एक दिन इतिहास के किसी ‘शांत या अशांत ही कहिए वाले गलियारे’ में अचानक हलचल-सी मच गई. खबर थी कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आमने-सामने बैठकर बातचीत करने वाले हैं. स्थान नामित किया गया था- ‘राष्ट्रीय जवाबदेही सभागार’. नेहरू जी एक कुर्सी पर बैठे किताब पढ़ रहे थे. तभी मोदी जी अंदर आए.
‘नमस्कार जवाहरलाल जी.’
‘नमस्कार नरेंद्र मोदी जी. आपसे मिलकर खुशी हुई. वैसे पिछले बारह वर्षों में आपके भाषणों के माध्यम से हमारी मुलाकातें इतनी नियमित रही हैं कि अब यह औपचारिक परिचय अनावश्यक-सा लगता है.’ एहसास होता है कि ‘मेरा साया आपके साथ-साथ हमेशा रहता है.’
मोदी जी मुस्कुराए. ‘देखिए, मैं आपका नाम इसलिए लेता हूं क्योंकि देश की बहुत-सी समस्याओं की जड़ आपके समय में रखी गई थी.’
नेहरू जी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और बोले, ‘अच्छा! तो अब भी मैं राष्ट्रीय जीवन में इतना प्रभावशाली हूं? मुझे तो लगा था कि 1964 में मेरा कार्यकाल ही नहीं, मेरी जिंदगी भी समाप्त हो गई थी.’
‘प्रभाव तो आज भी है,’ मोदी जी ने कहा, ‘आपकी नीतियों की कीमत देश अब तक चुका रहा है.’
‘कमाल है,’ नेहरू जी हंसते हुए बोले, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं मृत्यु के छह दशक बाद भी किसी सरकार का सबसे सक्रिय प्रशासनिक अधिकारी बना रहूंगा.’
मोदी जी ने विषय बदलते हुए कहा, ‘आप मज़ाक कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि कई समस्याएं विरासत में मिली हैं.’
‘यह तो हर सरकार कहती है,’ नेहरू जी बोले, ‘लेकिन एक जिज्ञासा है. जब कोई युवा नौकरी मांगता है तो उसे नियुक्ति-पत्र मिलता है या मेरी जीवनी की एक प्रति?’
मोदी जी कुछ क्षण चुप रहे. ‘रोज़गार का प्रश्न जटिल है.’
‘बिल्कुल है,’ नेहरू जी ने कहा, ‘लेकिन यदि कोई मरीज डॉक्टर के पास जाए और डॉक्टर बारह साल तक यह समझाता रहे कि बीमारी की जड़ उसके दादा की जीवनशैली में थी, तो मरीज एक दिन पूछेगा- ‘डॉक्टर साहब, दादा-पुराण बिसारिये ये बताएं कि मेरा इलाज कब शुरू होगा?’
मोदी जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, ‘लगता है आपके पास हर सवाल का जवाब तैयार रहता है.’
नेहरू जी भी मुस्कुरा दिए. ‘नहीं, मेरे पास हर सवाल का जवाब नहीं होता था. बस एक सुविधा थी. मुझे चौबीसों घंटे, सातों दिन चुनाव नहीं लड़ना पड़ता था. शासन चलाने और चुनाव लड़ने के बीच थोड़ा-सा फर्क बचा हुआ था. इसलिए कभी-कभी देश के बारे में सोचने का समय भी मिल जाता था.’
मोदी जी कुछ क्षण चुप रहे. नेहरू जी ने आगे कहा, ‘जब हर सुबह अगला चुनाव सामने खड़ा दिखाई दे, तो हर सवाल राजनीतिक लगता है. लेकिन जब चुनाव कुछ दूर हो, तब कुछ सवाल राष्ट्रीय भी दिखाई देते हैं.’
दोनों हंस पड़े. कुछ देर बाद मोदी जी बोले, ‘देश जिन आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, उसके पीछे वैश्विक परिस्थितियां भी हैं.’
‘निस्संदेह,’ नेहरू जी ने सिर हिलाया, ‘लेकिन जब पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बढ़ते हैं तो जनता भुगतान वैश्विक परिस्थितियों को करती है या पेट्रोल पंप पर खड़े होकर मुझे याद करती है?’
‘दुनिया बदल चुकी है,’ मोदी जी ने कहा.
‘और जिम्मेदारियां भी,’ नेहरू जी ने उत्तर दिया. ‘इतिहास संदर्भ दे सकता है, समाधान नहीं.’
थोड़ी देर बाद नेहरू जी ने पूछा, ‘वैसे एक बात बताइए. आजकल कुछ टीवी चैनल मुझे देखकर बहुत भावुक हो जाते हैं.’
‘क्यों?’ मोदी जी ने पूछा.
‘क्योंकि मैं जितना अपने जीवनकाल में समाचारों में नहीं रहा, उससे कहीं अधिक आज हूं. कभी-कभी तो लगता है कि मैं इतिहास की पुस्तक का पात्र नहीं, प्राइम टाइम का या तो स्थायी विषयवस्तु हूं या फिर स्थायी पैनलिस्ट हूं.’
मोदी जी हंस पड़े. ‘मीडिया स्वतंत्र है.’
‘निश्चित रूप से,’ नेहरू जी ने कहा, ‘बस अंतर इतना है कि हमारे समय में पत्रकार सरकार से प्रश्न पूछकर ख्याति पाते थे, आजकल कई लोग सरकार से प्रश्न न पूछकर प्रसिद्ध हो जाते हैं.’
