नेपाल का मधेश इलाका सांप्रदायिक तनाव की चपेट में, हिंसा के पीछे क्या हैं वजहें?

नेपाल के मधेश क्षेत्र में जारी सांप्रदायिक तनाव कई ज़िलों में फैल चुका है, जिसमें अब तक 3 लोगों की मौत हो चुकी है. नेपाल में स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक तनाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हालिया हिंसा जिस पैमाने पर और जिस तेज़ी से फैली है, वह स्थिति के गंभीर रूप से बिगड़ने का संकेत है.

नेपाल के मधेश क्षेत्र में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के दौरान सड़क पर जुटे युवा. (फोटो: अन्नपूर्ण पोस्ट)

नई दिल्ली: नेपाल इन दिनों वर्षों के सबसे गंभीर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा का सामना कर रहा है. धार्मिक जुलूस के दौरान शुरू हुई झड़पें भारत से सटी दक्षिणी तराई (मधेश क्षेत्र) के कई जिलों में फैल गईं हैं. अब तक कम से कम तीन लोगों की मौत हो चुकी है, दर्जनों लोग घायल हुए हैं और हालात को नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू, सेना की तैनाती तथा शांति बनाए रखने की अपीलें जारी की गई हैं.

हिंसा की शुरुआत 26 जुलाई को सुनसरी जिले की देवानगंज ग्रामीण नगरपालिका से हुई थी. इसके बाद यह मधेश के कई जिलों तक फैल गई. यह इलाका नेपाल-भारत सीमा पर स्थित है, जहां दोनों देशों के लोगों के बीच भाषा, संस्कृति और पारिवारिक संबंध काफी गहरे हैं.

हालांकि स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक तनाव पहले भी देखने को मिला है, लेकिन शोधकर्ताओं और सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस बार हिंसा जिस तेजी और व्यापक स्तर पर फैली है, वह पहले की घटनाओं से कहीं अधिक गंभीर है.

पहली झड़प के करीब एक सप्ताह बाद भी कई कस्बों में कर्फ्यू और निषेधाज्ञा लागू है. इस बीच राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों और धार्मिक नेताओं ने नई हिंसा को रोकने के लिए शांति मार्च और अंतरधार्मिक बैठकों का आयोजन किया. नेपाल सेना समेत सुरक्षा बल संवेदनशील इलाकों में तैनात हैं और पुलिस ने दंगों में शामिल होने के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तार किया है.

कैसे एक स्थानीय विवाद पूरे क्षेत्र में फैल गया

हिंसा की शुरुआत 26 जुलाई की शाम भारत-नेपाल सीमा से 20 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित देवानगंज में हुई. श्रावण महीने के दौरान आयोजित वार्षिक बोल बम यात्रा के तहत हजारों हिंदू श्रद्धालु कोशी बैराज से पवित्र जल लेकर लौट रहे थे. भगवा झंडों और डीजे संगीत के साथ यह जुलूस कप्तानगंज चौक की ओर बढ़ रहा था. इसी दौरान स्थानीय मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने तेज आवाज वाले संगीत और कुछ रिपोर्टों के अनुसार धार्मिक झंडों की मौजूदगी पर आपत्ति जताई.

स्थानीय मीडिया की कुछ रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उसी दिन, इससे पहले कथित तौर पर एक मुस्लिम झंडा हटाकर उसकी जगह हिंदू झंडा लगा दिया गया था, जिससे पहले से ही तनाव बढ़ा हुआ था.

शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हुई, जो जल्द ही पथराव में बदल गई. देखते ही देखते बड़ी संख्या में लोग वहां जुट गए. स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने पहले भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की और बाद में गोली चलाई. इस गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि पुलिसकर्मियों समेत लगभग दो दर्जन लोग घायल हुए. प्रशासन ने अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया और अतिरिक्त सशस्त्र पुलिस बल तैनात किया.

