(यह लेख कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक पर दो भागों की शृंखला का दूसरा भाग है. पहली किस्त यहां पढ़ सकते हैं.)
18 मई, 2007 को हैदराबाद की ऐतिहासिक मक्का मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान एक बम धमाका हुआ, जिसमें नौ नमाज़ियों की जान चली गई और 50 से ज़्यादा लोग घायल हो गए. यह घटना भी अजमेर दरगाह पर हुए आतंकी हमले जैसी ही थी. पुलिस ने तीन दिनों के भीतर उस सिम कार्ड का पता लगा लिया जिसका इस्तेमाल बम धमाके के लिए किया गया था. पता चला कि यह सिम कार्ड पश्चिम बंगाल के आसनसोल के रहने वाले बाबूलाल यादव के फ़र्ज़ी नाम से, एक जाली ड्राइविंग लाइसेंस का इस्तेमाल करके ख़रीदा गया था. इस ख़बर को 21 मई, 2007 के द टाइम्स ऑफ इंडिया में भी प्रकाशित किया गया था.
ठीक अजमेर शरीफ़ धमाके की तरह, पुलिस ने जांच की इस कड़ी को नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर समझा. उन्होंने न सिर्फ़ सौ से ज़्यादा मुस्लिम नौजवानों को इस अपराध के आरोप में हिरासत में लिया, बल्कि विरोध कर रही भीड़ पर गोलियां भी चलाईं, जिसमें पांच लोगों की जान चली गई.
मैं 25 साल के एक नौजवान, इब्राहीम जुनैद से पहली बार तब मिला, जब जेल में पांच महीने बिताने के बाद उसे ज़मानत मिली थी, जिस पर ‘आतंकवादी’ होने का कलंक लग चुका था. वह अपनी बेगुनाही साबित करने और अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के लिए जी-जान से कोशिश कर रहा था. उसे हैदराबाद के पुराने शहर में स्थित अपने पारंपरिक चिकित्सा महाविद्यालय (कॉलेज) में दोबारा दाख़िला लेने से और अपनी अंतिम परीक्षा देने से रोक दिया गया था.
आख़िरकार, दो साल बाद उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया गया और उसने मेडिकल कॉलेज में दोबारा पढ़ाई शुरू कर दी. जब मैं उससे मिला, तो जेल में बिताए सालों और अपने ऊपर हुए ज़ुल्म के गहरे ज़ख़्मों के बावजूद वह एक सामान्य ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रहा था. उस समय मैंने लिखा था:
18 मई 2007 को पुराने शहर की ऐतिहासिक मक्का मस्जिद पर हुए आतंकी हमले में वह बाल-बाल बच गया था. लेकिन कुछ ही महीने बाद, सादे कपड़ों में आए पुलिसवालों ने उसे ग़ैर-क़ानूनी ढंग से अग़वा कर लिया, उस पर ज़ुल्म ढाए और उसे जेल में डाल दिया. फिर भी, उसने न तो हार मानी और न ही उम्मीद का दामन छोड़ा. यह उसकी अपनी आपबीती है.
हर शुक्रवार की तरह इब्राहीम अपने दोस्तों के साथ यूनानी मेडिकल कॉलेज से पास की मक्का मस्जिद तक पैदल गया. गर्म दोपहर थी, नमाज़ ख़त्म हो चुकी थी, और नमाज़ियों की भीड़ मस्जिद से बाहर निकल रही थी. अचानक इब्राहीम ने अपने पीछे एक ज़ोरदार धमाका सुना. जब वह मुड़ा, तो उसने देखा कि मस्जिद धुएं से पूरी तरह भर गई है. हर तरफ़ लोग चीखते-चिल्लाते भाग रहे हैं. ज़मीन पर ख़ून से लथपथ लाशें बिखरी पड़ी हैं. इब्राहीम ने देखा कि एक आदमी का सिर फटकर खुल गया है, और कई कटे हुए अंग इधर-उधर बिखरे पड़े थे.
