नॉर्थईस्ट डायरीः मणिपुर में तनाव के बीच विपक्ष का सरकार पर निशाना, कहा- केंद्र की कठपुतली

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में मणिपुर, असम, नगालैंड, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के प्रमुख समाचार.

मणिपुर में हिंसा के विरोध में एक प्रदर्शन. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: जातीय हिंसाग्रस्त मणिपुर में बढ़े तनाव के बीच मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा-नीत एनडीए सरकार विपक्षी दलों और वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं की तीखी आलोचना के निशाने पर है.

नॉर्थईस्ट नाउ के मुताबिक, शुक्रवार (12 जून) को इंफाल में मीडिया से बात करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), मणिपुर राज्य परिषद के प्रवक्ता राजकुमार अमुसाना ने कहा कि युमनाम खेमचंद के नेतृत्व वाली सरकार एक ‘कठपुतली सरकार’ है, जिसे केंद्रीय नेताओं, जिनमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हैं – की एक ‘शैडो सरकार’ नियंत्रित कर रही है.

उन्होंने आरोप लगाया कि असामाजिक तत्वों की लगातार गतिविधियों – जिनमें हाल ही में कई लोगों की हत्या और बंधकों को अपंग बनाना शामिल है – के बावजूद केंद्र सरकार मूकदर्शक बनी हुई है. सुरक्षा के कई उपाय होने के बावजूद बंधकों की हत्या में शामिल एक भी अपहरणकर्ता या अपराधी को अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है.

अमुसाना के अनुसार, संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि मुख्यमंत्री इस वर्ष फरवरी के पहले सप्ताह में पद संभालने के बाद से अब तक कुकी-जो समुदाय बहुल चूड़ाचांदपुर जिले का दौरा नहीं कर पाए हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन, जो इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला हैं और कुकी-जो समुदाय से आती हैं, भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद इंफाल नहीं जा सकी हैं.

इस बीच, वरिष्ठ राजनेता और मणिपुर के पूर्व कैबिनेट मंत्री ओकराम जॉय सिंह ने भी पत्रकारों से कहा कि वर्तमान संकट से निपटने के केंद्र सरकार के तरीके से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि राज्य व्यवहारिक रूप से कानूनी तौर पर तीन हिस्सों- मेईतेई, नगा और कुकी समुदायों – में विभाजित हो चुका है.

उन्होंने कहा कि यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि राज्य एक साथ कई संकटों का सामना कर रहा है, जिनमें हाल ही में अपहृत किए गए छह नगा लोगों की हत्या भी शामिल है.

ओकराम जॉय सिंह ने आगे आरोप लगाया कि केंद्र में बैठे भाजपा नेता मणिपुर के मूल निवासियों के कल्याण और विकास की अपेक्षा राज्य की भूमि में अधिक रुचि रखते हैं.

असम: फर्जी सर्टिफिकेट से बड़ा भर्ती घोटाला सामने आया, बाहरी राज्यों के युवा फर्जी प्रमाणपत्र से नौकरी पा रहे हैं

असम के जोरहाट जिले में एक बड़े दस्तावेज़ी घोटाले का खुलासा हुआ है, जिसमें आरोप है कि अन्य राज्यों के युवाओं ने फर्जी असम स्थायी निवासी प्रमाणपत्र का उपयोग कर केंद्रीय सुरक्षा बलों में नौकरियां हासिल कीं.

नॉर्थईस्ट टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कथित घोटाले का पता जोरहाट के अतिरिक्त उपायुक्त (एडीसी) पंकज बोरा ने तब लगाया, जब उन्होंने सीआरपीएफ, सीआईएसएफ और असम राइफल्स जैसी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों में कार्यरत उम्मीदवारों द्वारा जमा किए गए आधिकारिक दस्तावेजों का सत्यापन किया.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

अधिकारियों के अनुसार, बिहार और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के कई युवाओं पर आरोप है कि उन्होंने खुद को असम का स्थायी निवासी बताने वाले फर्जी दस्तावेज जमा कर राज्य के निवासियों के लिए आरक्षित लाभ हासिल किए. बताया गया है कि इन उम्मीदवारों ने अपनी शिक्षा अपने-अपने गृह राज्यों में पूरी की थी, लेकिन उन्होंने जोरहाट के नौशालिया इलाके से जारी किए गए स्थायी निवास प्रमाणपत्र दिखाए. उनमें से कुछ ने जोरहाट से जारी किए गए कथित जाति प्रमाण पत्र भी जमा किए थे.

