ज्ञान का विउपनिवेशीकरण: ज्ञान अपर्याप्त और शाश्वत होने को अभिशप्त है

कभी कभार | अशोक वाजपेयी: हमारे यहां हुए विउपनिवेशीकरण के अध्ययन में उपनिवेशवाद के भाषाई साम्राज्य का विश्लेषण बहुत कम है. सारी उत्तर-आधुनिकता के बावजूद पश्चिम अपने विचारों को सारे संसार में मनवाने में सफल हुआ है. विडंबना यह है कि हिंदुत्व के नाम पर जो राजनीतिक विचारधारा आज परंपरा के पुनर्वास और भारतीय आत्मबोध के नवजागरण का दावा कर रही है वह अपनी समझ में पूरी तरह औपनिवेशिक है.

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'सातत्य और संवर्द्धन के रहते भारतीय ज्ञान के संपूर्ण होने का दावा किया तो जा सकता है और उसकी शाश्वतता का आग्रह भी किया जा सकता है पर सारे ज्ञान, कहीं के भी ज्ञान की अपर्याप्तता ही शाश्वत हो सकती है.' (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

पिछले दिनों ‘ज्ञानोत्पादन के विउपनिवेशीकरण’ पर अभय कुमार दुबे के संयोजन में तीन दिनों का एक बहुत विचारोत्तेजक परिसंवाद हुआ, जिसमें अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों और युवा अध्येताओं ने भाग लिया. अवसर था रज़ा फाउंडेशन के एक नए प्रोजेक्ट ‘उन्मोचन’ के अंतर्गत पांच पुस्तकों के प्रकाशन का, जिनमें ‘भारत की सारस्वत साधना’ (राधावल्लभ त्रिपाठी), ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ (बलराम शुक्ल), ‘उपनिवेशवाद का अलौकिक साम्राज्यवाद’ (अभय कुमार दुबे), ‘अनागत गांधी’ (अम्बिकादत्त शर्मा, विश्वनाथ मिश्र) और ‘हन्ना आरेंट’ (अम्बिका दत्त शर्मा, विश्वनाथ मिश्र), सभी वाणी प्रकाशन से प्रकाशित, शामिल थीं. सारी चर्चा इन पुस्तकों के इर्दगिर्द पर व्यापक रूप से हुई.

परिसंवाद में राधावल्लभ त्रिपाठी, ब्रजेन्द्र पाण्डे, नंद किशोर आचार्य, अम्बिकादत्त शर्मा, पुरुषोत्तम अग्रवाल, राज कुमार, मणीन्द्र ठाकुर, बलराम शुक्ल, उदयन वाजपेयी, रमण सिन्हा, गिरीश्वर मिश्र, राजन, कमल नयन चौबे, आलोक टण्डन, आकांक्षा बरनवाल आदि ने भाग लिया. तीन दिनों और लगभग बीस घंटोंों में फैली चर्चाएं लगातार सघन-प्रश्नाकुल-विचारोत्तेजक बनी रहीं. मुझे याद नहीं आता कि ऐसी बौद्धिक बातचीत हिंदी में ऐसे विषयों पर मैंने पहले कभी सुनी हो.

पूरी चर्चा पुस्तकाकार प्रकाशित की जाएगी और वह इतनी विविधवर्णी थी कि उसका सार-संक्षेप प्रस्तुत करना कठिन है. उससे यह प्रगट हुआ कि हिंदी की बौद्धिक क्षमता और प्रतिभा क्षीण या मलिन नहीं है: उसे अपने प्रकाशन के लिए उपयुक्त अवसर चाहिए.

आयोजन के आरंभ और समापन पर कुछ बातें कहने का सुयोग हुआ. इस ओर इशारा करना ज़रूरी लगा कि यह ज्ञानधर्मी चर्चा हमारे बौद्धिक-सांस्कृतिक जीवन के किस मुक़ाम पर हो रही है. इन दिनों, संकीर्णता-झूठ-घृणा-हिंसा आदि को पोसने-बढ़ाने वाले निज़ाम के निर्देशों पर देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों पर भारतीय ज्ञान परंपरा का संकीर्ण सीमित हिंदुत्ववादी संस्करण पेश किया और फैलाया जा रहा है.

