सुविधा में तब्दील दलबदल: माननीय की ‘महानता’ के तले छिपता नागरिकों से किया धोखा

एक अध्ययन के अनुसार नरेंद्र मोदी के बारह साल के सत्ताकाल में तक़रीबन दो सौ सांसदों और विधायकों ने दूसरी पार्टियों को छोड़कर भाजपा में दलबदल किया. हर चार दलबदलू सांसदों-विधायकों में से तीन से ज़्यादा को भाजपा ने अपनी गोद में बिठाया और आधे-पौने ही उसके बजाय कहीं और गए. भाजपा में शामिल हुए 68 प्रतिशत सांसद-विधायक पहले कांग्रेसी हुआ करते थे.

/
(फोटो साभार: पीआईबी/पिक्साबे)

आज़ादी के बाद देश में नवस्थापित लोकतंत्र का सांसदों व विधायकों के दल-बदल, खरीद-फरोख्त और तोड़-फोड़ आदि की बीमारियों से सामना शुरू हुआ तो माना जाता था कि जैसे-जैसे लोकतांत्रिक चेतनाओं व विचारों का विकास होगा और वे परिपक्व होंगे, वैसे-वैसे इन बीमारियों का प्रकोप घटता जाएगा.

इस मान्यता का आधार यह था कि अपेक्षाकृत सचेत लोकतंत्र में राजनीतिक दल व जनप्रतिनिधि इतने बीमार होते हुए थोड़ा-बहुत तो लजाएंगे ही. इस कारण और कि लोकतंत्र आमतौर पर लोकलाज से ही चलता है.

लेकिन अफसोस कि न हम लोकतांत्रिक चेतनाओं का अपेक्षित विकास कर पाए, न राजनीति को विचारहीन होने से रोक पाए और न ये बीमारियां हमारे काबू में आ पाईं. उलटे बिग मनी और बड़े स्वार्थों के बड़े खेल से अब ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’ वाली हालत हो गई है. इतना ही नहीं, इस हालत के ‘लाभार्थियों’ द्वारा उसे ‘बदलने’ के जो तीन नए ‘उपाय’ ढूंढ़े गए हैं, वे भी कोढ़ में खाज ही पैदा कर रहे हैं.

उनका ढूंढ़ा पहला उपाय यह है कि दवा की बात ही बंद कर दी जाए और दूसरा यह कि मर्ज को कुछ इस तरह मरीज के गौरवबोध से जोड़ दिया जाए कि वह उसके साथ ही खुश रहने लग जाए. वैसे ही जैसे कभी टीबी को राजरोग या शाही बीमारी कहा जाता था.

तीसरा उपाय यह कि मर्ज के उत्प्रेरकों में धन व पद के लॉलीपॉप व प्रलोभनों के साथ प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो और आयकर विभाग की जांचों व छापों यानी भयादोहन को भी शामिल कर लिया जाए.

इन ‘उपायों’ का ही फल है कि अब सत्ता नियंत्रित समाचार माध्यम दलबदल के लिए ‘पालाबदल’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तोड़-फोड़ की साजिशों को ‘चाणक्य नीति’ बताते हैं और खरीद-फरोख्त की कवायदों को ‘ऑपरेशन’. ‘ऑपरेशन लोटस’ और ‘ऑपरेशन टाइगर’ इसी की मिसालें हैं, जिन्हें शुरू में छुप-छुपाकर, थोड़े अपराधबोध के साथ व इक्का-दुक्का अंजाम दिया जाता था और अब सीना ठोंककर सगर्व दिया जाता है – बतर्ज सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का!

गौरतलब है कि यह स्थिति हमेशा उन्हीं के पक्ष में जाती रही है, जिनके सैंया कोतवाल हों यानी जो सत्ता में या उसके सगे हों. इसलिए भले ही इसके कुप्रभाव पहले आम चुनाव से ही दिखने शुरू हो गए थे, उनके निवारण के वांछित उपाय नहीं किए गए. उल्टे अपनी बारी पर हर सत्ता दल ने खुद को इससे भरपूर उपकृत किया. ऐसे में वही हो सकता था, जो हो रहा है.

हमारी आज की पीढ़ी को भले ही यह जानकर ताज्जुब हो, लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि इस मामले में हम आज जिस गति को प्राप्त हो गए हैं, उसके बीज 1952 में मद्रास, 1953 में आंध्र प्रदेश और 1956 में केरल में हुई दलबदल की घटनाओं ने ही बो दिए थे.