यह मामला तब सामने आया जब संबंधित विभागों ने सत्यापन के लिए इन दस्तावेजों को जोरहाट जिला प्रशासन के पास भेजा. जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि प्रस्तुत किए गए प्रमाणपत्रों का कोई रिकॉर्ड जोरहाट आयुक्त कार्यालय में मौजूद नहीं है. इससे बड़े पैमाने पर जालसाजी की आशंका पैदा हो गई.

संदिग्ध फर्जी दस्तावेजों में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उनमें विनय कुमार, सोनू शर्मा, मुकेश, परमेश्वर गाला और अकरम शामिल हैं. बताया जाता है कि ये लोग वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों में सेवाएं दे रहे हैं.

मामले का खुलासा होने के बाद अतिरिक्त उपायुक्त पंकज बोरा ने जोरहाट सदर पुलिस थाने में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई. शिकायत के आधार पर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है, ताकि कथित जालसाजी गिरोह में शामिल लोगों की पहचान की जा सके और यह पता लगाया जा सके कि फर्जी प्रमाणपत्र कैसे तैयार किए गए तथा भर्ती प्रक्रिया में उनका उपयोग किस प्रकार किया गया.

जोरहाट सदर पुलिस स्टेशन में बीएनएस की धारा 3(5), 318(2), 319(2), 336, 336(2), 338, 340, 61(2) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

अधिकारियों द्वारा अब यह जांच की जा रही है कि यह फर्जीवाड़ा कितना व्यापक है और क्या अन्य लोगों ने भी जाली दस्तावेजों का उपयोग कर सरकारी नौकरियां प्राप्त की हैं.

इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, इस कथित घोटाला के सामने आने के बाद कई लोगों ने इसमें शामिल लोगों के खिलाफ़ पूरी जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है. उनका तर्क है कि ऐसी धोखाधड़ी वाली गतिविधियां न केवल भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कम करती हैं, बल्कि योग्य असमिया युवाओं को उनके सही रोज़गार के अवसरों से भी वंचित करती हैं.

नगालैंड: नगा विद्रोही संगठनों ने असम के साथ कच्चे तेल तलाशी समझौते का विरोध किया

असम, नगालैंड और केंद्र सरकार के बीच दोनों राज्यों की सीमा पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खोज और उत्पादन के लिए गुरुवार को नई दिल्ली में हुए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) का विरोध हो रहा है.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सात विद्रोही संगठनों के छत्र संगठन नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स (एनएनपीजी) की वर्किंग कमेटी (डब्ल्यूसी) ने कहा है कि जब तक ‘इंडो-नगा’ राजनीतिक समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक नगा क्षेत्रों में पेट्रोलियम सहित किसी भी प्राकृतिक संसाधन की खोज या दोहन का कोई भी प्रयास ‘अवैध और सहमत सिद्धांतों के खिलाफ’ होगा.

11 जून 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भारत सरकार (केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी), नगालैंड (मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो) और असम (मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा) के बीच असम-नगालैंड सीमा पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की संयुक्त खोज और उत्पादन के लिए एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए. (फोटो: पीटीआई)

केंद्र सरकार ने 17 नवंबर 2017 को इस समूह के साथ ‘एग्रीड पोजीशन’ (Agreed Position) पर हस्ताक्षर किए थे.

एनएनपीजी की वर्किंग कमेटी ने एक बयान में एग्रीड पोजीशन के भाग-7 का हवाला देते हुए कहा कि भूमि और उससे जुड़े संसाधनों- जिनमें खदानें, खनिज, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस शामिल हैं – का स्वामित्व और नियंत्रण राजनीतिक समाधान के बाद गठित होने वाली नगालैंड सरकार और प्रस्तावित नगालैंड तातार होहो (Nagaland Tatar Hoho) के पास होगा.

बयान में कहा गया, ‘जब तक इंडो-नगा राजनीतिक समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक नगा क्षेत्रों में कहीं भी प्राकृतिक संसाधनों की खोज का कोई भी प्रयास अवैध है और सहमत सिद्धांतों के खिलाफ है.’

वर्किंग कमेटी ने आगे कहा कि उस समय तक वह यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी कंपनी नगा भूमि से कच्चे तेल के भंडार का दोहन न कर सके.