यह अफ़वाह फैलने के बाद कि और बम फट सकता है लोगों में और ज़्यादा दहशत फैल गई. जब वह बाहर की तरफ़ भाग रहा था, तो उसने देखा कि उसके कॉलेज के एक प्रोफेसर बेहोश पड़े हैं, और उनके हाथ-पैर टूट गए हैं. इस अफ़रातफ़री में उसने अपने दोस्तों को आवाज़ दी, और वे उन्हें अपने कंधे पर उठाकर बाहर ले आए, और अपने प्रिंसिपल की कार में बिठाकर तुरंत अस्पताल पहुंचाया.
बाद में इब्राहीम को पता चला कि शहर की पुलिस ने कुछ ही घंटों के अंदर यह ऐलान कर दिया था कि इस हमले की साज़िश एक इस्लामी आतंकवादी संगठन ने रची थी. पुलिस ने उन मुस्लिम प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर गोलियां चलाईं जो इस बात से नाराज़ थे कि पुलिस मस्जिद पर हुए इस आतंकवादी हमले को रोकने में नाकाम रही है.
‘इस हमले के लिए कौन ज़िम्मेदार था?’
बम हमले के बाद कई दिनों तक इब्राहीम बस अपने घर पर सोता रहा. मस्जिद में पड़ी लाशों और क्षत-विक्षत शरीरों की तस्वीरें उसके ज़ेहन में बार-बार कौंधती रहीं. धमाके के आठवें दिन, हैदराबाद पुलिस की विशेष जांच दल ने उसे पूछताछ के लिए बुलाया. अफ़सर ने उससे पूछा कि इस हमले के लिए कौन ज़िम्मेदार था. इब्राहीम ने कहा कि उसे नहीं पता. लेकिन उसने पलटकर यह सवाल पूछा कि पुलिस को इतना पक्का यक़ीन कैसे है कि आतंकवादी किसी दूसरे समुदाय के नहीं हो सकते.
उस पूरे दिन, फिर लगातार अगले तीन दिनों तक, और उसके बाद भी समय-समय पर इब्राहीम से कड़ी पूछताछ की गई. फिर उन्होंने उससे यह पूछना शुरू कर दिया कि कहीं बम उसने ख़ुद तो नहीं लगाया था.
शायद क़ानून के साथ इस शुरुआती झड़प की वजह से ही पुलिस ने मक्का मस्जिद ब्लास्ट के बाद उसे पकड़ लिया था. शायद इसकी वजह यह रही हो कि वह दाढ़ी रखता था और बहुत ज़्यादा धार्मिक था. जब वह 12 साल का था, तो उसके माता-पिता ने तय किया कि वे ईसाई मिशनरी स्कूल से उसका नाम कटवा देंगे और उसे चार साल के लिए एक स्थानीय मदरसे में ‘डे स्कॉलर’ के तौर पर पढ़ने के लिए भेजेंगे.
वे चाहते थे कि उनका कम से कम एक बेटा ‘हाफ़िज़’ बने- यानी ऐसा व्यक्ति जिसे पूरा कुरान ज़बानी याद हो. उन्हें निराशा नहीं हुई, क्योंकि इब्राहीम ने चार साल में ही मदरसे की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी कर ली थी. लेकिन वह फिर भी डॉक्टर बनना चाहता था. उसने एक दूसरे प्राइवेट स्कूल में दाख़िला लेने और अपनी हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के लिए बहुत संघर्ष किया.
लेकिन इब्राहीम को पूरा यक़ीन था कि पुलिस ने उसे ख़ास तौर पर इसलिए निशाना बनाया था, क्योंकि वह एक मानवाधिकार समूह, सिविल लिबर्टीज़ मॉनिटरिंग कमेटी में शामिल हो गया था. यह समूह पुलिस की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ अपने साहसी और बेबाक रुख़ के लिए जाना जाता था. अपनी गिरफ़्तारी से कुछ महीने पहले वह गुजरात पुलिस द्वारा सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी के एनकाउंटर के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करने में सबसे आगे था, जिस एनकाउंटर में हैदराबाद पुलिस बलों की भी सक्रिय मिलीभगत थी.