मोदी जी ने बातचीत को दूसरी दिशा में मोड़ते हुए कहा, ‘विपक्ष भी तो हर बात में सरकार को दोष देता है.’
‘लोकतंत्र में यही तो उसकी भूमिका है,’ नेहरू जी ने शांत स्वर में कहा. ‘विपक्ष का काम सवाल पूछना है और सरकार का काम उन सवालों का जवाब देना. लोकतंत्र इसी संवाद और जवाबदेही पर चलता है. मेरे समय में विपक्ष की संख्या बहुत कम थी, लेकिन मैं उनकी हर आलोचना को गंभीरता से सुनता था. कई बार बैठकों में नोट्स बनाता था, क्योंकि आलोचना केवल विरोध नहीं होती, वह शासन को बेहतर बनाने का अवसर भी देती है.
यदि सरकार हर सवाल को शत्रुता समझने लगे और विपक्ष हर बात को केवल आरोप का विषय बना दे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है. तब संसद विचार-विमर्श का मंच नहीं रह जाती, बल्कि शोर-शराबे का अखाड़ा बन जाती है. लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, कोलाहल से नहीं. यदि दोनों पक्ष केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहें, तो वह लोकतंत्र नहीं, टीवी डिबेट बन जाता है.’
कुछ देर की चुप्पी के बाद नेहरू जी गंभीर हुए.
‘देखिए मोदी जी, मैं यह नहीं कहता कि मुझसे गलतियां नहीं हुईं. अवश्य हुई होंगी. कोई भी नेता त्रुटिहीन नहीं होता. इतिहास की आलोचना होनी चाहिए. मेरी भी होनी चाहिए. लेकिन मैं केवल यह समझना चाहता हूं कि आखिर मेरी क्षमता की सीमा क्या है?’
‘क्या मतलब?’ मोदी जी ने पूछा.
नेहरू जी बोले, ‘यदि बेरोज़गारी का कारण मैं हूं, महंगाई का कारण मैं हूं, विपक्ष की आक्रामकता का कारण मैं हूं, संस्थाओं की कमजोरी का कारण मैं हूं, सामाजिक तनाव का कारण मैं हूं, तो फिर मुझे भारत का पहला प्रधानमंत्री नहीं, सर्वकालिक सुपर प्राइम मिनिस्टर घोषित कर देना चाहिए.’ करेंगे आप और आज के बाकी लोग?
मोदी जी हंसी रोक नहीं पाए.
नेहरू जी आगे बोले, ‘कभी-कभी मुझे डर लगता है कि कहीं मौसम विभाग भी यह घोषणा न कर दे कि इस वर्ष मानसून देर से आया क्योंकि 1957 में नेहरू ने इस आशय का कोई भाषण दे दिया था.’
अब दोनों खुलकर हंस रहे थे. बातचीत समाप्त होने लगी तो मोदी जी ने पूछा, ‘तो मुझको आपकी अंतिम सलाह क्या है?’
नेहरू जी ने शांत स्वर में कहा, ‘इतिहास को पढ़िए, उसकी आलोचना कीजिए, उससे सीखिए भी. लेकिन वर्तमान की समस्याओं का समाधान इतिहास के कब्रिस्तान में नहीं मिलेगा. बेरोज़गार युवा को नौकरी चाहिए, इतिहास का अभियुक्त नहीं. महंगाई से परेशान परिवार को राहत चाहिए, सत्तर साल पुरानी बहस नहीं.’
मोदी जी कुछ सोचते हुए बैठे रहे.
नेहरू जी उठे, अपनी किताब हाथ में ली और जाते-जाते मुस्कुराकर बोले, ‘वैसे एक बात के लिए मैं आपका आभारी हूं. मेरे तब के राजनीतिक विरोधियों ने या मेरे अपने दल के लोगों ने भी मुझे उतना याद नहीं रखा जितना आपने रखा है. मैं बासठ साल से इस दुनिया में नहीं हूं, फिर भी आपके हर चुनाव में मौजूद रहता हूं, हर विधायी बहस में शामिल रहता हूं और हर समस्या का संदिग्ध अभियुक्त बना रहता हूं. विश्व-लोकतंत्र के इतिहास में शायद ही किसी पूर्व प्रधानमंत्री को इतनी लंबी सेवा-अवधि मिली हो.’
यह कहकर नेहरू जी उठे और धीरे-धीरे सभागार के लंबे गलियारे में आगे बढ़ गए. मोदी जी कुछ क्षण वहीं बैठे रहे. उनकी निगाहें उस जाती हुई आकृति का पीछा करती रहीं, जो इतिहास के किसी धुंधले पन्ने में विलीन होती जा रही थी.
सभागार में फिर वही सन्नाटा लौट आया. न कोई नारा था, न कोई भाषण, न कोई कैमरा. केवल दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी.
और तभी लगा मानो वह घड़ी धीरे से फुसफुसाई हो- ‘इतिहास महत्वपूर्ण है. उससे प्रेरणा ली जा सकती है, उससे बहस की जा सकती है, उससे असहमति भी रखी जा सकती है. लेकिन वर्तमान की जिम्मेदारी हमेशा वर्तमान की ही होती है. बीते हुए समय को कठघरे में खड़ा करके आज के सवालों से हमेशा नहीं बचा जा सकता. आखिरकार जनता अपना फैसला इतिहास की किताबें पढ़कर नहीं, अपने वर्तमान का हिसाब देखकर करती है.’
घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती रहीं. समय, हमेशा की तरह, किसी का इंतज़ार नहीं कर रहा था.
(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)
(मूल रूप से एक्स पर प्रकाशित)