एनएनपीजी की वर्किंग कमेटी ने यह भी कहा कि नगालैंड और असम के बीच या किसी अन्य राज्य के साथ राजस्व साझेदारी का कोई भी मॉडल नगा लोगों के हितों के बजाय केवल कुछ लाभ कमाने वाले लोगों के हितों की पूर्ति करेगा.

बयान में कहा गया, ‘तथाकथित ‘डिस्टर्ब्ड एरिया बेल्ट’ कानूनी और ऐतिहासिक रूप से नगा मातृभूमि का अभिन्न हिस्सा है. असम अपने तेल राजस्व में नगालैंड को हिस्सेदारी नहीं देता, तो फिर नगालैंड सरकार अपनी संपदा असम सरकार के साथ क्यों साझा करे? तेल अन्वेषण और दोहन के खिलाफ नगालैंड की जनजातियों और नागरिक समाज संगठनों की नाराजगी पूरी तरह जायज है.’

गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समृद्ध पूर्वोत्तर के विजन को साकार करने में आ रही एक बड़ी बाधा को दूर करेगा. उन्होंने विश्वास जताया था कि इससे तेल और प्राकृतिक गैस की खोज के साथ-साथ खनिजों के खनन के नए अवसर खुलेंगे.

गृह मंत्रालय के एक आधिकारिक बयान के अनुसार, ‘उन्होंने (शाह ने) कहा कि दोनों राज्यों ने यह निर्णय लिया है कि वे भारत में तेल अन्वेषण के रास्ते में कोई बाधा नहीं बनने देंगे, बल्कि पारस्परिक सहयोग के मार्ग पर आगे बढ़ेंगे, क्योंकि ये संसाधन राष्ट्रीय संपदा हैं.’

त्रिपुरा: पुनर्वास पैकेज में देरी के विरोध में आत्मसमर्पण कर चुके उग्रवादियों ने 72 घंटे की हड़ताल शुरू की

प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों – नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एनएलएफटी) और ऑल त्रिपुरा टाइगर फ़ोर्स (एटीटीएफ) के आत्मसमर्पण कर चुके सदस्यों ने शुक्रवार (12 जून) को त्रिपुरा के विभिन्न हिस्सों में 72 घंटे की हड़ताल शुरू कर दी. उनका आरोप है कि लगभग दो वर्ष पहले हुए शांति समझौते के तहत किए गए पुनर्वास संबंधी वादों को केंद्र और राज्य सरकार ने अब तक लागू नहीं किया है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने खोवाई जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे पटरियों के कुछ हिस्सों को अवरुद्ध कर दिया. वे उस 250 करोड़ रुपये के पुनर्वास पैकेज को लागू करने की मांग कर रहे हैं, जिसकी घोषणा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नई दिल्ली में हस्ताक्षरित चार-पक्षीय समझौते के तहत की गई थी.

नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा और ऑल त्रिपुरा टाइगर फ़ोर्स के सदस्यों ने पुनर्वास समझौते को लागू करने की मांग को लेकर त्रिपुरा में शुक्रवार, 12 जून को 72 घंटे के नाकेबंदी की घोषणा की. (फोटो: पीटीआई)

यह समझौता 4 सितंबर 2024 को मुख्यमंत्री माणिक साहा, भाजपा सहयोगी दल तिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर देबबर्मा और गृह मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी में हुई थी. समझौते के अनुसार केंद्र सरकार ने उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए 250 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी थी.

एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘4 सितंबर 2024 को एक समझौता हुआ था, जिसमें टिपरासा समुदाय के पुनर्वास के लिए 250 करोड़ रुपये के पैकेज का वादा किया गया था. समझौते पर हस्ताक्षर हुए लगभग दो वर्ष बीत गए, लेकिन उसमें से कुछ भी लागू नहीं हुआ. हमने कई बार केंद्र और राज्य सरकार को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर ध्यान देने का आग्रह किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. इसके विरोध में हम आज (शुक्रवार) से 72 घंटे की हड़ताल कर रहे हैं.’

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्होंने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, गृह सचिव, जनजातीय कल्याण मंत्री और जनजातीय कल्याण विभाग के सचिव को भी अपनी मांगों को पूरा करने के लिए पत्र भेजे थे, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. गुरुवार को उन्होंने जनजातीय कल्याण मंत्री विकास देबबर्मा के साथ बैठक भी की, लेकिन वार्ता से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. इसके बाद उन्होंने 72 घंटे की हड़ताल जारी रखने का निर्णय लिया.

