यूपी: पुल गिरने से मारे गए मज़दूर के परिजनों ने सुनाई आपबीती- ‘पूरी रात बॉडी दबी रही’

बीते सप्ताह हमीरपुर में बेतवा नदी पर बन रहे निर्माणाधीन पुल के गिरने से छह श्रमिकों की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद पीड़ित परिजनों ने साइट पर काम करने की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठाए हैं. वे पूछ रहे हैं कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की चेतावनी के बावजूद मज़दूरों से रात की पाली में काम करने को क्यों कहा गया. इसके अलावा घटना के बाद बचाव कार्यों में हुई देरी के आरोप भी सामने आए हैं.

मृतक तीस वर्षीय गंगाचरण यादव का परिवार. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

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ये बातें उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के चिल्ला गांव के निवासी राम मूरत ने कहीं. मूरत के 22 वर्षीय भतीजे लोकेंद्र निषाद, उन छह मृतकों में से एक हैं, जिनका शव 29 मई को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में बेतवा नदी पर एक निर्माणाधीन पुल के ढह जाने के बाद बरामद किया गया था.

लोकेंद्र कुछ दिन पहले ही इस साइट पर एक कंस्ट्रक्शन वर्कर के तौर पर काम पर लगे थे. वह पिछले पांच सालों से दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर काम कर रहे थे, और हाल के दिनों में उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट्स के ज़रिए काम के ज़्यादा नियमित मौके मिले थे.

इस घटना के एक दिन बाद द वायर से फोन पर बात करते हुए मूरत ने कहा, ‘यह मुद्दा उठना चाहिए.’

मूरत यहां जिस मुद्दे का ज़िक्र कर रहे थे, उसमें मृतकों के परिवार वालों के कई आरोप शामिल हैं. ये आरोप काम करने की परिस्थितियों से जुड़े हैं, जैसे कि कंस्ट्रक्शन मज़दूरों को रात की शिफ़्ट में काम जारी रखने के लिए कहना- जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने पूरे राज्य में तूफ़ान आने की चेतावनी दी थी. इसके अलावा घटना सामने आने के बाद बचाव कार्यों में हुई देरी के आरोप भी सामने आए हैं.

उल्लेखनीय है कि 28-29 मई की दरमियानी रात को पुल गिरने के कारण जिन लोगों की जान गई, उनमें कुलदीप निषाद (चिल्ला गांव, बांदा), लोकेंद्र निषाद (चिल्ला गांव, बांदा), सावंत यादव उर्फ ​​गंगाचरण यादव (भूरागढ़ गांव, बांदा), सभाजीत यादव (भूरागढ़ गांव, बांदा), पुष्पेंद्र सिंह चौहान (स्वासा खुर्द गांव, हमीरपुर) और राजेश पाल (अच्छपुरा गांव, हमीरपुर) शामिल थे.

द वायर ने बांदा और हमीरपुर में तीन पीड़ित परिवारों से बात की, जिससे यह पता लगाया जा सके कि शटरिंग के काम के दौरान पुल का एक खंभा गिरने के बाद असल में क्या हुआ था.

यहां शटरिंग या फॉर्मवर्क का मतलब है लोहे की छड़ों और लकड़ी के खंभों का इस्तेमाल करके एक अस्थायी ढांचा बनाना, जिसमें कंक्रीट सामग्री को डाला जाता है ताकि वह छत या दीवार का आकार लेकर जम जाए.

‘क्या होता अगर ऐसा पुल पूरी तरह से बन चुका होता?’

29 मई को सुबह करीब 5 बजे मूरत को हमीरपुर के मोरा कंदर गांव में पुल गिरने की खबर मिली; यह जगह बांदा में उनके अपने गांव चिल्ला से करीब 260 किलोमीटर दूर है.

मूरत ने बताया, ‘हमारे गांव का एक लड़का कंस्ट्रक्शन साइट पर मौजूद था, जब उसे पता चला कि मलबे में फंसे लोगों में लोकेश भी है, तो उसने हमें फोन किया.’

