लद्दाख: करगिल के मौजूदा सीईसी के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर निर्णय में देरी से नाराज़ सांसद और पार्षद

लद्दाख में इस वक़्त स्थानीय स्वशासन की महत्वपूर्ण संस्था करगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद अभूतपूर्व संकट से गुज़र रही हैं. परिषद के मौजूदा मुख्य कार्यकारी पार्षद के ख़िलाफ़ 'इंडिया' गठबंठन के पार्षदों द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में देरी को लेकर पार्षदों और स्थानीय सांसद ने सूबे के प्रशासन पर इस इलाके में लोकतंत्र की 'बची-खुची निशानियों' को कमज़ोर करने का आरोप लगाया है.

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19 मार्च, 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (बीच में) की नई दिल्ली में मुख्य कार्यकारी पार्षद मोहम्मद जाफ़र अखून (दाएं) और सांसद मोहम्मद हनीफ़ा के साथ बैठक की तस्वीर. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद, करगिल के मौजूदा मुख्य कार्यकारी पार्षद (सीईसी) के ख़िलाफ़ ‘इंडिया’ गठबंठन के पार्षदों द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर फ़ैसला लेने में हो रही देरी ने केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पार्षदों और स्थानीय सांसद ने प्रशासन पर इस इलाके में लोकतंत्र की ‘बची-खुची निशानियों’ को कमजोर करने का आरोप लगाया है.

उल्लेखनीय है कि मौजूदा सीईसी मोहम्मद जाफर अखून को हटाने के लिए 14 मई को करगिल के डिप्टी कमिश्नर (जो हिल परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी हैं) को अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित एक पत्र सौंपा गया था, जिस पर 16 पार्षदों के हस्ताक्षर हैं.

पार्षदों की ओर से पेश किए गए इस अविश्वास प्रस्ताव में कहा गया है, ‘हम, लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद, करगिल के चुने हुए पार्षद, जिनके नीचे हस्ताक्षर हैं – जो परिषद के कुल चुने हुए सदस्यों का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा हैं और लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद करगिल एक्ट, 1997 की धारा 27 के प्रावधानों के तहत ऐसा करने के लिए अधिकृत हैं- मौजूदा अध्यक्ष/चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर को हटाने के लिए परिषद की एक विशेष बैठक बुलाने का यह औपचारिक अनुरोध पेश करते हैं.’

मालूम हो कि यह अविश्वास प्रस्ताव तब पेश किया गया जब सीईसी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और कांग्रेस के बीच सत्ता-साझाकरण समझौते की खुलेआम अनदेखी करते हुए अपना ढाई साल का कार्यकाल पूरा होने पर पद छोड़ने से इनकार कर दिया.

समझौते के तहत सीईसी के अध्यक्ष का पद दोनों सहयोगियों के बीच बारी-बारी से दिया जाना था; पहले ढाई साल के लिए एनसी ने इसकी कमान संभाली और उसके बाद उतने ही समय के लिए कांग्रेस को संभालनी थी.

फ्लोर टेस्ट में देरी से पार्षद और सांसद नाराज़

इस अविश्वास प्रस्ताव पर प्रशासन द्वारा कोई फ़ैसला न लिए जाने के चलते ‘इंडिया’ गठबंधन के पार्षद बहुत नाराज़ हैं.

इस संबंध में कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष और चोस्कोरे के पार्षद नासिर हुसैन मुंशी ने फोन पर द वायर को बताया, ‘हमने फ्लोर टेस्ट की मांग के लिए लद्दाख के उपराज्यपाल और मुख्य सचिव से भी मुलाक़ात की. उन्होंने हमें बार-बार भरोसा दिलाया कि वे जल्द ही फ़ैसला लेंगे, लेकिन प्रशासन ने अभी तक फ्लोर टेस्ट कराने की कोई तारीख़ तय नहीं की है. ऐसा लगता है कि वे जान-बूझकर इसमें देरी कर रहे हैं.’

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद केंद्र-शासित प्रदेश में ‘पहाड़ी परिषद’ ही एकमात्र चुनी हुई प्रतिनिधि संस्था बची है.