सितंबर 2024 में केंद्र सरकार द्वारा त्रिपुरा सरकार और दोनों उग्रवादी संगठनों के साथ चार-पक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाने के तीन सप्ताह बाद एनएलएफटी और एटीटीएफ के कम-से-कम 584 उग्रवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की थी.

1980 के दशक से लेकर 2000 के शुरुआती वर्षों तक त्रिपुरा में एनएलएफटी और एटीटीएफ सहित कई प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों के कारण व्यापक हिंसा और खून-खराबा देखने को मिला.

भारत सरकार ने 1997 में गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 (यूएपीए) के तहत एनएलएफटी और एटीटीएफ को प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन घोषित किया था. बाद में इन संगठनों पर प्रिवेंशन ऑफ टेररिज़्म एक्ट (पोटा), 2002 के तहत भी प्रतिबंध लगाया गया था.

अरुणाचल प्रदेश: सियांग बांध परियोजना को लेकर फिर तनाव, कई घरों में तोड़फोड़

अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग जिले में अपर सियांग बांध परियोजना का विरोध कर रहे समूहों द्वारा कथित तौर पर उन ग्रामीणों के घरों में तोड़फोड़ किए जाने के बाद निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है, जिन्होंने हाल ही में परियोजना के समर्थन में एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे.

स्थानीय खबरों के अनुसार, बीते सोमवार को जिन घरों में कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई, उनमें स्थानीय विधायक ओनी पनयांग का घर भी शामिल था.

अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग में बहुउद्देशीय परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन करते ग्रामीण (फाइल फोटो: अरेंजमेंट)

यह घटना उस घोषणा के दो दिन बाद हुई, जिसमें अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और विधायक पनयांग ने कहा था कि गेकू गांव के 110 परिवारों ने ‘सियांग अपर बहुउद्देश्यीय परियोजना’ की प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट (पीएफआर) के समर्थन में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. गेकू सियांग नदी के किनारे स्थित उन गांवों में से एक है, जो इस जलविद्युत परियोजना से प्रभावित होने वाला है.

2017 में 11,000 मेगावाट क्षमता वाली सियांग अपर बहुउद्देश्यीय परियोजना प्रस्तावित होने के बाद से ही स्थानीय ग्रामीण इसका विरोध कर रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों से राज्य सरकार और राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (एनएचपीसी) प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट पर काम शुरू करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय विरोध के कारण यह प्रक्रिया रुकी हुई है.

एमओयू पर हस्ताक्षर की खबर फैलते ही सोमवार को गेकू गांव में तनाव बढ़ गया.

मंगलवार (9 जून) को गेकू में लोगों के एकत्र होने और ‘सोशल मीडिया पर भड़काऊ गतिविधियों’ पर प्रतिबंध लगाने संबंधी आदेश में अपर सियांग के जिला मजिस्ट्रेट ने आरोप लगाया कि ‘बांध-विरोधी समूहों ने गेकू कस्बे और आसपास के गांवों में पीएफआर समर्थक निवासियों के कुछ घरों और संपत्तियों में तोड़फोड़ कर नुकसान पहुंचाया है.’

आदेश में कहा गया, ‘यह आशंका है कि बांध-विरोधी समूह हिंसा, धमकी और सार्वजनिक संपत्तियों अथवा अन्य पीएफआर समर्थक ग्रामीणों की संपत्तियों को नुकसान पहुंचाकर स्थिति को और अधिक गंभीर बना सकते हैं.’

केंद्र और राज्य सरकारें दोनों सियांग बांध परियोजना को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं. उनका तर्क है कि यह परियोजना तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन द्वारा प्रस्तावित 60,000 मेगावाट क्षमता वाली दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना के संभावित प्रभावों का मुकाबला करने में मदद करेगी.

यारलुंग त्सांगपो नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है और आगे चलकर दिबांग तथा लोहित जैसी सहायक नदियों से मिलकर असम में ब्रह्मपुत्र नदी बन जाती है.

मेघालय: बांग्लादेश सीमा पर बसे गांवों के लोग बाड़ लगाने का विरोध में

मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स ज़िले में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बसे गांव के लोग बाड़ लगाने का विरोध कर रहे हैं. उनकी मांग है कि प्रस्तावित सीमा बाड़ (फेंसिंग) भारतीय इलाके में अंदर बनाने के बजाय ‘ज़ीरो लाइन’ पर बनाई जाए.