चार घंटे बाद सुबह 9 बजे जब मूरत और लोकेंद्र के पिता राधे श्याम निषाद हमीरपुर पहुंचे, तो उन्हें शुरू में दुर्घटनास्थल के पास जाने से रोक दिया गया और फिर उन्हें तुरंत पोस्टमॉर्टम हाउस जाने के लिए कहा गया.

मूरत से जब पूछा गया कि 29 मई की देर रात 12:30 से 1 बजे के बीच पुल गिरने के बाद राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) की टीम को बचाव अभियान शुरू करने में कितना समय लगा, तो उन्होंने जवाब में कहा, ‘शव को सुबह ही निकाला जा सका.’

मूरत ने बताया कि पूरी रात शव मलबे के नीचे दबा पड़ा रहा. साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि जब इस तरह की कोई दुखद घटना घटती है, और बचाव दल इतनी देर से पहुंचता है, तो इसका क्या फायदा है?

मोरा कांदर गांव के सरपंच बदलू निषाद उन पहले लोगों में से थे जो घटना के बाद स्थानीय पुलिस के साथ मौके पर पहुंचे.

बदलू निषाद ने द वायर को बताया, ‘मुझे और पास के लालपुरा थाने के प्रभारी (एसएचओ) को रात करीब 1:30 बजे मौके पर पहुंचने में एक घंटा लग गया, क्योंकि सड़क की हालत बहुत खराब थी. जालौन ज़िले की उरई तहसील और कानपुर से बचाव दल सुबह करीब 5-6 बजे पहुंचे.

मालूम हो कि उरई और कानपुर, दोनों ही हमीरपुर से लगभग डेढ़ घंटे की दूरी पर हैं; इनकी दूरी क्रमशः 83 किमी और 62 किमी है.

इस संबंध में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता और उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद बाबूराम निषाद के भाई बदलू निषाद ने स्थानीय पुलिस टीम और एसडीआरएफ दस्ते का बचाव किया.

बदलू निषाद ने कहा, ‘बचाव टीम ने शुरू में उन लोगों पर ध्यान दिया जो अभी भी ज़िंदा थे और एक खंभे के ऊपर फंसे हुए थे. इसलिए यह ऑपरेशन सुबह 8 बजे तक यानी तीन घंटे तक चला. इसके बाद शवों को निकालने के लिए कटर मशीनें लाई गईं. पुलिस और बचाव दल दोनों ही टीमों ने सराहनीय काम किया है.’

हालांकि, पीड़ितों के परिजन इस बात से सहमत नहीं नज़र आते.

मूरत ने कहा, ‘सेतु निगम की तरफ से बहुत बड़ी चूक हुई लगती है, जिसकी जांच होनी चाहिए. आज यह घटना हुई है; ज़रा सोचिए, अगर यह पुल बन गया होता, तो कितने और लोगों की जान चली जाती.’

‘देरी होना स्वाभाविक है’: भाजपा सांसद बाबूराम निषाद

29 मई को हमीरपुर के कुरारा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में कंस्ट्रक्शन कंपनी M/s The Shelter के साथ-साथ उसके मालिक विजय प्रताप सिंह और प्रोजेक्ट सुपरवाइज़र नीतीश सचान पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 106(1) और 125(a) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

ज्ञात हो कि बीएनएस की धारा 106(1) लापरवाही के कारण किसी की मौत होने पर सज़ा से संबंधित है, वहीं धारा 125(a) किसी ऐसे अपराध से संबंधित है जिससे इंसानी जान या दूसरों की निजी सुरक्षा को खतरा पैदा होता हो.

इस एफआईआर की एक कॉपी ‘द वायर’ ने देखी है—इसमें कहा गया है, ’28-29 मई की दरमियानी रात को तूफ़ान और तेज़ हवाओं के कारण निर्माणाधीन खंभे (P-5 से P-6) ढह गए, जिसके परिणामस्वरूप छह लोगों की मौत हो गई.’

सांसद बाबूराम निषाद ने देरी के दावों को खारिज करते हुए कहा कि यह देरी ‘स्वाभाविक’ है, क्योंकि ‘यह घटना रात में हुई थी.’

