ऐसे आलोचक कम हैं जो अपने समय के मूर्धन्य या महत्वपूर्ण लेखकों को, उनकी कृतियों को बार-बार पढ़ते और उनमें नए अर्थ और नई प्रासंगिकता खोज पाते हों. प्रगतिशील आलोचक नंदकिशोर नवल उनमें से एक थे. उन्होंने वैसे तो मुक्तिबोध पर एक पूरी पुस्तक लिखी है. पर उस पुस्तक के बाद वे अपनी अन्य पुस्तकों में मुक्तिबोध की विशिष्ट रचनाओं का पाठ-आधारित विश्लेषण करते रहे. इधर संयोगवश मेरा ध्यान इन निबंधों की ओर गया.
विचारधारा से प्रेरित आलोचक अक्सर कृति या लेखक पर धारा का ऐसा आच्छादन तान देते हैं कि हमें धारा का पता तो चलता है, कृति या लेखक की विशिष्टता या अद्वितीयता का बहुत कम. नवल इसका अपवाद हैं.
मुक्तिबोध पर उनके समय के प्रगतिवादियों का आरोप था कि वे साहित्य में व्यक्तित्व की स्थापना का आग्रह कर व्यक्तिवाद का समर्थन कर रहे थे. नवल कहते हैं कि ‘मुक्तिबोध इस सत्य से अच्छी तरह परिचित थे कि व्यक्तित्वहीन व्यक्ति सत्वहीन होगा’.
वे आगे यह स्पष्ट करते हैं कि ‘व्यक्तित्व का, निजस्वता का और आंतरिकता का आग्रह व्यक्तिवाद का आग्रह नहीं है. मुक्तिबोध के व्यक्तित्ववाद को समाजवाद-विरोधी कवियों का व्यक्तिवाद समझना ग़लत है. संकीर्णतावादी प्रगतिशील दौर में व्यक्तित्व को समाज के विरोध में खड़ा कर दिया गया था. मुक्तिबोध दोनों में न केवल अनिवार्य विरोध नहीं मानते, बल्कि दोनों को एक-दूसरे का सहायक मानते हैं.’
मैंने कभी यह कहने की कोशिश की थी कि मुक्तिबोध की अज्ञेय से दूरी की तो पहचान की गई है पर इसकी नहीं कि वे नागार्जुन-त्रिलोचन की कविता से भी दूर थे.
नवल कहते हैं कि ‘मुक्तिबोध जैसे कविता के प्रगतिवादी ढांचे से असंतुष्ट थे वैसे ही उसके नई कविता वाले ढांचे से भी. नई कविता के आंदोलन में काम करते हुए भी उसके विरुद्ध उनका संघर्ष सुविदित है. काव्य-निर्माण में वे कवि-व्यक्तित्व को एक प्रमुख पात्र मानते थे, लेकिन वे व्यक्तिवाद के उग्र विरोधी थे. इसी तरह सौन्दर्य की प्यास उनमें बहुत तीव्र थी, लेकिन वे सौन्दर्यवाद के कायल न थे. वे हिंदी कविता में निम्न मध्यवर्ग के प्रतिनिधि थे और यह मानने को तैयार नहीं थे कि इस वर्ग में क्रांतिकारिता शेष नहीं रही.’ लेकिन इस वर्ग की अपने वर्ग से विश्वासघात करने की मनोवृत्ति को ‘मुक्तिबोध ने स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद की भारत में अवसरवाद की जो बाढ़ आई थी, उससे जोड़ा है.’
मुक्तिबोध के संत्रास को अस्तित्ववादी संत्रास से अलगाते हुए नवल कहते हैं कि ‘वह संत्रास है, जिसका स्वातंत्र्योत्तर भारत की बिगड़ी हुई सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से घनिष्ठ संबंध है’. वे यह भी अपने सजग विवेक से नोट करते हैं कि ‘इन स्थितियों का जैसा तीव्र बोध मुक्तिबोध में है, वैसा ग़ैर-प्रगतिशील कवियों में तो क्या, किसी अन्य प्रगतिशील कवि में भी दिखाई नहीं देता.’
हमारा समय धर्माक्रांत समय हो गया है. उसमें मुक्तिबोध की नवल-व्याख्या में यह जानना-समझना सम्यकता की ओर बढ़ने जैसा है.
नवल कहते हैं कि… कविता में आगे जाकर मुक्तिबोध धर्मों की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि हिंदू, बौद्ध और ईसाई इन सभी धर्मों ने सत्य का शीलहरण ही किया है. किसी धर्म ने मनुष्यता के सपने को साकार नहीं किया. ‘ओ काव्यात्मन् फणिधर’ शीर्षक अपनी एक दूसरी प्रसिद्ध कविता में उन्होंने कविता का उद्देश्य बतलाया है, वह रोशनी फैलाना, जिसमें लोग ब्रह्म के असली चेहरे को पहचान सकें. इस ब्रह्म की विशेषता यह है कि इसकी कृपा से धनी और धनी, ग़रीब और ग़रीब होते जाते हैं. दूसरे यह व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बनाकर उसे शेष विश्व से अलग कर देता है.’
