मेरी मां मेरी गैंगस्टर: जब एक आर्किटेक्ट ने बदल दी अरुंधति रॉय की ज़िंदगी की दिशा

पुस्तक अंश: उन दिनों कोट्टयम की किसी लड़की के लिए आर्किटेक्चर की पढ़ाई कोई मामूली ख़्वाहिश नहीं थी. ग़ुस्से के अपने दौरों और बढ़ती मार-पीट के बीच, मिसेज़ रॉय ने अपनी बेटी से कहा कि अगर वह ठान ले, तो वह जो चाहे, बन सकती है. वे शब्द उनकी बेटी के लिए लाइफ़राफ़्ट बन गए, जो उसे गाढ़े अंधेरों, तूफ़ानी लहरों और जानलेवा भंवर से बचाकर ले आए.

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लॉरी बेकर से मुलाक़ात ने एक झटके से मेरी सोच का रुख़ बदल डाला, हमेशा से यह सिर्फ़ ख़याल नहीं, मेरा यक़ीन था : जब मैं बड़ी हो जाऊंगी, तो लेखक बनूंगी. (फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

कभी प्रेम, कभी टकराव, कभी गहरा अपनापन और कभी असहनीय दूरी – मां-बेटी का रिश्ता अक्सर इन सभी भावनाओं को एक साथ समेटे होता है. बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति रॉय अपनी बहुप्रतीक्षित संस्मरणात्मक कृति ‘मेरी मां मेरी गैंगस्टर’ में इसी जटिल रिश्ते की परतें खोलती हैं. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित यह पुस्तक उनके अंग्रेज़ी संस्मरण ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ का हिंदी अनुवाद है. इस संस्मरण में रॉय अपनी मां मैरी रॉय के साथ प्रेम, संघर्ष, दूरी और आत्मीयता से बने जटिल रिश्ते के माध्यम से स्मृति, स्त्री-अस्मिता, परिवार और आत्मपहचान के प्रश्नों से संवाद करती हैं. यह अंश उसी आत्मीय और निर्भीक यात्रा की एक झलक है.

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लॉरी बेकर और गंजा पहाड़

मेरे हाई स्कूल पूरा करने में दो साल से कम वक़्त रह गया था, जब मिसेज़ रॉय ने तय किया कि उनके स्लाइडिंग-फ़ोल्डिंग स्कूल को अब अपने कैम्पस की ज़रूरत है. स्कूल अच्छा-ख़ासा बढ़िया चल रहा था. मगर रोटरी क्लब के किराए वाले हॉल में पढ़ाई का कामचलाऊ बन्दोबस्त उनकी तरक़्क़ी में अड़ंगा था. वहां खेल का मैदान नहीं था, अलग क्लासरूम नहीं थे, ढंग का फ़र्नीचर नहीं था. और कभी-कभी क्लब की बैठकों के बाद छूटा हुआ कचरा स्कूल के लिए मुसीबत बन जाता.

एक सुबह झाड़ू लगाने की रस्म पूरी होने के बाद, छह साल का एक छात्र लापता हो गया. आख़िरकार हमने उसे बन्द शौचालय में खोज निकाला, जो मुख्य हॉल से थोड़ी ही दूर था. उसने सिगरेट के टोटे इकट्ठा करके उनका अंबार लगा रखा था और उन्हें पीने की कोशिश कर रहा था. हमने वक़्त रहते उसे देख लिया और उसके मंसूबों पर पानी फिर गया. साफ़ था कि उस छोटे बच्चे ने पहले से इसकी तैयारी कर रखी थी, माचिस की डिब्बी वह साथ लेकर आया था. (अब तो वह होली रोलर है, यीशु का सिपाही. सिगरेट नहीं पीता.)

बच्चे जब सीमेंट के खुरदरे फ़र्श पर गिरते, तो बुरी तरह रगड़ खा जाते थे, और उनके घावों में मवाद भर जाता था. जंग से लौटे घायल फ़ौजियों की तरह वे इधर-उधर घूमते फिरते, उनके घुटनों और कुहनियों पर जेंशियन वॉयलेट या गहरे लाल मरक्यूरोक्रोम घोल के निशान उनकी चोटों की मुनादी करते थे. कुछ हादसे ज़्यादा गम्भीर होते थे और उनमें टाँके लगाने या प्लास्टर चढ़ाने की ज़रूरत पड़ती थी. सबसे ख़राब हादसा, ख़ुशक़िस्मती से, मेरे साथ हुआ, किसी और विद्यार्थी के साथ नहीं.