व्यापक समाज में ज्ञान का लगभग हर दिन सार्वजनिक रूप से अपमान होता है: शिखर से लेकर गली-कूचों के राजनेता-धर्मनेता, मीडिया आदि ज्ञान की इस व्यापक अवमानना में लगे हुए हैं. सुनियोजित ढंग से विस्मृति फैलाई जा रही है और अनेक दुर्व्‍याख्याएं या अपढ़ व्याख्याएं अनेक मंचों पर आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत की और व्यापक की जा रही हैं. ज्ञान का दुर्वियोजन असत्य-घृणा-भेदभाव फैलाने के लिए किया जा रहा है. ज्ञान की सुपरिचित जगहें, जैसे विश्वविद्यालयों में, छेंकी, बाधित, अलभ्‍य बनाई जा रही हैं.

भारत में ज्ञानोत्पादन बेहद क्षीण और मंद हो गया है. यह सवाल भी उठता है कि जब ज्ञान की अवमानना और अज्ञान का महिमामंडन हो रहा है तो इसका प्रतिरोध अधिकांश ज्ञानी क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

भारतीय ज्ञान परंपरा के तीनों शब्द विवादास्पद हैं इन दिनों. कौन-सा भारत, उदार-बहुल, प्रश्नवाचकता-संवाद-विवाद-असहमतियों और समावेश से बना भारत, अनेक भाषाओं-धर्मों-भोजनों-वेशभूषाओं-रीति-रिवाज़ों से गढ़ा गया भारत या संकीर्ण, एकनिष्ठ, एकतान, धर्मविशेष के वर्चस्व का भारत? किस ज्ञानबल से संकीर्ण धर्मांध भारत ने उदार-व्यापक बहुल भारत का कब्ज़ा कर लिया है?

ज्ञान में शास्त्र-चिंतन के अलावा लोकज्ञान या विद्या भी समाहित है या नहीं? क्या साहित्य-कलाओं-भाषाओं में अंतर्भूत ज्ञान भी शामिल है? क्या अनेक धर्म चिंतनों, दर्शनों में समाया ज्ञान भी और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ भी? क्या शुद्ध ज्ञान के साथ-साथ और उसके अलावा कुछ मटमैला ज्ञान भी है? क्या ज्ञान में आत्मालोचन है? इन दिनों ज्ञान हमें निर्भय क्यों नहीं बना पा रहा है?

क्या भारतीय ज्ञान में मुगलकालीन मिनिएचर चित्रकला और उसका सौंदर्य-चिंतन, हिंदुस्तानी संगीत में ख़याल गायकी के शास्त्रविचार आदि की जगह है? परंपरा भी भारत में बहुल हैं: अनेक परंपराएं हैं. हमारे समय में परंपरा को निरे अनुष्ठान या तमाशे में तब्दील करने का कोई प्रतिरोध है?

इन सब पर विस्तार से विचार-विमर्श करने का यह पहला उपक्रम था और आगे ऐसे कई परिसंवाद होंगे. इस संवाद में दरारों और फांकों का, विपथगामिता और विद्रूपों का उल्लेख या विवेचन प्रायः नहीं हुआ. इस पर भी विचार नहीं हो पाया कि अगर यह ज्ञान-पंरपरा अब भी सजीव-सक्रिय है तो उसका समकालीन बौद्धिक जगत् और सृजन-समुदाय से इतनी दूरी या अलगाव क्यों है?

यह भी पता नहीं चला कि जब औपनिवेशक सत्ता भारतीय बुद्धि और चित्त को निर्णायक रूप से बदलने और वहां से पारंपरिक ज्ञान को अपदस्थ कर रही थी तो यह ज्ञान इस हस्तक्षेप के प्रति कितना और कैसे सजग था. संस्कृत के अलावा भारतीय भाषाओं में जो ज्ञान परंपराएं वे इस ज्ञान में कैसे हिस्सेदार हैं और उनका समावेश किस तरह से हो?

