अरुणाचल प्रदेश: सीएम खांडू के ख़िलाफ़ सीबीआई जांच के बीच उनके पद पर बने रहने के बचाव में भाजपा

सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के रिश्तेदारों के स्वामित्व वाली कंपनियों को सरकारी ठेके देने के आरोपों की सीबीआई जांच का आदेश दिया है. कांग्रेस उनके इस्तीफ़े की मांग कर रही है. अब अरुणाचल प्रदेश के भाजपा नेताओं ने कहा कि पार्टी उनके साथ खड़ी है और नेतृत्व में बदलाव का सवाल ही नहीं उठता. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की सीबीआई जांच का आदेश दिए जाने के बाद उनके इस्तीफे की बढ़ती मांगों के बीच, राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं ने खांडू का बचाव किया है. उन्होंने कहा है कि पार्टी उनके साथ खड़ी है नेतृत्व में बदलाव का सवाल ही नहीं उठता.

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश भाजपा के प्रमुख कालिंग मोयोंग ने कहा है कि पार्टी ‘न्यायिक प्रक्रिया का पूरी तरह सम्मान करेगी’ और जांच पूरी होने तक कोई फैसला नहीं लेगी.

उन्होंने कहा, ‘अगर सुप्रीम कोर्ट मुख्यमंत्री के खिलाफ फैसला देता है, तो पार्टी उचित निर्णय लेगी. लेकिन अभी नहीं, क्योंकि जांच अभी जारी है.’

बता दें कि बीते 6 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री पेमा खांडू के रिश्तेदारों के स्वामित्व वाली कंपनियों को सार्वजनिक ठेके देने के आरोपों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को प्रारंभिक जांच का आदेश दिया है. सीबीआई को 1 जनवरी, 2015 से 31 दिसंबर, 2025 के बीच दिए गए ठेकों की जांच करने का निर्देश दिया गया है.

यह आदेश सेव मोन रीजन फेडरेशन और वॉलंटरी अरुणाचल सेना नामक दो संगठनों द्वारा दायर याचिका पर पारित किया था, जिन्होंने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री के परिजनों को 1,270 करोड़ रुपये के ठेके दिए गए थे.

6 अप्रैल को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य और उसकी संस्थाएं किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक पदाधिकारी की ‘मनमर्जी’ के अनुसार लाभ नहीं बांट सकतीं. पीठ ने कहा कि यह मामला ‘स्वतंत्र जांच’ की मांग करता है.

अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक खरीद प्रणाली की निष्पक्षता और सर्वोच्च स्तर पर हितों के टकराव के आरोपों से जुड़े मामलों में जांच ‘सिर्फ निष्पक्ष होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी देनी चाहिए.’

भाजपा के पिछले रुख़ के उलट

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कांग्रेस ने खांडू के इस्तीफे की मांग की और यह भी पूछा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं.

खांडू का पद पर बने रहना भाजपा के उस रुख के भी विपरीत है जो उसने भ्रष्टाचार के मामले में अपनाया था – खासकर तब, जब पिछले साल 20 अगस्त को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में ‘संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025’, ‘केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025’ और ‘जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025’ पेश किए थे.

विपक्ष ने जिन तीन विधेयकों का विरोध किया था, उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेज दिया गया है.

अगर यह संवैधानिक संशोधन बिल पास हो जाता है, तो इससे केंद्र सरकार को अतिरिक्त शक्तियां मिल जाएंगी. इन शक्तियों के तहत अगर कोई मुख्यमंत्री या उनके मंत्रिमंडल का कोई सदस्य 30 दिनों तक जेल में बंद रहता है – भले ही उसे अभी तक दोषी न ठहराया गया हो – तो केंद्र सरकार उसे पद से हटा सकती है.

इन बिलों को पेश किए जाने के तुरंत बाद लोकसभा में विपक्षी सदस्यों ने इस कानून का विरोध किया था. उन्होंने कहा कि ये बिल एक ‘पुलिस राज’ का रास्ता खोलते हैं, कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन करते हैं, राजनीतिक दुरुपयोग के दरवाज़े खोलते हैं और उन राज्यों को निशाना बनाते हैं जहां विपक्ष की सरकारें हैं.

विधेयकों के उद्देश्यों और कारणों के विवरण में एक जैसे कहा गया है: ‘कोई मंत्री, जिस पर गंभीर आपराधिक अपराधों के आरोप लगे हों, जिसे गिरफ़्तार किया गया हो और हिरासत में रखा गया हो, वह संवैधानिक नैतिकता के मानदंडों और सुशासन के सिद्धांतों को बाधित या अवरुद्ध कर सकता है, और अंततः लोगों द्वारा उस पर जताए गए संवैधानिक विश्वास को कम कर सकता है.’

ऐसे नाज़ुक मोड़ पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद खांडू को भाजपा का समर्थन, भ्रष्टाचार के खिलाफ उसके अपने रुख में दोहरेपन पर सवाल खड़े करता है – खासकर तब, जब भ्रष्टाचार के ये आरोप उसके अपने ही पार्टी सदस्य और मौजूदा मुख्यमंत्री पर लगे हैं.