लोकसभा के महासचिव रहे प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ स्मृतिशेष सुभाष सी. कश्यप ने अपनी पुस्तक ‘पॉलिटिक्स ऑफ डिफेक्शन (दलबदल की राजनीति) में इसका विस्तार से वर्णन किया है. उनके अनुसार 1957 से 1962 के बीच लगभग 542 विधायकों ने दलबदल किया था और 1967 में चौथे आम चुनाव के बाद उनका दलबदल और तेज हो गया था.

1967 में एक ही वर्ष में 430 बार दलबदल का रिकॉर्ड बना था, जबकि दलबदलुओं के कारण 16 महीनों में 16 सरकारें गिरी थीं.

जैसे उड़ि जहाज को पंछी…

मध्य प्रदेश में तो ऐसी अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई थी कि कुछ न पूछिए. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंडित डीपी मिश्र के मुख्यमंत्रित्व में सरकार बनाई तो दलबदल के चलते वह जल्दी ही अपदस्थ हो गई. उसकी जगह संविद सरकार बनी तो उसे भी लंबी उम्र नसीब नहीं हुई. श्यामाचरण शुक्ल के मुख्यमंत्रित्व में फिर कांग्रेस सरकार गठित हुई तो वह भी ज्यादा दिन नहीं चली.

लेकिन 1969 में मध्यावधि चुनाव के बाद कांग्रेस ही सत्ता में आई तो जो लोग उसको छोड़ गए थे, फिर उसमें लौट आए. पत्रकारों ने पूछा कि उन्होंने कांग्रेस क्यों छोड़ दी थी और छोड़ ही दी थी तो फिर उसमें वापस क्यों चले आए, तो उनका जवाब था, ‘जैसे उड़ि जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवै’.

1967 में ही हरियाणा के विधायक गया लाल ने हसनपुर (पलवल) से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतने व विधायक बनने के बाद, एक ही दिन में तीन बार दल बदल किया और अब तक का अटूट रिकॉर्ड बनाया.

पहले वे कांग्रेस में शामिल हुए, फिर यूनाइटेड फ्रंट में चले गए और उसी दिन वापस कांग्रेस में लौट आए. तब कांग्रेस नेता राव वीरेंद्र सिंह ने उनके लिए ‘आया राम गया राम’ का जुमला इस्तेमाल किया, जो अब तक हमारी राजनीति में दल-बदल को दर्शाने वाली सबसे लोकप्रिय कहावत बना हुआ है.

(बाद में एक ही झटके में पूरी सरकार के दल-बदल का रिकॉर्ड भी हरियाणा में ही बना. मुख्यमंत्री चौधरी भजनलाल (जनता पार्टी) 22 जनवरी, 1980 को अपनी पार्टी के लगभग सभी (35-37) विधायकों के साथ रातों-रात कांग्रेस (आई) में शामिल हो गए और उनकी जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस की सरकार हो गई.)

कश्यप के मुताबिक 1967 से 1985 तक दलबदल के कुल मिलाकर 2700 मामले रिकॉर्ड किए गए , जिनमें 212 दलबदलू विधायक मंत्री तो 15 मुख्यमंत्री बने. इसको लेकर ‘चिंतित’ देश की इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व वाली तत्कालीन सरकार ने गृहमंत्री यशवंतराव चव्हाण की अध्यक्षता में एक समिति गठित की. लेकिन इस समिति द्वारा 18 फरवरी, 1969 को लोकसभा में पेश की गई रिपोर्ट अगले चार साल तक धूल फांकती रही. फिर अचानक उसकी याद आई तो सरकार ने 16 मई, 1973 को दलबदल रोकने के लिए कानून बनाने के इरादे से लोकसभा में एक विधेयक पेश किया, लेकिन उसे पारित नहीं करा पाई.

1977 के लोकसभा चुनाव में उसकी बेदखली के बाद 1978 में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने भी ऐसा एक विधेयक पारित कराने की कोशिश की, तो उसके ही पक्ष के कुछ सांसदों ने उसका इतना तीव्र विरोध किया कि उसे अपने कदम वापस खींच लेने पड़े.

1984 के लोकसभा चुनाव में अपार बहुमत से जीत हासिल कर राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरकार ने 1985 में संविधान में 52वां संशोधन कराकर उसे दसवीं अनुसूची में जोड़ दिया. उसके अनुसार इसका मुख्य उद्देश्य संसद और विधानसभाओं के सदस्यों को व्यक्तिगत लाभ या प्रलोभन के लिए पार्टी बदलने से रोकना था और न रुकने पर उनको अयोग्य ठहराने के कड़े प्रावधान किए गए थे. इसीलिए उसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून के रूप में ही जाना जाता है.

