इस समय माहौल ऐसा है कि उसमें झूठ, घृणा, हिंसा और डर बहुत फैल गए हैं. आम तौर पर ज़्यादातर लोग कुछ असहमति व्यक्त करने, आलोचना करने आदि से बचने लगे हैं. लेखकों और बुद्धिजीवियों तक को डर लगता है कि उनके कुछ कहने से उनके विरूद्ध कोई कार्रवाई न हो जाए. हालत तो यह है कि राजस्थान में किसी शैक्षणिक संस्था द्वारा अपने विदाई समारोह को उर्दू नाम देने पर शासकीय आपत्ति की गई है. डराया तो जा ही रहा है; लोग, वे भी, जिनमें साहस और निर्भीकता होना चाहिए, डर के मारे चुप हैं. अजब दुश्चक्र है कि डराया जा रहा तो लोग डर रहे हैं; तो और सख़्ती से डराया जा रहा है. लोकतंत्र भयतंत्र में बदलता लग रहा है.
एक कविता संग्रह आया जो साफ़बयानी का अच्छा दस्तावेज़ है. हमारे डरे समय में यह साफ़बयानी निश्चय ही साहस का काम है. लेकिन उसमें एक अंतर्विरोध भी है: उसमें साफ़बयानी तो बहुत है, कविता अपेक्षाकृत कम है. यह तर्क दिया जा सकता है और उसमें बल होगा कि इस समय साफ़बयानी अधिक ज़रूरी है, उसका प्रभाव भी शायद अधिक पड़ता है. जो स्थिति है उसमें कविता बिना अभिधा या साफ़बयानी के शायद वैसा प्रभाव नहीं डाल सकती. पर क्या सिर्फ़ इसलिए साफ़बयानी की जगह बनाते हुए कविता को खुद को कुछ कम या लगभग ग़ायब कर लेना चाहिए? इस प्रतितर्क में भी बल है कि हर हालत में कविता को कविता बने रहना चाहिए. साफ़बयानी में अक्सर सच्चाई या सच समस्याग्रस्त नहीं होते. वे स्पष्ट होते हैं और उसमें अक्सर ही आत्मलिप्ति नहीं होती. क्या ये अभाव कविता को कम प्रामाणिक या कम नैतिक नहीं कर देते हैं? अगर हां, तो फिर कविता को ऐसी राह निकाल सकना चाहिए कि सच कहने की बेबाकी भी बनी रहे और कुछ और भी कहा जा सके- यह कुछ और अपनी ज़िम्मेदारी को हिसाब में लेना होगा.
एक और पक्ष है. जब व्यापक रूप से साहित्य-बुद्धि-ज्ञान के क्षेत्रों में कायर चुप्पी छाई हुई है, मीडिया का बहुत बड़ा लोकप्रिय और प्रभावशाली हिस्सा पालतू और गोदी मीडिया होकर स्वामिभक्ति में पूंछ हिला और तलुए चाट रहा है तब अगर कोई साफ़बयानी कर रहा है तो उसके साहस और निर्भीकता का स्वागत होना चाहिए, भले उसमें कविता की कुछ क्षति हो रही है. हमारी मुश्किल यह है कि हमें इस समय सत्यवचन भी चाहिए और कविता भी. अगर इस दबसट में कुछ घालमेल हो रहा है तो उस पर आपत्ति करना या बिसूरना शायद असामयिक होगा. आगे जाकर यह स्पष्ट है कि यह साफ़बयानी साहसी बयान के रूप में तो बची रहेगी, कविता के रूप में नहीं. इस समय तो, किसी हद तक, वह कायरता के तिलिस्म को तोड़ रही है.
