तरुण तेजपाल केस: कुछ प्रगतिशीलों के लिए न्याय और पितृसत्ता में चुनाव करना मुश्किल क्यों है?

दुनिया में सबसे आसान नैतिकता अपने शत्रु के अपराध की निंदा करना है. असली परीक्षा तब होती है जब आरोपी वह शख़्स हो, जिसके साथ आपने मंच साझा किया हो, जिसकी पत्रकारिता की प्रशंसा की हो, जिसके राजनीतिक शत्रु आपके भी शत्रु हों. तब तय करना होता है विचार बड़ा है या दोस्त? स्त्री की स्वायत्तता बड़ी है या अपना 'बॉएज़' क्लब? और यहीं बहुत-से प्रगतिशील पुरुषों की जेब से स्त्रीवाद चुपचाप गिर जाता है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

यह हतप्रभ करने वाला है कि सामाजिक-राजनीतिक और मानवाधिकार केंद्रित सिनेमा के प्रतीक पुरुष आनंद पटवर्धन ने बलात्कार के लिए दोषी पत्रकार और लेखक तरुण तेजपाल के पक्ष में ऐसी टिप्पणियां कीं, जो उनकी दीर्घ वैचारिक यात्रा से असंगत और विचलनकारी हैं.

यह वही फिल्मकार हैं, जिन्होंने धार्मिक कट्टरवाद, सांप्रदायिकता, जातिवाद, परमाणु राष्ट्रवाद, असमान विकास और सत्ता की संरचनाओं को अपनी फिल्मों में असाधारण निर्भीकता से परखा है. उनकी दृष्टि ने बार-बार यह सिखाया कि सत्ता चाहे राजनीतिक हो, धार्मिक हो या सामाजिक; उससे प्रश्न पूछना लोकतांत्रिक चेतना का अनिवार्य दायित्व है. इसीलिए तरुण तेजपाल प्रकरण पर उनकी टिप्पणी साधारण विचलन नहीं; पितृसत्तात्मक मानसिकता का घृणित उद्वेग है. जिसने जीवन भर सत्ताओं के रचे गए नैरेटिव पर संदेह करना सिखाया, वही एक प्रभावशाली पुरुष की बारी आई तो उस युवा स्त्री की गवाही को उसके चेहरे की मुद्रा और सीसीटीवी की दृश्य-सामग्री से कसौटी पर कसने लगा, जो तरुण तेजपाल के सबसे करीबी मित्र की बेटी और तेजपाल की अपनी बेटी की सबसे अच्छी दोस्त थी.

पटवर्धन ने प्रश्न उठा दिया है कि क्या प्रगतिशीलता केवल विरोधी खेमे की सत्ता को पहचानने का नाम है या अपने ही वैचारिक घर के भीतर मौजूद पुरुष-सत्ता की आपराधिकता को पहचानने के साहस की बुनियादी शर्त भी है? पटवर्धन उस जगह खड़े हैं, जहां एक प्रगतिशील पुरुष भी बलात्कार के अपराधी सिद्ध हुए वैचारिक सहयात्री को बचाने के लिए उन्हीं पितृसत्तात्मक औजारों को उठा लेता है, जिन्हें वह जीवन भर प्रतिक्रियावादी समाज के हाथों में देखकर धिक्कारता रहा है.

पीड़ित से ‘पीड़ित दिखने’ की आशा

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने 6 अगस्त 2026 को 7-8 नवंबर 2013 के मामले में तरुण तेजपाल को दोषी ठहराते हुए 2021 का बरी करने वाला निर्णय पलट दिया और दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई. खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट की साक्ष्य-मीमांसा को केवल त्रुटिपूर्ण ही नहीं, ‘परवर्स’ माना और शिकायतकर्ता की गवाही को विश्वसनीय तथा सुसंगत पाया.