लेकिन सच पूछिए तो इस कानून का एकमात्र उद्देश्य यह था कि उसकी बिना पर कांग्रेस रिकॉर्ड संख्या में चुनकर आए अपने 415 लोकसभा सदस्यों को दलबदल करने से रोके रख सके.

सामूहिक दलबदल की सुविधा

उस वक्त वह ऐसा करने में सफल भी रही, लेकिन बाद में यह कानून सांसदों व विधायकों के थोक में कहें या सामूहिक दलबदल की सुविधा बन गया. दूसरे शब्दों में कहें तो दलबदल व्यक्तिगत से ज्यादा सामूहिक और स्वत: प्रेरित से ज्यादा प्रायोजित होने लगे.

इसका कारण उक्त कानून का यह प्रावधान था कि यदि लोकसभा या किसी विधान सभा में किसी पार्टी के एक तिहाई से अधिक सदस्य अलग गुट बना लेते या किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं तो उनकी अपने सदन की सदस्यता नहीं समाप्त होगी क्योंकि उसे दलबदल नहीं बल्कि पार्टी का विभाजन माना जाएगा.

इसके विपरीत, पूरी पार्टी का किसी अन्य पार्टी में विलय इस शर्त पर मान्य होगा कि मूल पार्टी के कम से कम दो तिहाई सांसद या विधायक उस विलय के पक्ष में हों. इस स्थिति में विलय का समर्थन करने वाले और मूल पार्टी में बने रहने वाले दोनों ही तरह के सदस्यों की सदस्यता सुरक्षित रहेगी. हां, इन सारे मामलों में संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी का निर्णय ही अंतिम होगा.

जानकार बताते हैं कि आलोचकों ने इस कानून के बनते वक्त ही कहा था कि उसका मसौदा जल्दी में बनाया और जल्दबाजी में ही उसे संसद के दोनों सदनों से पास करा लिया गया, जिससे उसमें कई कमियां रह गईं . उनकी ओर ध्यान दिलाए जाने पर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह कहकर छुट्टी कर दी थी कि यह तो अभी पहला कदम है, आगे देखा जाएगा. लेकिन आगे कुछ नहीं देखा जा सका और देश अनेक बार (इस कानून के अनुसार वैध) थोक दलबदल के दुष्परिणाम देखने को अभिशप्त हुआ.

1990 में केंद्र में चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली सरकार ऐसे दलबदल के सहारे ही बनी थी और 1991 में नरसिंहराव की अल्पमत सरकार भी इसी के सहारे अपना अल्पमत स्वरूप खत्म करके अपने पांच वर्ष पूरे कर सकी थी. ‘चमत्कार’ यह कि जब-जब उसके विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव आया, कोई न कोई विपक्षी पार्टी विभाजित हुई अथवा किसी पार्टी का दूसरी में विलय हुआ. दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में तो 1995 के बाद अरसे तक लगातार दलबदल हुए और बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी (सपा) या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हर किसी की सरकार दलबदल के सहारे ही बनी.

संविधान का 91वां संशोधन

प्रेक्षकों के अनुसार उक्त कानून में एक तिहाई सांसदों या विधायकों के अलग समूह बनाने पर उसे दलबदल के बजाय पार्टी का विभाजन मानने और उनकी सदस्यता बरकरार रखने का प्रावधान यह सोचकर किया गया था कि सांसद – विधायक अपनी पार्टियों के बंधुआ होकर न रह जाएं और उनमें लोकतंत्र की मांग करते रह सकें. लेकिन उसका सदुपयोग से ज्यादा दुरुपयोग होने लगा तो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीकाल में 2003 में संविधान में 91वां संशोधन किया गया, जिसे राष्ट्रपति ने एक जनवरी, 2004 को मंजूरी दी.

इस संशोधन द्वारा किसी पार्टी के एक-तिहाई सदस्यों के उससे अलग होने को दलबदल के बजाय विभाजन मानने का प्रावधान समाप्त कर दिया गया और दलबदल तभी वैध रह गया जब किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय करें.

फिर भी चूंकि इस बाबत अंतिम फैसले का अधिकार पीठासीन अधिकारियों के ही पास है और न्यायिक समीक्षा की परिधि में होने के बावजूद उनके द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग की मिसालें सामने आती रहती हैं, इसलिए सत्तारूढ़ पार्टियों द्वारा प्रलोभन व भयादोहन के रास्ते साम दाम दंड और भेद सब बरतकर छोटी पार्टियों को तोड़ने के ऑपरेशन चलाने (यहां तक कि उनको टुकड़े-टुकड़े कर देने पर भी) कोई अंकुश नहीं है. उनके सांसदों व विधायकों के बारे में खुलेआम घोषणा की जाती है कि उनमें से इतने हमारे संपर्क में हैं.