विउपनिवेशीकरण का जो अध्ययन और अन्वेषण हमारे यहां हुआ है, उसमें उपनिवेशवाद के भाषाई साम्राज्य का, जिसे अभय कुमार दुबे ने, ‘अलौकिक’ बताया है, एहतराम और विश्लेषण बहुत कम है. सारी उत्तर-आधुनिकता के बावजूद और उसमें संस्कृतियों और विचारों की बहुलता के स्वीकार के रहते, पश्चिम अपने मूल्यों और विचारों को सारे संसार में सार्वभौमिक मूल्य और विचार मनवाने में सफल हुआ है.

विडंबना यह है कि हिंदुत्व के नाम पर जो राजनीतिक विचारधारा आज परंपरा के पुनर्वास और भारतीय आत्मबोध के नवजागरण का दावा कर रही है वह अपनी समझ और मानसिकता में, अपनी युक्तियों और पूर्वाग्रहों में पूरी तरह औपनिवेशिक है.

मुझे यह कहना ज़रूरी लगा कि सातत्य और संवर्द्धन के रहते भारतीय ज्ञान के संपूर्ण होने का दावा किया तो जा सकता है और उसकी शाश्वतता का आग्रह भी किया जा सकता है पर सारे ज्ञान, कहीं के भी ज्ञान की अपर्याप्तता ही शाश्वत हो सकती है: ज्ञान अपर्याप्त और शाश्वत होने को अभिशप्त है और वही उसका मर्म और सौंदर्य है.

भाषा और चाटुकारिता

अपने सामान्यीकरण करने के पहले यह बताना ज़रूरी है कि मेरे प्रशासनिक जीवन का बड़ा हिस्सा शिक्षा विभाग में उपसचिव, फिर विशेष सचिव उच्च शिक्षा, लोक शिक्षण संचालक, शिक्षा सचिव, विज्ञान और टेक्नोलॉजी सचिव और अंततः एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति के रूप में बीता है. मेरी यह धारणा बनी है कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जो विभाग और अध्यापक सत्ता से नज़दीकी पाते और उसकी चाटुकारिता करते हैं वे अधिकांशतः हिंदी और संस्कृत विभाग के होते हैं.

उर्दू कथाकार ने ख़ालिद जावेद ने एक बार सार्वजनिक रूप से इस सूची में उर्दू विभाग को भी शामिल करने का आग्रह किया, अपने अनुभव के आधार पर.

ऐसी स्थिति में यह याद करने की ज़रूरत है कि भले वे अपवाद थे पर थे कि हिंदी विभागों में स्वतंत्रचेता निर्भीक स्वाभिमानी अध्यापक जैसे श्यामसुन्दर दास, केशव प्रसाद मिश्र, रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, धीरेन्द्र वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी, रघुवंश जगदीश गुप्त, नलिन विलोचन शर्मा, नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डे, अजित कुमार, शिव कुमार मिश्र, रामदरश मिश्र, कैलाश वाजपेयी, नंद किशोर नवल, अपूर्वानंद आदि के अलावा अनेक युवा अध्यापक रहे हैं और हैं जो चाटुकारिता और सत्ताभक्ति से मुक्त साहित्य और भाषा की आसक्ति के लोग हैं. यह सूची निश्चय ही तीन-चार गुना लंबी है. पर है वह विशाल हिंदी अध्यापक संख्या में अल्पसंख्यक ही.

अपने अद्भुत स्कूल अध्यापक लक्ष्मीधर आचार्य के उदाहरण से लगता है कि स्कूली अध्यापकों में ऐसी चाटुकारिता से मुक्त अध्यापकों की संख्या बहुत बड़ी होती होगी पर, फिर भी, दुर्भाग्य से, अल्पसंख्यक.

भाषा और मुक्ति, अभिव्यक्ति, विचारशीलता, सर्जनात्मकता आदि पर काफ़ी विचार और विश्लेषण हुआ है. पर अगर भाषा और चाटुकारिता में इतना व्यापक स्तर पर संबंध है तो इस पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए. इस समय हिंदी अंचल में हिंदुत्व द्वारा पोषित-प्रोत्साहित झगड़ालू-नफ़रती-हिंसक-झूठों से लबालब-स्मृतिहीन भाषा की इतनी लोकप्रियता और बढ़त है उनके रहते ऐसा विचार और ज़रूरी हो जाता है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)