लोकतंत्र के साथ सामंजस्य को भी प्रतिपल बचाना-बढ़ाना होता है

कभी-कभी | अशोक वाजपेयी: दक्षिण अफ्रीका के जननायक नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनकी पहल पर वहां की संसद ने एक ‘सच और सामंजस्य आयोग’ गठित किया था. यह सच को जानने, कुबूल करने, मानवीय अधिकारों के उल्लंघन को समझने, याद करने और क्षमा करने का अनूठा उपक्रम था. यह एक अफ्रीकी अवधारणा ‘उबन्तू’ से प्रेरित माना गया, जिसमें मानवीय अधिकार और सामंजस्य आदि के तत्व शामिल होते हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

पिछले सप्ताह दक्षिण अफ्रीका के जननायक नेल्सन मंडेला की स्मृति में ‘सामंजस्य और कला’ विषय पर एक व्याख्यान देने का सुयोग हुआ. उस देश में जब औपनिवेशिक शासन और अपार्थीड समाप्त हुए और लोकतंत्र की स्थापना हुई तो गोरे लोगों द्वारा काले लोगों पर जो अत्याचार, हिंसा, हत्याएं आदि हुए थे उनका प्रतिशोध लिए जाने का माहौल बहुत गरम था. लेकिन तब मंडेला के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनकी पहल पर वहां की संसद ने एक ‘सच और सामंजस्य आयोग’ गठित किया जिसके अध्यक्ष ईसाई पादरी डेसमंड टूटू थे जो एक काले व्यक्ति थे.

यह सच को जानने, कुबूल करने, मानवीय अधिकारों के उल्लंघन को समझने, याद करने और क्षमा करने का अनूठा उपक्रम था. संसार में कहीं भी पहले ऐसा आयोग गठित नहीं हुआ था. इस आयोग को एक अफ्रीकी अवधारणा ‘उबन्तू’ से प्रेरित और परिचालित माना गया है. इस अवधारणा में मानवीय अधिकार, न्याय के पुनरुद्धार और पुनर्प्रतिष्ठा, सामंजस्य आदि के तत्व शामिल होते हैं.

अफ्रीकी कवि-पत्रकार एन्तजी क्राग ने बताया है कि मूलतः यह अवधारणा मुख्यतः यह विचार सामने रखती है कि हम अंतर्संबंधिता से ही समग्रता या अखंडता पा सकते हैं. वह एक ऐसा भौतिक और मानसिक बोध है कि हम जो हैं या हो सकते हैं उसका होना हमारे आस-पास जो है, भौतिक और आध्यात्मिक, उसकी पूर्णता से ही संभव है. यह समग्रता कोई निष्चेष्ट निर्वाण नहीं है, वह एक प्रक्रिया है जिसमें हर कोई और हर चीज़ अपने को रचते हुए अपने पूर्णतम आत्म की ओर बढ़ती है.

लेकिन आत्म की यह पूर्णता दूसरों के साथ उनके द्वारा ही पाई जा सकती है और इन दूसरों में पूर्वज और ब्रह्मांड शामिल हैं. किसी का भी आत्मबोध अपने को दो में विभाजित कर नहीं, अपने को एक-में-अनेक बनाकर, अपने आसपास जो हैं उनमें एकतरह से बिखराकर ही संभव होता है.

मुझे ठीक से पता नहीं है कि इस अवधारणा ने अफ्रीकी साहित्य और कलाओं में क्या भूमिका निभाई है, पर लेकिन यह अपने आप में यह सामंजस्य का, ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ का एक संक्षिप्त काव्यशास्त्र ही है.

साहित्य और कलाएं, कहीं न कहीं, हमें एक दूसरे से, व्यापक सचाई और संसार से समंजस ही करती हैं. हम सबमें जो एक मजिस्ट्रेट बैठा हुआ है जो हर कुछ पर फ़ैसला देता रहता है, वे उसे अगर पूरी तरह से अपदस्थ नहीं तो चुप तो करा देती हैं. साहित्य और कलाएं संसार का गुणगान करते हैं, उसकी गहरी आलोचना भी, जब-सब उसका प्रतिरोध भी और असहमति पर वे उसे ख़ारिज नहीं करते.

साहित्य और कलाओं में न कोई दंडविधान है, न कोई देशनिकाला देने का उत्साह. वे तो सबका देश होते हैं- कई बार तो अपनी मातृभूमि से निष्कासित या भगाए गयों का एकमात्र शरण्य, एकमात्र देश.

यह याद करना उपयुक्त होगा कि भारत ने, एक अद्वितीय विश्वदृष्टि और उपमहाद्वीप के रूप में, आक्रांताओं, विदेशियों, बाहर से आए व्यापारियों, यात्रियों, साहित्य और कलाओं की नई विधाओं और शैलियों, उपकरणों, टेक्नोलॉजी, अनेक व्यवस्थाओं के साथ सामंजस्य बैठाया है. यह दावा किया जा सकता है कि भारत में साहित्य और कलाएं सामंजस्य की रंगभूमि रहे हैं. इस रंगभूमि में किसी का प्रवेश निषिद्ध नहीं रहा, किसी को निष्कासित नहीं किया गया- वह एक खुला, और राजनीतिक लोकतंत्र स्थापित होने के सदियों पहले से, लोकतांत्रिक परिसर रहा है.

