क्या आज़ादी के बिना कोई कला संभव है?

'आज़ादी के मायने' श्रृंखला: आज रंगकर्मी व्यापक तौर पर आलोचना को अपनी प्रस्तुति से बाहर कर रहे हैं. बहुत से लोग सेल्फ़ सेंसरशिप में चले गए हैं. इस नज़रिये से हम आज़ादी के किस मायने की तलाश कर रहे हैं. क्या आज़ादी के बिना कोई कला संभव हो सकती है?

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है 17वीं क़िस्त.

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हाल ही में दिल्ली में रंगमंच की राजधानी मंडी हाउस के एक प्रेक्षागृह में मैं नाटक देख रहा था. नाटक में सब कुछ था- एक अच्छा नाट्यालेख, समर्थ अभिनेता, संस्थान, बजट, तामझाम- वह सब कुछ जो एक हिंदी प्रदेश के रंगकर्मी को दुर्लभ होता है लेकिन इन सबके बावजूद प्रस्तुति में वह बात नहीं आ पाई. मैंने सोचा कि क्यों? मुझे एक कारण पता लगा कि निर्देशक ने प्रस्तुति करने में यह सावधानी बरतनी चाही थी कि नाटक में कुछ भी आलोचनात्मक सबटेक्स्ट छन के बाहर ना आ पाए. उन्होंने अपने को खुद ही सेंसर कर लिया था. नाटक के जरिए अपनी बात कह सकने की आज़ादी उन्होंने स्वयं ही गंवा दी थी.

आज़ादी की खोज एक नए सिरे से शुरू हुई है और जिसका अक्स हमें भारत की सड़कों, शैक्षिक परिसरों और अन्य जगहों पर भी दिखने लगा है. क्योंकि एक बात सब महसूस कर रहे हैं कि कुछ भी कह सकने की आज़ादी पर नियंत्रण हो गया है, और इस आज़ादी पर नियंत्रण सत्ता के नियंत्रण के साथ-साथ परिवेश का है. अपने को अभिव्यक्त कर पाने में संकट आप महसूस करें और फिर आपको कोई ऐसी जगह मिले और ऐसा रास्ता मिले जहां आप दूसरों को खुलकर अभिव्यक्त करता हुए देखते हैं तब इस उपक्रम में जनता शामिल होने लगती है और विस्तार होने लगता है.

यह विस्तार भाषा का बंधन तोड़ती है और तयशुदा अभिव्यक्तियों का भी. और एक बार फिर इस पर नियंत्रण की कोशिशें होने लगती हैं लेकिन आज़ादी का मतलब विपरीत माहौल में भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए रास्ता तलाशना है. मैं देखता हूं कि युवा इस कतार में आगे खड़े हैं, बुजुर्ग उनके लिए एक संहिता बनाना चाह रहे हैं लेकिन वे खुलकर अपनी बात कह रहे हैं. इसमें अनुशासन कई बार टूटता है, गलतियां भी होती हैं लेकिन गलती करने की भी आज़ादी देनी चाहिए जब तक उससे समाज का नुकसान ना होता है.

आज़ादी उस परिवेश का भी निर्माण करती है जहां लोग निडर होकर अपनी बात कह सकें. आज़ादी की आवश्यकता को सब महसूस नहीं कर पाते, क्यों नहीं कर पाते यह भी सोचना चाहिए!

भारत जब आज़ाद हुआ तो कला ख़ासकर रंगमंच की दुनिया के लोग भारतीय पहचान निर्मित करने के लिए आगे आए. भारतीय रंगमंच की पहचान क्या होगी? उसकी वैश्विक उपस्थिति क्या होगी? उसका अपने देश की जनता से कैसा संवाद होगा? वह भारतीय परम्परा के सातत्य से कैसे जुड़ेगी? ऐसे सवाल उनकी चिंता और सरोकार में शामिल थे. हबीब तनवीर, इब्राहिम अल्काज़ी, गिरीश कर्नाड जैसे लोग इसके केंद्र में थे जो अपने समय के वैश्विक रंगमंच और कला की दुनिया को देख समझ कर भारत लौटे थे.