रोटरी क्लब की इमारत खड़ी पहाड़ी पर बनी थी, और बग़ल के हमारे भू-तल वाले हॉस्टल-घर से काफ़ी ऊंचाई पर थी. दोनों अहातों के मैदान को जोड़ने वाली लोहे की एक रेलिंग वाली सीढ़ी थी, जो मखरैले की दस फ़ुट ऊंची काई लगी पुश्ते की दीवार पर कसी हुई थी. यह छोटा रास्ता आस-पास की इमारतों के बीच कर्मचारियों और रसद की आवाजाही आसान बनाने के लिए था, ताकि उन्हें बाहर मुख्य सड़क से होकर न जाना पड़े. इसे आम रास्ता बनने से रोकने के लिए सीढ़ियों पर लोहे का एक तालाबन्द गेट था. बच्चों को इसका इस्तेमाल करने की सख़्त मनाही थी. मैंने यह नियम तोड़ा, बन्द गेट के ऊपर चढ़ी, और धड़ाम से नीचे जा गिरी. मैं सीढ़ी से नीचे लुढ़की और मेरे दांत पत्थर से टकरा गए. कई हफ़्ते तक मेरे मुंह पर एक तरह का प्लास्टर बंधा रहा, मुझे सिर्फ़ तरल आहार पर रहना पड़ा. साल-भर से ज़्यादा समय तक मैं सिर्फ़ मसला हुआ खाना ही खा पाती थी. कोट्टयम के पड़ोसी एक मिलनसार दांतों के डॉक्टर ने मेरे सामने के दांतों को वापस मसूढ़ों में जड़ दिया. अपनी इस हुनरमन्दी पर वह इतने मुग्ध थे कि उसके बाद सालों तक, सामाजिक समारोहों में, किसी मवेशी के मालिक या घोड़े के ख़रीदार की तरह, यह देखने के लिए कि मेरे दांत कैसे हैं, वह सबके सामने बेझिझक मेरे दांतों की जांच करने लग जाते थे. उनकी इतनी तवज्जो के बाद भी, सामने के मेरे दो दांत बच नहीं पाए. कुछ सालों के बाद वे टूट गए. अभी मेरे जो दांत हैं, वे नक़ली हैं. वे इधर-उधर खिसकने लगे हैं, और उनके बीच अजीब-सी ख़ाली जगह बन गई है. (यह असहज करता है पर चूंकि यह मुझे मेरे अतीत से जोड़ता है, इसलिए इस ख़ाली जगह को मैंने क़बूल कर लिया है.)

स्कूल के लिए बाक़ायदा अलग कैम्पस की मिसेज़ रॉय की ख़्वाहिश की दूसरी वजहें भी थीं. अपने विद्यार्थियों के लिए उन्होंने कुछ बड़े अरमान पाल लिए थे. वे चाहती थीं कि दूसरे स्कूलों के बच्चों की तरह वे भी खेल, नाटक और कला की सरगर्मियों में सक्रिय रहें. मगर उनके पास केवल दो छोटे हॉल ही थे, उसी में तमाम गतिविधियों के लिए हदें तय की हुई थीं.

जैसे-जैसे स्कूल बड़ा हुआ, अफ़रा-तफ़री भी बढ़ती गई. हॉल में जोशीली, उतावली आवाज़ें गूंजतीं और दीवारों से टकराती थीं. किसी के लिए किसी भी काम में मन लगाना आसान नहीं रह गया था.

हर दिन वहां नई सनसनी होती थी; नये विद्यार्थी होते थे, नये विचार होते थे. शहर की नौउम्र औरतें, जो वैसे तो शायद फ़रमां-बरदार, घरेलू बीवियों की तरह ज़िन्दगी बिताते हुए अपने पतियों द्वारा फ़र्श पर फेंक दी गई चीज़ें उठाती रहतीं, अचानक उन्हें इस नये, नवोन्मेषी स्कूल में टीचर बनने और ख़ुद अपना रोमांचक कॅरिअर बनाने का मौक़ा मिल गया. स्कूल में पैदा होने वाली जोशीली रेलम-पेल संभाल पाने के लिहाज़ से रोटरी क्लब के हॉल बहुत छोटे थे.