हालात ऐसे हो गए हैं कि आज की तारीख में कहना कठिन है कि कौन-सी विपक्षी पार्टी ऐसे ऑपरेशनों से पीड़ित या आशंकित नहीं है. समाजवादी पार्टी के बाद आशंकितों में ताज़ा नाम नेशनल कॉन्फ्रेस का आ जुड़ा है.

दूसरी ओर एक अध्ययन के अनुसार नरेंद्र मोदी के बारह साल के सत्ताकाल में तक़रीबन दो सौ सांसदों और विधायकों ने दूसरी पार्टियों को छोड़ कर भाजपा में दलबदल किया. हर चार दलबदलू सांसदों-विधायकों में से तीन से ज़्यादा को भाजपा ने अपनी गोद में बिठाया और आधे-पौने ही उसके बजाय कहीं और गए. भाजपा में शामिल हुए 68 प्रतिशत सांसद-विधायक पहले कांग्रेसी हुआ करते थे.

निजात की राह

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन हालात से निजात का रास्ता किधर से है? क्या कानून बनाकर दलबदल पर पूरी तरह से रोक की तरफ से?

शायद नहीं, क्यों कि बहुत संभव है कि कुछ समय बाद इस रोक के साइड इफेक्ट भी सामने आने लगें. वैसे ही जैसे वर्तमान दलबदल विरोधी कानूनों के साइड इफेक्ट सामने आए हुए हैं. ठीक है कि मतदाता चुनावों में किसी उम्मीदवार को वोट देते समय उसके व्यक्तित्व व कृतित्व से ज्यादा उसकी पार्टी पर टेक रखते हैं, जिसके कारण ऐसे उम्मीदवार भी विधायक व सांसद बन जाते हैं, जो अपने बूते पर यानी निर्दल ब्लॉक स्तर के चुनाव भी नहीं जीत सकते. यही कारण है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार बहुत कम संख्या में जीतते हैं.

2024 के लोकसभा चुनाव में तो केवल सात निर्दलीय जीते थे. लेकिन इस बात का क्या किया जाए कि हमारे संविधान में सारे अधिकार व्यक्ति के लिए ही हैं, समूह के लिए नहीं और उसके मूल रूप में ‘राजनीतिक पार्टी’ शब्द तक नहीं है. इस शब्द का पहला स्पष्ट उल्लेख तो 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) में किया गया.

ऐसे में समाधान तो एक ही है: लोकतांत्रिक चेतना का इतना विकास किया जाए कि संविधान की प्रस्तावना में जिसे ‘व्यक्ति की गरिमा’ कहा गया है, सांसदों व विधायकों में उसकी समुचित प्रतिष्ठा सुनिश्चित की जा सके. अभी तक, अपवादों को छोड़कर, जो दलबदल पूरी तरह स्वार्थ आधारित होते चले हैं, ऐसा होने के बाद वे निस्संदेह सिद्धांत आधारित होने लगेंगे और जो बिग मनी (अकूत धन) और बाहुबल चुनावों में अजब-गजब गुल खिला रहे हैं, उनका समुचित प्रतिकार हो पाएगा. संभवतः यही सोचकर दलबदल विरोधी कानून में पार्टियों के विभाजन का नियमन भी किया गया था.

निस्संदेह, व्यक्ति की गरिमा की प्रतिष्ठा का रास्ता लंबा भी है और दुरूह भी, लेकिन अगर लोकतंत्र हमारे लिए सत्ता की सुविधा न होकर सर्वश्रेष्ठ जीवन-दर्शन या शासन प्रणाली है, तो उसी पर सबसे ज्यादा निर्भर करना होगा. वरना तो सिद्धांतहीन धमाचौकड़ी में जो भी विघ्न रूप में सामने आएंगे – धर्म, शील या सदाचार- उनके सिर पर हम इसी भांति पादप्रहार करते रहेंगे और हमारे लोकतंत्र पर यह कलंक लगा रहेगा कि उसमें बंदों को सिर्फ गिना जाता है, तौला नहीं जाता.

फिर तो अल्लामा इक़बाल की तरह कोई न कोई दोहराता ही रहेगा कि जम्हूरियत वो तर्जे हुकूमत है कि जिसमें, बंदों को गिना जाता है, तौला नहीं जाता!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)