नई दिल्ली में रविवार (14 जून) को जब तृणमूल कांग्रेस के 20 विद्रोही सांसद लोकसभा अध्यक्ष के सामने पहुंचे, तब वे केवल अपनी सीटों की नई व्यवस्था मांगने नहीं गए थे. वे अपने साथ पश्चिम बंगाल के एक पूरे राजनीतिक युग के विघटन का दस्तावेज लेकर गए थे.
इन सांसदों ने घोषणा की कि वे नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करेंगे और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देंगे. एनसीपीआई एक ऐसी पंजीकृत; लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है, जिसकी गतिविधियां मुख्यतः त्रिपुरा में रही हैं और जिसका पंजीकृत पता हावड़ा के सांकराइल में बताया जाता है. कल तक जो दल भारत की संसदीय राजनीति की परिधि पर भी दिखाई नहीं देता था, वह अचानक 20 सांसदों का संभावित घर और एनडीए का दूसरा सबसे बड़ा घटक बनने लगा.
भारतीय राजनीति में कभी-कभी विचारधारा से अधिक उपयोगिता किसी पार्टी को विराट बना देती है.
कोलकाता में कालीघाट का वह घर, जहां वर्षों तक उम्मीदवारों, मंत्रियों, उद्योगपतियों और अधिकारियों के राजनीतिक भाग्य लिखे जाते थे, अब अपनी ही पार्टी की सदस्य-सूची गिन रहा था. विधानसभा में 80 सीटें जीतकर विपक्ष में पहुंची तृणमूल के विद्रोही नेता ऋतब्रत बनर्जी ने पहले 58 और फिर 64 विधायकों के समर्थन का दावा किया. विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें विपक्ष का नेता नियुक्त किया; ममता समर्थक तृणमूल इस निर्णय को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दे चुकी है.
राज्यसभा में भी तीन इस्तीफे हो चुके हैं. लोकसभा में पार्टी के लगभग आठ सांसद ममता बनर्जी के साथ प्रभावी रूप से खड़े दिखाई देते हैं. इनमें अभिषेक बनर्जी, सौगत राय, कल्याण बनर्जी, महुआ मोइत्रा, कीर्ति आजाद और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नाम हैं; लेकिन इस संकट में निष्ठाओं की सूची लगभग रोज बदल रही है. पहले 19 सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र सामने आया, फिर संख्या 20 हुई और विद्रोही खेमे ने दो और सांसदों के आने का दावा कर दिया.
यह सामान्य दलबदल नहीं है. यह उस पार्टी का संस्थागत ध्वंस है, जिसका सबसे बड़ा राजनीतिक दावा ही यह था कि वह किसी संस्था की नहीं, जनता की पार्टी है.
दो पराजय: एक चुनाव में, दूसरी पार्टी के भीतर
ममता बनर्जी की पहली पराजय मतगणना के दिन हुई. भाजपा ने पश्चिम बंगाल की 294 में से 207 सीटें जीतीं और तृणमूल 80 पर सिमट गई. पराजय प्रचंड थी; लेकिन वोटों का अंतर उतना प्रलयंकारी नहीं था. भाजपा को 45.84 प्रतिशत और तृणमूल को 40.80 प्रतिशत मत मिले. तृणमूल के पक्ष में दो करोड़ साठ लाख से अधिक लोगों ने वोट दिया. अर्थात् बंगाल ने ममता बनर्जी को त्याग नहीं दिया था; उसने उनके शासन को अस्वीकार किया था.
लेकिन दूसरी पराजय अधिक भयावह है. चुनाव हारने के कुछ सप्ताह के भीतर पार्टी का अधिकांश विधायक दल और लगभग दो-तिहाई संसदीय दल नेतृत्व के विरुद्ध खड़ा हो गया.
इससे यह प्रश्न पैदा होता है कि तृणमूल पंद्रह वर्षों तक वास्तव में क्या बना रही थी- एक राजनीतिक संगठन या सत्ता से जुड़ी हुई निर्वाचित प्रतिभाओं का अस्थायी संघ?
तृणमूल ने टिकट दिए, चुनाव जिताए, मंत्री बनाए और संसदीय पद बांटे; लेकिन पर्याप्त संख्या में तृणमूलवादी पैदा नहीं किए.
यह उसकी सबसे बड़ी विफलता है.