मिसेज़ रॉय ने शहर से कुछ किलोमीटर दूर ज़मीन का एक टुकड़ा देखा था. उसे ख़रीदने के लिए रक़म का बन्दोबस्त करना था तो उन्होंने अपने विद्यार्थियों के अभिभावकों से ‘ज़मानत राशि’ भरने को कहा—जो एक तरह से ब्याज़-मुक्त क़र्ज़ था—जो स्कूल छोड़ने के समय विद्यार्थी को लौटा दी जानी थी. अभिवावक ख़ुशी-ख़ुशी राज़ी हो गए. यह 1974 था. उनका स्कूल सात साल पुराना था. मैं चौदह साल की थी और पन्द्रह की होने वाली थी.

उन्होंने जो ज़मीन ख़रीदी थी, वह तीन एकड़ में फैला जंगल था, जिसे मोट्टा कुन्नू, यानी ‘गंजा पहाड़’ कहा जाता था. वह सचमुच में गंजा नहीं था, क्योंकि केरल में ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता. वहां कटहल के मोटे-बड़े पेड़ और ऊंचे बांसों के घने झुरमुट थे, जो चरमराते और मातम करने वालों की तरह कराहते थे. वह इलाक़ा घनी झाड़ियों से ढका हुआ था, जिनमें बभनियों, नेवलों और छिपकलियों की सरसराहट भरी रहती थी. वहां सूख चुका एक उथला कुआं था. मुख्य सड़क के क़रीब, पहाड़ की तलहटी में आबाद छोटे-छोटे घरों में रहने वाले लोगों ने हमारी बेहतरी के लिए हमें बताया कि कुआं चिड़ियों, सांपों और मेंढकों के कंकालों से भरा हुआ है, जिन्हें कुएं में रहने वाले एक जोड़ी भूतों ने फंसाकर खा लिया था. रात में कोई भी वहां ऊपर जाने की हिम्मत नहीं करता था. यहां तक कि आवारा भटकने वाले और शराबी भी नहीं जाते थे. झींगुरों की चीं-चीं और मेंढकों की टर्र-टर्र किसी नाद-गुम्बद की तरह पहाड़ को ढांक लेती, जो इसे पास के शहर से अलग-थलग कर देता था. ज़मीन ख़ासी सस्ती थी, क्योंकि वह बेहद भूतिया और बेहिसाब खड़ी चढ़ाई वाली ऐसी जगह थी कि उस पर कुछ भी बना पाना बहुत मुश्किल था. मिसेज़ रॉय का अगला लक्ष्य एक ऐसे आर्किटेक्ट को खोजना था, जो यह चुनौती क़ुबूल कर सके.

उनकी फ़ेहरिस्त में एक नाम झट से सबसे ऊपर आया. लॉरेंस विल्फ़्रेड बेकर, ज़्यादातर लोग जिन्हें लॉरी बेकर के नाम से पहचानते थे, और दक्ष राजमिस्त्रियों का उनका दल उन्हें सिर्फ़ ‘डैडी’ कहता था. दूसरे विश्वयुद्ध में अन्तरात्मा की आवाज़ पर नैतिक आपत्ति करने वाले बेकर अंग्रेज़ थे, जो गांधी से अचानक हुई मुलाक़ात से बेहद प्रभावित हुए, और 1945 में भारत आ गए. यहां उन्होंने विश्व कुष्ठ रोग मिशन के लिए आर्किटेक्ट के तौर पर काम करना शुरू किया. यहां उनकी मुलाक़ात और फिर शादी एलिज़ाबेथ जैकब से हुई, जो मलयाली डॉक्टर थीं और वहीं काम करती थीं.

फिर इस नौजवान युगल ने स्वतंत्र रूप से काम करने का फ़ैसला किया. फ़ैज़ाबाद से चलकर वे पिथौरागढ़ आए, जो हिमालय की तलहटी के दूरस्थ अंचल में बसा एक शहर है. यहां उन्होंने ज़िले के उन गांव वालों के लिए एक छोटा-सा अस्पताल चलाया, इलाज की सहूलियत जिनकी पहुंच से बाहर थी. पिथौरागढ़ में सोलह साल बिताने के बाद वे दक्षिण की ओर बढ़े और आख़िरकार भारतीय प्रायद्वीप के सिरे पर, केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम में आकर आबाद हुए, जो कोट्टयम से क़रीब सौ किलोमीटर दक्षिण में है.