ग्रामीणों ने पिनुरस्ला के सब-डिविजनल ऑफिसर को एक ज्ञापन सौंपा और अधिकारियों से अपील की कि जब तक उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हो जाता, तब तक चल रहे फेंसिंग के काम को तुरंत रोक दिया जाए.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

लिंगखोंग उन कुछ सीमावर्ती गांवों में से एक है जहां घर बांग्लादेश की सीमा के उस पार मौजूद बस्तियों से बस कुछ ही मीटर की दूरी पर हैं. मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत सीमा पर बाड़ आमतौर पर ज़ीरो लाइन से कम से कम 150 गज की दूरी पर बनाई जाती है.

निवासियों को डर है कि मौजूदा बाड़ लगाने की योजना के कारण गांव बाड़ वाले इलाके के बाहर रह जाएगा, जिससे यह देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा.

गांव के मुखिया रामू ने कहा, ‘हम सीमा पर बाड़ लगाने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि बाड़ ज़ीरो लाइन पर लगाई जाए ताकि हमारा गांव भारत के अंदर और बाड़ वाले इलाके के भीतर रहे.’

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह गांव अब तक बांग्लादेश से मुख्य रूप से बांस की बाड़ के ज़रिए अलग रहा है, जिसे लोगों ने कोविड-19 महामारी के दौरान बनाया था.

ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित फेंसिंग रूट से आवाजाही, सुरक्षा और बस्ती के भविष्य को लेकर लंबे समय तक चलने वाली चिंताएं पैदा हो सकती हैं.

हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा मजबूत करने के प्रयासों के तहत फेंसिंग परियोजना जारी है.

मेघालय की बांग्लादेश के साथ 444 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जिसमें से कठिन इलाके और स्थानीय मुद्दों के कारण 80 किलोमीटर से भी कम हिस्से पर बाड़ नहीं लगी है.

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि लिंगखोंग में पहले ही एक सुरक्षा चौकी स्थापित की जा चुकी है.

अधिकारी ने कहा, ‘गांव में बीएसएफ की मौजूदगी है और निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी ज़रूरी सुरक्षा उपाय किए जा रहे हैं.’

इस बीच, गृह विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नई दिल्ली ने बांग्लादेश के सामने ज़ीरो लाइन के पास एक लाइन वाली बाड़ लगाने का प्रस्ताव रखा है. यह उन जगहों के लिए है जहां मौजूदा बाड़ लगाने के नियमों से बस्तियों पर बुरा असर पड़ सकता है.

अधिकारी ने कहा, ‘ज़ीरो लाइन पर एक लाइन वाली बाड़ लगाने के प्रस्ताव पर बातचीत शुरू हो गई है. हालांकि, बांग्लादेश की नई सरकार ने अभी तक इस मामले पर कोई फ़ैसला नहीं लिया है.’

असम: राज्य में 18 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए आधार कार्ड जारी करने पर रोक

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने शनिवार (13 जून) को कहा कि राज्य मंत्रिमंडल ने 18 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए आधार कार्ड जारी करने पर रोक लगाने का फ़ैसला किया है, जबकि अनुसूचित जनजाति (एसटी), अनुसूचित जाति (एससी) और चाय बागान समुदायों के लिए मार्च 2027 तक आधार कार्ड जारी करने की अनुमति दी गई है.

राज्य मंत्रिमंडल की बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री ने कहा, ‘असम कैबिनेट ने फैसला लिया है कि 18 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को आधार कार्ड जारी नहीं किया जाएगा. हालांकि, एसटी, एससी और चाय बागान समुदाय के लोगों को मार्च 2027 तक आधार कार्ड मिलते रहेंगे.’

न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मुख्यमंत्री ने कहा, ‘खास मामलों में ज़िला कमिश्नर को कार्ड जारी करने की मंज़ूरी के लिए राज्य सरकार को एक प्रस्ताव भेजना होगा.’

यह बताते हुए कि राज्य में आधार कार्ड जारी करने का काम सैचुरेशन पॉइंट तक पहुंच गया है- शर्मा ने कहा, ‘कुछ ज़िलों में यह आंकड़ा 100 प्रतिशत से ज़्यादा हो गया है, और हमें यह पता लगाना होगा कि ये कौन लोग हैं जो अतिरिक्त आधार कार्ड ले रहे हैं.’

उन्होंने दावा किया कि यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी अवैध बांग्लादेशी को आधार कार्ड न मिले.