यह सामंजस्य आसानी से संभव नहीं हुआ. हर मुक़ाम पर शुद्धतावादी और कठमुल्ले आदि विरोध करते रहे हैं. कई बार यह सामंजस्य खंडित और बाधित भी हुआ है. पर यह हमारा जातीय आश्चर्य है कि हम इस सामंजस्य से कभी डिगे या हटे नहीं. हमारी प्राचीनता, हमारी मध्यकालीनता और हमारी आधुनिकता अभी सामंजस्य के काल रहे हैं. यह सामंजस्य, बहुलताओं का स्वीकार और उनके बीच निरंतर संवादिता और सहकार ही भारतीयता की प्रामाणिकता परिभाषा है.

पर इस सचाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जो सामंजस्य सृजन के क्षेत्र में संभव हुआ वह जीवन में, रोज़मर्रा के सामाजिक आचार-व्यवहार में, जातियों के बीच, धार्मिक क्षेत्र आदि में लगातार भंग किया जाता रहा. हमारे अपने धर्मों के बीच खूंख़ार युद्ध और खून-ख़राबा हुए हैं. निचली- तथाकथित- जातियों के करोड़ों लोगों को सदियों से अस्पृश्य माना जाता रहा जबकि इन्हीं जातियों के कवि कबीर, रैदास, नामदेव आदि साहित्य में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय रहे.

इस समय जो राजनीतिक विचारधारा ‘हिंदुत्व’ के नाम से भारत में सब कुछ पर काबिज हुई है उसका एक लक्ष्य इस भारतीय सामंजस्य को नष्ट करना है. उसकी संभावना तक को हटा देना है. यह कई तरह से भारत-विरोधी और परंपरा-विरोधी काम है.

पर उसका समर्थन करोड़ों भारतीय अपनी अंधभक्ति में कर रहे हैं. जब इतना प्रतिकूल और शत्रुता-भरा माहौल हो तो उसकी आंच से साहित्य और कलाएं बच नहीं सकते. वे उत्तराधिकृत सामंजस्य से संतुष्ट और आश्वस्त नहीं रह सकते. उन्हें, यह सामंजस्य, उसकी आत्मा को नए कौशल से आयत्त करना होगा.

कभी-कभी लगता है कि कई लेखक और कलाकार ऐसा कर रहे हैं पर यह भी लगता है कि बहुत से बेख़बर, निष्क्रिय और अपनी कायरता में दुबके हुए हैं. लोकतंत्र को ही नहीं सामंजस्य को भी पल-पल बचाना-बढ़ाना होता है. इस ज़रूरी काम से बेरुख़ी बहुत बड़ी सांस्कृतिक और नैतिक चूक है.

चोरी का अमृत काल

अभी तक हम झूठ के अमृतकाल में रह रहे थे कि वह कब खिसककर चोरी का अमृतकाल भी हो गया, पता ही नहीं चला. अभी रामलला के मंदिर से चोरी का मामला सर्वोच्च न्यायालय की मेज़ तक पहुंचा नहीं कि रेलवे से तौलिया और लिनेन चोरी का मामला सामने आ गया. पता चला कि ढाई करोड़ रुपये की क़ीमत के तौलिए आदि भारतीय रेलवे के एसी कोचों में सफ़र करने वाले चुराकर अपने साथ ले गए.

ऐसा सफ़र मध्यवर्ग के चिकने-चुपड़े अपेक्षाकृत पैसे वाले ही कर पाते हैं. तो उन्हें झूठ बोलने और झूठ पर यक़ीन करने की लत के साथ-साथ चोरी की भी लत लग गई है.

गांधी जी को यह याद रहा होगा कि मंदिरों की चोरी-लूट का हिंदू में लंबा इतिहास है. जहां मंदिर होगा वहां पैसा आएगा और चोरी होगी यह समीकरण उन्हें समझ में आ गया होगा. तभी न उन्होंने अपने अंतिम आश्रम सेवाग्राम में कोई मंदिर नहीं बनाया.

उन्हें यह भी याद रहा होगा कि राजे-महाराजों ने जब-तब अपने ही धर्म के मंदिर वहां जमा संपत्ति हड़पने के लिए लूटे हैं. गांधी जी ने इसीलिए ईंट-पत्थर का मंदिर बनाने के बजाय, प्रार्थना सभा के रूप में सारे धर्मों का एक मंदिर बनाया. उसमें हर प्रमुख धर्म से प्रार्थना होती थी. सेवाग्राम के खुले प्रागंण से लेकर कमरों, दालानों, पेड़ों के नीचे जब जैसी सुविधा हो. यह एक ऐसा मंदिर था जिससे कुछ भी चुराया नहीं जा सकता था.

याद करें कि जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय का उद्घाटन हो रहा था तो गांधी जी ने अपने सामने सभास्थल पर बैठे राजे-महाराजों से, जो स्वर्ण-हीरक-रत्न जटित हारों से विभूषित बैठे थे कि उन्हें ये आभूषण जनहित में त्याग देना चाहिए क्योंकि वे जनता के पैसे से ही संभव हुए हैं. अगर गांधी जी को ऐसे ही, धर्मनेताओं को संबोधित करने का, अवसर मिला होता तो वे उनसे आग्रह करते कि वे मंदिरों की अपार संपत्ति जनहित के लिए सौंप दें.

पर चोरी पर लौटें: मंदिर के अलावा सड़कों-पुलों-सरकारी इमारतों-छात्रों की स्कॉलरशिप आदि में धड़ाके से चोरी हो रही है. इक्का-दुक्का चोर पकड़े भी जाते हैं लेकिन असली बड़े चोरों का बाल भी बांका नहीं होता. रही पुलिस जिसका काम चोर पकड़ना और चोरी को रोकना उसे तो हबीव तनवीर का एक नायक चरनदास पहले ही ‘सरकारी चोर’ कह चुका है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)