पीछेदेखू आधुनिकता
हम कितने आधुनिक हैं, कितने नहीं हैं यह बहस-तलब है. पर हम एक बड़े अंतर्विरोध में फंसे हुए ज़रूर हैं. सारी राजनीति, विशेषकर सत्तारूढ़ राजनीति, हमें सपने तो भविष्य के दिखा रही है और उसी समय हमें बार-बार पीछे देखने की ओर ढकेल भी रही है. गतिशास्त्र का एक अब तक न खोजा जा सका सिद्धांत उसने पा लिया है कि हम जितना पीछे जाएंगे उतना आगे बढ़ेंगे? जिस देश में विषमता भयावह रूप से बढ़ रही है; ग़रीबी और बेरोज़गारी का स्तर अभूतपूर्व हो चुका है; जिसका विश्व भ्रष्टाचार की सूची में बहुत ऊंचा स्थान है; जिसमें दलितों-अल्पसंख्यकों-स्त्रियों-बच्चों पर जघन्य अपराध तेज़ी से बढ़ रहे हैं, उसमें बहस हो रही है कि औरंगजेब ने क्या-किया- क्या-कहा या शिवाजी ने. जिस देश का लगातार अपमान अमरीकी राष्ट्रपति कर रहा है, उसमें यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि भारत विश्वगुरू बन रहा है. हमारा एक ही विश्वविद्यालय विश्व के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों की दो सौ की सूची में नहीं है, जहां अपढ़ राज्यपाल ज्ञान बघार रहे हैं कि हमारे शास्त्रों में सारा मानवीय ज्ञान सदियों पहले संकलित हो चुका था. बहस इस पर नहीं हो रही है कि भुखमरी की विश्व-सूची में हमारा स्थान क्यों इतना ऊंचा है.
कहा जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में भारत अग्रगामी है. टेक्नोलॉजी में हमारी उपलब्धि के बरक़्स विज्ञान में हम इतने पिछड़ क्यों रहे हैं? और तो और, ऐसा क्यों है कि इस समय हमारे प्राचीन और मध्यकालीन साहित्य के, कला-शिल्प-दर्शन-भाषा चिंतन के बड़ी संख्या में, लभग अधिकांश विद्वान-विशेषज्ञ-अध्येता भारत में नहीं, विदेशों में हैं? अतीत के ज्ञान की इस विपन्नता का कोई वस्तुनिष्ठ आकलन, उसे दूर कर सकने की कोई ठोस उपायों पर कोई बहस क्यों नहीं हो रही? क्या सत्ता हमें ज्ञान और सृजन के क्षेत्रों में निरूपाय बना रही है? क्या अंतत: हमारी आधुनिकता, कुल मिलाकर, अधकचरी है? यह तो स्पष्ट है कि आधुनिकता की टेक्नोलॉजी से लैस भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा, जो ज़्यादातर मध्यवर्ग से आता है, पीछेदेखू आधुनिकता की चपेट में है. यही कारण है कि इस समय बहस के मुद्दे औरंगजेब और शिवाजी हैं.
यह पीछेदेखू आधुनिकता अतीत के बारे में जिज्ञासा से भरी नहीं है: वह मुदित मन, सारे प्रामाणिक तथ्यों और तर्कों, लिखित और कई तरह से दर्ज़ साक्ष्य को नज़र-अंदाज़ कर उस अतीत की दुर्व्याख्याओं में यक़ीन कर रही है. इस अंधभक्त संशयहीन प्रश्न-शून्य मानसिकता को आधुनिकता कहना ग़लत और निराधार होगा. उसकी व्याप्ति पढ़ेलिखों में है और वे आधुनिक तकनालजी और सुख-सुविधाओं का उपयोग करने के बावजूद आधुनिकता के बुनियादी लक्षण प्रश्नवाचकता और संवाद से अछूते हैं.
धर्मान्ध और सांप्रदायिक राजनीति ने हमारी परंपरा और हमारी आधुनिकता दोनों को ही विकृत-विदूषित कर दिया है. उसका आक्रामक प्रभाव इतना गहरा है कि हमें आगेदेखू आधुनिक होने के लिए दशकों तक बड़ा संघर्ष करना होगा.
