उपभोक्ता आयोगों की हालत चिंताजनक: कानून में बदलाव से पहले व्यवस्था सुधारना जरूरी

देश में उपभोक्ता विवादों के त्वरित निपटारे के लिए बनी व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है. आयोगों में रिक्त पद, संसाधनों की कमी और लंबी देरी ने लोगों का भरोसा कमजोर किया है. ऐसे में सवाल है कि नए कानून लाने से पहले मौजूदा तंत्र को मजबूत क्यों नहीं किया जा रहा.

उपभोक्ता न्याय व्यवस्था में बढ़ती देरी, संसाधनों की कमी और जवाबदेही के संकट को दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर. (चित्रांकन: एआई)

कुछ समय पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने विशेष न्यायाधिकरणों को ‘जवाबदेही की कमी वाला क्षेत्र’ बताया था. उपभोक्ता आयोगों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. कानून कहता है कि उपभोक्ता विवादों का निपटारा तीन से पांच महीने में होना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि इनमें औसतन 600 दिन लग जाते हैं. देरी और आदेशों का पालन न होना अब सामान्य हो चुका है, और इसके लिए किसी तरह की जवाबदेही भी तय नहीं है.

उपभोक्ता न्याय की चार दशक पुरानी व्यवस्था आने से लेकर अब तक ई-कॉमर्स का विस्तार हुआ है, लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी है और बाजार छोटे शहरों और गांवों तक पहुंच गए हैं. आज उपभोक्ताओं को अपने आसपास, सरल और प्रभावी न्याय मंचों की जरूरत कहीं अधिक है.

ऐसे समय में सरकार ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019’ में संशोधन पर विचार कर रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या नए बदलावों से पहले मौजूदा व्यवस्था ठीक से काम कर रही है? इसका जवाब साफ है- नहीं.

हाल ही में जारी और सरकारी आंकड़ों पर आधारित ‘कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट’, बताती है कि देश का कोई भी राज्य उपभोक्ता कानून के सभी मानकों को पूरा नहीं करता. हर राज्य में राज्य आयोग है, लेकिन हर दस में से एक जिले में आज भी उपभोक्ता आयोग नहीं है. इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में लोगों के पास न्याय पाने का पहला मंच ही नहीं है.

दूसरी बड़ी समस्या है- रिक्त पद. हर राज्य और जिला आयोग में अध्यक्ष होना जरूरी है, लेकिन 2025 में 35 में से 17 राज्य आयोग बिना अध्यक्ष के चल रहे थे. गोवा और झारखंड में पांच वर्षों तक यह पद खाली रहा. जहां नियुक्तियां हुई भी हैं, वहां सदस्यों की नियमित उपस्थिति नहीं रही, जिससे मामलों की सुनवाई के लिए जरूरी संख्या पूरी नहीं हो पाती. इससे पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं.

नियुक्तियों पर लंबे समय से कानूनी विवाद भी इस स्थिति के जिम्मेदार हैं. नियमों पर असहमति के कारण मामला वर्षों से अदालतों में अटका है और आयोग अधूरी क्षमता से काम कर रहे हैं.

स्टाफ की कमी भी गंभीर समस्या है. 20 राज्यों में 20% प्रशासनिक पद खाली हैं. झारखंड में 14 कर्मचारियों के पद सृजित हैं तो राजस्थान में 130 पद. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में काफी कम पद हैं.

वित्तीय संसाधनों की कमी भी इस समस्या को बढ़ाती है. 2024-25 में देश की 75 फीसदी आबादी वाले 22 राज्यों में उपभोक्ता आयोगों का प्रति व्यक्ति औसतन खर्च केवल 2 रुपए था. ऐसे में यह उम्मीद करना अनुचित होगा कि उपभोक्ता आयोग पर्याप्त संसाधनों के साथ प्रभावी ढंग से काम कर पाएंगे.

इन सभी कमियों का असर साफ दिखता है. मामलों का निपटारा समय पर नहीं हो पाता, आदेशों का पालन नहीं होता और लोगों का भरोसा धीरे-धीरे कम होता जाता है. यही वजह है कि देश में उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ने के बावजूद राज्य आयोगों में दर्ज केस लगभग 2 लाख पर स्थिर बने हुए हैं. इसका मतलब यह नहीं कि विवाद कम हैं, बल्कि लोग इस व्यवस्था तक पहुंच नहीं पा रहे या उस पर भरोसा नहीं कर रहे.

‘केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण’ ने कुछ मामलों में कार्रवाई की है, लेकिन उसकी सक्रियता सीमित नजर आती है. इसी तरह लोक अदालतों के जरिए उपभोक्ता विवाद सुलझाने की व्यवस्था भी मौजूद है, लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है. राज्य आयोगों ने 2022 में 1463 केस लोक अदालतों को भेजे थे, लेकिन 2024 में ये केवल 446 रह गए.

असल समस्या सिर्फ ढांचे की नहीं है, बल्कि काम करने के तरीके की भी है. उपभोक्ता आयोगों को इसलिए बनाया गया था ताकि आम लोग आसानी से और कम खर्च में न्याय पा सकें, खासकर तब जब उनका सामना बड़ी कंपनियों से हो. लेकिन आज कुल केसों में से आधे केस तो लोगों के दैनिक जीवन से संबंधित बीमा, आवास और बैंकिंग से जुड़े हैं. ऐसे में धीरे-धीरे यह व्यवस्था भी जटिल होती जा रही है, जिससे आम लोगों के लिए इसे इस्तेमाल करना मुश्किल हो रहा है.

ऐसे में जरूरी है कि हम सुधार की शुरुआत बुनियादी स्तर से करें. सबसे पहले समय पर नियुक्तियां सुनिश्चित हों, ताकि आयोगों में पूरी बेंच के साथ काम हो. स्टाफ और बजट को काम के अनुसार तय हो. यह भी जरूरी है कि संसाधनों के इस्तेमाल पर जवाबदेही तय हो.

मध्यस्थता जैसी वैकल्पिक व्यवस्था को मजबूत करने से मामलों का जल्दी निपटारा हो सकेगा. पारदर्शी आंकड़े उपलब्ध होंगे तो समझा जा सकेगा कि व्यवस्था कहां कमजोर है. प्रक्रियाओं को भी सरल बनाने से अनावश्यक देरी और जटिलता कम होगी.

सबसे महत्वपूर्ण है कि समय-समय पर सर्वेक्षण करके उपभोक्ताओं के अनुभव को समझा जाए. इससे यह पता चलेगा कि लोग इस व्यवस्था से कितने संतुष्ट हैं और उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

इन सुधारों के फायदे केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं हैं. इससे बाजार में संतुलन आएगा, वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होगी और अदालतों पर बोझ भी कम होगा. सबसे अहम, इससे लोगों का कानून और व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा.

आखिरकार, कोई भी व्यवस्था तभी सफल होती है जब लोग उस पर भरोसा करते हैं. अगर यह भरोसा कमजोर हो जाए, तो कानून बदलने से कुछ हासिल नहीं होगा. इसलिए जरूरी है कि हम पहले व्यवस्था को ठीक करें, तभी किसी बड़े सुधार की बात करें.

(माया दारूवाला इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की मुख्य संपादक हैं.)