नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (18 मई) को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें गुजरात के दो चिड़ियाघरों के भीतर जंगली जानवरों को खिलाने के लिए भैंसों के वध को चुनौती दी गई थी.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिका पर सुनवाई जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की. पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें इस प्रथा के खिलाफ दायर जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया गया था. यह प्रथा राज्य के जूनागढ़ जिले स्थित सक्करबाग चिड़ियाघर में अपनाई जा रही है.
29 जनवरी को हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा था कि चिड़ियाघर के अधिकारियों ने कानूनी नोटिस के जवाब में बताया था कि चिड़ियाघर का संचालन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा बनाए गए नियमों के तहत किया जाता है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने कहा, ‘यह पूरा नियम-संग्रह उन बूचड़खानों के लिए है जहां इंसानों के खाने के लिए जानवरों को मारा जाता है… उन्हें चिड़ियाघर का प्रबंधन अपनी मर्ज़ी से करने दें. असल में आपको तो यह कहते हुए जनहित याचिका दायर करनी चाहिए थी कि इन चिड़ियाघरों को ही हटा दिया जाए. वह भी पशुओं के प्रति क्रूरता है.’
याचिकाकर्ता संस्था ‘एनिमल वेलफेयर फाउंडेशन’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल ने दलील दी कि चिड़ियाघर परिसर के अंदर जानवरों को मारने के लिए नियमों की ज़रूरत होती है, और ‘सिर्फ इसलिए कि यह काम गैर-व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि नियम लागू नहीं होंगे.’
उन्होंने ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2017)’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें अदालत के निर्देशों के बाद सरकार ने जानवरों को मारने से पहले, मारने के दौरान और मारने के बाद के चरणों को नियंत्रित करने वाले 24 नियम निर्धारित किए थे.
गोयल ने कहा कि भले ही सभी 24 नियम इस मामले में लागू न हों, क्योंकि मांस मानव उपभोग के लिए नहीं है, फिर भी बाकी नियम लागू होते हैं.
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भारत के अन्य चिड़ियाघरों के विपरीत, जहां जानवरों के लिए तैयार मांस या भोजन की आपूर्ति के लिए टेंडर जारी किए जाते हैं – गुजरात के इन दोनों चिड़ियाघरों में ज़िंदा भैंसों को चिड़ियाघर परिसर के अंदर लाने और वहीं उन्हें मारने की अनुमति दी जाती है.
गोयल ने कहा कि चिड़ियाघर परिसर के भीतर पशुओं का वध करना एक बूचड़खाना चलाने के समान है, इसलिए इसके लिए पशु क्रूरता निवारण अधिनियम सहित अन्य कानूनी प्रावधानों और लाइसेंस संबंधी नियमों का पालन आवश्यक है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे प्रदूषण और जल स्रोतों पर प्रभाव पड़ता है.
हालांकि जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं है और याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया.
