उल्लंघन के आधार पर एनजीटी द्वारा नोटिस जारी किए गए. नगर निगम और एनजीटी की ये कार्रवाइयां केवल मुस्लिम मालिक-आरोपियों की संपत्तियों पर ही की गई हैं.

संगठन ने बयान में कहा कि सांप्रदायिक उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार के कारण आरोपियों के परिवारों के बहुत सारे लोग अपने घरों में दो महीने बाद भी वापस नहीं लौट पाए हैं. इन परिवारों की औरतों और बच्चों को सांप्रदायिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है, उन्हें बदनाम किया जा रहा है, और उन्हें अपनी ज़िंदगी और कमाई दोबारा शुरू करने से रोका जा रहा है.

अंत में पीयूडीआर ने आरोपियों के घरों को सांप्रदायिक आधार पर गिराने का काम रोकने, पुलिस बाबू खान की शिकायत की जांच करने और सही तरीक़े से काम करने के साथ पुलिस आरोप वाले परिवारों की सुरक्षा का ध्यान रखने की मांग की.