इसके बाद आनंद पटवर्धन ने जो प्रश्न उठाया, उसमें दो बातें विशेष रूप से परेशान करने वाली हैं. पहली, तहलका मोदी और भाजपा के लिए राजनीतिक परेशानी था; इसलिए इस मुकदमे को उस राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए. दूसरी, सीसीटीवी में महिला तेजपाल के साथ लिफ्ट में जाती और बाहर आती सामान्य दिखाई देती है, इसलिए उन्हें यह विश्वास नहीं होता कि भीतर वैसी हिंसक घटना हुई होगी.

यही तो वह प्रश्न है, जिसे हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में लगभग शल्यचिकित्सकीय कठोरता से काटकर अलग किया. हमारे समाज ने बलात्कार पीड़िता की एक काल्पनिक मूर्ति बना रखी है. उसके बाल बिखरे हों, आंखें सूजी हों और चेहरा निर्जीव लगे. वह कांपे, रोए, भागे, लोगों से न मिले, काम पर वापस न जाए और मुस्कराए तो बिल्कुल नहीं. यदि उसके चेहरे पर दो मिनट के लिए सामान्यता लौट आए तो पितृसत्ता अपनी ऐनक ठीक करके कहती है; देखिए, यह तो सामान्य दिखाई दे रही थी!

लेकिन बलात्कार कोई फिल्मी दृश्य नहीं है. हर स्त्री चीखती या नाखून नहीं मारती या लिफ्ट से बाहर निकलते ही जमीन पर नहीं गिरती. हर आघात चेहरे पर तत्काल अपना उपशीर्षक नहीं लिख देता. ट्रॉमा की कोई अनिवार्य कोरियोग्राफी नहीं होती. हाईकोर्ट ने इसी ‘परफेक्ट विक्टिम’ अथवा ‘आइडियल विक्टिम’ की धारणा को अस्वीकार किया.

किसी सर्वाइवर की विश्वसनीयता इस बात से तय नहीं की जा सकती कि उसने आघात के बाद पुरुष-समाज की लिखी पटकथा के अनुसार व्यवहार किया या नहीं. अदालत ने उस सोच की आलोचना की, जिसमें महिला के बाद के व्यवहार, उसकी सामान्यता, दिखाई देने वाली चोट, प्रतिरोध के प्रकार अथवा कार्यक्रम स्थल पर बने रहने तक से उसकी गवाही की विश्वसनीयता मापी गई. एक कैमरे ने बंद दरवाज़े के भीतर नहीं देखा, इसलिए भीतर कुछ हुआ ही नहीं, यह न्यायबोध नहीं है. यह कैमरे को स्त्री की गवाही से ऊंचा दर्जा देने की तकनीकी पितृसत्ता है.

इस मामले का दूसरा पहलू और अधिक विचलित करता है. पीड़िता तरुण तेजपाल की कनिष्ठ सहकर्मी थी. तेजपाल तहलका के एडिटर-इन-चीफ और मालिक थे और वह संस्था में अपेक्षाकृत कनिष्ठ पद पर थीं. यानी यहां पुरुष और स्त्री केवल दो स्वतंत्र व्यक्ति नहीं थे; उनके बीच पद, उम्र, प्रतिष्ठा और रोज़गार का साफ़ सत्ता-संबंध था. हाईकोर्ट ने भी इस ‘कंट्रोल एंड डॉमिनेंस’ को महत्वपूर्ण माना. लेकिन कहानी यहां भी खत्म नहीं होती. समकालीन विवरणों में उस युवती को तेजपाल की अपनी बेटी की मित्र और उनके एक मित्र की बेटी बताया गया. अर्थात् यह केवल कार्यस्थल का विश्वास नहीं था; यह घर, मित्रता और पीढ़ियों के बीच निर्मित नैतिक भरोसे का एक स्नेहसिक्त वृत्त भी था.