किसी और को सूझने के आधी सदी पहले, जब रोज़मर्रा की बातचीत में ‘टिकाऊ’ और ‘जैविक’ जैसे शब्द चलन में नहीं आए थे, तब लॉरी बेकर नवाचार के उस मक़ाम पर थे. उन्होंने निर्माण की ऐसी तकनीकें ईजाद कीं, जिनमें आसपास उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल होता और जो स्थानीय आबोहवा के माफ़िक होतीं. वे भट्ठे में पकी सस्ती ईंटें और सीमेंट की जगह चूना-गारा इस्तेमाल करते. जहां तक मुमकिन होता, महंगी खिड़कियों की जगह, वे ईंटों की तमाम तरह की जालियों का इस्तेमाल करते—एक तरह की जालीदार सजावट जिनसे, हवा की गुज़र रहती, रौशनी की ख़ूबसूरत आकृतियां दाख़िल होतीं, और कभी-कभार रेंगनेवाले खोजी जीव भी चले आते. छत बनाने की तकनीक उनकी सबसे नायाब और नई खोज थी.

उन्होंने इसे फ़िलर-स्लैब कहा. यह कंक्रीट और खपरैल की छत का मिला-जुला रूप था. ‘फ़िलर’ पकी मिट्टी का सस्ता देसी खपड़ा था, जिसे कम से कम सरिये से बने जाल के भीतर सीमेंट की ढलाई में जड़ दिया जाता था. इसे सपाट, शंक्वाकार, त्रिकोणीय शक्ल में ढाला जा सकता था, यह मेहराबदार हो सकता था—यानी किसी भी आकार में बनाया जा सकता था. ऐसी जलवायु में, जहां मानसून की बेरहम बारिश के चलते तीखी ढलान वाली छतों की ज़रूरत होती थी, बेकर के फ़िलर-स्लैब ने भवन-योजना को टाइल और राफ़्टर वाली छत की कठोर ज्यामितीय पाबन्दियों से आज़ाद कर दिया.

बेकर सिर्फ़ इसलिए असाधारण नहीं थे कि उनका निर्माण किफ़ायती था, बल्कि इसलिए भी कि उनकी इमारतें वैसी बेनूर या उदास, बड़े पैमाने पर बेमुरव्वत क़िस्म की नक़ल नहीं थीं, जिसकी उम्मीद आप किसी कम ख़र्चीली वास्तुकला से करते हैं. उनकी बनाई हर इमारत अनूठी थी, जो ऊर्जा, शोख़ी और ऐसी ज़िद्दी बेपरवाही से लबरेज़ होती थी, जो उनकी शख़्सियत का हिस्सा थी. (जब उनकी मृत्यु हुई, तो वे हिदायतें छोड़ गए थे कि उनकी अन्त्येष्टि तुरंत कर दी जाए, उनकी लाश पर कोई न रोए, और यह कि उनकी राख अंडा-घड़ी में डाल दी जाए.)

और फिर भी, अपने अनूठेपन के बावजूद, उनकी इमारतों में कोई ग़ुरूर नहीं था. वे इस क़दर ख़ूबसूरती से अपने आसपास के माहौल में घुल-मिल जातीं—किसी गुप्त इशारे की तरह—कि आप उन्हें मुश्किल से देख पाते थे. वह मज़ाक़ में कहा करते थे कि उनकी तमन्ना ‘कम-ख़र्चा नहीं, नो-ख़र्चा’ आर्किटेक्ट बनने की है. उन्हें पूरी शिद्दत से इस बात का एहसास था कि जिन लोगों के लिए वह इमारतें बनाते थे, उनके पास पूंजी बहुत थोड़ी और ख़्वाब बहुत नाज़ुक होते थे. वह इसकी क़द्र करते, और उनके सपनों को अपना बना लेते. यही गुण उनको बेजोड़ बनाता था.

मिसेज़ रॉय ने उन्हें ढूंढा और सचमुच अपना सब कुछ दांव पर लगाकर, उन पर भरोसा किया, बिना किसी की सीख, प्रेरणा या मदद के, वास्तुकला के बारे में कोई तजुर्बा नहीं होने के बावजूद, और सिर्फ़ मर्दों वाले क्लब की उन बैठकों तक किसी पहुंच के बग़ैर ही, जिनमें कारोबार, टैक्स, बैंकिंग और बिल्डिंग जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है, यह बात उन्हें भी बेजोड़ बनाती है.