पुलिस अधिकारी ने यह तर्क दिया कि सोहराबुद्दीन एक छोटा-मोटा अपराधी था और उसे ऐसी ही मौत मिलनी चाहिए थी. इब्राहीम अपनी बात पर अड़ा रहा, ‘भले ही वह अपराधी था, आपको उस पर आरोप लगाकर उसे अदालत का सामना करने देना चाहिए था. और उसकी पत्नी के बारे में क्या? क्या वह भी अपराधी थी?’ पुलिसवाला चिढ़ गया, और उसने इब्राहीम से पूछा, ‘क्या तुम नेता बनने की कोशिश कर रहे हो?’
2007 में हैदराबाद में आतंकवादी बम धमाकों के दूसरे दौर के कुछ ही समय बाद, इब्राहीम अपने शिक्षक और सहकर्मियों के साथ दिल्ली और मसूरी के एक स्टडी टूर पर गया. वह अपनी वापसी पर ट्रेन से अभी उतरा ही था और अपने भाई का इंतज़ार कर रहा था कि तभी तीन आदमियों ने उसकी कमर पकड़ ली और उसे घसीटकर एक गाड़ी में डाल दिया. उन्होंने उसे चुप रहने की धमकी दी, वरना उसे जान से मार देने की बात कही. वे गाड़ी चलाकर पुनाना पुल पहुंचे, और फिर उन्होंने उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी और उसके हाथ पीछे की ओर बांध दिए. गाड़ी लगभग दो घंटे तक चलती रही, जिसके बाद वे आख़िरकार एक इमारत के पास रुके. यह जगह शहर के ट्रैफ़िक के शोर-शराबे से बहुत दूर थी.
इमारत के अंदर लेजाकर उन्होंने उसका मोबाइल और पैसा छीन लिया. आधी रात के क़रीब उन्होंने उसके सारे कपड़े उतार दिए और उसे सिर्फ़ अंडरवियर में छोड़ दिया. दो आदमियों ने उसके पैरों को ज़ोर से फैला दिया, जबकि एक दूसरा आदमी उसके कंधे पर चढ़ गया और उस पर ज़ोर-ज़ोर से वार करने लगा. वे बारी-बारी से उसके गुप्तांगों, कानों, होठों, निप्पल्स, कनपटी और जोड़ों पर बिजली के झटके देते रहे. तब तक झटके देते रहे जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गया. वे उसे फिर से होश में लाते और फिर से शुरू हो जाते. रबर के बेल्ट से उसके तलवों पर मारते.
यातना और ख़ौफ़ का भंवर
सांप्रदायिक ताने कसते हुए वे उससे बार-बार पूछते रहे कि धमाकों के लिए कौन ज़िम्मेदार है. उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि उसे कुछ नहीं पता, और शहर में हुए आतंकवादी हमलों से उसका कोई लेना-देना नहीं है. सुबह-सवेरे जब वह एक बार फिर बेहोश हो गया, तो एक बूट वाला आदमी उसके ऊपर से गुज़रा. फिर उसे नंगी हालत में घसीटकर एक एयर-कंडीशंड कमरे में ले जाया गया, जहां वह सर्दी से कांपते हुए और असहनीय दर्द में किसी तरह सोने की कोशिश करता रहा.
दिन से रात हुई, फिर दिन निकला, मगर यही सिलसिला चलता रहा. वह इस यातना और ख़ौफ़ के भंवर में समय का हिसाब ही भूल गया. उसके पेशाब से ख़ून आने लगा. इब्राहीम को जानकारी नहीं थी मगर बाहर उसी मानवाधिकार संगठन ने, जिसका वह सदस्य था, अन्य मानवाधिकार समूहों तथा ऐसे 20 से ज़्यादा अन्य नौजवानों के परिवारों की एक मीटिंग बुलवाई, जिन्हें उसी तरह अगवा करके हिरासत में रखा गया था.