उन्होंने कहा, ‘जिस तरह से वे देश के बाकी हिस्सों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म कर रहे हैं, हमें डर है कि वे हमारे जैसे छोटे ज़िले को भी नहीं छोड़ेंगे.’

उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी मौजूदा अध्यक्ष का समर्थन कर रही है.

सिल्मू इलाके से एनसी पार्षद फ़िरोज़ खान ने कहा कि प्रशासन के पास फ्लोर टेस्ट कराने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘नियमों के मुताबिक फ्लोर टेस्ट अब तक हो जाना चाहिए था.’

लद्दाख के सांसद हाज़ी हनीफ़ा जान ने इस कदम को इलाके की ‘आखिरी बची हुई लोकतांत्रिक संस्था को कमजोर और कमज़ोर करने’ की कोशिश बताया.

उन्होंने कहा, ‘पूरे लद्दाख में करगिल पहाड़ी परिषद के अलावा कोई दूसरी चुनी हुई संस्था नहीं है. यह दुखद है कि पार्षदों की बार-बार की गुजारिश के बावजूद वे फ्लोर टेस्ट नहीं करवा रहे हैं.’

कानून और सत्ता का समीकरण

लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद एक्ट, 1997 के मुताबिक, विश्वास मत के लिए बैठक परिषद के कुल सदस्यों में से कम से कम एक-तिहाई सदस्यों के अनुरोध पर बुलाई जानी चाहिए, और अगर अविश्वास प्रस्ताव को बहुमत का समर्थन मिलता है, तो अध्यक्ष को अपना पद छोड़ना होगा.

इस एक्ट की धारा 27 के सब-सेक्शन (2) में लिखा है, ‘परिषद के कम से कम एक-तिहाई सदस्यों की लिखित मांग पर बुलाई गई परिषद की एक विशेष बैठक में कुल सदस्यों की बहुमत से पास हुए प्रस्ताव के ज़रिए अध्यक्ष को उनके पद से हटाया जा सकता है.’

फ्लोर टेस्ट बुलाने के लिए कम से कम 10 पार्षदों का समर्थन ज़रूरी है. अगर फ्लोर टेस्ट के दौरान 16 पार्षद अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करते हैं, तो सीईसी अपनी सत्ता खो देता है.

एनसी और कांग्रेस के दावों के अनुसार, मौजूदा सीईसी के पास आठ बागी पार्षदों का समर्थन है – सात एनसी से और एक कांग्रेस से. सदन में भारतीय जनता पार्टी के भी छह पार्षद हैं – दो चुने हुए और चार मनोनीत.

संपर्क करने पर सीईसी अखून ने दावा किया कि उन्हें सदन में बहुमत का समर्थन हासिल है. उन्होंने कहा, ‘मेरे पास अभी भी 16-17 पार्षदों का समर्थन है. पत्र में कुछ पार्षदों के जाली हस्ताक्षर हैं.’

उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा पार्षदों ने उन्हें बिना शर्त समर्थन दिया है.

जब उन पार्षदों के नाम बताने को कहा गया जिनके हस्ताक्षर एनसी और कांग्रेस ने जाली बनाए हैं, तो अखून ने कहा, ‘मैं आपको उनके नाम नहीं बता सकता.’

इसके बाद जब उनसे पूछा गया कि प्रशासन फ्लोर टेस्ट के लिए बैठक क्यों नहीं बुला रहा है– क्योंकि ‘इंडिया’ गठबंठन के पास अभी भी ज़रूरी संख्या में पार्षद हैं, भले ही 16-17 पार्षदों के समर्थन का उनका दावा सही मान लिया जाए – तो अखून ने कहा कि बैठक बुलाने की समयसीमा के बारे में कानून में कुछ नहीं कहा गया है.

उन्होंने कहा, ‘यह ज़रूरी नहीं है कि प्रस्ताव पेश होने के तुरंत बाद ही फ्लोर टेस्ट कराया जाए.’

संपर्क करने पर करगिल के डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार ने पुष्टि की कि उन्हें अविश्वास प्रस्ताव मिल गया है और वे प्रक्रिया के अनुसार उस पर कार्रवाई कर रहे हैं.

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