डैडी की निर्माण तकनीकों ने उनके हमबिरादरों को बेचैन कर दिया था. आर्किटेक्ट, इंजीनियर और निर्माण ठेकेदारों को, जिनकी फ़ीस और कमीशन उनकी बनाई इमारतों की लागत का कुछ फ़ीसदी होता था, इस ख़ुदाई-फ़ौजदार से ख़तरा महसूस हुआ. उन्हें ज़्यादा ख़र्चीली वास्तुकला रास आती थी. वे खुलेआम बैर रखते और आगाह करते थे कि बेकर की इमारतें ख़तरनाक और असुरक्षित हैं. उनकी आलोचनाओं को वह हंसकर टाल जाते. उनकी वास्तुकला जिस भाषा में थी, उनके बहुतेरे साथी उसे पढ़ या समझ ही नहीं पाते थे. उन्होंने मौक़े पर रहकर अपने राजमिस्त्रियों के साथ काम किया, और साथ-साथ काम करते हुए वे सभी सीखते भी गए.

मिसेज़ रॉय की तरह, बेकर भी धारा के ख़िलाफ़ तैरने वाली मछली थे. जब वे मिले, तो उन्होंने एक-दूसरे की यह ख़ूबी तुरंत पहचान ली. उन दोनों के लिए एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाना आसान नहीं था. बेकर मायावी विचारों वाले थे और उन्हें पकड़ना मुश्किल था. तय वक़्त पर वह कभी नहीं मिलते थे. वे, तो ख़ैर, वे ही थीं. वे एक-दूसरे की अकड़ और सनकपन के बारे में बड़बड़ाते रहते थे, पर मन ही मन वे एक-दूसरे को पसंद करते और इज़्ज़त देते थे.

बेकर मोट्टा कुन्नू वाली जगह देखने गए और वहां की चुनौतियों से आह्लादित हुए. काम तुरंत शुरू हो गया. बिना कोई पेड़ काटे, बिना कोई ढलान समतल किये, बिना एक भी पैसा बर्बाद किए. मम्मी और डैडी के मिलन से एक तरह की आध्यात्मिक वास्तुकला जन्मी, एक निहायत ही अनोखा, निहायत ख़ूबसूरत स्कूल कैम्पस, जिसने बच्चों की पढ़ाई में, अगर ज़्यादा नहीं तो, उतना ही योगदान दिया जितना कि उनकी औपचारिक कक्षाओं ने. यह धीरे-धीरे बढ़ा और वैसा बनने में इसे सालों लग गए जैसा कि यह आज है. कुछ इमारतें बेकर की मृत्यु के बहुत बाद बनाई गईं. इनकी ड्राइंग उन्होंने बना ली थीं मगर तब इन्हें बनाने लायक़ पूंजी नहीं थी. मिसेज़ रॉय ने ड्राइंग संभालकर रखीं और सही समय का इन्तज़ार किया.

नया कैम्पस मामूली तरीक़े से बनना शुरू हुआ. जैसे ही पहला चरण पूरा हुआ, हम किराए के हॉस्टल-घर और रोटरी क्लब से निकलकर यहीं आ गए.

प्रशासनिक खंड में रिसेप्शन और अभिभावकों के लिए इन्तज़ार करने की जगह, और प्रिंसिपल का एक छोटा-सा दफ़्तर था, जो रात को मेरी मां के सोने का कमरा बन जाता था और, कभी-कभी, ख़तरनाक ढंग से, मेरे लिए भी. तीन दीवारों और बिना दरवाज़ों वाले खुले क्लासरूम, हर एक की बनावट अलग थी, हर एक अलग तल पर, और इनसे घिरा हुआ बीच का वह हिस्सा, जो नीचे धंसे हुए मंच का काम भी करता था. सारे बच्चों को सिर्फ़ ब्लैकबोर्ड से मुंह फेरकर अपने स्टूल पर घूम जाना होता था, और वे ख़ुद को एक छोटी-सी रंगशाला में पाते. क्लासरूम से उतरकर मंच तक आने वाली चौड़ी सीढ़ियां बैठने की अतिरिक्त जगह के काम आती थीं. पहाड़ी पर थोड़ा और ऊपर की तरफ़, अनगढ़ पत्थरों की सीढ़ियों वाला ज़ीना चढ़ने पर पहाड़ी की ढलान पर एक बड़ी और हवादार रसोई थी, बच्चों और टीचरों के लिए खाने का कमरा, विद्यार्थियों के सोने के कुछ कमरे और एक रोगी कक्ष था. मेरा भाई रोगी कक्ष या किसी क्लासरूम में सोता था. मिसेज़ रॉय ने जो रक़म जुटाई थी, वह छत बनाने के लिए नाकाफ़ी थी, उतने पैसों से तो फ़िलर-स्लैब छतें भी नहीं बनाई जा सकती थीं, इसलिए शुरुआत के कुछ सालों तक क्लासरूम की छतें फूस की थीं.

