नई दिल्ली: भारत ने शुक्रवार (31 जुलाई) को एमनेस्टी इंटरनेशनल के उन आरोपों पर सीधे जवाब देने से परहेज़ किया, जिनमें कहा गया था कि भारत इज़रायल को हथियारों और उनसे संबंधित सामान के निर्यात की अनुमति देकर नरसंहार संधि (Genocide Convention) और जिनेवा कन्वेंशन के तहत अपनी जिम्मेदारियों का उल्लंघन कर रहा है, जबकि इस बात के बढ़ते प्रमाण मौजूद हैं कि इनका इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसके जवाब में विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसके पास रणनीतिक और दोहरे इस्तेमाल (dual-use) वाली चीज़ों के निर्यात को नियंत्रित करने के लिए एक ‘मजबूत कानूनी और नियामक ढांचा’ है.
विदेश मंत्रालय के दो हफ्ते में होने वाली मीडिया ब्रीफिंग में एक सवाल का जवाब देते हुए मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘भारत के पास रणनीतिक व्यापार नियंत्रण पर एक मजबूत कानूनी और नियामक ढांचा है और वह अपने राष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों के अनुरूप विभिन्न देशों को दोहरे इस्तेमाल वाली चीज़ों और तकनीकों का निर्यात करता है.’
हालांकि, जायसवाल ने एमनेस्टी इंटरनेशनल के उन गंभीर आरोपों पर सीधे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिनमें कहा गया था कि भारत ‘स्पष्ट और सार्वजनिक चेतावनियों’ के बावजूद इज़रायल को ऐसे हथियारों और सैन्य पुर्ज़ों के निर्यात की अनुमति देता रहा है, जिनका इस्तेमाल गाज़ा में युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध और नरसंहार में हो सकता है.
एमनेस्टी का यह भी आरोप था कि ऐसा करके भारत नरसंहार संधि और जिनेवा कन्वेंशनों के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहा है.
विदेश मंत्रालय की यह संक्षिप्त प्रतिक्रिया एमनेस्टी इंटरनेशनल की उस रिपोर्ट के एक दिन बाद आई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि भारत हथियारों, गोला-बारूद, सैन्य पुर्ज़ों और दोहरे इस्तेमाल वाली चीज़ों के निर्यात के ज़रिए गाज़ा में ‘इज़रायल के सैन्य अभियानों को सक्षम करने वाली सप्लाई चेन में एक महत्वपूर्ण भागीदार’ बन गया है.
‘मेड इन इंडिया: द सप्लाई ऑफ वेपन्स एंड एम्युनिशन टू इज़रायल’ शीर्षक से जारी 42 पन्नों की अपनी रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि उसने 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों के बाद गाज़ा में इज़रायल के सैन्य अभियान शुरू होने से लेकर 30 नवंबर 2025 तक भारत से इज़रायल भेजी गई 2,596 खेपों (शिपमेंट) की पहचान की है. इन खेपों में छोटे हथियार, गोला-बारूद और सैन्य वाहनों में इस्तेमाल होने वाले पुर्ज़े शामिल थे.
एमनेस्टी की रिपोर्ट में नौ भारतीय कंपनियों का नाम लिया गया, जिन पर आरोप है कि उन्होंने गाज़ा युद्ध शुरू होने के बाद इज़रायल को हथियार, गोला-बारूद, सैन्य पुर्ज़े या दोहरे इस्तेमाल वाली चीज़ें निर्यात कीं, जिनमें तीन रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) शामिल हैं.
रिपोर्ट का कहना है कि गाज़ा में इज़रायल की सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी चेतावनियां लगातार बढ़ने के बावजूद ये निर्यात जारी रहे. एमनेस्टी ने भारत सरकार से इज़रायल को हथियारों और उनसे संबंधित सभी प्रकार के निर्यात तत्काल रोकने की अपील की है.
मानवाधिकार संगठन का कहना है कि भारत की निर्यात नियंत्रण व्यवस्था के तहत ऐसे निर्यातों के लाइसेंस जारी करने की जिम्मेदारी सीधे सरकार पर है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा सामग्री (स्पेशल केमिकल्स, ऑर्गेनिज़्म्स, मैटेरियल्स, इक्विपमेंट एंड टेक्नोलॉजीज़) की प्रतिबंधित सूची में आती है, जिसका प्रशासन विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) करता है.
एमनेस्टी के अनुसार, निर्यात लाइसेंस के लिए आने वाले आवेदनों की जांच एक अंतर-मंत्रालयी कार्य समूह करता है, जिसमें विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और गृह मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल होते हैं. उनकी सिफारिश के बाद ही लाइसेंस को मंजूरी दी जाती है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि SCOMET दिशानिर्देशों के तहत अधिकारियों को लाइसेंस जारी करने से पहले यह आकलन करना होता है कि: अंतिम उपयोगकर्ता (End User) कितना विश्वसनीय है, अंतिम उपयोग संबंधी घोषणा (End-use Declaration) कितनी भरोसेमंद है, और प्रस्तावित निर्यात भारत के अंतरराष्ट्रीय संधि दायित्वों के अनुरूप है या नहीं.
एमनेस्टी का तर्क है कि इन प्रावधानों के तहत इज़रायल को निर्यात की अनुमति देते समय भारत को नरसंहार सम्मेलन और जिनेवा कन्वेंशनों के तहत अपने दायित्वों को भी ध्यान में रखना चाहिए था.
