‘मैं संसार से विरक्त होकर नहीं, उसमें अनुरक्त रहकर ही विदा लेना चाहता हूं’

कभी-कभार में इस सप्ताह वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी अपने 'उत्तरकाल' की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, 'मुझे किसी तरह की मुक्ति की तलाश नहीं है, न भवचक्र से, न जन्मचक्र से. संसार बहुत तेज़ी से बदल गया और रहा है- वह निरंतर क्रूर-निष्करुण-असह्य होता जाता है पर उसमें, फिर भी, सचाई और विवेक, ईमानदारी और सुंदरता, अर्थ और संभावनाएं बची हुई हैं. मैं इस बचे हुए को अलक्ष्य नहीं करना चाहता.'

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"अपने बुनियादी अनुराग मैंने छोड़े नहीं हैं. अगर शरीर ही बाध्य कर दे तो और बात है, अन्यथा मैं उनमें से किसी को छोड़ना नहीं चाहता." (पेंटिंग साभार: The Persistence of Memory By Salvador Dalí/MoMA)

जब आप छियासी बरस पार कर चुके हों तो यह सोचना कि आप अपने उत्तरकाल में हैं अस्वाभाविक नहीं है. इस समय जो आपाधापी है, तेज़ भागती गतिशीलता है, सूचनाओं का अंबार है, छबियों की बौछार है और झूठों का घटाटोप है उनसे मुक्त होकर या उन्हें परे ढकेलकर कुछ राहत या फ़ुर्सत पा सकना कठिन से कठिनतर होता जाता है. फिर भी, यह कोशिश कभी-कभार कामयाब होती है.

ऐसे अवकाश में मन अक्सर पीछे की तरफ़ लौटता है और बहुत सारे लोग, प्रसंग याद आते हैं. याद उन्हें एक तरह की आभा से दीप्त कर देती है. कई बार आप अचरज से भर जाते हैं कि सचमुच ऐसा कुछ हुआ था या कि ऐसा कोई मिला था. पहले बिताए समय की कटुताएं और विफलताएं, चूकें और झगड़े, कटूक्तियां और बहसें भी याद आती हैं. समय उनका दंश या ज़हर, ताप या आर्द्रता कुछ कमज़ोर या फ़ीका ज़रूर कर देता है. पर कुछ ऐसे दुष्ट वचन, फिर भी, याद में अटके रहते हैं और उन्हें आप भूल या माफ़ नहीं कर पाते. आप कोई संत या देवता तो हैं नहीं, उत्तरकाल में भी आप मटमैले ही हैं- मिट्टी के माधो.

फिर आप सोचने लगते हैं, कुछ आत्मालोचक भाव से, कि जो आपको मिला वह निश्चय ही बहुत अधिक है और हर बार या कई बार आप उसके सुपात्र नहीं थे. आप इस बाद से कुछ दिलासा पाते हैं कि जब बड़ों-बड़ों को ग़लत समझा गया तब अगर आप को भी इसका बारहा सामना करना पड़ा तो यह कोई असाधारण बात नहीं है. यह तो जीवन में हस्बे-मामूल होता ही रहता है.

यह भी कुछ समय में आता है कि अनेक बाधाओं, अड़ंगों, लांछनों आदि के बावजूद आप चलते रहे हैं, हारकर बैठ नहीं गए, आपने हथियार नहीं डाल दिए, आपने अपनी जिजीविषा को मंद नहीं पड़ने दिया और यह सब जीवन में सफलता भले न दे पाया हो, कुछ सार्थकता तो दे सकता है.

अपने बुनियादी अनुराग मैंने छोड़े नहीं हैं. अगर शरीर ही बाध्य कर दे तो और बात है, अन्यथा मैं उनमें से किसी को छोड़ना नहीं चाहता. मैं संसार से विरक्त होकर नहीं उसमें अनुरक्त रहकर ही उससे विदा लेना चाहता हूं.

मुझे किसी तरह की मुक्ति की तलाश नहीं है, न भवचक्र से, न जन्मचक्र से. संसार बहुत तेज़ी से बदल गया और रहा है- वह निरंतर क्रूर-निष्करुण-असह्य होता जाता है पर उसमें, फिर भी, सचाई और विवेक, ईमानदारी और सुंदरता, अर्थ और संभावनाएं बची हुई हैं. मैं इस बचे हुए को अलक्ष्य नहीं करना चाहता. पढ़ने-लिखने, आयोजन, यारबाशी, बहस, कलाओं के रसास्वादन के अनुराग इसी बचे हुए को प्रणति देते हैं. उसी बचे हुए से अनुप्राणित होते आए हैं, अब भी हो रहे हैं.