मोट्टा कुन्नू के नीचे, कैंची मोड़ वाली एक घुमावदार सड़क पर, स्कूल बस के लिए गैरेज और एक खुला सायबान था, जिसमें दोपहर तक नर्सरी स्कूल चलता था और दोपहर के बाद इसका इस्तेमाल संगीत, नृत्य और नाटकों के रियाज़ के लिए होता था. इसके सामने खेल का छोटा मैदान था, जो जंगली काली मिर्च की बेलों और केले के पेड़ों के झुंड से घिरा हुआ था. स्पोर्ट्स डे पर नर्सरी वाला सायबान अभिभावकों के लिए मंडप का काम भी करता था, जहां बैठकर वे अपने बच्चों का प्रदर्शन देखते थे. कभी-कभी यह इन्तज़ाम उलट भी जाता, और सायबान मंच बन जाता था. खेल के मैदान में शामियाना लगाकर दर्शकों के लिए कुर्सियां डाल दी जाती थीं.

पेड़ों और पौधों की तरह बेकर की इमारतों को ज़मीन से उगते हुए देखना भी मुझे अभिभूत करता. मैंने महसूस किया कि डिज़ाइन भी मेरे अन्दर वैसी ही उमंग जगा सकता है जैसे कि संगीत, नृत्य और साहित्य पैदा करते हैं. पन्द्रह बरस की उम्र में लॉरी बेकर से मिलना, उन्हें सुनना, अपनी जेब से छोटी-सी नोटबुक निकालकर उन्हें ठीक वैसा ही ख़ाका बनाते हुए देखना जैसा वे सोच रहे हैं—उसी तरह जैसे कोई कविता का एक छंद दर्ज करता है—मेरी रग-रग फड़कने लगती. मैं उन्हीं की तरह स्केच बनाना चाहती थी, सोचना चाहती थी, कन्स्ट्रक्शन साइट्स पर घूमना चाहती थी; मैं बेकर बनना चाहती थी.

उन दिनों कोट्टयम की किसी लड़की के लिए आर्किटेक्चर की पढ़ाई कोई मामूली ख़्वाहिश नहीं थी. पर अगर वह लड़की मिसेज़ रॉय की बेटी हो, और अगर मिसेज़ रॉय उसके साथ खड़ी हों, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं था. ग़ुस्से के अपने दौरों और बढ़ती मार-पीट के बीच, मिसेज़ रॉय ने अपनी बेटी से कहा कि अगर वह ठान ले, तो वह जो चाहे, बन सकती है. वे शब्द उनकी बेटी के लिए लाइफ़राफ़्ट बन गए, जो उसे गाढ़े अंधेरों, तूफ़ानी लहरों और जानलेवा भंवर से बचाकर ले आए. लॉरी बेकर से मुलाक़ात ने एक झटके से मेरी सोच का रुख़ बदल डाला, हमेशा से यह सिर्फ़ ख़याल नहीं, मेरा यक़ीन था : जब मैं बड़ी हो जाऊंगी, तो लेखक बनूंगी.

बेकर ने मुझे यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि आर्किटेक्चर की पढ़ाई से ज़्यादा मज़ेदार कुछ नहीं हो सकता. मगर सच कहूं तो, कोट्टयम से खींचकर मुझे दिल्ली तक ले आने के पीछे जो ताक़त काम कर रही थी, वह क्षुद्र और मामूली चीज़ों की कशिश थी. दरअसल, वही रिवायती चीज़ें—पैसा और सेक्स. पैसा, क्योंकि मैं समझ गई थी कि गुज़ारा करने और बने रहने के लिए मुझे जितनी जल्दी हो सके घर से दूर जाना होगा, और मैंने सुन रखा था कि आर्किटेक्चर स्कूल में पढ़ाई पूरी करने से पहले ही आप काम करना और कमाना शुरू कर सकते हैं. और सेक्स—यौन आकर्षण—क्योंकि जिस रोज़ मैं लॉरी बेकर से मिली थी, उसी रोज़ मेरी मुलाक़ात किसी और से भी हुई थी.

तो हुआ ये कि, जिस रोज़ मम्मी डैडी से मिलीं, बेबी ने उसी रोज़ फ़ैसला कर लिया कि उसे उड़ जाना चाहिए. हालांकि, बन्दोबस्त करने में उसे थोड़ा समय लगा.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)