और यहीं कानून के ऊपर एक दूसरा न्यायालय खुलता है और वह है रिश्तों के भरोसे का. बेटी की सहेली आपकी बेटी की उम्र की हो, आपके घर आती-जाती हो, आपके परिचय और संरक्षण के संसार में हो तो वह सिर्फ़ ‘एक अन्य युवा स्त्री’ नहीं रहती. इसमें कोई कानूनी पितृत्व घोषित नहीं किया जा रहा; यह संबंधों की नैतिक भाषा है. और वह आपके मित्र की बेटी भी हो तो विश्वास के वृत्त और गहरे हो जाते हैं. सभ्यता ने मनुष्य को इसलिए मनुष्य बनाया कि उसने रक्त-संबंधों से बाहर भी संरक्षण, विश्वास और मर्यादा के संबंध बनाए.

स्त्रीवाद यहीं पुरुष से कहता है कि वह अपनी शक्ति की सीमा पहचानो. विशेषतः वहां, जहां आयु, पद, प्रतिष्ठा, रोज़गार और भावनात्मक विश्वास सब तुम्हारे पक्ष में खड़े हों. पटवर्धन नाम का पुरुष स्वयं को ‘यूनिवर्सल’ मनुष्य और स्त्री को ‘अदर’ बना रहा है. तेजपाल प्रकरण में यह ‘दूसरा’ फिर लौट आया है.

सवालों की दिशा सिर्फ स्त्री की तरफ़

तरुण तेजपाल का पूरा इतिहास महत्वपूर्ण है. उसकी पत्रकारिता, उसकी सत्ता-विरोधी लड़ाइयां, उसकी वैचारिक प्रतिबद्धताएं, उसके राजनीतिक शत्रु, उसकी संस्था का इतिहास. और स्त्री? उससे पूछा जाता है, मुस्कराई क्यों? वहां रुकी क्यों? शराब पी थी? तुम्हारी सेक्सुअल हिस्ट्री क्या थी? उसने उस समय ऐसा क्यों नहीं किया? उसने बाद में वैसा क्यों किया?

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की इसी दिशा पर कठोर टिप्पणी की. शिकायतकर्ता के निजी जीवन, पूर्व यौन इतिहास, व्हाट्सऐप संदेशों और चरित्र को उस सीमा तक खंगाला गया, मानो कठघरे में आरोपी नहीं, स्त्री स्वयं खड़ी हो. पीड़िता से 18 तारीखों में निर्लज्जता से इतनी क्रॉस-क्वेश्चनिंग की गई कि वह अदालत के 800 से 1000 पन्नों में दर्ज़ है. हाईकोर्ट की टिप्पणी से यह अर्थ भी ध्वनित होता है कि निचली अदालत ने यह छूट कैसे दी और वे इसे कैसे होने देते रहे?

अदालत ने यह मूल सिद्धांत फिर सामने रखा कि किसी महिला की सेक्सुअल हिस्ट्री उसके किसी विशेष पुरुष को ‘नहीं’ कहने के अधिकार को समाप्त नहीं करती. यह टिप्पणी केवल तरुण तेजपाल के मुकदमे की नहीं है. यह भारतीय पुरुष की सदियों पुरानी अदालत के विरुद्ध फैसला है. स्त्री चरित्रहीन हो या चरित्रवान, उसकी सहमति आवश्यक है. वह शराब पीती हो या आबेजम या गंगाजल, सहमति आवश्यक है. उसके दस पुराने प्रेम-संबंध रहे हों या एक भी नहीं, सहमति आवश्यक है. वह घटना के दस मिनट बाद हंस दे, सहमति फिर भी आवश्यक है. यही आधुनिक स्त्रीवाद का सबसे सरल और शायद पुरुष के लिए सबसे कठिन वाक्य है.