जिस पार्टी का अर्थ था ‘जड़’, वह ऊपर की शाखाओं में बस गई
तृणमूल कांग्रेस का नाम किसी राजनीतिक सलाहकार की खोज नहीं था. ‘तृणमूल’ का अर्थ ही था- घास की जड़, समाज का सबसे निचला हिस्सा, वह मनुष्य जिसे सत्ता की ऊंची इमारतों में प्रवेश नहीं मिलता.
ममता बनर्जी की राजनीति वहीं से निकली थी.
21 जुलाई 1993 को उनके नेतृत्व में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता फोटोयुक्त मतदाता पहचान-पत्र की मांग करते हुए राइटर्स बिल्डिंग की ओर बढ़े. पुलिस गोलीबारी में 13 लोग मारे गए. वह घटना केवल ममता के राजनीतिक जीवन का रक्तरंजित अध्याय नहीं बनी; उसने उनके चारों ओर संघर्ष, साहस और राज्यसत्ता के प्रतिरोध की एक स्थायी कथा निर्मित कर दी.
1998 में कांग्रेस से अलग होकर बनाई गई तृणमूल के पास न वाम मोर्चे जैसा कैडर था, न भाजपा जैसा राष्ट्रीय ढांचा और न कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक विरासत. उसके पास एक दुबली-पतली स्त्री थी, सफेद सूती साड़ी थी, रबर की चप्पलें थीं, बार-बार घायल हुआ शरीर था और सत्ता के सामने असाधारण निर्भीकता थी.
2004 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल इतनी सिकुड़ गई थी कि ममता बनर्जी उसकी अकेली निर्वाचित सांसद बची थीं. दो वर्ष बाद विधानसभा चुनाव में भी पार्टी बुरी तरह हारी. लेकिन ममता ने पार्टी नहीं छोड़ी, किसी सुविधाजनक संगठन में उसका विलय नहीं किया और न पराजय से बचने के लिए कोई संसदीय सुरंग खोजी.
वे सड़क पर लौट गईं.
सिंगूर और नंदीग्राम ने उन्हें पुनर्जीवित किया. वहां उन्होंने औद्योगीकरण का विरोध मात्र नहीं किया; उन्होंने जबरन विकास के विरुद्ध सहमति, भूमि-अधिकार और नागरिक गरिमा का प्रश्न खड़ा किया. ‘मां, माटी, मानुष’ इसीलिए सफल हुआ, क्योंकि वह विज्ञापन नहीं, सामाजिक गठबंधन था- स्त्री, किसान और साधारण नागरिक का गठबंधन.
2011 में इसी राजनीति ने 34 वर्ष पुराने वाम शासन को उखाड़ दिया.
आज की विडंबना यह है कि जिस पार्टी को ममता ने एक सांसद से पुनर्जीवित किया था, उसी पार्टी के 20 सांसद संख्या की सुरक्षा के लिए एक लगभग अज्ञात पार्टी में शरण ढूंढ़ रहे हैं.

वामपंथ की बीमारी तृणमूल को कैसे लगी
पश्चिम बंगाल में लंबे शासन की एक विशिष्ट विकृति रही है. यहां सत्तारूढ़ पार्टी धीरे-धीरे सरकार के ऊपर नहीं रहती; वह समाज के भीतर उतरकर राज्य की जगह लेने लगती है.
वाम मोर्चे की ऐतिहासिक उपलब्धियां वास्तविक थीं- ऑपरेशन बर्गा, भूमि-सुधार, पंचायतों का सशक्तीकरण और ग्रामीण गरीबों को राजनीतिक आवाज. लेकिन समय के साथ उसका स्थानीय कैडर नागरिक और सरकार के बीच अनिवार्य दरबान बन गया. नौकरी, राशन, पट्टा, पुलिस, पंचायत और ठेका- हर रास्ता पार्टी के स्थानीय कार्यालय से होकर गुजरने लगा.
ममता बनर्जी इसी ‘पार्टी-सोसाइटी’ के विरुद्ध उठीं थीं. लेकिन सत्ता में आने के बाद तृणमूल ने उस व्यवस्था को समाप्त करने के बजाय उसका अधिक लचीला, अधिक निजी और कई जगह अधिक व्यावसायिक रूप विकसित कर लिया.
ऊपर ममता का करिश्मा था; नीचे स्थानीय फ्रेंचाइजी.
किसी के पास क्लब था, किसी के पास ठेके, किसी के पास रेत और निर्माण का कारोबार, किसी के पास सरकारी लाभार्थियों की सूची और किसी के पास थाने तथा ब्लॉक कार्यालय तक पहुंच. तृणमूल कार्यकर्ता धीरे-धीरे नागरिक और सरकार के बीच सहयोगी नहीं, अनुमति देने वाला मध्यस्थ बनने लगा.