भाजपा सांसद बाबूराम निषाद ने फोन पर द वायर को बताया, ‘इसमें कोई देरी नहीं हुई, उस रात मौसम सच में बहुत खराब था. आपको थोड़ी समझदारी से सोचना चाहिए कि एसडीआरएफ टीम तभी कार्रवाई करेगी, जब स्थानीय प्रशासन और एसएचओ की तरफ से उन्हें जानकारी दी जाएगी. यह देखते हुए कि यह घटना रात में हुई थी, इसमें थोड़ी देरी होना तो स्वाभाविक ही है.’

जब उनसे पूछा गया कि क्या एनडीएमए की आंधी-तूफान की चेतावनी के बावजूद मज़दूरों का रात की शिफ्ट में काम जारी रखना लापरवाही माना जाएगा, तो राज्यसभा सांसद ने कहा, ‘यह एक समयसीमा वाला प्रोजेक्ट था और इसमें रात की शिफ्ट में काम किया जाता था, क्योंकि पुल को एक तय समय के अंदर पूरा करना था. इसलिए, इसकी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही ठेकेदार की है.’

हमीरपुर के ज़िलाधिकारी अभिषेक गोयल को किए गए फोन का कोई जवाब नहीं मिला. द वायर ने पुलिस अधीक्षक मृगांक शेखर से बात करने की कोशिश की, लेकिन बताया गया कि वे एक मीटिंग में व्यस्त थे.

इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की. दैनिक भास्कर ने बताया है कि राज्य सरकार ने मृतकों के परिवारों को 4 लाख रुपये प्रति परिवार की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है.

‘खराब क्वालिटी का मटीरियल इस्तेमाल किया जा रहा था’

36 साल के पुष्पेंद्र सिंह 2024 से पुल बनाने वाली जगह पर सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर काम कर रहे थे. हादसे वाले दिन वह दूसरे मज़दूरों को बचाने के लिए एक हाइड्रा क्रेन पर चढ़ गए थे, तभी खंभे का सारा कंक्रीट मटीरियल उन पर गिर गया.

उनके छोटे भाई रवींद्र सिंह चौहान नोएडा की एक निजी कंपनी में काम करते हैं.

रवींद्र ने द वायर को बताया, ‘निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा था. क्या आपने कभी सुना है कि तेज हवा और तूफान के कारण पुल गिर सकता है?’

राज्य सरकार द्वारा जांच के आदेश दिए जाने के बावजूद रवींद्र के मन में अब भी यह सवाल है कि आने वाले तूफान की चेतावनी के बावजूद साइट पर काम कर रहे मजदूरों को क्यों नहीं निकाला गया.

रवींद्र ने कहा, ‘उसे (पुष्पेंद्र का जिक्र करते हुए) अन्य गार्ड्स की तरह उचित सुरक्षा केबिन भी नहीं मिला था.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कंपनी की ओर से जो भी जिम्मेदार हैं, वे सब मौके से भाग गए. सिर्फ सुरक्षा गार्ड ही उस अफरातफरी में फंसे. यह कंपनी की बहुत बड़ी गलती है. अगर बचाव अभियान रात में ही शुरू हो जाता, तो शायद एक-दो और जानें बचाई जा सकती थीं.’

तीस साल के गंगाचरण यादव घटना से दो-तीन दिन पहले ही कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने गए थे.

गंगाचरण के एक रिश्तेदार दीपक यादव ने बताया, ‘उन्होंने हाल ही में खेती-बाड़ी का काम खत्म किया था, इसलिए उन्हें लगा कि वहां जाने से उन्हें कुछ अतिरिक्त पैसे कमाने में मदद मिलेगी.’

गंगाचरण के परिवार में उनके माता-पिता और छोटा भाई हैं.

सुरक्षा गार्ड्स समेत इनमें से अधिकतर कामगारों को बारह घंटे की शिफ्ट के लिए 9,000-10,000 रुपये प्रति माह मिलते थे.

मूरत ने द वायर को बताया, ‘इस इलाके में कोई और रोजगार नहीं हैं. वह मज़दूरी करने गया था, उसका जीवन ही खत्म हो गया.’

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