आनंद पटवर्धन कोई साधारण दक्षिणपंथी ट्रोल नहीं हैं. उन्हें एक ऐसे प्रसिद्ध, संपन्न, अत्यंत प्रभावशाली एडिटर-इन-चीफ और उसकी युवा सबऑर्डिनेट के बीच ताकत का संबंध क्यों नहीं दिखाई दिया, जिसके बारे में विनोद मेहता जैसे प्रख्यात संपादक लिख चुके हैं, ‘उसे (तरुण तेजपाल को) अपनी पैंट की ज़िप बंद रखने में कुछ कठिनाई होती है. … मैं इतना जानता हूं कि तरुण अपने पद का दुरुपयोग इंटर्न और जूनियर कर्मचारियों को सहमति से और संभवतः बिना सहमति के शारीरिक संबंध बनाने की खातिर रिझाने के लिए जाना जाता था. जब वह मेरे यहां काम कर रहा था, तब मुझे उसकी इस शैली का आभास हुआ था… उसकी कथित उन्मादी कामेच्छा संभवतः उसके मित्र विलियम डेलरिम्पल वर्णित ‘अत्यंत आकर्षक यौन आभा’ का परिणाम हो सकती है, जिसका महिलाओं के लिए विरोध करना मुश्किल होता है. …उसके मचाए उन्माद की स्थिति, देश में घटे अपराधों और दुराचारों ने मुझे झकझोर दिया.’ (पेज 9, ‘एडिटर अनप्ग्ड: मीडिया, मैग्नेट्स, नेताज़ एंड मी’)

सत्ता विरोध अपराध से बचने का लाइसेंस नहीं

पटवर्धन का राजनीतिक तर्क भी इसी कारण कमजोर पड़ता है. किसी विस्तृत साक्ष्य-आधारित निर्णय को केवल इसलिए संदिग्ध कर देना कि दोषसिद्ध व्यक्ति सत्ता-विरोधी पत्रकार रहा है, ट्राइबल लॉयल्टी है. लेकिन अच्छी पत्रकारिता किसी पुरुष को किसी स्त्री के शरीर पर जुल्म ढाने का वीजा नहीं दे देती. यह साफ़-साफ़ दक्षिणपंथी पैट्रियार्क ‘कॉम्प्लेक्स’और स्त्री विरोधी मानसिक विकृति है. पितृसत्ता और स्त्री दुराचार ऐसी खानाबदोश प्रवृत्तियां हैं कि ये कभी दक्षिणपंथ तो कभी दबे पांव प्रगतिशीलता के कक्षों में अपने शिकार तलाश करती है.

इस लेख की प्रकाशन प्रक्रिया के बीच सोमवार (17 अगस्त) को पटवर्धन ने अपनी पूर्व टिप्पणी को लेकर माफ़ी मांगते हुए खेद जताया है, यह भी कहा है कि तेजपाल उनके मित्र या सोशल सर्किल में कभी नहीं रहे; हालांकि उनकी क्षमा के साथ दी गई सफाई फिर कई सवाल खड़े कर रही है, जिसे कई पत्रकारों और महिलाओं ने इंगित भी किया है.

दुनिया में सबसे आसान नैतिकता अपने शत्रु के अपराध की निंदा करना है. उसमें कोई जोखिम नहीं. असली परीक्षा तब होती है जब आरोपी वह शख़्स हो, जिसके साथ आपने मंच साझा किया हो, जिसकी किताब पसंद की हो, जिसकी पत्रकारिता की प्रशंसा की हो, जिसके राजनीतिक शत्रु आपके भी शत्रु हों. तब तय करना होता है विचार बड़ा है या दोस्त? स्त्री की स्वायत्तता बड़ी है या अपना क्लब? और यहीं बहुत-से प्रगतिशील पुरुषों की जेब से स्त्रीवाद चुपचाप गिर जाता है.

वामपंथ, उदारवाद और प्रगतिशीलता को सबसे अधिक नुकसान हमेशा उनके शत्रु नहीं पहुंचाते. सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है जब उनके उनके अपने बुद्धिजीवी स्त्री के न्याय और अपने पुरुष मित्र में से पुरुष मित्र को चुन लेते हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)