‘दुआरे सरकार’ प्रशासन को लोगों के दरवाजे तक ले गई; लेकिन अनेक इलाकों में पार्टी ने लोगों को यह भी अनुभव कराया कि दरवाजे की चाबी स्थानीय नेता के पास है.
ममता की व्यक्तिगत सादगी बनी रही, मगर पार्टी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था उनसे अलग होती चली गई. भारत में यह मान लेना गंभीर भूल है कि शीर्ष नेता का निजी ईमानदार होना पूरे संगठन को ईमानदार बना देता है. सत्ता का भ्रष्टाचार हमेशा नेता की अलमारी में नकद रखकर नहीं आता; वह उसके नाम पर चलने वाली अनौपचारिक अनुमतियों, संरक्षण और भय में भी रहता है.
कल्याण से आकांक्षा तक का अधूरा सफर
कन्याश्री, रूपश्री, स्वास्थ्य साथी और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने बंगाल की लाखों महिलाओं के जीवन में वास्तविक सहायता पहुंचाई. इन योजनाओं को केवल ‘रेवड़ी’ कहना उस घरेलू अर्थव्यवस्था का अपमान होगा, जिसमें कुछ हजार रुपये भी स्त्री को निर्णय की छोटी-सी स्वतंत्रता देते हैं.
लेकिन कल्याण की राजनीति का एक स्वाभाविक विकासक्रम होता है. जो सहायता पहले उपहार लगती है, वह कुछ वर्षों में नागरिक अधिकार बन जाती है. उसके बाद मतदाता नई मांग करता है.
2026 में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया, फिर भी तृणमूल अपनी पुरानी महिला बढ़त नहीं बचा सकी. इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं ने लक्ष्मी भंडार को अस्वीकार कर दिया. इसका अर्थ यह है कि वे नकद सहायता के साथ रोजगार, सुरक्षा, बेहतर स्कूल, अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन और अपने बच्चों के लिए सामाजिक गतिशीलता चाहती थीं.
भाजपा ने ममता की योजनाएं बंद करने का वादा नहीं किया. उसने उन्हीं योजनाओं में अधिक पैसा देने, कानून-व्यवस्था सुधारने और रोजगार लाने का दावा किया. इस प्रकार उसने तृणमूल के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक औजार को वैचारिक संघर्ष से निकालकर प्रतिस्पर्धी बोली में बदल दिया. जब दोनों दल पैसे का वादा कर रहे हों, तब मतदाता शासन, पहचान और भविष्य को देखकर वोट करता है.
यहीं तृणमूल पिछड़ गई.
कानून संख्या को सुरक्षा देता है, विरासत नहीं
विद्रोही सांसदों और विधायकों की रणनीति संविधान की दसवीं अनुसूची के ‘विलय’ प्रावधान पर आधारित दिखाई देती है. किसी विधानमंडलीय दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य यदि किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय पर सहमत हों तो वे दलबदल के आधार पर अयोग्यता से बचने का दावा कर सकते हैं.
लोकसभा में 20 और विधानसभा में कथित 64 सदस्य इस गणित को पार करते हैं.
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी भेद है, जिसे राजनीतिक घोषणाएं जानबूझकर धुंधला करती हैं. दो-तिहाई सांसद या विधायक होने से कोई समूह अपने आप ‘असली तृणमूल’ नहीं बन जाता. दलबदल से सुरक्षा, विधानमंडलीय दल की मान्यता और पार्टी के नाम-चिह्न का स्वामित्व तीन अलग प्रश्न हैं.
अयोग्यता पर प्रारंभिक निर्णय सदन का अध्यक्ष करता है. पार्टी के नाम और फूल-घास के चुनाव-चिह्न पर विवाद हो तो निर्णायक अधिकार चुनाव आयोग के पास होता है. आयोग केवल सांसदों और विधायकों की संख्या नहीं देखता; पार्टी का संविधान, संगठनात्मक निकाय, पदाधिकारियों का समर्थन और दस्तावेजी नियंत्रण भी प्रासंगिक होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद में स्पष्ट किया था कि ‘राजनीतिक दल’ और ‘विधानमंडलीय दल’ एक ही वस्तु नहीं हैं. विधायक दल की संख्यात्मक शक्ति राजनीतिक पार्टी को निगल नहीं सकती. ह्विप और सदन के नेता की वैधता भी मूल राजनीतिक दल से जुड़ी होती है.
