यूएस-एसईसी रिश्वतखोरी: अडानी के ख़िलाफ़ केस वापस लेने के न्याय विभाग के फैसले को यूएस अटॉर्नी का समर्थन 

गौतम अडानी के ख़िलाफ़ अमेरिका में चल रहे कथित रिश्वत और धोखाधड़ी मामले में यूएस अटॉर्नी जोसेफ़ नोसेला जूनियर ने अदालत को बताया कि यह आपराधिक मुक़दमा वापस लेने का फैसला उन्होंने नहीं, बल्कि अमेरिकी न्याय विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैककॉट्टर ने लिया था. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे यह माना जाए कि न्याय विभाग द्वारा केस वापस लेने के लिए दिए गए कारण वास्तविक नहीं थे.

गौतम अडानी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली:  भारतीय अरबपति उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ आपराधिक मामला वापस लेने के फैसले में जिस शीर्ष संघीय अभियोजक (अमेरिकी अटॉर्नी) की भूमिका पर एक फेडरल जज द्वारा सवाल उठाए गए थे, अब उन्होंने कोर्ट को बताया है कि इस मामले में मुकदमा वापस लेने का फैसला उन्होंने नहीं, बल्कि अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजी) के वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैककॉट्टर ने लिया था और उनके पास ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे यह माना जाए कि केस वापस लेने के लिए दिए गए कारण वास्तविक नहीं थे.

रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार (17 जुलाई) को दायर एक शपथ-पत्र में न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी जोसेफ नोसेला जूनियर ने कहा कि प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककॉट्टर ने बचाव पक्ष के वकीलों और डीओजी के अधिकारियों की दलीलों पर विचार करने के बाद अकेले ही आरोपपत्र (indictment) को खारिज करने की मांग करने का फैसला किया था.

नोसेला ने कहा कि उन्होंने इस मामले में कई बैठकों में हिस्सा लिया, लेकिन आखिरकार मैककॉट्टर ने अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह तय किया कि इस केस को आगे चलाने में सरकारी संसाधनों का और इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

नोसेला ने कहा, ‘केस को खारिज करने के प्रस्ताव पर फैसला लेने वाला मैं नहीं था.’

उन्होंने आगे कहा कि बचाव पक्ष के वकीलों को 11 मई को भेजा गया उनका ईमेल और डीओजी के 18 मई के केस खारिज करने के प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर, दोनों ही मैककॉट्टर के ‘निर्देश या मंज़ूरी’ से किए गए थे.

उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि उनके पास यह मानने का कोई आधार नहीं है कि अभियोग खारिज करने के लिए मैककॉट्टर द्वारा दिए गए कारण ‘वे वास्तविक आधार नहीं हैं जिन पर आवेदन आधारित है.’

मालूम हो कि न्यायाधीश निकोलस गराफिस ने नोसेला को घोषणा पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था, क्योंकि उन्होंने पाया था कि अडानी के वकील रॉबर्ट गिफ्रा जूनियर द्वारा प्रस्तुत घोषणा पत्र मैककॉट्टर के पूर्व के इस दावे से विरोधाभासी प्रतीत होता है कि अभियोग खारिज करने के सरकारी कदम के पीछे ‘अंतिम और एकमात्र निर्णयकर्ता’ वही थे.

गिफ्रा के बयान से नोसेला का 11 मई का एक ईमेल सामने आया, जिसमें उन्होंने बचाव पक्ष के वकीलों को भेजे संदेश में समझौते के प्रस्ताव के एक हिस्से को खारिज कर दिया. साथ ही उन्होंने कहा कि ‘न्याय विभाग के साथ लंबित आपराधिक आरोपों को सुलझाने के अन्य तरीकों पर भी विचार किया जा रहा है.’

नोसेला ने विशेष तौर पर लिखा कि न्याय विभाग ने संयुक्त बचाव प्रस्ताव के उस हिस्से को ‘साफ़ तौर पर खारिज’ कर दिया, जिसमें आपराधिक आरोपों को सुलझाने के लिए ‘आंशिक रूप से अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश करने का सामान्य प्रस्ताव’ दिया गया था.

उन्होंने यह भी साफ किया कि प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) या ट्रेजरी डिपार्टमेंट के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल के साथ कोई भी समझौता आपराधिक मामले से अलग रहेगा.

15 जुलाई के अपने आदेश में जज गराफिस ने कहा था कि ईमेल से ऐसा लगता है कि नोसेला आपराधिक मामले के ‘समाधान के आधार’ तय करने में शामिल थे.

यह घटनाक्रम 11 मई का है, यानी डीओजी द्वारा आरोप-पत्र को खारिज करने की कार्रवाई शुरू करने से लगभग एक हफ़्ते पहले का. जज ने लिखा कि इससे मैककॉट्टर के उस दावे पर सवाल उठता है कि यह फैसला उन्होंने अकेले लिया था. साथ ही इससे यह भी संदेह पैदा होता है कि क्या डीओजी द्वारा बताए गए कारण ही मामला खारिज करने की पूरी वजह थे.

इसलिए जज ने नोसेला को शपथ के तहत यह बताने का आदेश दिया था कि क्या वह मामला खारिज करने के लिए मैककॉट्टर द्वारा बताए गए कारणों से सहमत थे और क्या इस फैसले के लिए कोई अतिरिक्त आधार भी मौजूद था.

यह घोषणा तब हुई जब न्यायाधीश गराफिस ने न्याय विभाग द्वारा अडानी के खिलाफ आपराधिक मामले को खारिज करने के प्रयास पर बार-बार सवाल उठाए.

विभाग ने मई में अभियोजन संबंधी विवेकाधिकार का हवाला देते हुए अभियोग को पूर्णतः रद्द करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन न्यायाधीश ने तुरंत इस अनुरोध को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और इसके बजाय विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा.

न्यायाधीश द्वारा अडानी को शपथपूर्वक यह जवाब देने का निर्देश दिए जाने के बाद कि क्या उन्होंने अभियोग को रद्द करने के बदले सरकार के साथ कोई समझौता किया था. इस पर अरबपति ने एक हलफनामा दाखिल कर ऐसे किसी भी समझौते से इनकार किया.

हालांकि, उन्होंने यह माना था कि उनके वकीलों ने सुझाव दिया था कि अगर डीओजी या एसईसी चाहे, तो अमेरिका में अडानी ग्रुप का प्रस्तावित 10 अरब डॉलर का निवेश ‘किसी समझौते का हिस्सा’ हो सकता है.

गौरतलब है कि यह आपराधिक मामला नवंबर 2024 के उस आरोप-पत्र से जुड़ा है जिसमें अडानी, उनके भतीजे सागर और छह अन्य लोगों पर आरोप लगाया गया है कि वे एक ऐसी कथित योजना में शामिल थे, जिसके तहत रिन्यूएबल एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह करने के लिए भारतीय राज्य सरकारों के अधिकारियों को लगभग 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी जानी थी.