इब्राहिम अलक़ाज़ी ने तो आज़ाद भारत की शासकीय परियोजनाओं के साथ कदमताल करते हुए भारतीय रंगमंच की अभिव्यक्ति को आकार दिया जिसमें केवल शासन का प्रचार नहीं था. रंगमंचीय सौन्दर्यशास्त्रीय की खोज और उसकी स्थापना के साथ-साथ रंगमंच के सामाजिक सरोकार की स्थापना भी उनके उद्देश्यों में शामिल था. जगदीशचंद्र माथुर के नाटक ‘कोणार्क’ का केन्द्रीय द्वन्द्व ही था कि शिल्पियों की राष्ट्र में क्या भूमिका होती है?

आज आज़ादी के इतने साल बाद रंगमंच की दुनिया, जिससे मेरा आत्मीय और पेशेवर ताल्लुक है, को देखता हूं तो आज़ादी के मायने बदले हुए नज़र आते हैं. शासन के साथ कदम ताल करते संस्थान और रंगकर्मी प्रचारक में बदल गए हैं, असहमति और प्रश्नों की कोई गुंजाइश नहीं है. बस थोड़े से लोग हैं जो रंगमंच की सामाजिक भूमिका की खोज करते हुए सौन्दर्यशास्त्रीय चिंताओं से भी जूझ रहे हैं लेकिन वो भी हर वक्त आशंकित रहते हैं. विविधता का तथ्य गौण किया जाने लगा है और एक्यवाद का वर्चस्व स्थापित हो रहा है.

भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने उन्नीसवीं सदी में नाटक की भूमिका के बारे में ज़ोर देकर कहा था कि वह आलोचना है, लेकिन आज रंगकर्मी व्यापक तौर पर आलोचना को अपनी प्रस्तुति से बाहर कर रहे हैं. सत्ता की विचारधारा से जुड़े लोग भी बंदिश में रहते हैं और रंगमंच की कोई अपनी विचारधारा हो सकती है, यह भुलाने की कोशिश कर रहे हैं. बहुत से लोग सेल्फ़ सेन्सरशिप में चले गए हैं, जोखिम नहीं लेना चाहते क्योंकि जोखिम लेते ही संकट का दरवाजा खुल जाता है.

इस नज़रिये से हम आज़ादी के किस मायने की तलाश कर रहे हैं. क्या आज़ादी के बिना कोई कला संभव हो सकती है?

आज़ादी की मेरी स्मृतियां कहां से शुरू होती हैं? यह जब मैं याद करता हूं तो मुझे अपना स्कूल याद आता है, उसमें मनाया जाने वाला पन्द्रह अगस्त और उसमें मिलने वाली इमरती याद आती है. फिर इन अवसरों पर दिया जाने वाला भाषण याद आता है. एक दिन मैं भी भाषण देने लगता हूं, परेड में शामिल होने लगता हूं… लेफ्ट राइट लेफ्ट… झंडे को सलामी देता हूं, राष्ट्रगान गाते हुए रोमांचित होता हूं… तमाम प्रतियोगिताओं में भाग लेता हूं, जीतता हूं, हारता हूं… गीत सुनता हूं. हर साल गीत वही, रोमांच, पुलक और उत्तेजना वही. धीरे-धीरे मुझे ये सब कवायद लगने लगता है औऱ दोहराव भी. मुझे लगता है कि भाषण और परेड निरंतर चल रहा है लेकिन इसके आस-पास कुछ बदल क्यों नहीं रहा?

मुझे धूमिल की कविता का स्मरण हो आता है. मैं इतिहास में जाता हूं और खोजना चाहता हूं कि शिद्दत और कोशिशों से मिली आज़ादी का हमने किया क्या? अपने आस-पास के बहुत से लोगों पर निगाह करता हूं, हाशिये पर जीने वाले लोगों को तो पता ही नहीं है कि आज़ादी है क्या? वह तो जीवन की बहुत-सी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं. उनकी अपेक्षाओं और ज़रूरतों का संसार सीमित है, उस संसार में जूझते हुए वह अपने से कभी पूछते ही नहीं है कि आज़ादी के लिए उनके लिए क्या मायने है?