इसलिए एनसीपीआई का रास्ता विद्रोहियों को अयोग्यता से बचाने वाली कानूनी नौका हो सकता है, लेकिन वह उन्हें ममता बनर्जी की बनाई पार्टी का इतिहास, नाम और चुनाव-चिह्न स्वतः नहीं सौंप सकता.
ममता की कानूनी लड़ाई यहीं से शुरू होगी. उन्हें लोकसभा अध्यक्ष के सामने विलय की वैधता चुनौती देनी होगी, विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में दस्तावेजी आधार प्रस्तुत करना होगा और किसी संभावित प्रतीक-विवाद के लिए चुनाव आयोग में संगठनात्मक बहुमत सिद्ध करना होगा.
लेकिन उन्हें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि अदालत में जीत राजनीतिक पुनर्जन्म भी दे देगी. कानून विधायकों को वापस कर सकता है; विश्वास नहीं.
अभिषेक का प्रश्न- व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का
तृणमूल के संकट को केवल ममता बनाम अभिषेक की कथा बना देना भी सतही होगा. अभिषेक बनर्जी ने संगठन को डेटा, बूथ प्रबंधन, पेशेवर प्रचार और चुनावी अनुशासन दिया. लेकिन पार्टी में यह धारणा मजबूत हुई कि पुराने नेताओं, जिला इकाइयों और निर्वाचित प्रतिनिधियों तक पहुंच एक संकुचित शक्ति-वृत्त से नियंत्रित होती है.
समस्या यह नहीं कि ममता ने अभिषेक पर विश्वास किया. समस्या यह है कि पार्टी ने ऐसा कोई विश्वसनीय संस्थागत ढांचा नहीं बनाया, जिसमें उत्तराधिकार, असहमति और नेतृत्व का विकास पारदर्शी ढंग से हो सके.
अब केवल पद बदलना पर्याप्त नहीं होगा. चंद्रिमा भट्टाचार्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाना, डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन को नई जिम्मेदारियां देना, सौगत राय को संसदीय सलाहकार बनाना या युवा तथा महिला संगठन के चेहरे बदलना उपयोगी हो सकता है; लेकिन नए नाम पुराने ढाँचे में रख दिए जाएँ तो परिवर्तन केवल नामपट्टिका पर होता है.
ममता को एक सामूहिक राजनीतिक परिषद बनानी होगी, जिसमें पुराने नेताओं, महिलाओं, युवाओं, श्रमिक संगठनों, अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों, उत्तर बंगाल, जंगलमहल और शहरी बंगाल की स्वतंत्र आवाज हो. महुआ मोइत्रा की राजनीतिक धार, सौगत राय का अनुभव, कल्याण बनर्जी की कानूनी क्षमता और डेरेक ओ’ब्रायन की राष्ट्रीय संप्रेषण-शक्ति को किसी एक उत्तराधिकारी की छाया में रखने के बजाय साझा नेतृत्व में बदला जाना चाहिए.
यह अभिषेक को अपमानित करने का कार्यक्रम नहीं होगा. यह तृणमूल को परिवार से संस्था बनाने का कार्यक्रम होगा.
वापसी के लिए माफी की राजनीति
भारतीय नेता मतदाताओं से आशीर्वाद मांगते हैं; क्षमा बहुत कम मांगते हैं. ममता बनर्जी की वापसी का सबसे शक्तिशाली आरम्भ कोई विशाल रैली नहीं, एक सार्वजनिक स्वीकारोक्ति हो सकती है.
उन्हें कहना चाहिए कि उनकी सरकार ने काम किया; लेकिन उनकी पार्टी के लोगों ने अनेक स्थानों पर सत्ता का दुरुपयोग भी किया; नौकरियों, ठेकों और प्रशासन में अनौपचारिक प्रभाव बढ़ा; शिकायतों को विरोधी प्रचार समझा गया; और पार्टी जनता की आवाज सुनने के बजाय अपने प्रचार पर विश्वास करने लगी.
इसके बाद प्रत्येक जिले में स्वतंत्र शिकायत आयोग बनाया जाए. शक्तिशाली नेताओं की संपत्ति और व्यावसायिक हित सार्वजनिक हों. पार्टी पद और सरकारी ठेका एक साथ रखने पर रोक लगे. ब्लॉक अध्यक्ष पुलिस अधिकारी का अनौपचारिक वरिष्ठ न बने. पार्टी कार्यालय लाभ बाँटने का केंद्र नहीं, अन्याय दर्ज करने की जगह बने.