उन्होंने हाईकोर्ट में ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (habeas corpus) याचिकाएं दायर कीं, राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार तथा अल्पसंख्यक आयोगों से गुहार लगाई, और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों तथा प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया. इन सभी विरोध प्रदर्शनों और अपीलों में इब्राहीम के माता-पिता सबसे आगे थे.
आख़िरकार पुलिस को दबाव के आगे झुकना पड़ा और उसने उन नौजवानों को सिकंदराबाद के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सरकारी आवास पर पेश किया. पुलिस ने यह दावा किया कि उन्हें तो बस कुछ ही घंटे पहले गिरफ़्तार किया गया है, क्योंकि वे राज्यसत्ता के ख़िलाफ़ मुस्लिम नौजवानों को भड़काने की ‘विध्वंसक’ साज़िशें रच रहे थे. मजिस्ट्रेट अपने घर से बस कुछ ही पल के लिए बाहर निकले, उन नौजवानों की गिनती की, और बस इतना कहा, ‘इन्हें जेल भेज दो.’ उन्होंने हिरासत में लिए गए उन नौजवानों को अपनी बात कहने का कोई मौक़ा नहीं दिया, और न ही उन्हें दी गई यातनाओं के बारे में कुछ पूछताछ की.
जेल में, जेल अधिकारियों और यहां तक कि कुछ क़ैदियों ने भी उन्हें ‘गद्दार’, ‘आतंकवादी’ और ‘आईएसआई एजेंट’ कहकर ताना मारा. उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच अलग रखा गया और उनके साथ भेदभाव किया गया.
मानवाधिकार संगठनों ने राज्य मानवाधिकार आयोग के साथ मिलकर इब्राहीम और अन्य लोगों द्वारा पुलिस पर लगाए गए आरोपों की जांच की. उन्हें इस बात के पर्याप्त सहायक सबूत मिले जिससे लगा कि उनके द्वारा लगाए गए आरोप सही थे. जेल अधिकारियों ने जेल में आने के समय उन लोगों के शरीर पर लगे चोट के निशानों के भी दर्ज किया था, जिससे साफ़ पता चल रहा था कि उन्हें यातना दी गई थी. उन्होंने इसलिए ऐसा किया था ताकि जेल में रहने के दौरान उन पर यातना देने का आरोप न लगे.
एक-एक करके, जेल में बंद उन युवाओं को ज़मानत मिल गई. इब्राहीम को ज़मानत मिलने में 5 महीने लगे, क्योंकि पुलिस ने उसकी ज़मानत का ज़ोरदार विरोध किया था. हिरासत में रहते हुए उसे ‘नार्को-टेस्ट’ के लिए बैंगलोर की एफएसएल लैब ले जाया गया. इब्राहीम को याद है कि वहां उसे एक दवा का इंजेक्शन लगाया गया था जिसे आम तौर पर ‘ट्रुथ सीरम’ कहा जाता है, और उसके बाद उससे पूछताछ की गई थी. उस दौरान क्या हुआ, उसे कुछ भी याद नहीं है. आख़िरकार, 50,000 रुपये की ज़मानत मंज़ूर कर ली गई. इतनी बड़ी रक़म जमा करने के लिए उसकी मां को अपने गहने बेचने पड़े.
‘चार्जशीट में किसी मुस्लिम युवा का नाम नहीं’
यह ग़ौर करने वाली बात है कि हैदराबाद पुलिस ने आख़िरकार जो चार्जशीट पेश की, उसमें इब्राहीम या उस समय अगवा किए गए किसी भी दूसरे नौजवान पर यह आरोप नहीं लगाया कि शहर में हुए आतंकवादी हमलों से उनका कोई सीधा संबंध है.