एक स्वस्थ लोकतंत्र में हर नागरिक की न्यूनतम चेतना में जिस विचार को शामिल होना चाहिए था, उसकी कोई जगह नहीं है. आज़ादी के लिए नारा भी लग रहा है और उसी समय कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि मिल तो गई आज़ादी अब कितनी आज़ादी चाहिए? इतने सालों बाद भी एक बार फिर उन्हीं बुनियादी सुविधाओं की मांग हो रही है- स्कूल, हॉस्पिटल और सड़क. लेकिन ये तो लोगों के सामने बने और उन्हीं के सामने बिगड़े. सार्वजनिक व्यवस्था कैसे ठीक रहे इसके लिए दबाव नहीं बनाया और निजी व्यवस्थाओं को पोषित किया. सरकार से उन्होंने बस कुछ सुविधाएं चाहीं.

एक तरफ़ ऐसे लोग हैं जो अपनी रोजमर्रा की दुनिया में क़ैद हैं, परेशान हैं, उसी से जूझते रहते हैं. इसके बरक्स कुछ लोग हैं जिन्होंने इस देश की आज़ादी का लाभ उठाया, इस व्यवस्था में अपनी प्रगति की, अपनी दुनिया बड़ी बनाई, शक्ति हासिल किया और फिर उसी शक्ति के केंद्र को स्वकेंद्रित करके संकुचित कर लिया. अब वह अपने लिए जैसी आज़ादी हासिल कर चुके हैं, दूसरे लोगों के लिए वैसी आज़ादी उपलब्ध नहीं कराना चाहते. अपने लिए उनके पास अकूत संसाधन हैं और उसी समय वह फ़ैसला भी लेते हैं कि दूसरे लोग कम संसाधनों में किसी तरह जीवन जीते चले जायें. एक ही देश में इतना बड़ा फासला है जिसे पाटना नामुमकिन लगता है.

आजकल मैं सड़क पर चलते हुए, बाज़ार में, पेशेवर स्थल पर, अक्सर क्षुब्ध और चिड़चिड़ा होता रहता हूं. महसूस करता हूं कि एक व्यवस्था ही ऐसी बनी हुई जिसमें अव्यवस्था को जीतने के लिए छोड़ दिया गया है. इसमें विवेक की जगह नहीं है. व्यक्तिवाद और महत्त्वाकांक्षी हावी है. हर व्यक्ति किसी तरह संरचना में ऊपर जाना चाहता है. वह अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति में कितनी संभावनाओं को समाप्त करता है, इसकी उसे चिंता नहीं है. कर्तव्य और अधिकार की जो व्यवस्था बनाई गई है, उसमें भी उनका विश्वास नहीं है. ‘बहुत बहुत लेना और बहुत बहुत कम देना’ उनका सरोकार है. और यह किसी भी व्यवस्था में अपना हित खोज लेते हैं.

आस-पास के अपने इस परिवेश को देख कर मुझे यह सवाल कम परेशान करता है कि आज़ादी के मेरे लिए क्या मायने है? बल्कि यह अधिक परेशान करता है कि हम सब आज़ादी के मायने की एक सामूहिक तलाश क्यों नहीं कर रहे जिसमें हर व्यक्तित्व को उसकी अपनी इच्छा और क्षमता अनुसार अपनी निजता का, सार्वजनिक हित का ध्यान रखते हुए, विकसित करने का अवसर मिले. इस सामूहिकता की सार्वजनिकता में उपस्थिति, जिसमें सबकी चिंता सबकी प्राथमिकता में हो, के लिए कोशिश करना ही आज़ादी का सच्चा मतलब तलाशना है.

(लेखक रंग समीक्षक हैं. उन्होंने हबीब तनवीर के रंगकर्म पर ‘वैकल्पिक विन्यास’ पुस्तक लिखी है. )

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