नवल आगे जोड़ते हैं कि ‘एक अरूप शून्य के प्रति’ शीर्षक मुक्तिबोध की बहुत ही ज़ोरदार ईश्वर-विरोधी कविता है जिसमें उन्होंने अध्यात्मवाद को ध्वस्त कर मानववाद की स्थापना की है.’
मुझे मुक्तिबोध के अपेक्षाकृत अलक्षित दो विचार नवल के निबंधों में ही मिले. पहला: ‘कविता, एक संगीत को छोड़कर, अन्य सब कलाओं से अमूर्त है. वहां जीवन-यथार्थ केवल भाव बनकर प्रस्तुत होता है, या बिंब बनकर.’ दूसरा: ‘कविता के भीतर की सारी नाटकीयता वस्तुतः भावों की गतिमयता है. उसी प्रकार कविता के भीतर का कथा-तत्व भी भाव का इतिहास है.’
बंदिशों की दुनिया
यो तो इन दिनों दुनिया बंदिशों की दुनिया भी दुर्भाग्य से हो गई है और मुक्त व्यापार को छोड़कर हर क्षेत्र में आने-जाने पर तमाम तरह की बंदिशें लगाई जा रही हैं. हम जिन बंदिशों की बात करने जा रहे हैं वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इस्तेमाल की जाती हैं और उनकी संख्या हज़ारों में हैं.
वे हिंदी कविता की एक विधा नहीं हैं क्योंकि उनकी कविता के रूप में गिनती नहीं होती है: उन्हें रचा है उन संगीतकारों ने जिन्हें वाग्गेयकार कहा जाता है. वे साहित्य के क्षेत्र में नहीं, संगीत के क्षेत्र में रचनाकार रहे हैं.
बंदिशों को लेकर हाल ही में सत्यशील देशपांडे ने एक लंबी प्रस्तुति की जिसमें उन सभी बंदिशों को गाकर सुनाया-समझाया भी. वे कई रागों की, कई घरानों की गायकी की बंदिशें थीं. हमारे विशद शास्त्रीय संगीत के विस्तृत क्षेत्र में सत्यशील जैसा, कम से कम मेरे जाने, कोई और संगीतकार नहीं है जो बंदिशों की दास्तान और व्याख्या वैसे कह-कर सके जैसा वे कह-कर पाते हैं.
बंदिशों की दास्तान वे विनोदपूर्ण भाव से सुनाते हैं और उनसे जुड़े अनेक रोचक मानवीय प्रसंग भी बताते चलते हैं. निस्संकोच वे हमारे समय में बंदिशों के अप्रतिम दास्तानगो हैं.
उन्होंने बंदिशों के बारे में कई तथ्य भी बताए और कई स्थापनाएं भी कीं. कुमार गंधर्व के हवाले से उन्होंने बताया कि बंदिश में शब्द तो होते हैं पर ज़्यादा उपयोगी यह है कि उसमें एक स्थिति, एक सिचुएशन होती है जिसके इर्द-गिर्द संगीतकार अपनी प्रस्तुति रूपायित करता है. एक राग में कई बंदिशें होती हैं पर किसी भी बंदिश में पूरा राग नहीं समा पाता. हर बंदिश एक तरह से राग का एक अन्वेषण होती है, पर एकमात्र अन्वेषण नहीं.
कई बंदिशें अलग-अलग घरानों में अलग-अलग तरह से पेश की जाती है और उनसे अलग-अलग किस्म के भाव जागते हैं. बड़ा संगीतकार किसी भी बंदिश को अपने रंग में रंग देता है: सामान्य संगीतकार बंदिश के रंग में ही लिपटे रहते हैं.
सत्यशील बताते हैं कि बंदिशें रचे जाने के अनेक अवसर या प्रसंग होते आए हैं. कभी-कभार कोई बंदिशें स्पर्धा में रची गई है, कभी एक निजी संप्रेषण के लिए, कभी अवसर विशेष को मनाने के लिए. हम जैसे रसिकों को यह लगता रहा है कि कम से कम बड़े संगीतकारों के यहां संगीत का असली टेक्स्ट कुछ और होता है, बंदिश मात्र प्रीटेक्स्ट, एक बहाना. हर बंदिश की एक भावसीमा होती है- उस सीमा में सूक्ष्मता, सघनता, उत्कटता, रस आदि की अपार संभावनाएं.
यह नोट करना दिलचस्प है कि अधिकांश बंदिशें पहले की हैं- उनका रचा जाना मंद पड़ा है. इसलिए उनमें जो ‘घटना’ बंधी है वह पहले की है- बंदिश में दिए ब्योरे भी पहले के जीवन से होते हैं. शास्त्रीयता का कमाल और जादू इसमें है कि वह इन्हें समकालीन ऐंद्रियता से भर देती हैं और हमें वे हमें प्रासंगिक लगने लगती हैं. वहां अतीत व्यतीत या दूर का नहीं रहता, वर्तमान और पास का हो जाता है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