फ़िल्मकार के अनूठे पत्र
विख्यात फ़िल्मकार अमित दत्ता द्वारा अपने भांजे पार्थ को फ़िल्मों और कलाओं की दुनिया से लिखे गए पत्रों का एक अनूठा संग्रह जल्दी ही प्रकाशित होने जा रहा है. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उसमें एक जिज्ञासु युवा को फ़िल्म और कलाओं के मर्म और रहस्य को सहज ढंग से बताने-समझाने की कोशिश है. बल्कि इसलिए कि इस बहाने हम स्वयं इस बहुप्रशंसित फ़िल्मकार के अपने संघर्ष, उसकी अपनी लंबी कोशिश और समझ से दो-चार हो पाते हैं. इसलिए भी कि उसमें हमें सिनेमा के इतिहास, कई महान फिल्मकारों के प्रयत्नों का विश्लेषण, कई कलारूपों और उनके फ़िल्मों में सर्जनात्मक प्रवेश आदि के बारे में जानकारी मिलती है और जीवन-जगत् से कलाओं के संबंध और संवाद का सुख भी.
अमित दत्ता एक पत्र में कहते हैं कि फ़िल्म बनाना ‘एक रहस्यमयी प्रक्रिया है जैसे तुम अपनी कल्पना के धागों से एक नई दुनिया बुन रहे हो. और हां, कभी-कभी उस बुनाई में कुछ धागे उलझ जाते हैं, कुछ कट जाते हैं, लेकिन अंत में जो कपड़ा बनता है, उसमें तुम्हारी मेहनत, तुम्हारे सपने और तुम्हारी कला की चमक होती है.’ पार्थ को सलाह देते हुए वे कहते हैं कि ‘हिन्दी और अंग्रेज़ी के साथ-साथ अपनी मातृभाषा डोगरी भी पढ़ो. ये तीनों भाषाएं मिलकर तुम्हारे जीवन को समृद्ध करेंगी.’ वे जोड़ते हैं कि ‘किताबें हमें वह दुनिया दिखाती हैं, जो हम कभी नहीं देख पाते, और कई बार वे हमें अपनी ही भीतर के रहस्यों से मिलवाती हैं.’ वे इसरार करते हैं कि ‘यह सब कुछ हमें यही सिखाता है कि साधारण में भी असाधारण छिपा होता है, सादगी में भी जटिलता को सकती है, और उस जटिलता को समझना ही कला की असली पहचान है.’
उनका मत है कि ‘सिनेमा केवल एक मनोरंजन नहीं है बल्कि ऐसी अनुभूति है, जिसे हम जीते हैं, देखते हैं, और कभी-कभी, उसकी रोशनी में खो जाते हैं.’ एक पत्र में वे कहते हैं: ‘हर फ़िल्म, हर दृश्य में एक शतरंज की बिसात सी बिछी रहती है, जहां निर्देशक और दर्शक, दोनों एक अदृश्य खेल खेलते हैं. सिनेमा और शतरंज दोनों-ही अपने-अपने ढंग से हमें जीवन के रहस्यों से रूबरू कराते हैं.’ उनके अनुसार ‘अच्छा सिनेमा वह है जिसे हर कोई अपनी ही दृष्टि से देख सके, उसे तोड़ सके, जोड़ सके और शायद उसे फिर से बना भी सके.
ये पत्र मुख्यतः फ़िल्म के बारे में होते हुए भी अनेक बड़ी-छोटी हस्तियों जैसे खिलौने, पल्लगुंजी, वारली, नैणसुख, सत्यजीत राय, मोढेरा का सूर्यमंदिर, बी एन गोस्वामी, यामिनी राय, कृष्ण बलदेव वैद, रामकुमार, परमजीत सिंह, मेरी-पियरे दुहामेल, जनगढ़ सिंह श्याम, नन्दिकेश्वर, सीता देवी मधुबनी, राजेंद्र टिक्कू, जार्ज मेलिएम, एबरहार्ड आदि की एक चित्रमाला ही इन पत्रों में बनती है. खुद अमित का फिल्म-संसार, विचार-वितान, दृष्टिपथ कितना विस्तृत, जटिल और कला और जीवन दोनों ही स्तरों पर कितना चौकन्ना है, इसका भी अनुभव होता है.
यह एक अनूठी और पठनीय पुस्तक है जिसे पढ़कर हर पाठक कृतकृत्य और कृतज्ञ अनुभव करेगा. वह जल्दी ही प्रकाशित होने जा रही है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