अपनी कमियों पर लगातार ध्यान आता है. जो कर नहीं पाया उस पर भी. लेकिन यह याद कर मन कृतज्ञता से भर जाता है कि कितने सारे दूसरों ने मेरी मदद की, मेरे साथ काम किया, मुझे सहारा दिया, मुझे घोर निराशा से बचाया. दूसरों के उजास में कृतार्थ अनुभव करता हूं. वे न होते तो भला मैं किस मसरफ़ का होता? ज़्यादा का अभी भी नहीं हूं पर दूसरे न होते तो इतना भी संभव न होता.

कितना बड़ा आश्वासन है कि उत्तरकाल में भी दूसरे हैं, आसपास और मददगार, संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण.

स्वामीनाथन से संवाद

यह सुखद संयोग है कि दिल्ली में रज़ा फाउंडेशन ने पाटनगढ़ में सक्रिय इक्कीस गोंड़ प्रधान युवा चित्रकारों की एक प्रदर्शनी पिछले सप्ताह आयोजित की है. पाटनगढ़ के ही जनगढ़ सिंह श्याम ने जिस सर्वथा मौलिक प्रवृत्ति को जन्म दिया और जिसे अब व्यापक रूप से ‘जनगढ़ कलम’ के रूप में माना-जाना जाता है, उनका यह उन्मेष भारत भवन में हुआ था और चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन ने ही जनगढ़ को खोजा था.

उनके साथ निरंतर कला-संवाद और उनकी अविराम प्रेरणा से ही जनगढ़ ने यह ऐतिहासिक नवाचार किया. आज ‘जनगढ़ कलम’ में सक्रिय लगभग अस्सी कलाकार हैं जिनका एक बड़ा हिस्सा पाटनगढ़ में है, जो जनगढ़ का मातृग्राम है.

स्वामीनाथन भारत के आधुनिक चित्रकारों में बिरले थे जो इतने मुखर और संवादप्रिय थे. उनके संवादों का चित्रकार अखिलेश द्वारा संपादित संकलन अपने तीसरे परिवर्द्धित संस्करण में ‘स्वामीनाथन से संवाद’ शीर्षक से आज यानी 21 जून 2026 को लोकार्पित होगा. उस दिन अगर होते तो स्वामी 98 बरस के हुए होते. चूंकि अकस्मात् 1994 में स्वामी का देहावसान हो गया था, ये सभी संवाद तीस से अधिक बरसों पहले के हैं.

स्वामी कहते हैं कि ‘पश्चिमी दृष्टिकोण हमारा दृष्टिकोण नहीं हो सकता. हम बराबर दर्शन-प्रिय लोग रहे हैं और बराबर जीवन और जगत का अध्ययन आध्यात्मिक स्तरों पर करते रहे हैं…. मैं बिल्कुल निश्चित हूं कि पश्चिम के अनुकरण में या कि पश्चिमी काम करके स्वीकृति पाने की आशंका भारतीय चित्रकारों को नष्ट कर देनी चाहिए. ऐसा करके वे कहीं नहीं पहुंच पाएंगे और न ही पश्चिम को अपने काम से चुनौती दे सकेंगे. आज रविशंकर या अली अकबर खां के संगीत की मौलिकता पश्चिम स्वीकार करता है और वे अपनी स्वीकृति अपनी ही शर्तों पर पश्चिम में भी करवा पाते हैं. इसका कारण शायद यही है कि उन्होंने पश्चिमी आतंक से अपने को दूर रखा. भारतीय चित्रकारों को एक काम तो करना ही चाहिए, और वह है भारतीय कला के वर्गीकरण का ख़ात्मा. मैं समझ नहीं पाता कि आधुनिक चित्रकार अपने को आदिवासी, लोक कला आदि से कैसे श्रेष्ठ मानता है. क्या इसलिए कि उसने पश्चिम के मुहावरे को थोड़ा-बहुत सीख लिया है?’