इसके बरअक्स जो आरोप लगाए गए वो बहुत सतही क़िस्म के थे. उनमें दावा किया गया था कि वह जिहादी विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखता है, एक ऐसी विचारधारा जो आतंक का सहारा इसलिए लेती है, ‘ताकि वे भारत पर उसी तरह राज कर सके, जिस तरह वे पाकिस्तान पर कर रहे हैं’.
कहा गया कि उसे रेलवे स्टेशन पर चल रही एक बैठक के दौरान गिरफ़्तार किया गया था, और उसके पास से देशद्रोही साहित्य तथा कुछ वीसीडी बरामद हुए थे, जिनमें ‘गुजरात के सांप्रदायिक दंगों और जिहादी तत्वों द्वारा पश्चिमी देशों के लोगों के सिर क़लम किए जाने के दृश्य दिखाए गए थे, जिनका मक़सद मुस्लिम नौजवानों को ग़ैर-मुस्लिम समुदायों से बदला लेने के लिए उकसाना था…’
ज़मानत पर रिहा होने के बाद इब्राहीम ने अपने मेडिकल कॉलेज में दोबारा दाख़िला पाने और अपनी परीक्षाओं में बैठने के लिए भरपूर कोशिश की. हालांकि उसके सहपाठियों, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम, दोनों ने ही वापस आने पर उसका स्वागत किया, फिर भी देशद्रोह और आतंकवाद को समर्थन देने के आरोपों की वजह से कॉलेज प्रशासन काफ़ी सशंकित था.
वे किसी भी तरह के क़ानूनी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे. वह सोचता रहता कि कब अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर पाएगा, कभी कर पाएगा भी या नहीं. आख़िरकार, वह इस मामले को लेकर हाईकोर्ट गया. हाईकोर्ट ने उसके कॉलेज को आदेश दिया कि दोबारा उसे दाख़िला दिया जाए. अंततः इब्राहीम ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की और अपनी मेडिकल की शिक्षा पूरी की.
इब्राहीम जब मुझसे मिला तो वह भी उन सभी नौजवानों की तरह बहुत उलझन में फंसा हुआ था जिन्हें हैदराबाद पुलिस ने अग़वा करके यातनाएं दी थीं. अगर वह अपने ऊपर हुए ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खुलकर बोलता तो उसे इस बात का डर था कि पुलिस उसके ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई करती. उसे राजद्रोह और आतंकवाद के झूठे मामलों में फंसाया जा सकता था, उसे और यातनाएं दी जा सकती थीं या उसे मारा भी जा सकता था. लेकिन अगर वह इसके नतीजों से डरकर चुप रहता, तब भी ख़तरा कम नहीं हो जाता, पुलिस फोर्स का डर बना ही रहता, जो पुलिस कथित माओवादियों और आतंकवादियों के ख़िलाफ़ ग़ैर-क़ानूनी हथकंडे अपनाने की आदी हो चुकी थी.
इस बारे में इब्राहीम की समझ एक़दम साफ़ था: वह अन्याय के ख़िलाफ़ डटकर लड़ेगा, और इसके जो भी नतीजे होंगे, उनका सामना करेगा. इसीलिए उसने मुझसे बात करने की ज़िद की, और उसकी इच्छा थी कि मैं उसकी कहानी लिखूं. मैंने वैसा ही किया, और उसे द हिंदू में प्रकाशित किया.
दो साल बाद बरी किया गया
आख़िरकार दो साल बाद उसे बरी कर दिया गया, और उसके साथ-साथ उन सभी नौजवानों को भी, जिन पर इस अपराध का आरोप लगा था. हिंदुत्व नेता असीमानंद के क़बूलनामे से यह बात सामने आई कि हैदराबाद के मक्का मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान हुआ बम धमाका, असल में कुछ हिंदुत्व संगठनों द्वारा रची गई एक साज़िश थी.