महिलाओं को केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं, संगठन की निर्णायक नेता बनाया जाए. युवाओं के लिए रोजगार, निष्पक्ष भर्ती, कौशल और आधुनिक उद्योग पर स्पष्ट कार्यक्रम हो. हिंदू मतदाता को वापस लाने का अर्थ भाजपा की सांप्रदायिक भाषा की नकल नहीं, उसे यह विश्वास दिलाना है कि सरकार किसी समुदाय के पक्ष या विरुद्ध नहीं, कानून के पक्ष में खड़ी होगी. मुसलमानों को भयग्रस्त वोट बैंक की तरह नहीं, शिक्षा, उद्यम, आधुनिक रोजगार और राजनीतिक नेतृत्व के अधिकारी नागरिकों की तरह देखा जाए.
और सबसे महत्त्वपूर्ण- कोलकाता को पूरे बंगाल का पर्याय मानना बंद किया जाए. उत्तर बंगाल, डुआर्स के चाय बागान, दार्जिलिंग की पहाड़ी अस्मिता, राजबंशी समाज, मतुआ बस्तियां, जंगलमहल, सुंदरबन, मुर्शिदाबाद-मालदा की निर्धनता और आसनसोल-दुर्गापुर के औद्योगिक संसार- इन सबके लिए अलग नेतृत्व और अलग राजनीतिक भाषा चाहिए.
बंगाल एक नहीं है. बंगाल अनेक बंगालों का संघ है.
ममता के पास अभी भी वह है जो विद्रोहियों के पास नहीं
आज विद्रोही सांसदों और विधायकों के पास संख्या है. भाजपा के पास सत्ता है. विधानसभा अध्यक्ष के पास निर्णय है. चुनाव आयोग के पास चिह्न पर अधिकार है. अदालतों के पास समीक्षा की शक्ति है.
लेकिन ममता बनर्जी के पास अभी भी एक चीज है, जिसे आदेश से हस्तांतरित नहीं किया जा सकता—एक जीवित राजनीतिक कथा.
उन्हें किसी परिवार से पार्टी नहीं मिली थी. वे पुलिस की लाठियों, चुनावी पराजयों, अपमान, अकेलेपन और लगातार सड़क पर बने रहने से निकली थीं. वे 2004 में एक सांसद रह गई थीं और सात वर्ष बाद बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं. इसलिए आज की संख्या उनके लिए अंतिम सत्य नहीं होनी चाहिए.
पर तब और अब में एक बड़ा अंतर है.
तब ममता के पास संगठन छोटा था, मगर नैतिक ऊर्जा बड़ी थी. आज संगठन बिखर रहा है और नैतिक ऊर्जा क्षीण हो चुकी है. उस समय उनके विरोध में स्थापित सत्ता थी; आज उनके सामने अपनी ही सत्ता की स्मृतियां हैं.
इसलिए वापसी का रास्ता भाजपा को कोसने से नहीं, स्वयं को बदलने से निकलेगा.
उन्हें उन परिवारों के घर जाना होगा जिन्हें तृणमूल नेताओं ने अपमानित किया. उन कार्यकर्ताओं को वापस बुलाना होगा जिन्हें ठेकेदार-नेताओं ने किनारे किया. बीस शक्तिशाली संदिग्ध चेहरों को हटाकर दो सौ अज्ञात ईमानदार कार्यकर्ताओं को आगे लाना होगा. डेटा प्रबंधन से पहले मनुष्य की आवाज सुननी होगी.
अदालत ममता को पार्टी दे सकती है. चुनाव आयोग उन्हें फूल और घास का चिह्न दे सकता है. संसद उन्हें आठ, दस या फिर अधिक सांसद दे सकती है.
लेकिन कोई संस्था उन्हें वह ‘तृणमूल’ नहीं दे सकती, जो कभी खेतों, बस्तियों, छात्र जुलूसों, घायल शरीरों और साधारण लोगों की उम्मीद से बनी थी. तृणमूल के सामने अब सबसे जरूरी प्रश्न यह नहीं है कि किसने ममता बनर्जी को धोखा दिया.
प्रश्न यह है कि सत्ता में रहते हुए तृणमूल ने किन लोगों को धोखा दिया. जिस दिन पार्टी इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से खोजने लगेगी, उसी दिन उसका पुनर्निर्माण शुरू होगा.
क्योंकि ममता बनर्जी को अब केवल अपनी पार्टी बचाने की आवश्यकता नहीं है. उन्हें अपनी पार्टी को उसके नाम में वापस लाना है. उसे फिर तृणमूल होना है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