कर्फ्यू लागू होने के बाद भी हिंसा नहीं थमी. रातभर देवानगंज के कई इलाकों में घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की खबरें आती रहीं. इसी दौरान हिंसा से जुड़े वीडियो और अफवाहें सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगीं.

अगले ही दिन मधेश इलाके के अन्य कस्बों में विरोध और जवाबी प्रदर्शन शुरू हो गए. इस तरह एक स्थानीय विवाद धीरे-धीरे व्यापक सांप्रदायिक तनाव में बदल गया.

30 जुलाई को हिंसा ने तब नया मोड़ लिया, जब सिराहा में प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 15 वर्षीय एक किशोर की मौत हो गई. इसके साथ ही पुलिस कार्रवाई में मरने वालों की संख्या तीन हो गई. इसके बाद नए सिरे से प्रदर्शन शुरू हुए और प्रदर्शनकारियों ने आसपास के इलाकों में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ की.

चार दिनों के भीतर प्रशासन ने बीरगंज समेत कई शहरों में कर्फ्यू और निषेधाज्ञा लागू कर दी.

मालूम हो कि बीरगंज भारत के साथ नेपाल का प्रमुख व्यापारिक प्रवेश द्वार है. सिराहा, महोत्तरी, मोरंग और अन्य जिलों में सुरक्षा बढ़ा दी गई. बाद में नेपाल सेना भी नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के साथ गश्त में शामिल हो गई. कुछ शहरों में ड्रोन निगरानी भी शुरू की गई.

इसके बावजूद प्रदर्शनकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाते रहे और प्रमुख राजमार्गों पर आवाजाही बाधित करते रहे.

मृतकों के परिजनों ने शुरुआत में शव लेने से इनकार कर दिया था. उनकी मांग थी कि गोली चलाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और सरकार द्वारा मुआवजा दिया जाए.

बाद में प्रशासन के साथ बातचीत के बाद समझौता हुआ, जिसके तहत सरकार ने मृतकों को शहीद घोषित करने, प्रत्येक परिवार को 10 लाख नेपाली रुपये का मुआवजा देने और परिवार के एक पात्र सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया.

शुक्रवार (31 जुलाई) तक बड़े पैमाने पर हिंसा तो थम गई, लेकिन कई जिलों में सुरक्षा बंदोबस्त और कर्फ्यू जारी रहा. स्थानीय समुदायों और धार्मिक नेताओं ने शांति मार्च निकाले, वहीं कुछ स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी होते रहे.

सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल

हिंसा से निपटने के सरकार के तरीके की विपक्षी दलों, नागरिक संगठनों और राजनीतिक विश्लेषकों ने आलोचना की है. उनका कहना है कि शुरुआती प्रतिक्रिया धीमी रही, जिसके कारण हिंसा सुनसरी से निकलकर अन्य जिलों तक फैल गई.

गृह मंत्री सुदन गुरूंग पहली झड़प के चार दिन बाद सुनसरी पहुंचे, जबकि प्रधानमंत्री बालेन शाह की पहली बड़ी सार्वजनिक प्रतिक्रिया तब आई, जब हिंसा कई जिलों में फैल चुकी थी.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि शुरुआत में ही समुदायों के नेताओं से राजनीतिक स्तर पर संवाद किया जाता, तो हालात इतने नहीं बिगड़ते.

सुनसरी में गृह मंत्री सुदन गुरूंग (हरी शर्ट में) (फोटो: अन्नपूर्ण पोस्ट)

पीड़ित परिवारों के साथ समझौते के बाद टेलीविजन पर प्रसारित अपने संबोधन में शाह ने कहा कि लोगों की जान की रक्षा करना, सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना और शांति बहाल करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है. उन्होंने लोगों से संयम बरतने की अपील की और चेतावनी दी कि हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी.

हालांकि उनके बयान के बावजूद सरकार पर यह दबाव बढ़ता गया कि वह केवल तत्काल हिंसा नहीं, बल्कि नेपाल में बढ़ रहे सांप्रदायिक तनाव के मूल कारणों पर भी ध्यान दे.