वे आगे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि ‘भारत के गांव-गांव में स्त्रियां गोबर लेकर और उस पर कौड़ियां चिपकाकर कई त्योहार और उत्सव मानती रही हैं. हर उत्सव के अवसर पर घर को सजाने-संवारने के लिए कुछ-न-कुछ करती रही हैं. इसे स्वीकार करने में हमें कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि उनका यह तरीका सर्वथा कलात्मक और मौलिक रहा है. न सिर्फ़ इतना ही बल्कि उसकी जड़ें जातीय जीवन में रही हैं और वह हमें और हमारी तथाकथित आधुनिक कला को प्रभावित करने की क्षमता आज भी रखती हैं.’

सामाजिक बदलाव और कला के संबंध को लेकर स्वामी कहते हैं:

‘मैं समाज के लिए सब कुछ करने को तैयार हूं बशर्ते कि वह मुझसे उसे न छीने जो पहले मेरी है- और जो मुझे उससे हमें समाज के पेट से नहीं अपनी मां के पेट से जन्मा हूं. मुझसे समाज ने तो यह कहा नहीं था कि तुम चित्र बनाओ, यह काम तुम्हारे जिम्मे किया जा रहा है. यानी पहले तो चित्र बनाना मेरी ही ज़रूरत हुई न?

… कला में क्रांति और सामाजिक या राजनीतिक क्रांतियां समांतर ही चला करती हैं- समांतर ही चल सकती हैं. कलाओं को किसी एक दिशा में हांका नहीं जा सकता. वैसी कोशिशें न तो क्रांति के लिए अच्छी होती हैं, न कलाओं के लिए. सोवियत क्रांति का उदाहरण लें, उस क्रांति की सबसे बड़ी भूल हुई वह यही थी कि कलाएं राजनैतिक आग्रहों के अधीन चलें.’

माध्यम बदलने के बारे में स्वामी का मत है: ‘… माध्यम को बदलने से आप सत्य के पास पहुंच जाएंगे या उसकी व्याख्या आपको सत्य के पास ले जाएगी यह सोचना ग़लत है. जितने ही सीमित दायरे के भीतर आप काम करते हैं उसमें कितनी पूर्णता के साथ पैठते हैं या समाते हैं उस पर यह निर्भर है कि आपकी कला में सार्वभौमिकता या सार्थकता आती है या नहीं…. लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि जब हमारे पास कुछ कहने के लिए न रह गया हो तो हम ऐसी चीज़ों का सहारा लें कि शायद हम कुछ कह रहे हैं.’

एक जगह स्वामी कुछ उकताकर कहते हैं: ‘भई, मैंने थोड़े ही पूंजीवाद पैदा किया है. मैं तो बदकिस्मती से कलाकार पैदा हो गया. समाज तो आपका है. समाज तो बना हुआ था, उसमें मैं निर्वाह करने की चेष्टा कर रहा हूं. तो मेरी प्रत्येक बात का जन्म समाज व्यवस्था से निकालना एक ग़लत चेष्टा है. लोक कलाओं का जो अपना स्वरूप है, उनकी जो अपनी शक्ल, वह और चीज़ है. और शास्त्रीय कला और लोक कला का मुक़ाबला वह बहुत ग़लत होगा. वह ग़लत इस तरह होगा जैसे कि मेरी गृहिणी है मैं उसका मुक़ाबला किसी नर्तकी से करूं. या तो नर्तकी को नीचा दिखाऊं या अपनी गृहिणी को नीचा दिखाऊं. यह नाजायज बात होगी. स्वतंत्र रूप से दोनों इतने सशक्त है कि …’

अन्यत्र स्वामी बताते हैं कि एक बार इंदिरा गांधी ने मुझसे पूछा था कि ख़ाली कैनवास को इस तरह ख़ाली नहीं छोड़ा जा सकता कि वह रंगों से भर जाए? यह एक इतना बड़ा सवाल था कि उसके उत्तर में पूरा जीवन बीत सकता है और उत्तर नहीं भी मिल सकता. उत्तर की प्रतीक्षा में उत्तर नहीं मिलता. प्रतीक्षा ही उत्तर है.’

इसी संवाद में वे आगे एक अद्भुत उक्ति कहते हैं: ‘कुछ नहीं से भर जाना वरदान है कुछ नहीं का’.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)