जब मैं इब्राहीम से मिला तो वह पुराने हैदराबाद में एक छोटा-सा यूनानी दवाख़ाना चला रहे थे. लेकिन उन्होंने पक्का इरादा कर रखा था कि हमें एक याचिका दायर करनी चाहिए, जिसमें यह मांग की जाए कि पुलिस उन्हें- और उनके साथ गिरफ़्तार किए गए दूसरे नौजवानों को भी- सालों तक दी गई यातना और बेवजह जेल में रखने के लिए मुआवज़ा दे.
मैं इस बात के लिए तैयार हो गया कि तीस्ता सीतलवाड़ के साथ मिलकर मुआवज़ा की मांग करने वाली एक याचिका दायर करूंगा. यह एक ऐसे सार्वजनिक अपराध के लिए सार्वजनिक प्रायश्चित का प्रतीक था, जिस अपराध को माफ़ नहीं किया जा सकता.
दिसंबर 2011 में आंध्र प्रदेश सरकार ने घोषणा की कि वह उन 70 युवा मुस्लिम पुरुषों को मुआवज़ा देगी, जिन्हें 2007 के मक्का मस्जिद धमाका मामले में ग़लत तरीक़े से फंसाया गया, पुलिस हिरासत में जिन्हें यातनाएं दी गईं, और आख़िरकार अदालत ने जिन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया.
राज्य अल्पसंख्यक आयोग की एक टीम ने भी इस मामले की जांच करने के बाद एक रिपोर्ट जारी की और आरोप लगाया कि पुलिस ने इन युवकों को यातनाएं दी थीं.
सीएम ने माफी मांगी, सताए गए लोगों को मुआवज़ा दिया गया
तत्कालीन मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने उन सभी युवकों से माफ़ी मांगी, जिन्हें ग़लत तरीक़े से हिरासत में लिया गया था. इस मामले में बरी हुए 15 लोगों में से प्रत्येक को 3 लाख रुपये का भुगतान किया गया, वहीं 46 अन्य लोगों, जिन्हें पुलिस की पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था, को प्रति व्यक्ति 20,000 रुपये का चेक दिया गया. उन्हें प्रमाण पत्र भी दिया गया, जिनमें यह लिखा गया था कि वे किसी भी मामले में शामिल नहीं हैं.
भारत में यह पहली बार हुआ कि किसी राज्य सरकार ने आतंकवाद के आरोप में ग़लत तरीक़े से गिरफ़्तार किए गए और सताए गए लोगों को मुआवज़ा दिया हो.
सीबीआई और राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 10 आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की, जो सभी अभिनव भारत संगठन के सदस्य थे. इनमें नबकुमार सरकार उर्फ़ स्वामी असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता, लोकेश शर्मा उर्फ़ अजय तिवारी, लक्ष्मण दास महाराज, मोहनलाल रेतेश्वर और राजेंद्र चौधरी शामिल थे. दो आरोपियों, रामचंद्र कालसांगरा और संदीप डांगे को फ़रार घोषित किया गया था.
लेकिन 2015 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक पूर्व सदस्य और वकील हरिनाथ को अपनी तरफ़ से केस लड़ने के लिए नियुक्त किया, जिन्हें आतंकवाद से जुड़े मामलों की पैरवी करने का कोई अनुभव नहीं था. 16 अप्रैल, 2018 को स्वामी असीमानंद सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया. अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी किसी भी आरोपी का दोष साबित करने में विफल रही.
‘हमारे भाई-बहनों को किसने मारा? क्या हमें कभी सच पता चल पाएगा?’ धमाके में मारे गए लोगों के एक परेशान परिजन रहमत अली ने खचाखच भरे कोर्टरूम के बाहर खड़े होकर पूछा था.
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं.)
(शोध सहायता के लिए सुमैय्या फ़ातिमा और सैयद रूबील हैदर ज़ैदी का आभार.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