प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहे, उनकी पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने ने पहल की. उन्होंने 29 जुलाई को सर्वदलीय बैठक बुलाई, जिसमें न तो शाह और न ही गृह मंत्री गुरूंग शामिल हुए. उन्होंने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल से मुलाकात की और प्रभावित जिलों के अपनी पार्टी के सांसदों को अपने-अपने क्षेत्रों में लौटने का निर्देश दिया.

शुक्रवार को उन्होंने सिंहदरबार स्थित पार्टी के संसदीय कार्यालय में मौलाना नरुल हुसैन, मौलाना मोहम्मद खालिद, विश्व हिंदू महासंघ के महासचिव रामचंद्र तिवारी और महासंघ के सचिवालय से जुड़े राजुराज फुयाल समेत कई धार्मिक नेताओं से मुलाकात की और उनसे अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर हिंसक प्रदर्शनों को रोकने की अपील की.

सुरक्षा एजेंसियों ने पहले ही दी थी चेतावनी

पिछले सप्ताह की हिंसा से काफी पहले ही नेपाल की सुरक्षा एजेंसियां सरकार को आगाह कर चुकी थीं कि मधेश इलाके में सांप्रदायिक तनाव अधिक संगठित और खतरनाक होता जा रहा है. उनका कहना था कि छोटे-छोटे स्थानीय विवाद भी बड़े पैमाने पर हिंसा में बदल सकते हैं.

करीब तीन वर्ष पहले सीमा सुरक्षा और दंगा नियंत्रण की जिम्मेदारी संभालने वाले सशस्त्र पुलिस बल ने सरकार को एक आकलन रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें दक्षिणी तराई में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव पर चिंता जताई गई थी.

स्थानीय मीडिया के अनुसार, रिपोर्ट में कहा गया था कि मधेश इलाके के कुछ हिस्सों में धार्मिक तनाव को संगठित तरीके से भड़काने की कोशिशें हो रही हैं. इसमें खुफिया तंत्र मजबूत करने, सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बढ़ाने और संभावित संवेदनशील स्थानों की पहले से पहचान करने की सिफारिश की गई थी.

नेपाल सेना ने भी अपनी आंतरिक रिपोर्ट्स में कई बार सांप्रदायिक हिंसा की आशंका जताई थी. सेना का मानना था कि पहले स्थानीय स्तर तक सीमित रहने वाला धार्मिक तनाव अब बड़े पैमाने पर अस्थिरता पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

क्यों बढ़ रही हैं सांप्रदायिक घटनाएं

उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशिया के कई अन्य देशों की तुलना में नेपाल में लंबे समय तक संगठित हिंदू-मुस्लिम हिंसा अपेक्षाकृत कम रही हैं. धार्मिक जुलूसों, पूजा स्थलों या स्थानीय विवादों को लेकर कभी-कभी तनाव जरूर हुआ, लेकिन वे आमतौर पर सीमित दायरे में ही रहे.

शोधकर्ताओं का कहना है कि हाल के वर्षों में यह स्थिति बदल गई है.

काठमांडू स्थित सेंटर फॉर सोशल चेंज के एक अध्ययन के अनुसार, 2022 में एक, 2024 में आठ, 2025 में तीन और केवल 2026 के पहले पांच महीनों में ही 13 सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गईं. हालांकि ये आंकड़े हर वर्ष लगातार बढ़ोतरी नहीं दिखाते, लेकिन यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि ऐसी घटनाओं की संख्या और उनकी सार्वजनिक मौजूदगी दोनों बढ़ी हैं.

संघर्ष और सुशासन के विशेषज्ञ प्रकाश भट्टराई का कहना है कि हाल की हिंसा नेपाल के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है.

उन्होंने कहा, ‘ऐतिहासिक रूप से नेपाल में दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में संगठित धार्मिक हिंसा कम रही है और विभिन्न धर्मों के बीच सौहार्द देश की पहचान माना जाता रहा है. ऐसे में चार वर्षों से भी कम समय में 37 सांप्रदायिक घटनाओं का दर्ज होना और 2026 में अचानक बढ़ोतरी एक महत्वपूर्ण बदलाव है.’

शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है. मधेश इलाके के कुछ हिस्सों में बढ़ता धार्मिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया पर अफवाहों और भड़काऊ सामग्री का तेजी से फैलना तथा स्थानीय विवादों को सांप्रदायिक रंग दिए जाने की प्रवृत्ति इसके प्रमुख कारक हैं.

पहले जहां घटनाएं एक जिले तक सीमित रहती थीं, अब सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें और भड़काऊ वीडियो कुछ ही घंटों में पड़ोसी जिलों तक पहुंच जाते हैं, जिससे जवाबी लामबंदी का खतरा बढ़ जाता है.

मधेश क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी इस चिंता को बढ़ाती है. भारत के साथ खुली सीमा होने के कारण लोगों, विचारों और मीडिया का आवागमन आसान है. सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के बीच भाषा, धर्म और पारिवारिक संबंध भी गहरे हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि इससे यह क्षेत्र सीमा पार के राजनीतिक और धार्मिक प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है. हालांकि वे यह भी आगाह करते हैं कि हाल की हिंसा को केवल किसी एक बाहरी प्रभाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार स्थानीय शिकायतें, प्रशासनिक कमजोरियां और व्यापक वैचारिक बदलाव मिलकर इस स्थिति को अधिक विस्फोटक बना रहे हैं.

सीमा पार के प्रभावों पर बहस

पिछले दो दशकों में नेपाल के धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है. 2008 में राजशाही समाप्त होने के बाद नेपाल दुनिया का एकमात्र आधिकारिक हिंदू राष्ट्र नहीं रहा और उसने धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था अपनाई. हालांकि, राजशाही समर्थक समूह और हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग करने वाले संगठन आज भी इस बदलाव का विरोध करते हैं.

इसी पृष्ठभूमि में शोधकर्ताओं और नेपाली मीडिया ने मधेश क्षेत्र में व्यापक संघ परिवार से जुड़े संगठनों की बढ़ती सक्रियता की ओर ध्यान दिलाया है.

कलाम वीकली न्यूज़लेटर के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की अंतरराष्ट्रीय शाखा हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) 1990 के दशक से नेपाल में सक्रिय है और हाल के वर्षों में मधेश क्षेत्र के कई इलाकों में उसकी गतिविधियां अधिक दिखाई देने लगी हैं.

न्यूज़लेटर में हाल की हिंसा के दौरान ‘पाकिस्तान वापस जाओ’ जैसे नारे लगाए जाने और कथित तौर पर कुछ मुसलमानों को ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के लिए मजबूर किए जाने की घटनाओं का उल्लेख किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की भाषा पहले नेपाल में आम नहीं थी.

इसी तरह सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट की 2024 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों ने नेपाल के तराई जिलों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है.

वहीं अमेरिकी विदेश विभाग की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट, 2023 में नागरिक समाज के नेताओं के हवाले से दावा किया गया था कि भारत की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े दक्षिणपंथी धार्मिक समूह हिंदू राष्ट्र की बहाली की वकालत करने वाले प्रभावशाली नेपाली नेताओं को आर्थिक सहायता दे रहे हैं. हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया था कि इन आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है.

गुरुवार को प्रकाशित एक संपादकीय में हिमाल खबर ने दावा किया कि मधेश-तराई में हुई सांप्रदायिक हिंसा की उसकी पड़ताल में एचएसएस नेपाल के माध्यम से आरएसएस की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका सामने आई है.

पत्रिका का आरोप है कि इन संगठनों से जुड़े लोगों ने सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश फैलाए, ज़मीनी स्तर पर भीड़ जुटाई और धर्म की रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाया. पत्रिका ने यह भी दावा किया है कि प्रशासन इन गतिविधियों से अवगत था, लेकिन संगठनों से जुड़े प्रभावशाली लोगों के कारण उसने कोई कार्रवाई नहीं की.