तीस्ता परियोजना: चीन द्वारा समर्थन के वादे के बाद भारत बोला- सभी घटनाक्रमों पर विचार किया जाएगा

पिछले हफ़्ते बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान के बीजिंग दौरे पर हुई चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात के दौरान दोनों देशों के बीच तीस्ता नदी प्रबंधन को लेकर सहयोग की बात कही हुई थी. इस संबंध में भारत ने कहा है कि वह पहले ही बांग्लादेश के समक्ष अपने विचार रख चुका है और नई दिल्ली समग्र दृष्टिकोण में इससे जुड़ी सभी घटनाओं को ध्यान में रखेगी.

नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में भारतीय और बांग्लादेशी झंडों की फ़ाइल तस्वीर. (फोटो: पीआईबी)

नई दिल्ली: भारत ने शुक्रवार (3 जुलाई) को कहा कि तीस्ता मुद्दे पर उसके रुख में ‘सभी संबंधित घटनाक्रमों’ को ध्यान में रखा जाएगा. यह बयान बीते दिनों चीन द्वारा बांग्लादेश में बहने वाली तीस्ता नदी प्रबंधन में मदद देने के वादे के कुछ दिनों बाद सामने आया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले हफ़्ते बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने बीजिंग का दौरा कर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात की थी. इस दौरान दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को और मज़बूत किया और एक संयुक्त बयान जारी कर तीस्ता नदी प्रबंधन से लेकर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी तक में सहयोग की बात कही गई.

विज्ञप्ति में कहा गया कि चीन तीस्ता नदी परियोजना को अपनी क्षमता के अनुसार समर्थन देगा और दोनों पक्षों के विशेषज्ञों को इसकी व्यवहार्यता अध्ययन में तेजी लाने में मदद करेगा.

इस यात्रा के परिणामों से संबंधित पूछे गए एक सवाल के जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने केवल तीस्ता नदी के मुद्दे पर ही बात की.

उन्होंने कहा, ‘बांग्लादेश में परियोजनाओं के लिए भारत की विकास से जुड़ी मदद आपसी सहमति से बने रोडमैप पर आधारित है, जिसकी समय-समय पर समीक्षा की जाती है.’

रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में भारत के विचारों से पहले ही बांग्लादेश को अवगत किया जा चुका है और नई दिल्ली तीस्ता मुद्दे पर अपने समग्र दृष्टिकोण में इससे जुड़ी सभी घटनाओं को ध्यान में रखेगा.

उल्लेखनीय है कि बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने कहा था कि बीजिंग जल संसाधन प्रबंधन में बांग्लादेश का ‘पूरा सहयोग’ करेगा.

बांग्लादेशी दैनिक ‘द डेली स्टार’ के अनुसार, बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने जानकारी दी कि तीस्ता परियोजना, जो पूरी तरह से बांग्लादेश के इलाके में है, उससे भारत के साथ कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए; हालांकि उन्होंने यह भी माना कि सूखे के मौसम में पानी का पर्याप्त बहाव सुनिश्चित करने के लिए नई दिल्ली के साथ पानी के बंटवारे का समझौता ज़रूरी है.

गौरतलब है कि इस नदी परियोजना पर बातचीत 2020 में शुरू हुई थी, जब ढाका ने लगभग 1 अरब डॉलर की इस परियोजना के लिए बीजिंग से 72.5 करोड़ डॉलर के आसान ऋण की मांग की थी.

तब मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने सबसे पहले मार्च 2025 में बीजिंग की अपनी यात्रा के दौरान एक संयुक्त बयान में ‘तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना’ (टीआरसीएमआरपी) में चीन की भूमिका का स्वागत किया था. इसके बाद मई में विदेश मंत्री खलीलुर रहमान की बीजिंग यात्रा के दौरान चुनी हुई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार ने पहली बार औपचारिक रूप से इसमें चीन की भागीदारी की मांग की.

मालूम हो कि रणनीतिक रूप से संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास होने के कारण इस परियोजना में चीन की भागीदारी को लेकर भारत के नीति-निर्माताओं की चिंताएं नई नहीं हैं.

इससे पहले मई 2024 में तत्कालीन विदेश सचिव विनय क्वात्रा की ढाका यात्रा के दौरान भारत ने तीस्ता प्रोजेक्ट के लिए खुद फंड देने की पेशकश की थी; इस कदम को बीजिंग को इससे दूर रखने की कोशिश के तौर पर देखा गया था.

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना छात्रों के नेतृत्व वाले आंदोलन द्वारा सत्ता से बाहर किए जाने से लगभग दो महीने पहले आधिकारिक दौरे पर भारत आई थीं. तब उनकी अहम घोषणाओं में से एक यह थी कि भारत तीस्ता प्रोजेक्ट का आकलन करने के लिए बांग्लादेश एक तकनीकी टीम भेजेगा.

इस साल मई में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली में बांग्लादेश से आए पत्रकारों से कहा था कि भारत इस परियोजना पर ढाका के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है.

ज्ञात हो कि टीआरसीएमआरपी भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटके तीस्ता जल-बंटवारे समझौते से अलग है. यह समझौता 2011 में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा राज्य के कृषि हितों का हवाला देते हुए समझौते के मसौदे पर आपत्ति जताने के बाद से 15 वर्षों से अधिक समय से रुका हुआ है.

इस साल मई में राज्य विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत के बाद बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने कहा था कि रुकी हुई जल-बंटवारे संधि पर फिर से विचार करने के बारे में सोचने से पहले ढाका पश्चिम बंगाल की नई सरकार से स्पष्टता का इंतजार करेगा.