संभल हिंसा: 22 आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर हाईकोर्ट की रोक

साल 2024 में संभल के शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान हुई हिंसा के मामले में आरोपी 22 लोगों के ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है. इससे पहले 13 मई 2026 को इसी तरह के एक मामले में चार अन्य आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रही कार्यवाही पर अदालत ने रोक लगा दी थी.

संभल का शाही जामा मस्जिद (फोटो: श्रुति शर्मा/द वायर हिंदी)

नई दिल्ली: वर्ष 2024 के नवंबर में संभल की शाही जामा मस्जिद का अदालत के आदेश पर कराए गए सर्वेक्षण के दौरान हुई हिंसा के मामले में आरोपी 22 लोगों के ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है.

यह भी सामने आया कि हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने 13 मई 2026 को इसी तरह के एक मामले में चार अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी थी.

मुगलकालीन शाही जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि इसे हरिहर मंदिर नामक पूजास्थल को तोड़ कर बनाया गया था. इसी कड़ी में 19 नवंबर 2024 को संभल की एक लोकल अदालत में याचिका दाख़िल की और याचिका पर उसी दिन सुनवाई भी हो गई. साथ ही मस्जिद के सर्वेक्षण का आदेश भी पारित कर दिया गया और उसी शाम एएसआई की टीम सर्वेक्षण के लिए भी पहुंची. 19 तारीख़ का सर्वेक्षण शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गया. 

मगर जब 24 नवंबर 2024 को एएसआई की टीम पुनः सर्वेक्षण के लिए पहुंची, और इस दौरान हिंसा भड़क गई. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, जिसमें 5 आम लोगों की जान चली गई. 

घटना के बाद एक पुलिस एसआई ने कोतवाली थाने में दंगा भड़काने और हिंसा समेत विभिन्न आरोपों में कई लोगों के खिलाफ एफआईआर  दर्ज कराई.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी सुब्हान और 21 अन्य लोगों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस वाणी रंजन अग्रवाल ने राज्य सरकार और अन्य पक्षकारों को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की.

याचिकाकर्ताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 (हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां) के तहत हाईकोर्ट का रुख किया था. उन्होंने संभल जिले के कोतवाली थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की रोकथाम अधिनियम और आर्म्स अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर से संबंधित पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी.

आरोपियों ने 20 फरवरी 2025 के उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसके तहत अदालत ने मामले का संज्ञान लेते हुए उन्हें तलब किया था. साथ ही उन्होंने 15 मई 2025 को संभल के चंदौसी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश की अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के आदेश को भी चुनौती दी.

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि आरोप तय करने का आदेश तथ्यों और स्थापित कानूनी स्थिति पर समुचित विचार किए बिना पारित किया गया. उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा 21 नामजद आरोपियों और 800-900 अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर झूठे और निराधार आरोपों पर आधारित है तथा इसका उद्देश्य याचिकाकर्ताओं को परेशान करना था.

अख़बार के अनुसार, वकील ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ताओं के नाम कुछ वीडियो के आधार पर सामने आए थे, लेकिन ऐसा कोई इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं है जो उनकी पहचान या कथित अपराधों में उनकी संलिप्तता को साबित करता हो.

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 8 जून को पारित अपने आदेश में कहा, ‘प्रथमदृष्टया यह मामला विचारणीय प्रतीत होता है.’ और इसके साथ ही अदालत ने मामले में आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी.